सोमवार, 10 नवंबर 2014

फिर एक 'संत' की कानून-व्‍यवस्‍था को खुली चुनौती

हिसार/नई दिल्‍ली।
जूनियर इंजीनियर पद से बर्खास्‍तगी के बाद 'संत' बने रामपाल आज भी कोर्ट में पेश नहीं होंगे। उनकी ओर से कोर्ट को मेडिकल रिपोर्ट भिजवा दी गई है। उनके वकील अदालत को बता रहे हैं कि खराब सेहत की वजह से रामपाल कोर्ट आने की स्थिति में नहीं हैं। रामपाल के निजी गार्ड्स और समर्थकों ने पुलिस को रोकने के लिए रविवार से ही मोर्चाबंदी कर रखी है। जमीन विवाद और हत्‍या के एक मामले में बार-बार समन के बावजूद पेश नहीं होने पर कोर्ट ने रामपाल को 10 नवंबर को पेश करने का आदेश दिया था लेकिन पुलिस ने उनकी गिरफ्तारी के लिए कोई पहल नहीं की। उनके समर्थकों की मोर्चाबंदी के मद्देनजर आश्रम से करीब 25 किलोमीटर दूर पुलिस ने अतिरिक्‍त कंपनियां एहतियातन तैयार रखी थीं लेकिन रामपाल की गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने कदम नहीं उठाए।
चंडीगढ़ में पूरी तैयारी
हिसार में बाबा के करीब 50 हजार समर्थक उनके डेरे को घेरा डालकर खड़े हैं। उधर, चंडीगढ़ पुलिस ने अपनी ओर से पूरी तैयारी कर रखी है। सोमवार सुबह 4 बजे से शहर के सारे एंट्री प्वाइंट, रेलवे स्टेशन और हाईकोर्ट में 5 हजार जवान तैनात किए गए हैं। अगर बाबा के समर्थक चंडीगढ़ पहुंचते हैं तो हाउसिंग बोर्ड के पास, रेलवे लाइट प्वाइंट और हाईकोर्ट की सड़क के पास से ट्रैफिक डायवर्ट किया जाएगा। चंडीगढ़ की तरफ से रेलवे स्टेशन की एंट्री ही बंद कर दी जाएगी। स्टेशन पर जीआरपी ने 150 महिला कांस्टेबल और 450 पुरुष कांस्टेबल तैनात किए गए हैं। जीआरपी के 50 अफसर भी तैनात हैं।
सतलोक आश्रम के संचालक रामपाल ने रविवार को शासन और प्रशासन को अपनी ताकत का अहसास कराने में कोई कमी नहीं छोड़ी। बंदूकों से लैस उनके निजी कमांडो आश्रम की छतों के अलावा चंडीगढ़ हाईवे पर घूमते नजर आए। ये कमांडो आश्रम के आसपास एक किलोमीटर के दायरे में फैले हुए थे।
आश्रम ने सशस्त्र युवाओं को दिखाकर पुलिस प्रशासन को डराया, वहीं महिलाओं और बच्चों को टकराव रोकने के लिए ढाल भी बनाया। सैकड़ों महिलाएं अपने बच्चों को गोदी में लेकर आश्रम के मुख्य द्वार पर घंटों बैठी रहीं। रामपाल के अनुयायी बैनर लेकर करौंथा कांड की सीबीआई जांच के साथ कुछ जजों के नाम लिखकर उनके ऊपर कार्यवाही की मांग की कर रहे थे। इस दौरान हाईवे से गुजरने वाला हर शख्स आश्रम के बाहर की गतिविधियों को देखकर चुपके से गुजरता रहा। अगर किसी अनजान शख्स ने आश्रम के सामने रुक कर पड़ताल करने की कोशिश की तो उसे संत के अनुयायियों ने पकड़ लिया और पूछताछ करने के बाद ही छोड़ा। ऐसा दहशत भरा माहौल दोपहर दो बजे तक रहा। फिर महिलाओं को आश्रम के भीतर भेज दिया गया और छतों से कमांडो भी हटा लिए गए।
