रविवार, 18 अगस्त 2013

मथुरा के मठाधीशों की मायावी दुनिया का सच

(लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष) राजनीति का अपराधीकरण तो एक लंबे समय से चर्चा में है और उसे लेकर न्‍यायपालिका भी चिंतित है पर राजनीति का एक अन्‍य नापाक गठजोड़ न चर्चा में है, न उसके लिए कोई चिंतित है जबकि वह देश व समाज की बर्बादी का बड़ा कारण बना हुआ है।   जी हां! यह गठजोड़ है तथाकथित धर्मगुरुओं एवं राजनीति का। इस नापाक गठजोड़ की गहराई का अंदाज यदि लगाना हो तो भगवान कृष्‍ण की जन्‍मस्‍थली मथुरा और उसके आस-पास आकर देखिये। वृंदावन, महावन, कोकिलावन, गोवर्धन, गोकुल, नंदगांव, बरसाना, बल्‍देव आदि अनेक स्‍थानों पर चारों ओर राजनीति और धर्म के नापाक गठजोड़ से उपजा धंधा फलता-फूलता नजर आयेगा। कहते हैं कि किसी भी पापकर्म के लिए धर्म और धार्मिक स्‍थानों से बड़ी कोई आड़ नहीं होती। तथाकथित धर्मगुरू इस आड़ का आधार होते हैं। फिर मथुरा तो विश्‍व पटल पर अपनी विशिष्‍ट धार्मिक छवि के कारण ही पहचाना जाता है और उसकी इस छवि के अनुरूप यहां नामचीन धर्मगुरुओं, संत-महंतों, भागवताचार्यों एवं मठाधीशों की लंबी फेहरिस्‍त है। धर्म की आड़ में कई दशकों से जड़ जमाये बैठे ये धंधेबाज कानून-व्‍यवस्‍था को खुली चुनौती दे रहे हैं और इनके द्वारा अर्जित अकूत संपत्‍ति बड़े विवादों का कारण बनी हुई है लेकिन कोई कुछ नहीं कर पा रहा क्‍योंकि इस संपत्‍ति में राजनेताओं की साइलेंट हिस्‍सेदारी है। बात शुरू करते हैं

शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

गुलाम' ही हैं हम अब भी, और गुलाम ही रहेंगे..

(लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष) 
आज की शुरूआत एक कहानी से करते हैं। कहानी कुछ यूं है- रास्‍ते से गुजरते किसी व्‍यक्‍ति को एक ही स्‍थान पर हाथियों का झुण्‍ड दिखाई दिया। उत्‍सुकतावश वह रुक गया तो उसने देखा कि सारे हाथी थोड़ी-थोड़ी दूरी पर पेड़ों के किनारे खड़े हैं। गौर करने पर पता लगा कि हर हाथी का एक-एक पैर उस रस्‍सी से बंधा है जो रस्‍सी पेड़ से बंधी है।
राहगीर ने इधर-उधर नजरें घुमाईं तो उसे एक व्‍यक्‍ति भी दिखाई दिया। यह व्‍यक्‍ति इन हाथियों का महावत था।
राहगीर ने महावत से पूछा- क्‍यों भाई! ये इतना बलशाली जीव जो चाहे तो एक झटके में पेड़ को उखाड़ दे, एक मामूली रस्‍सी से कैसे बंधा है ?
इस पर महावत का जवाब था- मैं इन हाथियों की देखभाल इनके बचपन से कर रहा हूं। तब मैं इनकी उम्र को देखकर इनके एक-एक पैर में रस्‍सी बांध दिया करता था और ये उसी से बंधे रहते थे।
अब बेशक ये बड़े हो चुके हैं और इनमें अपार ताकत है लेकिन एक रस्‍सी से बंधे रहने की इनकी सोच नहीं बदली।
ये अब भी यही सोचते हैं कि इस रस्‍सी को तोड़ना इनके वश की बात नहीं। सच तो यह है कि यह रस्‍सी या पेड़ से नहीं, अपनी सोच से बंधे हैं।
अब न तो ये आजाद होने की कोशिश करते हैं और ना ही बंधनमुक्‍त होना चाहते हैं।
इन्‍होंने अपने जीवन को एक मामूली सी रस्‍सी के हवाले कर दिया है

