बुधवार, 8 जनवरी 2014

ये रहे हमारे नीरो और उनकी बांसुरी

लखनऊ। 
यूपी के मुजफ्फरनगर दंगों को अभी ज्यादा वक्त नहीं बीता है। दंगा पीड़ित अभी भी मुसीबतों से भरी जिंदगी जीने को मजूबर हैं। कंपकंपा देने वाली ठंड में वह बिना बुनियादी सुविधाओं के खुले आसमान में रहने पर मजबूर हैं। इनको राहत देने की बजाय उत्तर प्रदेश सरकार के आठ राज्य मंत्री और नौ विधायक पांच देशों की स्टडी यात्रा पर निकले हैं। गौरतलब है कि सरकार मुजफ्फरनगर दंगों में अव्यवस्था को लेकर आलोचना झेल रही है। समूह में एक भाजपा और आरजेडी विधायक के साथ राजस्व मंत्री अंबिका चौधरी भी शामिल हैं।
यूपी के नेताओं का दल 18 दिन विदेश में रहेगा। राज्य की कॉमनवेल्थ पार्लियामेंट्री एसोसिएशन के सदस्य मंत्री और विधायक टर्की, नीदरलैंड, यूके, ग्रीस और यूएई की सरकारी खर्च पर यात्रा करेंगे। यह यात्रा एक तरह से सवैतनिक छुटि्टयों की तरह होती है। यात्रा का उद्देश्‍य दूसरे देशों की पार्लियामेंट्री टेक्नीक्स सीखना होता है।
मंत्रियों और विधायकों का यह दल आज सुबह इस्तांबुल के लिए रवाना हुआ। समाजवादी सरकार ने यात्रा के लिए करीब एक करोड़ रूपए मंजूर किए हैं। दल शहरी विकास मंत्री आजम खान के नेतृत्व में गया है। मुजफ्फरनगर जिले का चार्ज भी इन्ही के पास है।
सिंतबर 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगों के हजारों पीड़ित अब भी घर से बाहर राहत शिविरों में रह रहे हैं। कड़कड़ाती ठंड में बिना बुनियादी सुविधाओं और ठंड के बचने के कपड़ों के बिना जिंदगी जूझ रहे हैं। राज्य सरकार पीड़ितों को जबर्दस्ती अपने घरों में वापस भेजने के लिए दबाव बना रही है। सरकार ने आलोचना से बचने के लिए यह कदम उठाया है।
यात्रा करने वाले समूह में विवादित मंत्री रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैय्या भी शामिल हैं। हाल में राजा भैया पर एक पुलिस अधिकारी की हत्या का आरोप लगा था। जिसके बाद उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। आठ महीने के बाद उन्हें अखिलेश के कैबिनेट में दोबारा से शामिल कर लिया गया था।
-एजेंसी

425 करोड़ के घोटाले में बोमन ईरानी का बेटा!

मुंबई। 
मुंबई पुलिस बहुस्तरीय मार्केटिंग फर्म क्यूनेट के नेतृत्व में करीब 425 करोड़ रुपए के घोटाले में अभिनेता बोमन ईरानी के बेटे की कथित भूमिका की जांच में जुटी है। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा कि इस घोटाले में बोमन के बेटे ने कथित रूप से ‘बड़ी रकम’ हासिल की। पिछले साल अगस्त में क्यूनेट के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने वाले शिकायतकर्ता गुरुप्रीत सिंह आनंद ने आज जांच एजेंसी मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा में दो पन्नों की शिकायत के साथ गुहार लगाई। इस शिकायत में इस योजना में अभिनेता बोमन ईरानी के बेटे दानिश की कथित संलिप्तता की जानकारी दी गई है।
लिखित शिकायत में उन्होंने आरोप लगाया कि दानिश ने अपने पिता बोमन के साथ इस योजना का प्रचार प्रसार किया। हालांकि पुलिस के अनुसार, अभिनेता इस योजना में शामिल नहीं हैं। अतिरिक्त पुलिस आयुक्त राजवर्धन सिन्हा ने कहा कि बोमन ईरानी की क्यूनेट मामले में कोई भूमिका नहीं है। उनके बेटे दानिश ने क्यूनेट के जरिए बड़ी रकम कमाई और हम उनकी भूमिका की जांच कर रहे हैं।
पुलिस अब दानिश के बैंक खातों की जानकारी हासिल करने में जुटी है। गुरुप्रीत ने आरोप लगाया कि बोमन ईरानी और पूर्व विश्व बिलियर्ड्‍स चैंपियन माइकल फरेरा ने प्रचार कार्यक्रमों में भाग लिया था।
उन्होंने कहा कि बोमन और माइकल जैसे लोग क्यूनेट के साथ जुड़े थे जिससे कई लोग इसके प्रति आकर्षित हुए। इसलिए, इस संबंध में उनके खिलाफ भी अभियोजन चलाया जाना चाहिए और यही कारण है कि मैं उनका खुलासा करना चाहता हूं।
-एजेंसी