दोपहर बाद माहौल में बदलाव को लेकर जब आश्रम के प्रवक्ता राजकपूर से बात हुई तो उनका कहना था कि सुबह कुछ ऐसी जानकारी मिली थी, जिससे सुरक्षा प्रबंध बढ़ाए गए थे। वैसे भी साधक टकराने के लिए तैनात नहीं थे बल्कि अपने गुरुजी के लिए जान न्योछावर करने के लिए खड़े थे। गुरुजी अपने उपदेश में कहते भी हैं, मारने से अच्छा मरना है। उनका कहना था कि सुरक्षा में तैनात अनुयायियों को कम करने के पीछे एक वजह यह भी है कि अगर पुलिस कोई कार्यवाही के लिए हिसार से चलेगी तो उन्हें आधा घंटे से अधिक समय लगेगा और हमें तीन से चार मिनट लगेंगे।
रिश्तेदारों के पास ठहरे हैं अनुयायी
संत रामपाल के अनुयायी केवल आश्रम में ही मौजूद नहीं हैं, बल्कि आसपास के गांवों में अपने रिश्तेदारों के पास भी ठहरे हुए हैं। वे टेलीविजन और फोन के माध्यम से आश्रम की जानकारी ले रहे हैं। उन्हें पुलिस से टकराव की स्थिति में तत्काल आश्रम पहुंचने के निर्देश हैं।
मीडिया से बात न करने की हिदायत
रविवार को सत्संग का आखिरी दिन होने से आश्रम में श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही थी। इस पर आश्रम के सामने माहौल को देखने के लिए 11 बजे के बाद मीडियाकर्मियों की आवाजाही शुरू हो गई। आश्रम प्रबंधन ने सभी श्रद्धालुओं और अपने कमांडोज को मीडिया से बातचीत नहीं करने की हिदायत दी ताकि आश्रम की जानकारी प्रशासन तक न पहुंच सके।
सत्संग के बाद डटे रहे श्रद्धालु
बरवाला आश्रम में पिछले तीन दिनों से चल रहा सत्संग रविवार रात 10 बजे खत्म हो गया। पर इसके बाद भी श्रद्धालु आश्रम में ही डटे रहे। रात को काफी अनुयायी आश्रम से निकल गए। इसके बावजूद देर रात तक हजारों लोग आश्रम में मौजूद थे।
लिस का एक भी अधिकारी नहीं पहुंचा आश्रम
वैसे तो पुलिस प्रशासन ने संत रामपाल की गिरफ्तारी के लिए जिलेभर में पैरा मिलिट्री फोर्स सहित हरियाणा पुलिस की 35 कंपनियां तैनात की है लेकिन गिरफ्तारी से संबंधित बातचीत को लेकर एक भी पुलिसकर्मी रविवार को आश्रम नहीं पहुंचा। आश्रम के प्रवक्ता राजकपूर ने बताया कि कोई भी पुलिस अधिकारी आश्रम में नहीं आया है।
प्रवक्ता बोले : कोर्ट को लेकर दुविधा में
आश्रम के प्रवक्ता राजकपूर ने कहा कि गुरुजी के सामने अजीब समस्या पैदा हो गई है। अगर वह कोर्ट में जाते हैं तो अवमानना का नोटिस आ जाता है और पेश नहीं होते हैं तो गैर जमानती वारंट जारी कर दिया जाता है।
एसपी बोले:  हर हलचल पर नजर
रामपाल की गिरफ्तारी के लिए सभी प्रयास किए जा रहे हैं। हर हलचल पर नजर है। हाईकोर्ट के निर्देशों की पालना होगी।