रविवार, 11 अगस्त 2013

कंडम बुलेटप्रूफ जैकेट्स के कारण मारे गए भारतीय जवान

नई दिल्‍ली। जम्मू-कश्मीर के पुंछ सेक्टर की सरला पोस्ट पर पाकिस्तान के हमले को लेकर चौंकाने वाली जानकारियां सामने आई हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक हमला भारतीय सेना के यूनिट और ब्रिगेड लेवल पर कमांड और कंट्रोल के फेल होने के कारण हुआ था। सैनिकों ने जो बुलेट प्रूफ जैकेट पहन रखे थे, वे काम नहीं कर रहे थे।
तीन जवानों को काफी नजदीक से छाती में गोलियां मारी गई थीं। सूत्रों के मुताबिक या तो जवानों ने स्टैण्डर्ड बुलेटप्रूफ जैकेट नहीं पहन रखे थे या जैकेट काम नहीं कर रहे थे। चौथे जवान को आंखों के बीच गोलियां मारी गईं थीं। पांचवें जवान को हाथ और पैरों में गोलियां मारी गईं थीं। बहुत ज्यादा गोलियां लगने के कारण उसकी मौत हुई।

विकास नहीं, विनाश करा रहा है MVDA

(लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष)
क्‍या वाकई विकास प्राधिकरण की इस विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक जनपद के विकास में कोई भूमिका है या ये अथॉरिटी विकास की आड़ में विनाश का ऐसा खेल रच रही है जो सरकार से ज्‍यादा अधिकारियों के लिए मुफीद साबित हो रहा है ?
मथुरा-वृंदावन में तिराहों-चौराहों सहित सभी प्रमुख सड़कों के दोनों ओर निगाहें डालने से तो किसी को भी यह मुगालता हो सकता है कि कृष्‍णकालीन यह जिला तरक्‍की के नित नए आयाम स्‍थापित कर रहा होगा लेकिन हकीकत यह है कि शहर के विकास से कई गुना अधिक विकास मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण में तैनात अधिकारियों का हो रहा है और शहरी विकास के नाम पर विनाश की ऐसी इबारत लिखी जा रही है जिसके दुष्‍परिणाम भविष्‍य में अत्‍यंत भयानक साबित होंगे।

PMO ने सेना के हाथ बांध रखे हैं

नई दिल्‍ली। एक समाचार पत्र की रिपोर्ट के मुताबिक प्रधानमंत्री कार्यालय ने सेना के हाथ बांध रखे हैं। सीनियर कमांडरों के मुताबिक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ओर से लागू किए गए नियमों के कारण ही पाकिस्तान की फौज के हाथों हमारे सैनिक मारे गए हैं। कमांडरों का कहना है कि मौजूदा सेनाध्यक्ष जनरल बिक्रम सिंह प्रैक्टिकली पीएमओ के निर्देशों का पालन करते हैं जबकि सार्वजनिक रूप से वे टफ स्टैण्ड लेते हुए दिखाई देते हैं।
सूत्रों के मुताबिक इन दिनों रक्षा मंत्रालय के बाबू टेक्‍टीकल डिसीजन ले रहे हैं जबकि फैसले फील्ड कमांडरों पर छोड़ देने चाहिए। ऑपरेशन मामलों में रक्षा मंत्रालय का हस्तक्षेप खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है। कमांडरों के मुताबिक पाकिस्तान के सैनिक हमेशा हम पर ताना कसते हैं कि यह दिल्ली का हुकूम है। इस कारण हमारे सैनिक पाकिस्तान की उकसावे की कार्यवाही का कोई जवाब नहीं देते।
जून 2012 के बाद नियंत्रण रेखा और वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सीमा पार की घटनाओं में बढ़ोत्‍तरी हुई है। जून 2012 में ही जनरल बिक्रम सिंह ने जनरल वीके सिंह से सेना की कमान अपने हाथ में ली थी। हालांकि एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि पिछले एक साल में जवाबी कार्यवाही में जो डाइल्यूशन हुआ है उसमें जनरल बिक्रम सिंह की कोई गलती नहीं है। एक अनुशासित सिपाही होने के नाते जनरल सिंह के पास राजनीतिक और नौकरशाही नेतृत्व की ओर सी दी गई नीति का पालन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। जिन कमांडरों ने प्रो एक्टिव स्टैंस लिया उनको करियर में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा है जबकि पाकिस्तान के मामले में ठीक इसका उल्टा है।
-एजेंसी