7141 की आबादी वाले गांव को 334 करोड़ के प्रॉजेक्ट्स

लखनऊ। 
उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में भले ही मूलभूत सुविधाएं न हों लेकिन सत्ताधारी यादव परिवार के गांव सैफई पर सरकार की मेहरबानी जमकर बरस रही है। सैफई महोत्सव पर राज्य के खजाने से करोड़ों रुपये फूंकने की खबरों के बीच एक खबर यह भी है कि सूबे में पिछले 21 महीनों के दौरान समाजवादी पार्टी की सरकार ने सैफई को 334 करोड़ रुपये के प्रॉजेक्ट्स दिए हैं।
सैफई, इटावा जिले का एक गांव है और जसवंत नगर विधानसभा व मैनपुरी लोकसभा क्षेत्र में पड़ता है। इस गांव की कुल आबादी 7141 है। जसवंत नगर से राज्य के पीडब्ल्यूडी मंत्री शिवपाल यादव विधायक हैं और मैनपुरी से मुलायम सिंह यादव सांसद हैं। मुलायम के मुख्यमंत्री रहते भी सैफई का जमकर ख्याल रखा गया था। सैफई को सबडिवीजन बनाया गया और रूरल इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज व रिसर्च, एक स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स और हवाई पट्टी का तोहफा मिला था।
अखिलेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद फिर से सैफई के लिए खजाना खोल दिया गया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक यहां पांच करोड़ रुपये की लागत से एक स्पोर्ट्स कॉलेज बनाए जाने की योजना है। कक्षा छह से कक्षा 12 तक के लड़कों के लिए यह कॉलेज 71.25 एकड़ में बनाया जाएगा। इसमें वे सारी सुविधाएं होंगी, जो एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर के स्पोर्ट्स कॉलेज में होती हैं।
इसके अलावा 3.11 करोड़ की लागत से एक टूरिजम कॉम्प्लेक्स बनाए जाने की योजना है। पर्यटन सचिव संजीव सरन बताते हैं कि उन्हें इस प्रॉजेक्ट के ज्यादा डीटेल्स याद नहीं है, क्योंकि यह काफी छोटा प्रॉजेक्ट है। 42 करोड़ रुपये की लागत से एक ट्रॉमा और बर्न सेंटर बनाया जा रहा है। इस सेंटर के निर्माण की जिम्मेदारी पिछले साल उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम को दी गई थी।
103.21 करोड़ रुपये की लागत से अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं के लिए स्विमिंग पूल्स बनाए जाने का फैसला कैबिनेट ने नवंबर 2012 में लिया था। इस कॉम्प्लेक्स में एक प्रैक्टिस पूल, एक मेन पूल और एक डाइविंग पूल होगा। साथ ही इस कॉम्प्लेक्स में एक प्रशासनिक ब्लॉक, एक जिम, एक वीआईपी गैलेरी और तैराकों के रहने के लिए भी जगह होगी। पिछले महीने ही यहां स्पोर्ट्स डायरेक्टर के पद पर तैनात एक आईएएस ऑफिसर को काम में हो रही देरी की वजह से सस्पेंड कर दिया गया था।
चार करोड़ रुपये 2012 में सैफई हवाई पट्टी लाइट्स की रिपेयरिंग और रखरखाव के लिए पीडब्ल्यूडी को आवंटित किए गए थे। साथ ही 90 लाख रुपये हवाई पट्टी की दीवार की मरम्मत के लिए दिए गए। 26 करोड़ रुपये की लागत से अपना बाजार बनाए जाने की योजना है। इसमें दुकानें, ऑफिस, कैफेटेरिया और किचन बनाए जाएंगे। ये किसानों के लिए एक लोकल मंडी की तरह होगा। इसको यूपी मंडी परिषद् द्वारा बनाया जाना है। 150 करोड़ की लागत से सैफई और मैनपुरी के बीच दो लेन की सड़क को चार लेन का बनाया जा रहा है।
-एजेंसी