- सतेंद्र गुप्ता, एसपी।
सतलोक आश्रम के बाहर हिसार-चंडीगढ़ हाईवे पर करीब एक किलोमीटर तक संत रामपाल के अनुयायियों का जमावड़ा रहा।
आश्रम के अंदर आने वाले भक्तों पर भी पैनी नजर रखी जा रही है। आश्रम के मेन गेट पर भारी संख्या में संत के अनुयायी हर आदमी पर नजर रखे हुए हैं। वहीं, एसडीएम प्रशांत अटकान सहित अन्य स्थानीय आश्रम के मौजूदा हालात पर नजर रखे हैं।
सतलोक आश्रम और पुलिस-प्रशासन के बीच टकराव की आशंका के चलते आश्रम के नजदीक से सरकारी बसों को गुजरने नहीं दिया गया। फिर भी पूरे दिन संत के अनुयायियों का आना-जाना जारी रहा। आश्रम की बसें अनुयायियों को लाने और ले जाने में लगातार जुटी रहीं।
जिला प्रशासन ने सतलोक आश्रम के संचालक संत रामपाल की गिरफ्तारी के वारंट जारी होने के मामले में बरवाला पुलिस स्टेशन में दमकल विभाग की गाड़ियां, एंबुलेंस और क्रेन को तैनात किया गया है। गौरतलब है कि पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने तथाकथित संत रामपाल के खिलाफ गैरजमानती वारंट जारी करते हुए उन्हें 10 नवंबर को अदालत में पेश करने का निर्देश दिया है। उनके अनुयायियों ने संत को अस्वस्थ बताते हुए उनकी गिरफ्तारी का आदेश मानने से साफ मना कर दिया है। ऐसे में प्रशासन व अनुयायियों में टकराव की आशंका है।
संत पर अदालती काम में दखल देने का आरोप है। इसी मामले में उन्हें कई बार पेशी के आदेश हो चुके हैं मगर वह पेश नहीं हुए। पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने लगातार तीसरी पेशी में हाजिर न होने के मामले में रोहतक के करौंथा गांव स्थित आश्रम के संत रामपाल के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किए हैं क्योंकि वे तीसरी पेशी पर भी नहीं पहुंच सके।
सतलोक आश्रम के श्रद्धालुओं की संस्था राष्ट्रीय समाजसेवा कमेटी के अध्यक्ष राम कुमार ढाका के खिलाफ भी गैर जमानती वारंट जारी किए थे लेकिन वे कोर्ट में पेश हो गए हैं। ढाका ने अदालत में शपथ-पत्र देकर हिसार अदालत के बाहर हंगामे की जिम्मेदारी ली थी और कहा था कि हंगामे से संत रामपाल को कोई लेना-देना नहीं है।
न्यायालय ने हरियाणा के पुलिस महानिदेशक तथा गृह सचिव को 10 नवंबर को अपनी मौजूदगी में आदेश की पालना सुनिश्चित कराने के निर्देश दिए हैं। संत रामपाल की आज न्यायालय में पेशी होनी थी और ऐहतियाती तौर पर पुलिस ने कड़े सुरक्षा के इंतजाम किए। करीब तीन हजार पुलिसकर्मी ड्‍यूटी पर तैनात किये गये। पेशी को देखते हुए प्रशासन ने धारा 144 लगा रखी है ताकि संत के समर्थक कोई बवाल न मचाएं। जीरकपुर, मोहाली और पंचकूला में चंडीगढ़ प्रवेश द्वारों पर नाके लगाए हुए थे।
-Legendnews

