मंगलवार, 7 जनवरी 2014

दंगों की सीडी दिखाकर धन बटोर रही थी तीस्‍ता शीतलवाड़

अहमदाबाद। 
गुजरात दंगों से जुड़े गुलबर्ग सोसायटी पीड़ितों की जिस शिकायत पर सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता शीतलवाड़ व अन्य के तहत आईपीसी व आईटी एक्ट की धाराओं के तहत प्रकरण दर्ज किया गया है, उसकी तफ्तीश में खुलासा हुआ है कि तीस्ता व तनवीर जाफरी ने 2007 से 2012 की अवधि में अलग-अलग कार्यक्रमों की सीडी तैयार की थी। ये सीडी सूरत में तैयार की गईं। ये सीडी तनवीर जाफरी ने अमरीका में रहने वाले कुछ लोगों को भेजीं। इन्हें अमरीका में बड़े-बड़े सेमिनार में दिखाया गया और फंड जमा किया गया। 2002 के गुजरात दंगा पीड़ितों से जुड़े अमरीका में होने वाले कार्यक्रमों में पूर्व डीजीपी आर. बी. श्रीकुमार एवं फादर सेड्रिक प्रकाश भी अमरीका जाते थे। तनवीर गुलबर्ग कांड में मारे गए कांग्रेस के पूर्व सांसद एहजान जाफरी का बेटा है।
गुलबर्ग सोसायटी के दंगा पीड़ित फिरोज पठान ने रविवार शाम को गुजरात में धोखाधड़ी का मुकद्दमा दर्ज कराया था। इसमें तीस्ता के अलावा उनके पति जावेद आनंद, तनवीर जाफरी, गुलबर्ग सोसायटी के चेयरमैन सलीम संधी एवं सचिव फिरोज गुलजार को आरोपी बनाया है। सभी पर दंगा पीड़ितों के नाम पर विदेशों से चंदा उगाकर निजी काम के लिए खर्च करने का आरोप है।
प्रकरण दर्ज कर क्राइम ब्रांच ने मामले की तफ्तीश शुरू कर दी है। जांच एजेंसी सूत्रों के अनुसार तीस्ता व अन्य लोग पूर्व नियोजित षड्यंत्र के तहत गुलबर्ग सोसायटी सहित गुजरात के आठ दंगा प्रभावित इलाकों के पीड़ितों के फोटो-वीडियो लेते थे। इन्हें सीजेपी एवं सबरंग नामक वेबसाइट पर इंटरनेट के जरिए प्रकाशित किया जाता था। इन फोटो-वीडियों के माध्यम से विदेशों में रहने वाले लोगों से फंड की गुहार लगाई जाती थी। इसके चलते करोड़ो रुपए का फंड बैंक में जमा हुआ। यह धन निजी उपयोग में खर्च कर दिया गया। इसके अलावा अलग-अलग नाम से संस्थाएं बनाई, इनके नाम-पते एक ही रखे गए। धर्म के नाम पर गलत गतिविधि चलाई गई।
तीस्ता व अन्य के खिलाफ धोखाधड़ी की शिकायत करने वाले दंगा पीड़ित फिरोज पठान को आरटीआई के तहत जानकारी मिली कि तीस्ता एंड कंपनी ने 2009 से 2011 के दौरान 1.51 करोड़ रुपए विदेश-स्थानीय लोगों से जमा किए। सीजेपी एवं सबरंग ट्रस्ट के नाम पर क्रमश: 63 व 88 लाख रुपए का चंदा जुटाया। क्राइम ब्रांच सूत्रों के अनुसार इस धन का उपयोग सोसायटी (गुलबर्ग) के सदस्यों के लिए अभी तक नहीं किया गया।
मामले में शिकायतकर्ता फिरोज सहित सात लोगों के बतौर गवाह पुलिस ने बयान दर्ज किए गए हैं। इसके अलावा अन्य छह लोगों को बतौर गवाह समन भेजा है। सायबर एक्ट की धारा भी मामले में जोड़ी गई है। सूत्रों के अनुसार जल्द ही क्राइम ब्रांच का एक दल तफ्तीश के लिए मुंबई भी जाने वाला है। आईटी एक्ट की धारा-72(ए) के तहत भी मामला दर्ज किया है। रविवार शाम को आईपीसी 420 व 120 (बी) सहित धाराओं के तहत प्रकरण दर्ज किया था।
-एजेंसी