मंगलवार, 7 जनवरी 2014

दंगों की सीडी दिखाकर धन बटोर रही थी तीस्‍ता शीतलवाड़

अहमदाबाद। 
गुजरात दंगों से जुड़े गुलबर्ग सोसायटी पीड़ितों की जिस शिकायत पर सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता शीतलवाड़ व अन्य के तहत आईपीसी व आईटी एक्ट की धाराओं के तहत प्रकरण दर्ज किया गया है, उसकी तफ्तीश में खुलासा हुआ है कि तीस्ता व तनवीर जाफरी ने 2007 से 2012 की अवधि में अलग-अलग कार्यक्रमों की सीडी तैयार की थी। ये सीडी सूरत में तैयार की गईं। ये सीडी तनवीर जाफरी ने अमरीका में रहने वाले कुछ लोगों को भेजीं। इन्हें अमरीका में बड़े-बड़े सेमिनार में दिखाया गया और फंड जमा किया गया। 2002 के गुजरात दंगा पीड़ितों से जुड़े अमरीका में होने वाले कार्यक्रमों में पूर्व डीजीपी आर. बी. श्रीकुमार एवं फादर सेड्रिक प्रकाश भी अमरीका जाते थे। तनवीर गुलबर्ग कांड में मारे गए कांग्रेस के पूर्व सांसद एहजान जाफरी का बेटा है।
गुलबर्ग सोसायटी के दंगा पीड़ित फिरोज पठान ने रविवार शाम को गुजरात में धोखाधड़ी का मुकद्दमा दर्ज कराया था। इसमें तीस्ता के अलावा उनके पति जावेद आनंद, तनवीर जाफरी, गुलबर्ग सोसायटी के चेयरमैन सलीम संधी एवं सचिव फिरोज गुलजार को आरोपी बनाया है। सभी पर दंगा पीड़ितों के नाम पर विदेशों से चंदा उगाकर निजी काम के लिए खर्च करने का आरोप है।
प्रकरण दर्ज कर क्राइम ब्रांच ने मामले की तफ्तीश शुरू कर दी है। जांच एजेंसी सूत्रों के अनुसार तीस्ता व अन्य लोग पूर्व नियोजित षड्यंत्र के तहत गुलबर्ग सोसायटी सहित गुजरात के आठ दंगा प्रभावित इलाकों के पीड़ितों के फोटो-वीडियो लेते थे। इन्हें सीजेपी एवं सबरंग नामक वेबसाइट पर इंटरनेट के जरिए प्रकाशित किया जाता था। इन फोटो-वीडियों के माध्यम से विदेशों में रहने वाले लोगों से फंड की गुहार लगाई जाती थी। इसके चलते करोड़ो रुपए का फंड बैंक में जमा हुआ। यह धन निजी उपयोग में खर्च कर दिया गया। इसके अलावा अलग-अलग नाम से संस्थाएं बनाई, इनके नाम-पते एक ही रखे गए। धर्म के नाम पर गलत गतिविधि चलाई गई।
तीस्ता व अन्य के खिलाफ धोखाधड़ी की शिकायत करने वाले दंगा पीड़ित फिरोज पठान को आरटीआई के तहत जानकारी मिली कि तीस्ता एंड कंपनी ने 2009 से 2011 के दौरान 1.51 करोड़ रुपए विदेश-स्थानीय लोगों से जमा किए। सीजेपी एवं सबरंग ट्रस्ट के नाम पर क्रमश: 63 व 88 लाख रुपए का चंदा जुटाया। क्राइम ब्रांच सूत्रों के अनुसार इस धन का उपयोग सोसायटी (गुलबर्ग) के सदस्यों के लिए अभी तक नहीं किया गया।
मामले में शिकायतकर्ता फिरोज सहित सात लोगों के बतौर गवाह पुलिस ने बयान दर्ज किए गए हैं। इसके अलावा अन्य छह लोगों को बतौर गवाह समन भेजा है। सायबर एक्ट की धारा भी मामले में जोड़ी गई है। सूत्रों के अनुसार जल्द ही क्राइम ब्रांच का एक दल तफ्तीश के लिए मुंबई भी जाने वाला है। आईटी एक्ट की धारा-72(ए) के तहत भी मामला दर्ज किया है। रविवार शाम को आईपीसी 420 व 120 (बी) सहित धाराओं के तहत प्रकरण दर्ज किया था।
-एजेंसी