रविवार, 2 नवंबर 2014

ये क्‍या, नमामि गंगे की 1 मीटिंग 43 लाख की ?

नब्बे के दशक से ही हिंदुस्तान की सरकारें गंगा की सफाई के बहाने हजारों करोड़ बहा चुकी हैं और ऐसा लगता है कि आने वाले सालों में भी ये सिलसिला थमेगा नहीं. बड़े बड़े वादों से गंगा और जनता को नमामि गंगे के जरिए स्वच्छता की नई उम्मीद देने वाले मोदी के मंत्री भी गंगा की सफाई के नाम पर एक बैठक में लाखों रुपये निगल रहे हैं.
लोकसभा चुनावों में काशी से जीतकर प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी का गंगा की सफाई का सपना खर्चीला साबित होने जा रहा है. एक बैठक पर लाखों रुपये खर्च किए जा रहे हैं.
आरटीआई कार्यकर्ता गोपाल प्रसाद की ओर से सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी के आधार पर सरकार ने विज्ञान भवन में स्वच्छ गंगा के लिए आयोजित राष्ट्रीय मिशन की एक बैठक पर 43.85 लाख रुपये खर्च किए.
बैठक के लिए खर्च किए पैसों के आंकड़े चौंकाने वाले हैं, क्योंकि बैठक के लिए आए अतिथियों की सुविधाओं पर 26.7 लाख रुपये खर्च किए गए जबकि अधिकारियों की यात्रा पर 8.8 लाख रुपये बहा दिए गए.
इसके साथ ही गंगा की सफाई के लिए प्रचार पर 5.1 लाख रुपये खर्च किए गए.
दिलचस्प है कि सरकार ने इस बैठक के लिए 75 हजार रुपये सिर्फ साज सज्जा पर खर्च किए. इसके अलावा दूसरी सुविधाओं के लिए 2.3 लाख रुपये खर्च हुए.
गौरतलब है कि बीजेपी नीत केंद्र सरकार ने समेकित गंगा संरक्षण मिशन के लिए नमामि गंगे अभियान की घोषणा की है. इसके लिए केंद्रीय बजट से 2,037 करोड़ आवंटित किया गया है.

बुधवार, 29 अक्टूबर 2014

प्रदीप बर्मन के स्विस बैंक अकाउंट में हैं 18 करोड़ रुपए

नई दिल्ली। 
एक न्‍यूज़ चैनल ने स्विस बैंक में अकाउंट को लेकर डाबर समूह के पूर्व निदेशक प्रदीप बर्मन के खिलाफ कई खुलासे किए हैं। चैनल का कहना है कि बर्मन के स्विस बैंक अकाउंट में 18 करोड़ रुपए हैं और उन्‍होंने अपने खाते की जानकारी इनकम टैक्स से छिपाई थी। यह भी पता चला है कि बिना स्विट्जरलैंड गए प्रदीप बर्मन का खाता खुल गया था। बर्मन का खाता सिर्फ एक फैक्स औऱ फोन कॉल से ऑपरेट होता था। चैनल ने बर्मन का स्विस बैंक अकाउंट नंबर भी जारी किया है। उनके खिलाफ आयकर विभाग ने जो आरोपपत्र तैयार किया है उसमें ये सारी बातें कही गई हैं। दस्तावेजों के मुताबिक, बर्मन ने 2005-06 की अपनी आय मात्र 66 लाख 34 हजार तीन सौ चालीस रुपए बताई थी और आयकर विभाग को दी जानकारी में उन्‍होंने यह नहीं बताया था कि किसी विदेशी बैंक में उनका खाता है।
गौरतलब है कि सरकार ने 27 अक्‍टूबर को सुप्रीम कोर्ट में जिन कारोबारियों के नाम बताए थे उनमें प्रदीप बर्मन भी शामिल हैं। उस दिन डाबर समूह की ओर से बयान जारी कर कहा गया था कि बर्मन ने एनआरआई की हैसियत से खाता खुलवाया था और उन्‍होंने पूरी रकम पर टैक्‍स भरा है।
उधर, टीवी चैनल के मुताबिक बर्मन ने आयकर विभाग की पूछताछ में कहा कि एक आदमी जो ख्वाजा (अभी तक यह पता नहीं चला पाया है कि यह शख्‍स कौन है) को जानता था, वह एचएसबीसी बैंक ज्यूरिख का फॉर्म लेकर दुबई आया था और उन्‍होंने दुबई में ही इस फॉर्म को भरकर पहचान के तौर पर अपना फोटो और इंडियन पासपोर्ट लगाया था।
यह भी पता चला है कि खाते से पैसा निकालने के लिए बर्मन को कभी ज्यूरिख जाने की जरूरत नहीं पड़ती थी। बर्मन के मुताबिक, उन्‍होंने बैंक को ये निर्देश दिए हुए थे कि जब भी उन्‍हें पैसा जमा कराना होगा या निकालना होगा तो वह बैंक को एक फैक्स कर देंगे। फैक्स पहुंचने के बाद बर्मन के पास एक फोन आता था जिससे इस बात की पुष्टि की जाती थी कि पैसे वही निकाल रहे हैं। उसके बाद उन्‍हें बता दिया जाता था कि वह किस बैंक से पैसे ले सकते हैं। जब आयकर अधिकारियों ने बर्मन से पूछा कि वह किस नंबर पर फैक्स करते थे तो उन्‍होंने कहा कि अब उन्‍हें याद नहीं है।
ब्‍लैक मनी पर सरकार ने किया है समझौता
कालेधन पर लगाम लगाने के लिए भारत ने 13 देशों के साथ टैक्‍स इंफॉर्मेशन एक्‍सचेंज अग्रीमेंट (कर सूचना आदान-प्रदान समझौता) किया है। ये देश हैं- जिब्राल्‍टर, बहामास, बरमूडा, ब्रिटिश वर्जिन आईलैंड, आइल ऑफ मैन, केमैन आईलैंड, जर्सी लाइबेरिया, मोनाको, मकाऊ, अर्जेंटीना, बहरीन और गुर्नसे। माना जाता है कि इन देशों में कई भारतीयों ने काला धन जमा करा रखा है। इस समझौते के तहत दो देश किसी आपराधिक या सिविल टैक्‍स मामले में एक-दूसरे से जानकारियां साझा कर सकते हैं।
 -एजेंसी