सोमवार, 5 अगस्त 2013

कोषदा बिल्‍डकॉन का प्रोजेक्‍ट 'मंदाकिनी' गैरकानूनी

दिल्‍ली के निवेशक ने लगाए गंभीर आरोप
प्रोजेक्‍ट 'मंदाकिनी' को गैर कानूनी बताया (लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष)
यदि आप भगवान कृष्‍ण की क्रीड़ास्‍थली वृंदावन में 'कोषदा बिल्‍डकॉन प्रा. लि.' के मल्‍टी स्‍टोरी आलीशान रिहायशी प्रोजेक्‍ट 'मंदाकिनी' के निवासी बनने का सपना पाले हुए हैं तो थोड़ा ठहर जाइए।
अगर आपने इस प्रोजेक्‍ट में पैसा लगा रखा है तो संभल जाइए क्‍योंकि 'मंदाकिनी' आपको बहाकर भी ले जा सकती है और डुबो भी सकती है।
इस आशय की चेतावनी 'कोषदा बिल्‍डकॉन प्रा. लि.' के ही एक निवेशक द्वारा दी जा रही है।
जैन रियल्टर्स प्रा. लि. के निदेशक अजय कुमार जैन पुत्र श्री सुरेश चन्द्र जैन ने इस मामले में बाकायदा कोर्ट के आदेश से दि. 25 जुलाई 2013 को 'कोषदा बिल्‍डकॉन प्रा. लि.' के मालिकानों श्याम सुन्दर बंसल पुत्र श्री गोपाल दास बंसल निवासी-मकान नंबर 2255, भक्तिधाम भरतपुर गेट मथुरा, गौरव अग्रवाल पुत्र श्री माधव प्रसाद अग्रवाल  निवासी मकान नंबर 1684 गली ख्याला, मण्डी रामदास मथुरा, नरेन्द्र किशन गर्ग पुत्र श्रीराम गर्ग निवासी मकान नंबर जी 6 किशना अपार्टमेंट, मसानी तिराहा, मथुरा तथा कोषदा बिल्डकॉन प्रा. लि. कोषदा हाउस तिलक द्वार, मथुरा (उ॰प्र॰) के खिलाफ थाना कोतवाली वृंदावन में एफआईआर दर्ज कराई है।
मुकद्दमा अपराध संख्‍या 503/13 पर धारा 380, 384, 387, 392, 406, 409, 417, 420, 423, 424, 427, 448, 451, 452, 456, 467, 506, 120 B आईपीसी के तहत दर्ज इस मामले में दिल्‍ली निवासी अजय जैन ने जो आरोप कोषदा बिल्‍डकॉन प्रा. लि. के मालिकानों एवं कंपनी पर लगाए हैं उनके अनुसार उक्‍त लोग जनवरी 2011 में चार-पांच अन्‍य लोगों के साथ उनसे मिलने पहुंचे।