सोमवार, 6 जनवरी 2014

तुम याद तो जरूर रहोगे मनमोहन

(लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष)


 'मैं, ..............ईश्वर की शपथ लेता हूँ/सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूँ कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूँगा, मैं भारत की प्रभुता और अखंडता अक्षुण्ण रखूँगा, मैं संघ के मंत्री के रूप में अपने कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण से निर्वहन करूँगा तथा मैं भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना, सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और विधि के अनुसार न्याय करूँगा।'
'मैं, ........ईश्वर की शपथ लेता हूँ/सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूँ कि जो विषय संघ के मंत्री के रूप में मेरे विचार के लिए लाया जाएगा अथवा मुझे ज्ञात होगा, उसे किसी व्यक्ति या व्यक्तियों को, तब के सिवाय जबकि ऐसे मंत्री के रूप में अपने कर्तव्यों के सम्यक्‌ निर्वहन के लिए ऐसा करना अपेक्षित हो, मैं प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से संसूचित या प्रकट नहीं करूँगा।'
यह मात्र आठ-दस लाइनें नहीं हैं। यह संविधान (सोलहवाँ संशोधन) अधिनियम, 1963 की धारा 5 द्वारा अंतःस्थापित नियमों के तहत ली जाने वाली वो शपथ है जिसे प्रत्‍येक मंत्री अपना पदभार ग्रहण करने से पहले लेता है।
अब जरा प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के 3 जनवरी 2014 के उस व्‍याख्‍यान पर गौर कीजिए जो उन्‍होंने पूर्व निर्धारित संवाद्दाता सम्‍मेलन में दिया था।
वह कहते हैं कि- मैं उम्‍मीद करता हूं कि इतिहास मेरे प्रति उदारता बरतेगा और मीडिया की तरह मेरे कार्यों का कठोर आंकलन नहीं करेगा।
थोड़ी देर के लिए दलगत राजनीति को पूरी तरह तिलांजलि देकर सिर्फ कांग्रेस के नेतृत्‍व वाली उस यूपीए सरकार पर नज़र डाली जाए जिसके बतौर मुखिया प्रधानमंत्री लिखा-पढ़ी में मनमोहन सिंह थे.............. तो क्‍या उन्‍हें इतिहासकारों से ऐसी कोई उम्‍मीद रखनी चाहिए?
क्‍या मनमोहन सिंह को देश की वह जनता कभी माफ कर सकती है जिसका दलगत राजनीति से न कभी कोई वास्‍ता था और ना शायद कभी रहेगा। राजनीति अथवा राजनीतिक दल तो उस जनता लिए केवल अपने एक ऐसे 'अधिकार' तक सीमित हैं जिसे वह चुनावों के दौरान मतदान या मताधिकार के रूप में इस्‍तेमाल करती है। वह भी इस उम्‍मीद में कि संभवत: इस बार व्‍यवस्‍था परिवर्तन हो सके। संभवत: उसे किसी स्‍तर पर महसूस हो कि वाकई सरकार को उसने चुना है। अन्‍यथा कड़वा सच यही है कि उसके मतदान करने या न करने से सरकारों के बनने पर कोई फर्क नहीं पड़ता। मतदान का प्रतिशत कितना ही कम क्‍यों न हो, सरकार तो तब भी बना ही ली जाती है और उसी को बहुमत मान लिया जाता है।
यहां 'मतदान' अथवा 'मताधिकार' जैसे शब्‍दों पर गौर फरमाना जरूरी हो जाता है। यह दोनों ही शब्‍द भ्रमित करते हैं। यदि जनप्रतिनिधियों के चुनाव की प्रक्रिया मतदान से है तो यह कैसा 'दान' है जिसे जनता अनिच्‍छा से देने के लिए अभिशप्‍त है। वह पात्र या कुपात्र का चयन न करके मात्र उन प्रत्‍याशियों में से किसी एक को चुनने के लिए बाध्‍य है जिसे राजनीतिक दलों ने अपनी इच्‍छानुसार थोपा है। और यदि यह प्रकिया हमें अधिकार देती है और मताधिकार से चुनाव होता है तो यह कैसा अधिकार है जिसे देने के बाद हमारे हाथ में कुछ नहीं रह जाता। सिवाय हाथ मलते रहने के।