कालाधन: खेल की दुनिया से लेकर बॉलीवुड तक के लोग

नई दिल्ली। 
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को काला धन मामले में 627 खाताधारकों की सूची तो सौंप दी है लेकिन जानकारों के मुताबिक़ काला धन वापस लाने की दिशा में यह नाकाफ़ी है.
नाम भर पता लगने से काला धन वापस आ जाएगा, ऐसा नहीं हैं. हाँ, इतना ज़रूर है कि इससे जांच का रास्ता खुलेगा.
काले धन की वापसी पर अब तक क्या रहा है ख़ास और कितना है काला धन. बता रहे हैं प्रोफ़ेसर आर वैद्यनाथन:
1- कालाधन सबसे अधिक सेक्यूलर हैं. इसमें सिर्फ़ राजनीतिक दल ही नहीं बल्कि सारे वर्ग, संप्रदाय और तबक़े के लोग शामिल हैं. खेल की दुनिया से लेकर बॉलीवुड तक के लोग सब इसमें शामिल हैं, यहां तक कि मीडिया के भी.
2- विदेशों में जमा ये काला धन सिर्फ़ कर चोरी से संबंधित नहीं इसके साथ ड्रग, हवाला, अवैध हथियार और चरमपंथ जैसी चीज़ें जुड़ी हुई हैं.
3- ये काला धन शेयर, बाँन्ड्स के अलावा सोना, क़ीमती पत्थर, हीरा, ज़ेवरात जैसे कई रूपों में कई लॉकरों में मौजूद हैं.
4- मेरे अनुमान के मुताबिक़ ये काला धन 500 अरब डॉलर के बराबर होगा.
5- सोशल मीडिया की भी काला धन लाने में महत्वपूर्ण भूमिका होगी. देश के लोगों की इसे वापस लाने में अब दिलचस्पी है.
6- 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि नामों का ख़ुलासा करने से विदेशों के साथ किसी भी संधि का उल्लंघन नहीं होता है. सरकार का तर्क था कि दोहरा कराधान बचाव संधि (डीटीएए) की वजह से विदेशी बैंकों में जमा काला धन खाताधारकों के नाम उजागर नहीं किए जा सकते हैं.
7- किसी भी चुराए हुए डेटा को लेने में किसी भी तरह की संधि का उल्लंघन नहीं होता है. यह सबके लिए उपलब्ध होता है.
8- अभी तो सिर्फ़ नाम दिए जा रहे हैं, कालाधन वापस लाने में पांच से दस साल लग सकते हैं. हमारे सामने फ़िलीपिंस, पेरू और नाइजीरिया जैसे देशों का उदाहरण है जिन्हें काला धन वापस लाने में काफ़ी वक़्त लग गया था.

