सोमवार, 21 जुलाई 2014

कांग्रेस सरकार के कारनामों पर काटजू ने किया बड़ा खुलासा

नई दिल्‍ली। 
मद्रास हाईकोर्ट के एक जज के खिलाफ भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे थे। उन्हें सीधे तौर पर तमिलनाडु में डिस्ट्रिक्ट जज के तौर पर नियुक्त कर दिया गया था। डिस्ट्रिक्ट जज के तौर पर इस जज के कार्यकाल के दौरान उनके खिलाफ मद्रास हाई कोर्ट के विभिन्न पोर्टफोलियो वाले जजों ने कम-से-कम आठ प्रतिकूल टिप्पणियां की थीं। लेकिन मद्रास हाईकोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस ने अपनी कलम की ताकत से एक ही झटके में सारी प्रतिकूल टिप्पणियों को हटा दिया और यह जज हाईकोर्ट में अडिशनल जज बन गए। वह तब तक इसी पद पर थे, जब नवंबर 2004 में मैं मद्रास हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस बनकर आया।
इस जज को तमिलनाडु के एक बहुत ही महत्वपूर्ण राजनीतिक नेता का समर्थन प्राप्त था। मुझे बताया गया कि ऐसा इसलिए था क्योंकि डिस्ट्रिक्ट जज रहते हुए इस नेता को जमानत दी थी।
इस जज के बारे में भ्रष्टाचार की कई रिपोर्ट्स मिलने के बाद मैंने भारत के चीफ जस्टिस आरसी लाहोटी को इस जज के खिलाफ एक गुप्त आईबी जांच कराने की गुजारिश की। कुछ हफ्ते बाद जब मैं चेन्नै में था तो चीफ जस्टिस के सेक्रेट्री ने मुझे फोन किया और बताया कि जस्टिस लोहाटी मुझसे बात करना चाहते हैं। चीफ जस्टिस लाहोटी ने कहा कि मैंने जो शिकायत की थी वह सही पाई गई है। आईबी को इस जज के भष्टाचार में शामिल होने के बारे में पर्याप्त सबूत मिले हैं।
अडिशनल जज के तौर पर उस जज का दो साल का कार्यकाल खत्म होने वाला था। मुझे लगा कि आईबी रिपोर्ट के आधार पर अब हाईकोर्ट के जज के तौर पर काम करने से रोक दिया जाएगा लेकिन असल में हुआ यह कि इस जज को एडिशनल जज के तौर पर एक और साल की नियुक्ति मिल गई जबकि इस जज के साथ नियुक्त किए गए छह और एडिशनल जजों को स्थायी कर दिया गया।
मैंने बाद में इस बात को समझा कि यह आखिर हुआ कैसे। सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए एक कॉलेजियम प्रणाली होती है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के पांच सबसे सीनियर जज होते हैं जबकि हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए तीन सबसे सीनियर जजों की कॉलेजियम होती है।
उस समय सुप्रीम कोर्ट के तीन सबसे सीनियर जज थे, देश के चीफ जस्टिस लाहोटी, जस्टिस वाईके सभरवाल और जस्टिस रूमा पाल। सुप्रीम कोर्ट की इस कॉलेजियम ने आईबी की प्रतिकूल रिपोर्ट के आधार पर उस जज का दो साल का कार्यकाल खत्म होने के बाद जज के तौर आगे न नियु्क्त किए जाने की सिफारिश केंद्र सरकार को भेजी।
उस समय केंद्र में यूपीए की सरकार थी। कांग्रेस इस गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी थी लेकिन उसके पास लोकसभा में पर्याप्त बहुमत नहीं था और इसके लिए वह अपनी सहयोगी पार्टियों के समर्थन पर निर्भर थी। कांग्रेस को समर्थन देने वाली पार्टियों में से एक पार्टी तमिलनाडु से थी जो इस भ्रष्ट जज को समर्थन कर रही थी। तीन सदस्यीय जजों की कॉलेजियम के फैसले का इस पार्टी ने जोरदार विरोध किया।
मुझे मिली जानकारी के मुताबिक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उस समय संयुक्त राष्ट्र आमसभा की बैठक में भाग लेने के लिए न्यूयॉर्क जा रहे थे। दिल्ली एयरपोर्ट पर मनमोहन सिंह को तमिलनाडु की पार्टी के मंत्रियों ने कहा कि जब तक आप न्यूयॉर्क से वापस लौटेंगे उनकी सरकार गिर चुकी होगी क्योंकि उनकी पार्टी अपना समर्थन वापस ले लेगी। (उस जज को अडिशनल जज के तौर पर काम जारी न रखने देने के लिए)
यह सुनकर मनमोहन परेशान हो गए लेकिन एक सीनियर कांग्रेसी मंत्री ने कहा कि चिंता मत करिए वह सब संभाल लेंगे। वह कांग्रेसी मंत्री इसके बाद चीफ जस्टिस लाहोटी के पास गए और उनसे कहा कि अगर उस जज को एडिशनल जज के पद से हटाया गया तो केंद्र सरकार के लिए संकट की स्थिति पैदा हो जाएगी। यह सुनकर जस्टिस लाहोटी ने उस भ्रष्ट जज को एडिशनल जज के तौर पर एक साल का एक और कार्यकाल देने के लिए भारत सरकार को पत्र लिखा। (मुझे इस बात का आश्चर्य है कि क्या उन्होंने इसके लिए कॉलेजियम के बाकी दो सदस्यों से भी राय ली) इस तरह की परिस्थितयों में उस जज को एडिशनल जज के तौर पर और एक साल का कार्यकाल मिल गया।
उसके बाद चीफ जस्टिस बने वाईके सभरवाल ने उस जज को एक कार्यकाल और दे दिया। उनके उत्तराधिकारी चीफ जस्टिस केजी बालकृष्णन ने उस जज को स्थायी जज के तौर पर नियुक्त करते हुए किसी और हाईकोर्ट में ट्रांसफर कर दिया।
मैंने इन सब बातों का एक साथ उल्लेख करके यह दिखाने की कोशिश की सिद्धांत के उलट सिस्टम कैसे काम करता है। सच तो यह है कि आईबी की प्रतिकूल रिपोर्ट के बाद इस जज को एडिशनल जज के रूप में काम करने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए थी।
(मार्कंडेय काटजू वर्तमान में वह प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन हैं)

गुरुवार, 10 जुलाई 2014

''कुमार स्‍वामी''... साधु या शैतान ?