चुनाव प्रक्रिया के एक नये अधिकार 'नोटा' की बात करें तो उससे भी फिलहाल जनता के हाथ कुछ नहीं आने वाला। हां, इतना अवश्‍य है कि वह किसी को वोट न देकर अपनी बेबसी दर्शा सकती है। वैसे यह काम जनता पहले भी मतदान न करके करती रही है।
बहरहाल, संवैधानिक पद ग्रहण करने से पूर्व ली जाने वाली शपथ से लेकर मतदान अथवा मताधिकार तक....सब-कुछ जैसे आमजन को भ्रमित करने का तरीका बनकर रह गया है और इसी का लाभ स्‍वतंत्र भारत के छद्म भाग्‍यविधाता उठाते रहे हैं। चूंकि कांग्रेस ही किसी न किसी तरह अधिक समय तक शासक रही है इसलिए आमजन को धोखे में रखने का काम उसी के खाते में जाता है।
इन हालातों में जहां तक सवाल मनमोहन सिंह की इतिहासकारों से अपेक्षा का है तो उस पर यही कहना मुनासिब होगा कि या तो वह आत्‍ममुग्‍धता के शिकार हैं या फिर उस तथाकथित ईमानदारी के जिसका ढिंढोरा पीटकर देश के दस कीमती साल कांग्रेस ने बर्बाद कर दिए। इतिहास और आमजन का वश चले तो वह उन्‍हें शायद याद रखना भी पसंद न करें। ऐसा क्‍यों है.....इसका जवाब खुद मनमोहन सिंह को मिल सकता है बशर्ते वह सोनिया-राहुल की छाया के प्रभाव से बाहर आकर यदि 5 मिनट के लिए भी आत्‍मचिंतन करने में बिता सकें।
रही बात उनके द्वारा नरेन्‍द्र मोदी को देश के लिए विनाशकारी बताने की तो ऐसा कहकर उन्‍होंने अपनी बुद्धिमान होने की छवि को ही प्रभावित किया है। उन्‍होंने जाते-जाते यह साबित कर दिया कि वह एक ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो मन, वचन तथा कर्म से सोनिया-राहुल के बंधक है और उसकी अपनी कोई सोच है ही नहीं।
नरेन्‍द्र मोदी देश के लिए क्‍या साबित होंगे, इसका निर्णय तो आने वाला समय करेगा लेकिन अगर बात करें इस साल होने जा रहे चुनावों की तो वह नि:संदेह बहुत महत्‍वपूर्ण होंगे।
महत्‍वपूर्ण इसलिए नहीं कि सत्‍ता में कोई परिवर्तन संभावित है, महत्‍वपूर्ण इसलिए कि अब व्‍यवस्‍था में परिवर्तन की जन आकांक्षा दिखाई देने लगी है। मोदी आयें या केजरीवाल ही क्‍यों न आ जाएं.....अब जनता यह चाहती है कि किसी संवैधानिक पद के लिए ली गई शपथ और 'मतदान' अथवा 'मताधिकार' का इस्‍तेमाल जाया न हो। वह चाहती है कि लोकतंत्र की आड़ में उसके साथ 66 सालों से लगातार की जा रही धोखाधड़ी बंद हो। संवैधानिक पद की शपथ तथा मताधिकार का महत्‍व उसकी मूल भावना के अनुरूप हो।
इन चुनावों के बाद भी अगर जनता को ऐसा महसूस हुआ कि उसकी चुनी हुई सरकार और उसके द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों की नीयत नेक रास्‍ता अख्‍त़ियार करने को तैयार नहीं है तो आने वाला समय ऐसा इतिहास लिखेगा जिसकी किसी राजनीतिक दल या किसी नेता ने कल्‍पना तक नहीं की होगी।
इस करवट लेते समय की चूंकि मनमोहन सिंह आखिरी कड़ी हैं इसलिए उनका जिक्र तो जरूर होगा परंतु उस तरह नहीं जिस तरह वह सोचे बैठे हैं।
कठपुतलियों को लोग याद तो रखते हैं लेकिन सिर्फ और सिर्फ इसलिए कि वह तमाशा दिखाने के काम आती हैं। इसलिए नहीं कि उनमें कोई गतिशीलता या क्रियाशीलता होती है........ सब जानते हैं कि कठपुतलियों की क्रियाशीलता और गतिशीलता उन उंगलियों की मोहताज होती है जिनकी डोर पर्दे के पीछे छिपी दूसरी उंगलियों से बंधी रहती है।