सोमवार, 6 जनवरी 2014

तुम याद तो जरूर रहोगे मनमोहन

(लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष)


 'मैं, ..............ईश्वर की शपथ लेता हूँ/सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूँ कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूँगा, मैं भारत की प्रभुता और अखंडता अक्षुण्ण रखूँगा, मैं संघ के मंत्री के रूप में अपने कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण से निर्वहन करूँगा तथा मैं भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना, सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और विधि के अनुसार न्याय करूँगा।'
'मैं, ........ईश्वर की शपथ लेता हूँ/सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूँ कि जो विषय संघ के मंत्री के रूप में मेरे विचार के लिए लाया जाएगा अथवा मुझे ज्ञात होगा, उसे किसी व्यक्ति या व्यक्तियों को, तब के सिवाय जबकि ऐसे मंत्री के रूप में अपने कर्तव्यों के सम्यक्‌ निर्वहन के लिए ऐसा करना अपेक्षित हो, मैं प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से संसूचित या प्रकट नहीं करूँगा।'
यह मात्र आठ-दस लाइनें नहीं हैं। यह संविधान (सोलहवाँ संशोधन) अधिनियम, 1963 की धारा 5 द्वारा अंतःस्थापित नियमों के तहत ली जाने वाली वो शपथ है जिसे प्रत्‍येक मंत्री अपना पदभार ग्रहण करने से पहले लेता है।
अब जरा प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के 3 जनवरी 2014 के उस व्‍याख्‍यान पर गौर कीजिए जो उन्‍होंने पूर्व निर्धारित संवाद्दाता सम्‍मेलन में दिया था।
वह कहते हैं कि- मैं उम्‍मीद करता हूं कि इतिहास मेरे प्रति उदारता बरतेगा और मीडिया की तरह मेरे कार्यों का कठोर आंकलन नहीं करेगा।
थोड़ी देर के लिए दलगत राजनीति को पूरी तरह तिलांजलि देकर सिर्फ कांग्रेस के नेतृत्‍व वाली उस यूपीए सरकार पर नज़र डाली जाए जिसके बतौर मुखिया प्रधानमंत्री लिखा-पढ़ी में मनमोहन सिंह थे.............. तो क्‍या उन्‍हें इतिहासकारों से ऐसी कोई उम्‍मीद रखनी चाहिए?
क्‍या मनमोहन सिंह को देश की वह जनता कभी माफ कर सकती है जिसका दलगत राजनीति से न कभी कोई वास्‍ता था और ना शायद कभी रहेगा। राजनीति अथवा राजनीतिक दल तो उस जनता लिए केवल अपने एक ऐसे 'अधिकार' तक सीमित हैं जिसे वह चुनावों के दौरान मतदान या मताधिकार के रूप में इस्‍तेमाल करती है। वह भी इस उम्‍मीद में कि संभवत: इस बार व्‍यवस्‍था परिवर्तन हो सके। संभवत: उसे किसी स्‍तर पर महसूस हो कि वाकई सरकार को उसने चुना है। अन्‍यथा कड़वा सच यही है कि उसके मतदान करने या न करने से सरकारों के बनने पर कोई फर्क नहीं पड़ता। मतदान का प्रतिशत कितना ही कम क्‍यों न हो, सरकार तो तब भी बना ही ली जाती है और उसी को बहुमत मान लिया जाता है।
यहां 'मतदान' अथवा 'मताधिकार' जैसे शब्‍दों पर गौर फरमाना जरूरी हो जाता है। यह दोनों ही शब्‍द भ्रमित करते हैं। यदि जनप्रतिनिधियों के चुनाव की प्रक्रिया मतदान से है तो यह कैसा 'दान' है जिसे जनता अनिच्‍छा से देने के लिए अभिशप्‍त है। वह पात्र या कुपात्र का चयन न करके मात्र उन प्रत्‍याशियों में से किसी एक को चुनने के लिए बाध्‍य है जिसे राजनीतिक दलों ने अपनी इच्‍छानुसार थोपा है। और यदि यह प्रकिया हमें अधिकार देती है और मताधिकार से चुनाव होता है तो यह कैसा अधिकार है जिसे देने के बाद हमारे हाथ में कुछ नहीं रह जाता। सिवाय हाथ मलते रहने के।