रविवार, 4 अगस्त 2013

माई-बाप! अहसानमंद हैं हम आपके

(लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष)
लोकतंत्र  क्षत-विक्षत हो चुका है। लोक से तंत्र पूरी तरह कट गया है। क्षत-विक्षत लोकतंत्र पर राजनीति अट्टहास कर रही है। राजनीतिज्ञों का सर्वाधिक वीभत्‍स और डरावना चेहरा जनता के सामने है।
उसे समझ में नहीं आ रहा कि वह आखिर करे तो करे क्‍या।
दिन-रात भ्रष्‍टाचार की जुगाली करने वाले सत्‍तापक्ष और उस जुगाली का ढिंढोरा पीटने वाले विपक्षियों में कहीं कोई अंतर नजर नहीं आ रहा।
यही पता नहीं लग रहा कि भ्रष्‍टाचार की जुगाली का ढिंढोरा पीटने का मकसद अपनी बारी आने का इंतजार करना भर है या जनता की आंखों में धूल झोंकना।
जिस प्रकार अपने वेतन-भत्‍ते और सुख-सुविधाओं को बढ़ाने के लिए हर पक्ष के माननीय एकस्‍वर में बोलने लगते हैं, ठीक उसी प्रकार अब जनसूचना अधिकार सहित दागी नेताओं के मामले में कोर्ट के आदेश को ताक पर रखने की तैयारी है। न अपील, न दलील। सीधे कानून बना दो जिससे न रहेगा बांस और न फिर कभी बज पायेगी बांसुरी।
2G घोटाला, कोलगेट स्‍कैम, आदर्श सोसायटी घोटाला, कॉमनवेल्‍थ घोटाला, महंगाई, रुपये का रसातल में जाना, पड़ोसी देशों का हमलावर होना, विदेश नीति की दुर्गति, कालाधन आदि को दरकिनार कर एकबार फिर लोकसभा चुनावों का शंख समय से पहले फूंक दिया गया है। सबको पता है कि 2014 से पहले चुनाव नहीं होंगे पर माहौल ऐसा बनाया जा रहा है कि जैसे इसी साल चुनाव होने हों। माहौल बनाने में सबकी मिली-भगत है। समय जो चाहिए। किसी को और लूट करने के लिए तो किसी को इशारों-इशारों में यह समझाने के लिए कि जितना मौका हम दे रहे हैं, उतना ही आगे हमें मिलना चाहिए। 
दरअसल इसके पीछे भी सबकी अपनी राजनीति है और सबके अपने स्‍वार्थ। मुंह पर लगी कीचड़ दिखाने वाले से तो अब बड़ी बेशर्मायी के साथ कह दिया जाता है  कि 'बुरी नजर वाले, तेरा मुंह काला' और पिछवाड़े पर लगी कालिख दिखाई नहीं देती। दूसरों को दिखती है तो दिखती रहे। बदबू आती है तो मुंह फेरकर चले जाएं।
आम आदमी का पेट भरने के लिए देश के भाग्‍य विधाताओं को प्रतिमाह एक हजार रुपये की आमदनी पर्याप्‍त लगती है और खुद का पेट अरबों रुपये डकार जाने के बावजूद नहीं भर पा रहा।
लोकतंत्र के एक खंभे न्‍यायपालिका को जनता से मिले अपने विशेषाधिकार का इस्‍तेमाल कर कमजोर किया जा रहा है और कागजी खंभे मीडिया को कागज के ही नोटों से खरीदकर कागजी घोड़ा बना दिया गया है।
यही कारण है कि आम आदमी को, जो मीडिया सत्‍ता के खिलाफ दिन-रात चीखता और चिल्‍लाता हुआ दिखाई देता है, वह एक्‍चुअली मिमिया रहा होता है। उसकी लाउड आवाज हकीकत में शुकराना अदा करने के लिए होती है ताकि ऊंचाई पर बैठे आकाओं को ठीक से सुनाई दे जाए।
यूं भी ऊपर से फेंके गए सिक्‍के जब जमीन से उठाए जाते हैं तो बताना भी पड़ता है कि माई-बाप हम इनके लिए आपके अहसानमंद हैं।
वैसे भूखी-नंगी जनता के सामने भी फूड सीक्‍यूरिटी बिल का चारा डालने की व्‍यवस्‍था कर ली गई है जिससे चुनावों के दौरान वह पेट पकड़ कर रोने न लगे और मध्‍यमवर्ग के लिए एफडीआई के चमचमाते नियोन साइन लगवाने का रास्‍ता साफ कर दिया गया है ताकि वह उसकी रोशनी को दीवाली की आहट समझ दिवाला निकलने का अहसास तक न कर पाये।
शायद हर शासक जानता है कि अवाम मुगालते में जीने की आदी होती है। वह मुगालते में ही जीना चाहती है क्‍योंकि उससे उसे अपने दुख कम लगने लगते हैं।