सुना है पहले बड़े ही सुनियोजित तरीके से ठगों का गिरोह ठगाई का अपना धंधा किया करता था। मसलन जैसे कोई व्‍यक्‍ति पशु पैंठ से गाय खरीद कर लाया। रास्‍ते में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर मौजूद गिरोह के सदस्‍य उससे पूछते थे- अरे भाई, यह गधा कितने का खरीदा?
गाय को गधा बताये जाने पर पहले तो वह आदमी चौंककर कहता है कि क्‍या अंधे हो भाई, यह गधा नहीं गाय है लेकिन रास्‍ते में जब तमाम लोग यही सवाल करते मिलते तो गाय लाने वाले को अपने ऊपर ही शक हो जाता था और वह सोचने लगता कि हो न हो मैं ही मूर्ख बन आया हूं। गांव पहुंचूंगा इसे लेकर तो बड़ी बदनामी होगी, साथ ही मजाक भी उड़ेगा लिहाजा वह खुद भी गाय को गधा मानकर रास्‍ते में ही कहीं चुपचाप छोड़कर चल देता था और पीछे से ठग उस गाय को ले उड़ते थे।
समय के साथ ठगाई का तरीका भले ही बदल गया हो लेकिन धंधा आज भी जारी है। यकीन न हो तो आज का दैनिक जागरण अखबार उठाकर देख लो।
इस अखबार में एक जैकेट पेज विज्ञापन छपा है। यह विज्ञापन मथुरा के वृंदावन में कुमार स्‍वामी द्वारा 12 व 13 जुलाई को आयोजित 'प्रभु कृपा दुख निवारण समागम' का है। 'स्‍वयंभू ब्रह्मर्षि' कुमार स्‍वामी के इस विज्ञापन में नेशनल हाईवे नंबर दो के पास वृंदावन के ही चौमुहां क्षेत्र अंतर्गत श्री राधा-कृष्‍ण का एक विशाल मंदिर बनाये जाने की घोषणा की गई है। 108 एकड़ भूमि पर प्रस्‍तावित इस मंदिर के निर्माण में दो हजार किलो सोना इस्‍तेमाल करने की बात लिखी है।
इस मंदिर के उद्देश्‍य और इसके ऊपर होने वाले खर्च पर चर्चा बाद में, पहले इसी विज्ञापन में किए गये दूसरे दावों की बात।
विज्ञापन में 'दिव्‍य पाठ से आई जीवन में खुशहाली' शीर्षक से करीब डेढ़ दर्जन लोगों के अनुभव प्रकाशित कराये गये हैं। इन लोगों में युवक-युवतियों एवं महिला-पुरुषों के अलावा दो बच्‍चों के भी फोटो लगे हैं।
इन तथाकथित निजी अनुभवों के माध्‍यम से दावा किया गया है कि ब्रह्मर्षि कुमार स्‍वामी द्वारा उपलब्‍ध कराये गये दिव्‍य पाठ से, उनके समागम में शामिल होने से तथा उनके द्वारा बताये गये अन्‍य उपायों से किस प्रकार उनके सारे कष्‍ट दूर हो गए।
इन कष्‍टों में एमबीबीएस करने के लिए एडमीशन से लेकर गोल्‍डमेडल हासिल होने तथा मनमाफिक नौकरी पाने से लेकर हार्ट की ब्‍लॉकेज समाप्‍त हो जाने तक का जिक्र है।
इतना ही नहीं, किसी का दावा है कि कुमार स्‍वामी की कृपा और उनके द्वारा बताये गये उपायों से उसका लाइलाज ब्रेस्‍ट कैंसर पूरी तरह ठीक हो गया तो किसी का दावा है कि उसकी बच्‍चेदानी का कैंसर ठीक हो गया। ब्‍लड शुगर, ब्‍लड प्रेशर व थॉयराइड जैसी बीमारियां कुमार स्‍वामी की कृपा से खत्‍म होने का दावा इन अनुभवों में किया गया है।
इसी विज्ञापन में 'मेडिकल साइंस हतप्रभ' शीर्षक से दावा किया गया है कि कुमार स्‍वामी द्वारा उपलब्‍ध कराये गये दिव्‍य पाठ के बाद जन्‍म से गूंगा व बहरा एक बच्‍चा बोलने व सुनने लगा तथा किसी कारण पूरी तरह आंखों की रौशनी गंवा चुके एक अन्‍य बच्‍चे की आंखों की रौशनी लौट आई। विज्ञापन के अनुसार गूंगे व बहरे बच्‍चे का इलाज पूर्व में पीजीआई चण्‍डीगढ़ से चल रहा था लेकिन वहां कोई लाभ नहीं हुआ।
विज्ञापन की मानें तो जहां मेडीकल साइंस असमर्थ हो गई, वहां कुमार स्‍वामी से उपलब्‍ध दिव्‍य पाठ ने चमत्‍कार कर दिखाया। यहां तक कि अनेक असाध्‍य रोगों का इलाज मात्र ईमेल के जरिए कर दिया।
लोगों को प्रभावित करने के लिए विज्ञापन में एक ओर जहां आज देश के प्रधानमंत्री व गुजरात के पूर्व मुख्‍यमंत्री नरेन्‍द्र मोदी तथा मथुरा की सांसद एवं सुविख्‍यात अभिनेत्री हेमा मालिनी का कुमार स्‍वामी को लेकर तथाकथित संदेश भी छापा गया है वहीं दूसरी ओर अमेरिका के सीनेटरों से प्राप्‍त अंबेसेडर ऑफ पीस अवार्ड, न्‍यूयॉर्क स्‍टेट सीनेट से प्राप्‍त सम्‍मान, मॉरीशस के पीएम से प्राप्‍त एंजल ऑफ ह्यूमेनिटी अवार्ड  तथा ब्रिटेन की संसद से प्राप्‍त अंबेसेडर ऑफ पीस अवार्ड के फोटो प्रकाशित किये गये हैं। यह बात अलग है कि इन फोटोग्राफ्स की सत्‍यता को भी प्रमाण की जरूरत पड़ सकती है। जैसे नरेन्‍द्र मोदी और हेमा मालिनी का संदेश कब और किस संदर्भ में दिया गया था, दिया गया था भी या नहीं।
इन फोटोग्राफ्स को विज्ञापन में प्रकाशित करने के पीछे लोगों को प्रभावित करने के अलावा भी कोई दूसरा मकसद हो सकता है, यह समझ से परे है। हां, यह बात जरूर समझ में आती है कि प्रभावित क्‍यों और किसलिए किया जा रहा है।