चुनाव प्रक्रिया के एक नये अधिकार 'नोटा' की बात करें तो उससे भी फिलहाल जनता के हाथ कुछ नहीं आने वाला। हां, इतना अवश्‍य है कि वह किसी को वोट न देकर अपनी बेबसी दर्शा सकती है। वैसे यह काम जनता पहले भी मतदान न करके करती रही है।
बहरहाल, संवैधानिक पद ग्रहण करने से पूर्व ली जाने वाली शपथ से लेकर मतदान अथवा मताधिकार तक....सब-कुछ जैसे आमजन को भ्रमित करने का तरीका बनकर रह गया है और इसी का लाभ स्‍वतंत्र भारत के छद्म भाग्‍यविधाता उठाते रहे हैं। चूंकि कांग्रेस ही किसी न किसी तरह अधिक समय तक शासक रही है इसलिए आमजन को धोखे में रखने का काम उसी के खाते में जाता है।
इन हालातों में जहां तक सवाल मनमोहन सिंह की इतिहासकारों से अपेक्षा का है तो उस पर यही कहना मुनासिब होगा कि या तो वह आत्‍ममुग्‍धता के शिकार हैं या फिर उस तथाकथित ईमानदारी के जिसका ढिंढोरा पीटकर देश के दस कीमती साल कांग्रेस ने बर्बाद कर दिए। इतिहास और आमजन का वश चले तो वह उन्‍हें शायद याद रखना भी पसंद न करें। ऐसा क्‍यों है.....इसका जवाब खुद मनमोहन सिंह को मिल सकता है बशर्ते वह सोनिया-राहुल की छाया के प्रभाव से बाहर आकर यदि 5 मिनट के लिए भी आत्‍मचिंतन करने में बिता सकें।
रही बात उनके द्वारा नरेन्‍द्र मोदी को देश के लिए विनाशकारी बताने की तो ऐसा कहकर उन्‍होंने अपनी बुद्धिमान होने की छवि को ही प्रभावित किया है। उन्‍होंने जाते-जाते यह साबित कर दिया कि वह एक ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो मन, वचन तथा कर्म से सोनिया-राहुल के बंधक है और उसकी अपनी कोई सोच है ही नहीं।
नरेन्‍द्र मोदी देश के लिए क्‍या साबित होंगे, इसका निर्णय तो आने वाला समय करेगा लेकिन अगर बात करें इस साल होने जा रहे चुनावों की तो वह नि:संदेह बहुत महत्‍वपूर्ण होंगे।
महत्‍वपूर्ण इसलिए नहीं कि सत्‍ता में कोई परिवर्तन संभावित है, महत्‍वपूर्ण इसलिए कि अब व्‍यवस्‍था में परिवर्तन की जन आकांक्षा दिखाई देने लगी है। मोदी आयें या केजरीवाल ही क्‍यों न आ जाएं.....अब जनता यह चाहती है कि किसी संवैधानिक पद के लिए ली गई शपथ और 'मतदान' अथवा 'मताधिकार' का इस्‍तेमाल जाया न हो। वह चाहती है कि लोकतंत्र की आड़ में उसके साथ 66 सालों से लगातार की जा रही धोखाधड़ी बंद हो। संवैधानिक पद की शपथ तथा मताधिकार का महत्‍व उसकी मूल भावना के अनुरूप हो।
इन चुनावों के बाद भी अगर जनता को ऐसा महसूस हुआ कि उसकी चुनी हुई सरकार और उसके द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों की नीयत नेक रास्‍ता अख्‍त़ियार करने को तैयार नहीं है तो आने वाला समय ऐसा इतिहास लिखेगा जिसकी किसी राजनीतिक दल या किसी नेता ने कल्‍पना तक नहीं की होगी।
इस करवट लेते समय की चूंकि मनमोहन सिंह आखिरी कड़ी हैं इसलिए उनका जिक्र तो जरूर होगा परंतु उस तरह नहीं जिस तरह वह सोचे बैठे हैं।
कठपुतलियों को लोग याद तो रखते हैं लेकिन सिर्फ और सिर्फ इसलिए कि वह तमाशा दिखाने के काम आती हैं। इसलिए नहीं कि उनमें कोई गतिशीलता या क्रियाशीलता होती है........ सब जानते हैं कि कठपुतलियों की क्रियाशीलता और गतिशीलता उन उंगलियों की मोहताज होती है जिनकी डोर पर्दे के पीछे छिपी दूसरी उंगलियों से बंधी रहती है।