रविवार, 5 जनवरी 2014

चंदे के करोड़ों रु. हड़प गई तीस्‍ता सीतलवाड़: FIR दर्ज

अहमदाबाद। 
नरेंद्र मोदी के खिलाफ मुहिम चलाने वालीं सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ पर धोखाधड़ी के एक मामले में FIR दर्ज की गई है। उन पर गुलबर्ग सोसाइटी मेमोरियल के नाम पर जमा की गई राशि का इस्तेमाल निजी इस्तेमाल करने के लिए करने का आरोप है।
तीस्ता सीतलवाड़ जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता हैं। 2002 के गुजरात दंगों के बाद वह नरेंद्र मोदी का काफी मुखर विरोध करती रही हैं। 2002 में गुलबर्ग सोसाइटी को जला दिया गया था। सीतलवाड़ ने उस सोसाइटी के लिए एक मेमोरियल बनाने के वास्ते देश-विदेश से चंदा जमा करने का अभियान छेड़ा था। इस अभियान के तहत करोड़ों रुपये जमा हुए।
आरोप है कि इस पैसे से तीस्ता सीतलवाड़ और उनके पति जावेद आनंद के निजी खातों में एफडी करवा ली गई। अहमदाबाद पुलिस ने जांच के बाद इस मामले में FIR दर्ज कर ली। सीतलवाड़ और उनके पति जावेद आनंद के खिलाफ आईपीसी की धारा 420, 120 और 406 के तहत मामला दर्ज किया गया है।
-एजेंसी

शनिवार, 4 जनवरी 2014

इस कदर घबराए हुए थे... कि पहले की थी मॉक कॉफ्रेंस

नई दिल्ली। 
बतौर प्रधानमंत्री दस साल के कार्यकाल में तीसरी बार मीडिया से रूबरू होने से पहले पीएम मनमोहन सिंह को रिहर्सल करवाई गई थी। यूपीए-2 के कार्यकाल में उनकी दूसरी प्रेस कॉन्फ्रेंस के तैयारी के लिए मनमोहन ने सचिवालय के अधिकारियों के साथ रिहर्सल की थी। रिहर्सल के दौरान सचिवालय के अधिकारियों ने मनमोहन से सौ सवाल पूछे और उन्होंने जवाब दिया। पीएम मनमोहन अपने आपको रिहर्सल के माध्यम से मीडिया से रूबरू होने के लिए तैयार करके आए थे।
पहले हुई मॉक कॉन्फ्रेंस
सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए पूरी तैयारी करवाई गई थी। उन्होंने सचिवालय के साथ मॉक प्रेस कॉन्फ्रेंस करवाई थी। सचिवालय के अधिकारियों ने मॉक कॉन्फ्रेंस में पीएम से वे सवाल पूछे जो मीडिया पूछ सकती है। पीआईबी और डीएवीपी के 80 से ज्यादा अधिकारियों को मॉक कॉन्फ्रेंस की जिम्मेदारी गई थी। पीएम की प्रेस कॉन्फ्रेंस की जिम्मेदारी सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी को मिली हुई थी। प्रेस कॉन्फ्रेंस के प्रबंधन का काम तिवारी ही देख रहे थे।
-एजेंसी
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