स्‍पष्‍ट है कि पूर्व में कभी जिस तरह ठगों का सरगना गाय को गधा साबित करने के लिए एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत गिरोह के सदस्‍यों का इस्‍तेमाल किया करता था, ठीक उसी तरह आज के कुमार स्‍वामी अपने तथाकथित भक्‍तों का इस्‍तेमाल कर रहे हैं जो वास्‍तव में उनके गिरोह का ही हिस्‍सा हैं अन्‍यथा क्‍या ऐसा संभव है कि जन्‍म से गूंगा-बहरा कोई ऐसा बच्‍चा जिसे ठीक करने में मेडीकल साइंस भी असमर्थ हो, उसे कुमार स्‍वामी ने ठीक कर दें। क्‍या ऐसा संभव है कि लाइलाज कैंसर का इलाज और ब्‍लड शुगर व ब्‍लड प्रेशर को कुमार स्‍वामी हमेशा के लिए ठीक कर सकें। मनमाफिक नौकरी पाने की बात हो या परीक्षा में मनमाफिक अंक प्राप्‍त करने की, सबकुछ कुमार स्‍वामी करवा सकते हों।
सूरदास के भक्‍तिपदों में एक पद है-
चरण-कमल बंदौ हरि राई।
जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, अंधे को सब कुछ दरसाई।।
बहिरौ सुनै मूक पुनि बोलै, रंक चलै सिर छत्र धराई।
'सूरदास' स्वामी करूणामय, बार-बार बन्दौं तेहि पाई।।
सूरदास ने अपने भक्‍ति पदों की रचना भगवान कृष्‍ण के संदर्भ में की है जबकि सूरदास प्रत्‍यक्षत: स्‍वयं मृत्‍युपर्यन्‍त दृष्‍टिहीन ही रहे और सूरदास नाम भी जन्‍मांध लोगों का पर्याय बन गया। लेकिन यहां तो सब-कुछ ब्रह्मर्षि कुमार स्‍वामी की कृपा से संभव बताया जा रहा है।
बेशक धर्म की आड़ में लोगों को ठगने का धंधा करने वाले आज हर धर्म में सक्रिय हैं और कोई धर्म इस प्रकार के धंधेबाजों से अछूता नहीं रह गया है लेकिन कुमार स्‍वामी के विज्ञापन की चर्चा इसलिए जरूरी है क्‍योंकि यह कुछ समय पूर्व इसी तरह यमुना को शुद्ध करने का बीड़ा मथुरा में उठा चुके हैं। तब इन्‍होंने एक बड़ी धनराशि अपनी ओर से यमुना शुद्धीकरण के लिए दान देने का ऐलान यमुना पर संकल्‍प के साथ किया था लेकिन आज न उस धनराशि का कोई पता है और ना ही यमुना शुद्धीकरण के लिए उठाये गये संकल्‍प का। हां, उसके साथ ही कुमार स्‍वामी के संस्‍थान की वेबसाइट पर यमुना शुद्धीकरण के लिए यथासंभव दान देने की अपील जरूर शुरू कर दी गई थी। उसके माध्‍यम से कितना दान मिला, और कुमार स्‍वामी द्वारा यमुना के लिए दान की गई भारी-भरकम रकम का क्‍या हुआ, कुछ नहीं पता।
अब कुमार स्‍वामी ने 108 एकड़ में दो हजार किलो सोने से जड़ा राधाकृष्‍ण का मंदिर बनाने की घोषणा की है।
यदि 25 हजार रुपया प्रति दस ग्राम सोने की कीमत से दो हजार किलो सोने का भाव कैलकुलेट किया जाए तो यह रकम बैठती है पांच सौ करोड़ रुपया। पांच सौ करोड़ रुपए का सोना और उसके अलावा 108 एकड़ नेशनल हाईवे से सटी हुई जगह की कीमत, फिर इतने बड़े मंदिर के निर्माण पर आने वाला खर्च आदि सब जोड़ा जाए तो यह रकम हजारों करोड़ बैठेगी।
यहां सवाल यह पैदा होता होता है कि कुमार स्‍वामी के पास इतनी रकम पहले से है या यह उगाही जानी है। यदि पहले से है तो आई कहां से।
नहीं है तो क्‍या मंदिर के निर्माण की घोषणा और उसके लिए अखबार में दिये गये लाखों रुपये कीमत के विज्ञापन का मकसद उसी प्रकार धन की उगाही करना है जिस प्रकार यमुना शुद्धीकरण के नाम पर कुछ समय पूर्व शुरू किया था।
एक अन्‍य सवाल यहां यह भी है कि 12-13 जुलाई को वृंदावन क्षेत्र में आयोजित प्रभु कृपा दुख निवारण समागम या अन्‍य स्‍थानों पर होते आ रहे ऐसे ही दूसरे समागम क्‍या नि:शुल्‍क होते हैं अथवा इनमें शामिल होने की कोई फीस वसूली जाती है। विज्ञापन के अनुसार उत्‍तर प्रदेश में कुमार स्‍वामी का यह 396वां समागम है। 395 इससे पहले विभिन्‍न स्‍थानों पर किये जा चुके हैं।
यदि यह समागम नि:शुल्‍क होते हैं तो इनके आयोजन के लिए भारी-भरकम खर्च कहां से आता है, कौन यह खर्च उठाता है और उसका इसके पीछे मकसद क्‍या है।
जाहिर है कि इन सभी प्रश्‍नों का जवाब कुमार स्‍वामी के दो पेज वाले 'जेकेट एड' से मिल जाता है परंतु धर्म की आड़ लेकर चल रहे ठगी के इस धंधे पर रोक लगाना आसान नहीं। हाल ही मैं साईं बाबा को लेकर उपजा विवाद इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
चूंकि धर्म ही सभी पापकर्मों के लिए सबसे बड़ी आड़ का काम कर सकता है इसलिए कुमार स्‍वामी जैसे लोग न केवल धर्म को धंधा बनाकर ऐश कर रहे हैं बल्‍कि देश व विदेश में मौजूद उस कालेधन को सफेद करने में लगे हैं जिनको बाहर निकालने में अब तक सरकारें भी असफल रही हैं।
पता नहीं क्‍यों सरकारों का ध्‍यान इस ओर नहीं जाता। यदि जाने लगे तो एक बड़ी मात्रा में कालेधन का पता और उसकी आड़ बने पूरे खेल का पर्दाफाश होते ज्‍यादा वक्‍त नहीं लगेगा।
-legendnews

शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

मथुरा में सबाव पर है ''वाइफ स्‍वेपिंग'' का खेल

मेट्रो सिटीज दिल्‍ली, मुंबई, कलकत्‍ता, चेन्‍नई सहित देश के तमाम दूसरे महानगरों तथा नगरों के साथ तरक्‍की की दौड़ में विश्‍व का नामचीन धार्मिक शहर मथुरा बेशक काफी पिछड़ा हुआ प्रतीत होता हो, बेशक यहां अभी तरक्‍की को परिभाषित करने वाली अनेक सुविधाओं का अभाव हो, बेशक देश-दुनिया के साथ तरक्‍की के लिए कदम ताल मिलाने में इसे लंबा समय लगे, लेकिन एक क्षेत्र ऐसा है जिसमें कृष्‍ण की यह नगरी अन्‍य दूसरे महानगरों एवं नगरों से किसी तरह पीछे नहीं हैं। सच तो यह है कि वह बहुत से नगरों एवं महानगरों से इस क्षेत्र में काफी आगे है।
जी हां! चाहे आपको आसानी से यकीन आये या ना आए, चाहे आपका मुंह आश्‍चर्य से एकबार को खुले का खुला रह जाए लेकिन सच्‍चाई यही है कि विश्‍व की धार्मिक, सांस्‍कृतिक, आध्‍यात्‍मिक एवं साहित्‍यिक विरासत को दरकिनार कर यह शहर उस दिशा में करवट ले चुका है जिसके बारे में सोचना तक आम आदमी के लिए किसी महापाप से कम नहीं है।
यहां हम बात कर रहे हैं पैसे वालों के एक शौक, या कहें एक ऐसे खेल की जिसे ''वाइफ स्‍वेपिंग'' अथवा ''कपल स्‍वेपिंग'' कहा जाता है।
पैसे वालों का इसलिए कि मध्‍यम वर्गीय लोगों की तो औकात से ही बाहर है इस खेल में शामिल होना।
इस खेल के तहत पैसे वाले परिवारों से संबंध रखने वाले कपल, कम से कम छ: कपल का एक ग्रुप बनाते हैं और यह ग्रुप फिर वाइफ स्‍वेपिंग करता है।
वाइफ स्‍वेपिंग के तहत न्‍यूड एवं सेमी न्‍यूड ग्रुप डांस से लेकर ग्रुप सेक्‍स तक सब-कुछ शामिल होता है।
इसके लिए सबकी सहमति से शहर के किसी बाहरी हिस्‍से में अच्‍छे होटल का हॉल तथा कमरे बुक कराये जाते हैं, जहां ग्रुप के सदस्‍य कपल पूर्व निर्धारित दिन व समय पर अपनी-अपनी गाड़ियों से पहुंचते हैं। इस खेल में शामिल होने के लिए जितना जरूरी है एक अदद कपल का होना, उतना ही जरूरी है एक गाड़ी का होना।
खेल की शुरूआत ड्रिंक या ड्रग्‍स से होती है, और उसके बाद जैसे-जैसे सुरूर चढ़ता जाता है, खेल शुरू होने लगता है।
खेल की शुरूआत के लिए ग्रुप के सभी सदस्‍य हॉल की बत्‍तियां बुझाकर एक टेबिल पर अपनी-अपनी गाड़ियों की चाभियां रख देते हैं और फिर अंधेरे में ही ग्रुप के पुरुष सदस्‍य किसी एक गाड़ी की चाभी उठाते हैं। जिसके हाथ में जिसकी गाड़ी की चाभी आ जाती है, वह उस सदस्‍य की बीबी के साथ खेल खेलने को अधिकृत हो जाता है। ठीक इसी प्रकार उसकी बीबी के साथ वह सदस्‍य खेल खेलने का अधिकारी हो जाता है जिसकी चाभी उसके हाथ लगी है।
चाभियों की अदला-बदली के साथ यह सदस्‍य अपने पार्टनर को होटल में ही पहले से बुक्‍ड कमरों में ले जाते हैं और फिर वहां स्‍वछंद सेक्‍स का यह खेल शुरू हो जाता है।
इससे भी आगे इस खेल में कुछ लोग हॉल के अंदर ही एक-दूसरे की पत्‍नियों को लेकर सब-कुछ करने को स्‍वतंत्र होते हैं जबकि कुछ लोग दो-दो और तीन-तीन की संख्‍या में ग्रुप सेक्‍स करते हैं।
जाहिर है कि इस सारे खेल का राजदार और हिस्‍सेदार वह होटल मालिक भी होता है जिसके यहां खेल खेला जाता है। उसे इसके लिए अच्‍छी-खासी रकम मिलती है, वो अलग।
बताया जाता है कि मथुरा के नवधनाढ्यों को इस खेल की लत उस क्‍लब कल्‍चर से लगी है जो कथित तौर पर समाज सेवा के कार्य करते हैं अथवा समाज सेवा करने का दावा करते हैं।
इनके अलावा कुछ लोगों ने पर्सनल क्‍लब या ग्रुप भी बना लिए हैं और उनकी आड़ में विभिन्‍न कार्यक्रमों का आयोजन करते रहते हैं। जिनका असल मकसद उनके बीच से छांटकर वाइफ स्‍वेपिंग अथवा कपल स्‍वेपिंग के लिए एक अलग ग्रुप बनाना होता है।
विश्‍वस्‍त सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार पिछले कुछ समय के अंदर इस धार्मिक शहर के विशेष वर्ग में हुईं आकस्‍मिक युवा संदिग्‍ध मौंतों के पीछे यही खेल रहा है क्‍योंकि इसके आफ्टर इफेक्‍ट अंतत: ऐसे ही परिणाम निकालते हैं।
सूत्रों की मानें तो विगत माह एक प्रसिद्ध होटल मालिक की शादी-शुदा बहिन इसी खेल में अपनी जान दे चुकी है। उसकी मौत को हालांकि इसलिए आत्‍महत्‍या प्रचारित किया गया क्‍योंकि उसने अपने मायके में जान दी थी परंतु सूत्रों की मानें तो इसके पीछे का असली कारण वाइफ स्‍वेपिंग का खेल ही था।
इसके अलावा कुछ दिन पूर्व एक बिल्‍डर के युवा पुत्र की संदिग्‍ध मौत हो या एक अन्‍य  बड़े व्‍यवसाई के अधेड़ उम्र पुत्र की होटल के कमरे में हुई मौत का मामला हो, सबके पीछे यही खेल बताया जाता है।
जिन परिवारों में यह मौतें हुई हैं, वह दबी जुबान से इतना तो स्‍वीकार करते हैं कि अवैध संबंध इन मौतों का कारण बने हैं, लेकिन सीधे-सीधे वाइफ स्‍वेपिंग के खेल में संलिप्‍तता स्‍वीकार नहीं करते।
चूंकि इस खेल के परिणाम स्‍वरूप एचआईवी एड्स तथा दूसरी संक्रामक बीमारियां भी तोहफे में मिलने की पूरी संभावना रहती है इसलिए इसके परिणाम तो किसी न किसी स्‍तर पर जाकर घातक होने ही होते हैं। ऐसी स्‍थिति में पति-पत्‍नी एक-दूसरे को दोषी ठहराने का प्रयास करते हैं और इसके फलस्‍वरूप गृहक्‍लेश बढ़ जाता है। रोज-रोज के गृहक्‍लेश का नतीजा फिर किसी अनहोनी के रूप में सामने आता है।
इस खेल से जुड़े लोगों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार धार्मिक शहर मथुरा में यूं तो इस खेल की शुरूआत हुए कई साल हो चुके हैं, लेकिन पिछले करीब पांच सालों से इसमें काफी तेजी आई है। पांच सालों में मथुरा के अंदर इस खेल के कई ग्रुप बने हैं और इसी कारण सो-कॉल्‍ड सभ्रांत परिवारों में कई जवान संदिग्‍ध मौतें भी हुई हैं।
आजतक ऐसी किसी मौत का मामला पुलिस के पास न पहुंचने की वजह से पुलिस ने उसमें कोई रुचि नहीं ली क्‍योंकि यूं भी मामला पैसे वालों से जुड़ा होता है।
यही कारण है वाइफ स्‍वेपिंग का यह खेल धर्म की इस नगरी में न केवल बदस्‍तूर जारी है बल्‍कि दिन-प्रतिदिन परवान चढ़ रहा है।
एक-दो नहीं, अनेक अपराधों का रास्‍ता बनाने वाला यह खेल यदि इसी प्रकार फलता-फूलता रहा और पुलिस व प्रशासन के बड़े अधिकारियों ने इस ओर अपनी निगाहें केंद्रित न कीं तो आने वाले समय में कृष्‍ण की नगरी के लिए यह ऐसा कलंक साबित होगा जिससे पीछा छुड़ाना मुश्‍किल हो जायेगा।
मुश्‍किल इसलिए कि मथुरा से दिल्‍ली बहुत दूर नहीं है। दिल्‍ली का कचरा अगर यमुना में बहकर आ रहा है तो दिल्‍ली का कल्‍चर भी सड़क के रास्‍ते मथुरा को प्रदूषित कर ही रहा है।
-Legendnews EXCLUSIVE