रविवार, 5 जनवरी 2014

चंदे के करोड़ों रु. हड़प गई तीस्‍ता सीतलवाड़: FIR दर्ज

अहमदाबाद। 
नरेंद्र मोदी के खिलाफ मुहिम चलाने वालीं सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ पर धोखाधड़ी के एक मामले में FIR दर्ज की गई है। उन पर गुलबर्ग सोसाइटी मेमोरियल के नाम पर जमा की गई राशि का इस्तेमाल निजी इस्तेमाल करने के लिए करने का आरोप है।
तीस्ता सीतलवाड़ जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता हैं। 2002 के गुजरात दंगों के बाद वह नरेंद्र मोदी का काफी मुखर विरोध करती रही हैं। 2002 में गुलबर्ग सोसाइटी को जला दिया गया था। सीतलवाड़ ने उस सोसाइटी के लिए एक मेमोरियल बनाने के वास्ते देश-विदेश से चंदा जमा करने का अभियान छेड़ा था। इस अभियान के तहत करोड़ों रुपये जमा हुए।
आरोप है कि इस पैसे से तीस्ता सीतलवाड़ और उनके पति जावेद आनंद के निजी खातों में एफडी करवा ली गई। अहमदाबाद पुलिस ने जांच के बाद इस मामले में FIR दर्ज कर ली। सीतलवाड़ और उनके पति जावेद आनंद के खिलाफ आईपीसी की धारा 420, 120 और 406 के तहत मामला दर्ज किया गया है।
-एजेंसी