संभवत: इसीलिए हर युग के शासकों ने अवाम के कानों में मुगालते के तहत जीने का मंत्र कुछ इस तरह फूंका कि वही उसे हकीकत लगता है।
मुगालते में जीने की आदी जनता अब भी इस मुगालते में है कि देश स्‍वतंत्र हो चुका है लिहाजा वह 65 सालों से स्‍वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस मना रही है जबकि झण्‍डा आज भी फिरंगियों की कार्बन कापियां ही फहरा रही हैं।
आम जनता तब उनके झण्‍डे के नीचे खड़े होकर स्‍तुतिगान करती थी और अब इनके झण्‍डे के नीचे खड़े होकर स्‍तुतिगान कर रही है। 
कहने को वोट का अधिकार है और चुनी हुई सरकार है लेकिन यह चुनाव एक ऐसी मजबूरी है जिसका विकल्‍प कोई नहीं। भ्रष्‍ट और भ्रष्‍टतम में से किसी एक को चुनना है।
मतदान 40 प्रतिशत हो या चार प्रतिशत, सरकार तो बन ही जाती है। एक को बहुमत नहीं मिला तो न सही, एक दर्जन मिलकर एक हो सकते हैं। संविधान में ऐसा कहीं नहीं लिखा कि सत्‍ता के लिए दर्जन-दो दर्जन दल मिलकर सबसे बड़ा दल होने की औपचारिकता पूरी न कर पाएं। संविधान में यह भी नहीं लिखा कि चुनाव से पहले गठबंधन करना जरूरी है। फिर चुनावों में एक-दूसरे के खिलाफ खड़े होकर भी चुनावों के बाद एक होकर कुर्सी पर काबिज होने से कौन रोक रहा है।
कभी यूपीए के नाम से कभी एनडीए के नाम से। कभी कांग्रेस के पास, कभी भाजपा के पास। एक सर्किल है जिसमें वोट रूपी झुनझुना पकड़कर मतदाता को गोल-गोल घूमना है। उसके पास चुनाव नहीं, चंद चेहरे हैं। ऐसे चेहरे जिनकी सूरतें बेशक नहीं मिलतीं, पर सीरतें हूबहू हैं। उनका डीएनए एक है।
इसी महीने देश एक और स्‍वतंत्रता दिवस मनायेगा। राष्‍ट्रगान और राष्‍ट्रगीत के साथ देशभर में झण्‍डे फहराये जायेंगे। स्‍कूल में बच्‍चों को बताया जायेगा कि ये हमारा राष्‍ट्रीय पर्व है। इस दिन हमें स्‍वतंत्रता मिली थी।
लेकिन ये बताने वाला कोई नहीं होगा कि 15 अगस्‍त सन् 1947 से लेकर अब तक देश उस स्‍वतंत्रता की बाट जोह रहा है जिसके सपने संजोए थे।
ये भी कोई नहीं बतायेगा कि आज देश को फिर एक इतनी बड़ी लड़ाई लड़नी है जितनी बड़ी लड़ाई पहले कभी नहीं लड़ी गई।
क्‍या कोई स्‍कूल, कोई कॉलेज ऐसा बचा है जो देश के भविष्‍य को यह बता सके कि 65 सालों की स्‍वतंत्रता के बावजूद उसका अपना भविष्‍य असुरक्षित है क्‍योंकि कि नेताओं का भविष्‍य सुरक्षित है।
क्‍या उन्‍हें कोई ऐसी शिक्षा देगा कि विकल्‍पहीन चुनाव और मजबूरी का मतदान व्‍यवस्‍था परिवर्तन नहीं करा सकता। व्‍यवस्‍था परिवर्तन के लिए पर्याप्‍त विकल्‍प जरूरी हैं और संपूर्ण स्‍वतंत्रता के लिए स्‍वाभिमान जरूरी है। तलवे चाटने वाली मानसिकता न तो स्‍वाभिमान सुरक्षित रख पाती है और ना स्‍वतंत्रता।
कोई फर्क नहीं पड़ेगा इस बात से कि 2014 के चुनाव, सत्‍ता किसके हाथ में सौंपते हैं। कोई अंतर नहीं आयेगा इससे कि सत्‍ता पर कोई एक दल काबिज होता है या बहुत सारे दलों से मिलकर बनी दलदल। सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। चोर-चोर मौसेरे भाई।
जनसूचना अधिकार जैसा कानून आड़े आने लगा तो उसकी जड़ों में सब मिलकर मठ्ठा डालने को तैयार हैं और कोर्ट का आदेश चुनाव लड़ने में बाधक बना तो सब एकसाथ मिलकर उसका गला घोंटने पर सहमत हैं। इन मामलों में न कोई पक्ष, न विपक्ष। सब-कुछ निष्‍पक्ष। न अल्‍पमत, न बहुमत। सब-कुछ सर्वसम्‍मत। ताकि सनद रहे और वक्‍त जरूरत काम आये।
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