बुधवार, 2 जुलाई 2014

कुंभ के मेले में यूपी सरकार ने किया भारी घपला: कैग रिपोर्ट

लखनऊ। 
कुंभ के दौरान एक तरफ जहां श्रद्धालु आस्था के संगम में डुबकी लगा रहे थे, वहीं दूसरी तरफ सरकारी तंत्र भ्रष्टाचार में गोते लगा रहा था। यह खुलासा भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट में हुआ है। गौरतलब है कि यूपी के मंत्री आजम खां कुंभ मेला आयोजन कमिटी के अध्यक्ष थे। कैग रिपोर्ट में राज्य सरकार पर कई सवाल खड़े किए गए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, राज्य सरकार ने पूरा मेला केंद्र के पैसे से निपटा दिया जबकि 70 फीसदी खर्च राज्य सरकार को करना था। अफसरों ने कागजों में एक ही वक्त में कई मजदूरों को दो-दो जगह काम करते हुए दिखा दिया। ऐसा ही ट्रैक्टरों के साथ किया गया। सरकारी फाइलों में एक नंबर के ट्रैक्टर से एक साथ दो जगह काम किया गया। मेले में सड़क चौड़ी करने, मरम्मत से लेकर घाटों के निर्माण, बैरिकेडिंग तक हर काम में घपला सामने आया है। अफसरों ने ठेकेदारों की कमाई करवाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी।
सीएजी रिपोर्ट मंगलवार को विधानसभा में हंगामे के दौरान पेश की गई। इस पर सदन में कोई चर्चा भी नहीं हो सकी। रिपोर्ट के अनुसार, शहर, मेला स्थल, और रेलवे स्टेशनों पर सीसीटीवी कैमरों की व्यवस्था की गई थी, लेकिन सभी कंट्रोल रूम आपस में जुड़े ही नहीं थे। इस वजह से रेलवे स्टेशन पर पुलिस को शहर की भीड़ का अनुमान ही नहीं लगा।
कुंभ के लिए खरीदी गई दवाओं में आधी से ज्यादा का उपयोग ही नहीं हुआ। कुछ तो एक्सपायर हो गईं और बाद में वे गरीबों के इलाज के इस्तेमाल में दिखा दी गईं। करीब आधे कल्पवासियों को बीपीएल दर पर राशन भी नहीं उपलब्ध कराया गया। जिन्हें मिला भी तो आधे से ज्यादा कुंभ मेला गुजर जाने के बाद।
-एजेंसी

IPL की डील का खुलासा करने वाली थी सुनंदा इसलिए मार दी

नई दिल्ली। 
भाजपा के वरिष्ठ नेता और मशहूर वकील सुब्रमण्यम स्वामी ने आरोप लगाया है कि सुनंदा पुष्कर ने कहा था कि वह आईपीएल सौदों का खुलासा करेगी। सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा का नाम भी सामने आया था। सुनंदा पुष्कर की हत्या हुई थी। सुप्रीम कोर्ट को इसकी जांच करानी चाहिए। एक समाचार चैनल से बातचीत में स्वामी ने कहा कि सुनंदा पुष्कर की मौत के मामले की जांच को लेकर मैं सुप्रीम कोर्ट में जुलाई के अंत तक याचिका दाखिल करूंगा। कांग्रेस के सहयोगी दल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने भी सुनंदा पुष्कर की संदिग्ध मौत के मामले की विस्तृत जांच कराए जाने की मांग की है। एनसीपी नेता और वकील माजिद मेमन ने कहा कि सुनंदा पुष्कर की मौत के मामले की जांच होनी चाहिए और शशि थरूर को इसमें सहयोग करना चाहिए।
एम्स के फोरेंसिक विभाग के प्रमुख डॉ. सुधीर गुप्ता ने आरोप लगाया है कि उन पर गलत पोस्टमार्टम देने के लिए दबाव बनाया गया था। उन्होंने कहा कि पूर्व स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद और शशि थरूर के दबाव में पोस्टमार्टम रिपोर्ट बदली गई थी। गुप्ता के आरोपों पर केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने एम्स के निदेशक से रिपोर्ट मांगी है।
सुधीर गुप्ता ने स्वास्थ्य मंत्रालय और मुख्त सतर्कता आयुक्त को पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि वरिष्ठ अधिकारियों ने सुनंदा पुष्कर की संदिग्ध मौत को प्राकृतिक मौत बताने के लिए दबाव बनाया था। सुधीर गुप्ता के नेतृत्व वाली फोरेंसिक टीम ने ही सुनंदा पुष्कर का पोस्टमार्टम किया था। गुप्ता ने कैट में हलफनामा दाखिल किया है। इसमें गुप्ता ने दावा किया कि गुलाम नबी आजाद ने उन पर गैर पेशेवर तरीके से काम करने के लिए दबाव डाला ताकि मामले को रफा दफा किया जाए।
गुप्ता ने दावा किया है कि जब वह दबाव के आगे नहीं झुके और रिपोर्ट में यह बताया कि सुनंदा पुष्कर की मौत जहर के कारण हुई थी तो उन्हें निशाना बनाया गया। डॉ. हर्षवर्धन ने कहा कि गुप्ता ने अपने प्रमोशन को लेकर पत्र लिखा था लेकिन मीडिया ने यह रिपोर्ट किया कि पत्र में कुछ विशेष आरोप हैं। मैंने एम्स के डायरेक्टर को रिपोर्ट सौंपने के लिए कहा है। गौरतलब है कि 18 जनवरी को दिल्ली के पांच सितारा होटल के एक कमरे में सुनंदा पुष्कर मृत पाई गई थी।
-एजेंसी

शुक्रवार, 27 जून 2014

सावधान! क्‍या आप भी देख रहे हैं घर का सपना

(लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष)
यह खबर उन लोगों के लिए है जो अपनी मेहनत की कमाई से अपने एक अदद आशियाने का सपना पूरा करना चाहते हैं।
यह खबर उन लोगों के लिए भी है जो अपने परिवार का सिर ढंकने की खातिर जिंदगीभर के लिए अपने सिर पर बैंक का ऐसा कर्ज लाद लेते हैं, जिसकी भरपाई करना नामुमकिन न सही लेकिन बहुत कठिन अवश्‍य हो जाता है।