शनिवार, 4 जनवरी 2014

इस कदर घबराए हुए थे... कि पहले की थी मॉक कॉफ्रेंस

नई दिल्ली। 
बतौर प्रधानमंत्री दस साल के कार्यकाल में तीसरी बार मीडिया से रूबरू होने से पहले पीएम मनमोहन सिंह को रिहर्सल करवाई गई थी। यूपीए-2 के कार्यकाल में उनकी दूसरी प्रेस कॉन्फ्रेंस के तैयारी के लिए मनमोहन ने सचिवालय के अधिकारियों के साथ रिहर्सल की थी। रिहर्सल के दौरान सचिवालय के अधिकारियों ने मनमोहन से सौ सवाल पूछे और उन्होंने जवाब दिया। पीएम मनमोहन अपने आपको रिहर्सल के माध्यम से मीडिया से रूबरू होने के लिए तैयार करके आए थे।
पहले हुई मॉक कॉन्फ्रेंस
सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए पूरी तैयारी करवाई गई थी। उन्होंने सचिवालय के साथ मॉक प्रेस कॉन्फ्रेंस करवाई थी। सचिवालय के अधिकारियों ने मॉक कॉन्फ्रेंस में पीएम से वे सवाल पूछे जो मीडिया पूछ सकती है। पीआईबी और डीएवीपी के 80 से ज्यादा अधिकारियों को मॉक कॉन्फ्रेंस की जिम्मेदारी गई थी। पीएम की प्रेस कॉन्फ्रेंस की जिम्मेदारी सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी को मिली हुई थी। प्रेस कॉन्फ्रेंस के प्रबंधन का काम तिवारी ही देख रहे थे।
-एजेंसी

दिल्‍ली मेट्रो पर 10 तक हो सकता है 26/11 जैसा हमला

नई दिल्‍ली। 
अब तक आतंकवादियों की नज़रों से बची दिल्ली मेट्रो पर आतंकी साया मंडराने लगा है. दिल्ली मेट्रो पर आतंकवादी 26/11 जैसा हमला कर सकते हैं. मिलिट्री इंटेलिजेंस के सूत्रों के मुताबिक नए साल में दस दिन के भीतर आतंकवादी दिल्ली मेट्रो को अपना निशाना बना सकते हैं. मिलिट्री इंटेलिजेंस ने मेट्रो सिक्योरिटी को अलर्ट भेजकर कहा है कि कुछ आतंकी संगठन 10 जनवरी तक मेट्रो में 26/11 जैसे आतंकी हमले को अंजाम दे सकते हैं.
सीआईएसएफ को मिली खुफिया जानकारी के अनुसार मेट्रो में आतंकी हमले का अलर्ट 31 दिसंबर को मिला था.
चेतावनी के अनुसार 2014 में 10 जनवरी तक आतंकवादी कभी भी दिल्‍ली मेट्रो को अपना निशाना बना सकते हैं.
आतंकवादियों की इस धमकी के बाद दिल्‍ली मेट्रो की सुरक्षा पहले से और अधिक बढ़ा दी गई है.
एनसीआर में 140 स्टेशन पर पांच हजार से ज्यादा सुरक्षाकर्मी तैनात हैं.
इसके बाद हर मेट्रो स्‍टेशन में आने वाले यात्रियों पर कड़ी नज़र रखी जा रही है. मेट्रो ट्रेन और स्टेशन पर संदिग्ध मुसाफिरों से पूछताछ और सामान की गहन तलाशी का अभियान चलाया जा रहा है.
-एजेंसी