उन लोगों के लिए भी है यह खबर जो डेवलेपमेंट अथॉरिटी से अप्रूवल का विज्ञापन भर देखकर बिल्‍डर या प्रमोटर पर आंख बंद करके भरोसा कर लेते हैं और उसके द्वारा दिखाए जाने वाले सब्‍ज़बागों का कहीं किसी स्‍तर से सत्‍यापन नहीं करते।
हाल ही में देश की सर्वोच्‍च अदालत ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानि एनजीटी के फैसले पर अपनी मोहर लगाते हुए रीयल एस्‍टेट का बड़ा नाम जेपी इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर की याचिका को खारिज कर दिया। यह याचिका ओखला पक्षी विहार के आसपास चल रहे निर्माण कार्य पर एनजीटी द्वारा रोक लगाये जाने के खिलाफ थी। कोर्ट के इस फैसले के बाद करीब 20 हजार लोगों का फ्लैट मिलने का सपना अधर में लटक गया है।
एनजीटी ने 28 अक्टूबर, 2013 को अपने फैसले में कहा था कि ओखला पक्षी विहार के दस किलोमीटर का दायरा पर्यावरणीय और पारिस्थितिकीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र में आता है। ऐसे में यहां बन रही इमारतों को कम्प्लीशन सर्टिफिकेट नहीं दिया जाएगा।
जेपी की तरफ से कोर्ट में दलील दी गई थी कि इन इलाकों में करीब चार हजार फ्लैट तैयार हो चुके हैं। ऐसे में अगर नोएडा अथॉरिटी फ्लैट्स के कम्पलीशन सर्टिफिकेट जारी नहीं करता है तो खरीददारों को फ्लैट्स पर कब्जा नहीं मिल सकेगा।
कोर्ट के इस फैसले से नोएडा में जेपी इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर के अलावा ओखला पक्षी विहार के दायरे में आने वाले आम्रपाली, एटीएस, लॉजिक्स, गुलशन, सुपरटेक और अजनारा जैसे रीयल एस्‍टेट कंपनियों के प्रोजेक्‍ट प्रभावित होंगे।
इसके अलावा मुंबई की कैंपा कोला सोसायटी का केस भी सामने है जिसमें 25 साल पूर्व बने 96 फ्लैट्स को सुप्रीम कोर्ट ने अवैध मानते हुए उन्‍हें गिराने का आदेश दे दिया। आज वहां रहने वालों की सासें अटकी हुई हैं। उनके पानी, बिजली व गैस के कनैक्‍शन काट दिये गये हैं और वो पूरी तरह शासन व प्रशासन के रहमो-करम पर निर्भर हैं।
भ्रष्‍टाचार से उपजी ऐसी व्‍यवस्‍थागत खामियों के चलते नि:संदेह ये हालात किसी एक शहर या एक प्रदेश के नहीं हैं, पूरे देश के हैं। कोई प्रदेश, कोई जिला और यहां तक कि कोई कस्‍बा इससे अब अछूता नहीं रहा लेकिन खामी लोगों की सोच में भी है।
वह सोच जो ''सब-कुछ चलता है'' के जुमले को आत्‍मसात कर चुकी है और जिसके कारण भ्रष्‍टाचार व बेईमानी का कारोबार दिन दूना व रात चौगुना फल-फूल रहा है। जिसके कारण हर सरकारी मुलाजिम और प्रत्‍येक अफसर रिश्‍वत से अपनी तिजोरी भरने के लिए कानून को ताक पर रखने में कोई गुरेज़ नहीं करता। फिर चाहे उनकी वजह से आम आदमी की जान व माल पर क्‍यों न बन आए।
फिलहाल बात करते हैं विश्‍व के नक्‍शे में एक विशिष्‍ट स्‍थान रखने वाले धार्मिक जनपद मथुरा की।
विकास को परिभाषित करने वाले दूसरे तमाम आयाम भले ही मथुरा में कहीं दिखाई न देते हों परंतु बहुमंजिला इमारतों एवं अप्रूव्‍ड कॉलोनियों के मामले में यह धार्मिक जनपद दिल्‍ली एनसीआर से टक्‍कर लेता प्रतीत होता है।
यहां 9 से लेकर 14 मंजिला तक रिहायशी इमारतें निर्माणाधीन हैं और 3 व 6 मंजिला कई इमारतें बनकर खड़ी हो चुकी हैं।
राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्‍ली से मात्र 146 किलोमीटर दूर और राष्‍ट्रीय राजमार्ग नंबर दो के किनारे बसे इस धार्मिक जनपद में तरक्‍की यदि कहीं दिखाई देती है तो इन इमारतों से ही दिखाई देती है।
इनके अलावा भी यहां एक ओर सैंकड़ों एकड़ में फैली गेटबंद कॉलोनियां हैं तो दूसरी ओर व्‍यावसायिक कॉम्‍पलेक्‍स हैं। जाहिर है कि इन सबको डेवलेपमेंट अथॉरिटी से अप्रूव्‍ड बताया जाता है और यही प्रचार भी किया जाता है। सड़क के दोनों ओर, छतों और खेत खलिहानों के बीच लगे बड़े-बड़े होड्रिंग्‍स इसकी पुष्‍टि कर सकते हैं। यह बात अलग है कि इस सबके बावजूद जनपद में ऐसी अवैध रिहायशी एवं व्‍यावसायिक इमारतों की संख्‍या सैंकड़ों में है जिन्‍हें प्रशासन बाकायदा चिन्‍हित कर चुका है।
इन अवैध इमारतों की बात फिलहाल छोड़ दी जाए और सिर्फ उन इमारतों की बात की जाए जिन्‍हें मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण से अप्रूव्‍ड प्रचारित करके रीयल एस्‍टेट के कारोबारी अपनी जेबें भर रहे हैं, तो उन इमारतों की सच्‍चाई किसी के भी पैरों के नीचे से जमीन खिसका देने को काफी है।
दरअसल जिन रेजीडेंशियल व कॉमर्शियल इमारतों को डेवलेपमेंट अथॉर्टी से अप्रूव्‍ड प्रचारित किया जाता है, उनका कोई एक हिस्‍सा ही अप्रूव्‍ड होता है और बाकी सब प्रस्‍तावित रहता है। भ्रष्‍टाचार पर भरोसे के चलते रीयल एस्‍टेट के कारोबारी न केवल पूरे प्रोजेक्‍ट को अप्रूव्‍ड प्रचारित कर देते हैं बल्‍कि भूकंपरोधी जैसी अनेक खूबियों से सुसज्‍जित बताते हैं जबकि किसी भी भवन को भूकंपरोधी बनाने की एक जटिल प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में सॉइल टेस्‍ट (मृदा परीक्षण) से लेकर निर्माण में इस्‍तेमाल की जाने वाली सामग्री की गुणवत्‍ता तक शामिल है और इन सबके अलग-अलग विशेषज्ञ होते हैं जो निर्माण के साथ-साथ उसके लिए सर्टीफिकेट जारी करते हैं।
डेवलेपमेंट अथॉर्टी का काम केवल नक्‍शा पास करने भर का न होकर, वह सब देखना भी है जिसके बारे में बिल्‍डर विज्ञापनों के जरिए प्रचाारित कर रहा है लेकिन आज तक किसी फर्जी विज्ञापन पर अथॉरिटी ने कोई कार्यवाही की हो, ऐसा संज्ञान में नहीं आया जबकि ऐसे ढेरों विज्ञापन सामने हैं।
मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के ही सूत्र बताते हैं कि अप्रूवल की आड़ में निर्माणाधीन कोई प्रोजेक्‍ट ऐसा नहीं है जहां अनियमितताएं न बरती जा रही हों।
कई बड़े प्रोजेक्‍ट तो ऐसे हैं जिनका आधे से अधिक हिस्‍सा अवैध है लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्यवाही आज तक अमल में नहीं लाई गई।
राष्‍ट्रीय राजमार्ग के किनारे शहर में बन रहे ऐसे प्रोजेक्‍ट्स पर आश्‍चर्यजनक रूप से बैंके भी फाइनेंस कर रही हैं।
सूत्रों की मानें तो कई प्रोजेक्‍ट मालिकों ने बैंकों को भी धोखे में रखा हुआ है, यहां तक कि संबंधित विभागों की नकली स्‍टांप लगाकर फर्जी नक्‍शा आदि जमा करा दिया गया है और उन्‍हीं के आधार पर बैंकें फाइनेंस कर रही हैं।
चूंकि हाउसिंग फाइनेंस करने वाली अधिकांश बैंकों के लीगल एडवाजर, फील्‍ड ऑफीसर एवं मैनेजर आदि सब बिल्‍डर से सेट होते हैं, साथ ही कर्ज लेने वाले से भी सुविधा शुल्‍क प्राप्‍त करते हैं, इसलिए वह किसी डॉक्‍यूमेंट के असली होने की पुष्‍टि नहीं करते। विशेष रूप से यह तो कतई नहीं देखते कि जिस जमीन पर प्रोजेक्‍ट खड़ा किया जा रहा है, उसकी असलियत क्‍या है।
वह केवल डेवलेपमेंट अथॉरिटी की परमीशन भर देखकर संतुष्‍ट हो जाते हैं।
दूसरी ओर एक अदद घर अपना होने का सपना पाले बैठा व्‍यक्‍ति यह मान लेता है कि जब बैंक को कर्ज देने में आपत्‍ति नहीं है, तो सब-कुछ ठीक ही होगा।
यदि कभी कोई व्‍यक्‍ति बिल्‍डर से जमीन के कागजातों अथवा नक्‍शे आदि की मांग करता है तो उससे कह दिया जाता है कि सबके लिए अलग-अलग कहां तक बांटेंगे लिहाजा बैंक में सारे पेपर जमा हैं, आप अपना फाइनेंस कराइए। कोई परेशानी आए, तब बताइयेगा।
उधर दलालों से हर वक्‍त घिरे रहने वाले विकास प्राधिकरण के अधिकारियों को यह देखने की फुर्सत नहीं मिलती कि अप्रूवल की आड़ के बाद विकास कैसा व कितना हो रहा है।
विकास प्राधिकरण के अधिकारी अपनी जिम्‍मेदारी सुविधा शुल्‍क के साथ केवल डेवलेपमेंट चार्ज वसूलने तक निभाते हैं, उसके बाद बिल्‍डर कितना और क्‍या घालमेल कर रहा है, इससे उन्‍हें कोई लेना-देना नहीं। यही कारण है कि कल तक एक जैसे मकानों से सुसज्‍जित कॉलोनियों में आज लोग मनमाफिक निर्माण बेखौफ  कराते जा रहे हैं लेकिन न कोई देखने वाला है और न सुनने वाला।
और तो और बिल्‍डर्स से भारी भरकम डेवलेपमेंट चार्ज वसूलने वाले विभाग ने आज तक किसी अपनी कॉलोनी में कोई विकास कार्य कराया हो, ऐसी सूचना नहीं मिली है।
प्राधिकरण से अप्रूव्‍ड पॉश कॉलोनियों का सीवर आस-पास के नालों में समा रहा है और इन कॉलोनियों में बिजली, पानी व सड़क तक की व्‍यवस्‍था चरमराने लगी है।
इन सबसे अलग लगभग हर अच्‍छी कॉलोनी का कोई न कोई हिस्‍सा विवादित है और उसका विवाद किसी न किसी स्‍तर पर लंबित है लेकिन अधिकांश लोगों को इसकी जानकारी तक नहीं है। लोगों को बाकायदा एक सुनियोजित तरीके से अंधेरे में रखा जाता है। बाद में यदि किसी हाउस होल्‍डर को सच्‍चाई पता भी लगती है तो उसके पास हाथ मलने के अलावा कुछ नहीं रह जाता।
ठीक उसी तरह जिस तरह आज कैंपा कोला सोसायटी के वाशिंदे अथवा नोएडा में नामचीन बिल्‍डर्स के प्रोजेक्‍ट में पैसा फंसा चुके लोगों के साथ हो रहा है।
आज इन लोगों का साथ देने को न कोई डेवलेपमेंट अथॉरिटी सामने आ रही है और न कोई दूसरी अथॉरिटी। सब अपने-अपने हिस्‍से का माल मारकर तमाशा देख रहे हैं। न्‍यायपालिकाएं भी कोई मदद नहीं कर पातीं क्‍योंकि वह केवल दस्‍तावेजी सबूत देखती हैं। उनका कहना अपनी जगह सही है कि पैसा फंसाने से पहले बिल्‍डर के सभी दावों की सच्‍चाई पता करना, खरीदार का काम है। यदि वह आंखें बंद करके अपनी पूंजी फंसाते हैं तो दोषी वह भी कम नहीं।
यही कारण है कि कैंपा कोला सोसायटी और जेपी ग्रुप के मामले में कोर्ट काफी सख्‍त नजर आईं।
कोर्ट की ऐसी सख्‍ती ताकीद करती है कि अपने एक अदद आशियाने का सपना देखने वालों को आंख बंद करके बिल्‍डर या उसके कथित अप्रूवल एवं प्रचार पर भरोसा करने की बजाय, खुद सारे दस्‍तावेजों का सत्‍यापन कर लेना चाहिए अन्‍यथा एक दिन वह भी सड़क पर खाली हाथ खड़े दिखाई देंगे और तब उनकी मदद करने वाला कोई नहीं होगा।
मथुरा को बेशक समूची दुनिया में एक धर्म नगरी के तौर पर पहचाना जाता है लेकिन याद रहे कि पापकर्मों के लिए धर्म ही सबसे बड़ी आड़ का काम करता है और यह बात न केवल बेईमान कारोबारी भली-भांति जानते हैं बल्‍कि वो अधिकारी भी जानते हैं जो आने के साथ तो कहते हैं कि वह ब्रजभूमि की सेवा करने आएं हैं लेकिन जैसे ही पहले से मुंह लगा खून सामने नजर आता है, ब्रजभूमि व ब्रजवासी, सबको भुला देते हैं।