टू-व्‍हीलर्स पर रखकर ही करोड़ों के सेब बेच लिए वीरभद्र ने

नई दिल्‍ली। 
रिश्वत लेने के आरोपों से घिरे हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की परेशानियां और बढ़ने वाली हैं। उनके खिलाफ जांच में यह बात सामने आई है कि अपने बगान के करोड़ों रुपये के सेब की उन्होंने टू-वीलर्स और तेल टैंकर से ढुलाई करवा ली। यह ठीक वैसा ही हास्यास्पद मामला है, जिस तरह से बिहार में चारा घोटाले की जांच में यह बात सामने आई थी कि सांड़ों को स्कूटर से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया गया था।
इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने एक बार फिर वीरभद्र सिंह के उस दावे की जांच में तेजी ला दी है, जिसमें उन्होंने 3 सालों में बागवानी से होने वाली आय 6.56 करोड़ रुपये दिखाई थी। एक इंग्लिश न्यूज़ पेपर ने लिखा है कि इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने वीरभद्र सिंह और इंश्योरेंस एजेंट आनंद चौहान को अलग-अलग नोटिस भेजे हैं। नोटिस में वीरभद्र सिंह की बागवानी से हुई आय के बारे में सवाल उठाए गए हैं।
कहा जाता है कि आनंद चौहान ही मुख्यमंत्री के श्रीखंड वाले बागानों की देखरेख करता था। जून 2008 में वीरभद्र और आनंद चौहान ने एक एमओयू साइन किया था। इस एमओयू के तहत चौहान को वीरभद्र के बागान की देखभाल करनी थी। यह भी तय किया गया था कि चौहान को बागान से होने वाली आमदनी वीरभद्र और उनके परिवार की तरफ से एलआईसी या म्यूचुअल फंड्स में इन्वेस्ट करनी होगी।
चौहान ने क्लेम किया है कि उसने वीरभद्र सिंह के बागान के सेब यूनिवर्सल ऐपल असोसिएट के चुन्नीलाल को बेचे हैं। चुन्नीलाल नाम के शख्स ने टैक्स अथॉरिटीज़ को उन 18 गाड़ियों के रजिस्ट्रेशन नंबर दिए हैं, जिनकी मदद से वीरभद्र के बागानों से सेब ढोए गए थे। जब इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने इन नंबरों की जांच की तो चौंकाने वाली जानकारी सामने आई। मालूम हुआ कि इनमें से दो नंबर- HP 06 0768 और HP 06 1123 तो स्कूटर के हैं। एक अन्य नंबर HP 63 4975 तेल टैंकर का है। एक नंबर तो ऐसा है जो किसी को अलॉट ही नहीं हुआ। इनमें से कुछ नंबर ऐसे 'ट्रिपर' वीकल्स के हैं, जो यूज नहीं किए गए।
ऐसे में एक ऑफिशल ने आरोप लगाया, 'इन नंबरों को देखकर साफ लगता है कि चुन्नीलाल को कोई सेब नहीं बेचे गए। इसका मतलब है कि वीरभद्र सिंह ने बागवानी से जो आमदनी दिखाई है, वह झूठी है।'
इसी हफ्ते की शुरुआत में राज्य सभा में नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर वीरभद्र सिंह पर रिश्वत लेने और केंद्रीय इस्पात मंत्री रहते हुए एक स्टील कंपनी से पैसे लेने का आरोप लगाया था। 2 मार्च, 2012 को वीरभद्र सिंह ने 3 फाइनैंशल इयर्स के लिए इनकम टैक्स रिटर्न्स फाइल किए थे। उन्होंने बताया था कि बगवानी के जरिए उन्हें 2009-10 में 2.12 करोड़, 2010-11 में 2.80 करोड़ और 2011-12 में 1.55 करोड़ की आमदनी हुई है। उन्होंने क्लेम किया था कि 105 बीघा में फैले सेब के बागान से उन्हें आमदनी हुई है इसलिए वह इनकम टैक्स रिटर्न्स में रिविज़न करना चाहते हैं।
अखबार ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने साल 2010-11 में हुई वीरभद्र सिंह की आमदनी का आंकलन करने का काम दोबारा शुरू कर दिया है। हालांकि वीरभद्र सिंह के करीबियों का कहना है कि उनकी जानकारी में ऐसी कोई बात नहीं आई है।
-एजेंसी

शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

ना इधर-उधर की तू बात कर, ये बता कि काफिला क्यूं लुटा

नई दिल्‍ली। 
"हजारों जवाबों से अच्छी है मेरी खामोशी, ना जाने कितने सवालों की आबरू रखी।" कुछ इस शायराना अंदाज में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कोलगेट मामले में विपक्ष के पूछे सवालों का जवाब दिया था और आज दस साल में तीसरी बार मनमोहन खुद प्रेस कांफ्रेंस कर कई अहम सवालों का जवाब दे रहे हैं।
आखिर अब ऎसा क्या हो गया, जो उन्हें अपनी चुप्पी तोड़नी पड़ रही है। आईए जानते हैं कि वो क्या मजबूरियां हैं जिनके चलते उनको सालों की चुप्पी तोड़नी पड़ रही है।
दिसंबर 2013 में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को जनता ने सिरे से नकार दिया। कांग्रेस को राजस्थान, मध्यप्रदेश, दिल्ली और छत्तीसगढ़ में मुंह की खानी पड़ी। पार्टी की थोड़ी सी लाज केवल मिजोरम में बची, जहां उनकी सरकार फिर से सत्ता में आई।
इन चार राज्यों हुई दुर्गती ने कांग्रेस की आंखे खोल दी। जनता ने अपना गुस्सा कांग्रेस को बाहर का रास्ता दिखाकर जाहिर किया। चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस को अहसास हो गया कि जनता ने पार्टी को पूरी तरह से नकार दिया है, अगर अब कोई कोशिश नहीं हुई तो लोकसभा चुनाव में और भी बुरे परिणामों से दो-चार होना पड़ सकता है। माना जा रहा है कि मनमोहन सिंह की चुप्पी और अन्य कांग्रेस नेताओं का बड़बोलापन भी हार का एक बड़ा कारण रहा।
इन चार राज्यों के चुनाव में यह भी सामने आया कि कांग्रेस को अगर डूबने से बचाना है, तो परम्परा को तोड़ते हुए चुनाव से पहले प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित करना होगा। फिलहाल कांग्रेस के पास केवल एक नाम है जिसको लेकर पार्टी आशान्वित है। वह नाम है कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का।
मनमोहन को अपनी पारी समेटने और राहुल गांधी की नई पारी के आगाज के लिए चुप्पी तोड़ने की जरूरत पड़ी। इससे पहले भी मनमोहन राहुल गांधी के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने का संकेत यह कहकर दे चुके हैं कि वे राहुल गांधी के नेतृत्व में काम करने का तैयार हैं।
मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार के अब तक के कार्यकाल में मंहगाई ने जमकर आम आदमी के सब्र की परीक्षा ली। खुद मनमोहन और वित्तमंत्री की लाख कोशिशों के बावजूद मंहगाई सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती रही। मंहगाई फैक्टर ने न केलव कांग्रेस को दिसंबर में हुए विधानसभा चुनाव में सबक सिखाया, वल्कि संकेत भी दे दिए कि लोकसभा चुनाव मे भी इतिहास दोहराया जा सकता है।
जब शायरी में किया जवाब-तलब
पिछले वर्ष मार्च में मनमोहन सिंह ने संसद में कुछ इस तरह से विपक्ष को खरी-खरी सुनाई-
"हमको है उनसे वफा की उम्मीद, जो नहीं जानते वफा क्या है।"
इस बार विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने ये दिया जवाब-
"कुछ तो मजबूरियां रही होंगी यूं कोई बेवफा नहीं होता।"
इसके बाद सुषमा ने फिर शायरना अंदाज में कहा-
"तुम्हें वफा याद नहीं, हमें जफा याद नहीं,
जिंदगी और मौत के तो दो ही रास्ते हैं,
एक तुम्हें याद नहीं, एक हमें याद नहीं।"

कुछ वर्ष पहले विकीलिक्स मामले पर संसद में डिबेट के दौरान मनमोहन सिंह ने आलम इकबाल का लिखा शेर सुषमा स्वराज पर निशाना साधते हुए कहा-
"माना की तेरे दीद के काबिल नहीं हूं मैं,
तुम मेरा शौक तो देख, मेरा इंतजार तो कर।"

मनमोहन इस शायरी को पढ़ते हुए मुस्कुराते रहे और सदन में ठहाके गूंज उठे।
सुषमा ने भी मुस्कुराते हुए इकबाल का ही एक शेर पढ़ा-
"ना इधर-उधर की तू बात कर, ये बता कि काफिला क्यूं लुटा,
हमें रहजनों से गिला नहीं, तेरी रहबरी का सवाल है..."

-एजेंसी
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