अन्‍ना और रामदेव फिर आए साथ, श्री-श्री रविशंकर भी जुड़े

नई दिल्ली। 
समाजसेवी अन्ना हजारे ग्रेट इंडिया मूवमेंट या श्रेष्ठ भारत अभियान से जुड़ गए हैं। 9 अगस्त को भारत छोड़ो आंदोलन की वर्षगांठ पर वह दिल्ली में इसकी शुरुआत करेंगे। इस अभियान में उनके साथ आध्यात्मिक गुरु श्री-श्री रविशंकर तथा योग गुरु बाबा रामदेव भी होंगे। इस गैरराजनीतिक अभियान का मकसद समाज में व्यवस्थित ढंग से परिवर्तन लाना है। इस अभियान की शुरुआत आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता और केजरीवाल के विरोधी रहे अश्विनी उपाध्याय ने की है।
इस अभियान की कोर कमेटी में प्रोफेसर जगमोहन राजपूत (एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक), जस्टिस डीएस तेवतिया (कलकत्ता हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस), आईपीएस प्रकाश सिंह (उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी), आईपीएस शशिकांत (पंजाब के पूर्व डीजीपी), प्रभात चतुर्वेदी (पूर्व श्रम सचिव), डॉ. वेद प्रताप वैदिक, सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील राम जेठमलानी, पर्यावरणविद् राजेंद्र सिंह शामिल हैं।
केजरीवाल पर कुछ गंभीर आरोप लगाने के बाद पार्टी ने उपाध्‍याय को बाहर का रास्‍ता दिखा दिया था। वह आप के नेशनल काउंस‍िल के सदस्‍य भी रह चुके हैं। उपाध्‍याय ने पिछले दिनों बेंगलुरु में अभियान शुरू करने की घोषणा की थी। इस मौके पर उन्होंने कहा था कि हमारी योजना केंद्र और राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम करने की है लेकिन अगर कहीं गलत हुआ तो हम विरोध भी करेंगे। उपाध्याय के मुताबिक, 'हमने अभियान के तहत सरकारों को सुझाव देने के लिए पांच खास क्षेत्र चुने हैं जिनमें चुनाव, पुलिस, न्यायपालिका, कृषि और शिक्षा शामिल है।' हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि यह संगठन गैर-राजनीतिक है और इसका किसी पार्टी से कोई लेना-देना नहीं होगा। साथ ही, संगठन केजरीवाल या उनकी पार्टी के समानांतर दूसरी पार्टी बनाने जैसा बिल्कुल भी नहीं है। दूसरी ओर, उपाध्याय के श्रेष्ठ भारत अभियान में कुछ विशेषज्ञों को भी शामिल किया गया है, जिनमें संतोष हेगड़े भी शामिल बताए जा रहे हैं। दूसरी ओर, पूर्व AAP नेता शाजिया इल्मी के जुड़ने की पुष्टि होना भी अभी बाकी है। बताया गया है कि उन्हें मनाने के लिए अन्ना हजारे ने अपने प्रतिनिधि विनायक राव पाटिल को भेजा था।
उधर, श्री-श्री रविशंकर ने अमेरिका में आयोजित एक कार्यक्रम में मोदी को 'सख्‍त लेकिन नरमदिल इंसान' की संज्ञा दी है। रविशंकर नरेंद्र मोदी के बेहद करीबी माने जाते हैं। वॉशिंगटन में एक थिंक टैंक की ओर से आयोजित कार्यक्रम में रविशंकर को मोदी के बारे में बोलने के लिए कहा गया था। रविशंकर ने कहा, ''हालांकि, मोदी बेहद सख्‍त हैं लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि वह एक नरमदिल इंसान भी हैं। ''रविशंकर के अलावा रामदेव भी मोदी के बेहद करीबी माने जाते हैं। रामदेव ने तो मोदी को पीएम बनाने के लिए अभियान तक चलाया था। उधर, अन्‍ना हजारे ने भी हाल ही में मोदी की बतौर पीएम तारीफ की थी। अन्‍ना ने अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्‍सप्रेस से बातचीत में कहा था कि ऐसा लगता है कि अच्‍छे दिन आने वाले हैं। अन्‍ना, रविशंकर और रामदेव की इस तिकड़ी की मोदी से नजदीकी कांग्रेस और केजरीवाल, दोनों के लिए सिरदर्द साबित हो सकती है।
लोकपाल आंदोलन के बाद यह पहली बार होगा, जब अन्ना हजारे और बाबा रामदेव साथ होंगे। अन्ना के आंदोलन को बाबा रामदेव ने भी अपना समर्थन दिया था। इसी के चलते भ्रष्टाचार के खिलाफ उन्होंने दो साल पहले दिल्ली के रामलीला मैदान पर अनशन भी किया गया, जिसमें उन्होंने काले धन को भारत वापस लाने की सरकार से मांग की थी। हालांकि, आंदोलन का पटाक्षेप बेहद नाटकीय ढंग से हुआ था लेकिन इसके बाद ही केंद्र की यूपीए सरकार और कांग्रेस के खिलाफ बाबा रामदेव ने देश भर में यात्राएं की और कांग्रेस को वोट न देने की अपील भी की। वहीं, अन्ना हजारे अरविंद केजरीवाल द्वारा पार्टी बनाने से नाराज होकर अलग हो गए थे। अब तक वे सिर्फ लोकसभा चुनावों में प. बंगाल में ही सक्रिय दिखे, जहां वे ममता बनर्जी को समर्थन दे रहे थे। इसके अलावा, उनकी दिल्ली दौड़ थम-सी गई थी और वे अपना ज्यादातर समय अपने गांव रालेगणसिद्धि में ही बिता रहे थे।
श्रेष्ठ भारत अभियान की शुरुआत करने वाले आम आदमी पार्टी के ही एक नाराज नेता है, तो निश्चित तौर पर इससे आप के संयोजक अरविंद केजरीवाल को नुकसान उठाना पड़ सकता है। अन्ना पहले ही अरविंद के राजनीतिक कदमों का विरोध करते रहे हैं। ऐसे में, वे इस अभियान के जरिए अपना पुराना जनाधार एकत्र कर सकते हैं। वहीं, अभियान में शामिल अन्य शख्सियतें भी कालांतर में किसी न किसी तरह अरविंद केजरीवाल, लोकपाल आंदोलन या अन्ना हजारे से जुड़े रहे हैं। दूसरी ओर, 'आप' फिलहाल अंदरूनी कलह से जूझ रही है और दिल्ली में भी उसका जनाधार डांवाडोल है। ऐसे में, आप कार्यकर्ताओं और दूसरे नेता श्रेष्ठ भारत अभियान में अन्ना हजारे और अन्य महत्वपूर्ण लोगों की मौजूदगी के चलते 'आप' छोड़ सकते हैं। संभव है कि भविष्य में यह संगठन आप का विकल्प बन जाए।
जहां तक कांग्रेस का सवाल है, रामदेव इस पार्टी को अपना दुश्‍मन नंबर 1 मानते हैं। मोदी के करीबी रामदेव एनडीए के सत्‍ता में होने की वजह से कांग्रेस पर हमला बोलने के मामले में और ज्‍यादा मुखर होकर सामने आ सकते हैं। उधर, अन्‍ना हजारे और रविशंकर की सामाजिक प्रतिष्‍ठा का फायदा बीजेपी को मिल सकता है, जो एक तरह से कांग्रेस और अन्‍य विपक्षी दलों के लिए नुकसान ही साबित होगा।
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