गुरुवार, 23 अक्टूबर 2014

मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी...

जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए...

प्रसिद्ध कवि गोपाल दास 'नीरज' ने यह कविता कब लिखी थी, इतना तो नहीं मालूम परंतु इतना जरूर मालूम है कि यह कविता आज भी उतनी ही सार्थक है, जितनी अपने रचनाकाल में रही होगी।
2014 की यह दीवाली कई मायनों में देश तथा देशवासियों के लिए विशिष्‍ट है। अच्‍छे दिन लाने का वायदा करके सत्‍ता पर काबिज होने वाले नरेंद्र मोदी सरकार की यह पहली दीवाली है जबकि रोशनी के बीच कश्‍मीरियों के लिए एक उदास दिन से अधिक कुछ नहीं। हालांकि नरेंद्र मोदी अपनी ओर से उनकी दीवाली को खुशनुमा बनाने की कोशिश में उनके पास गये हैं।
पद्मश्री और पद्मभूषण डॉ. नीरज की इस कविता में और जो लाइनें हैं, वह कश्‍मीर के वर्तमान हालातों पर पूरी तरह सटीक बैठती हैं।
नीरज ने इस कविता में आगे कहा है-
सृजन है अधूरा अगर विश्‍व भर में
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी
मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी
कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी
चलेगा सदा नाश का खेल यूँ ही
भले ही दिवाली यहाँ रोज आए

उधर राजनीतिक नजरिए से भी 2014 की दीवाली का बहुत महत्‍व है। इस दीवाली से मात्र चार दिन पहले आये महाराष्‍ट्र और हरियाणा के चुनाव परिणामों ने कांग्रेस का तो जैसे दिवाला ही निकाल दिया।
ऊपर से मोदी सरकार ने जिस काले धन की सुप्रीम कोर्ट को फिलहाल जानकारी देने में असमर्थता जाहिर की थी, उस पर भी कांग्रेस का दांव ऐन दीवाली तक उल्‍टा पड़ता दिखाई देने लगा क्‍योंकि मोदी सरकार ने न केवल 136 लोगों के नाम सुप्रीम कोर्ट को शीघ्र बताने का ऐलान कर दिया बल्‍कि वित्‍तमंत्री ने यह और कह दिया कि इस खुलासे के बाद कांग्रेस शर्मसार हो सकती है।
जाहिर है ऐसे में कई उन कांग्रेसियों का हाजमा खराब हो गया होगा, जिन पर वित्‍तमंत्री ने निशाना साधा है।
नीरज ने इस कविता की आखिरी लाइनों में कहा है कि-
मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ जग में
नहीं मिट सका है धरा का अँधेरा
उतर क्यों न आयें नखत सब नयन के
नहीं कर सकेंगे ह्रदय में उजेरा
कटेंगे तभी यह अँधरे घिरे अब
स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए

इन आखिरी लाइनों को सार्थक करने की कोशिश में नरेंद्र मोदी कश्‍मीर गये हैं और ऐसा ही प्रयास उन्‍होंने कुछ दिन पहले आंध्र प्रदेश जाकर किया था जहां हुदहुद नामक तूफान के कारण भारी तबाही हुई।
राजनीति की बिसात पर बेशक नरेंद्र मोदी के हर कदम को उनके विरोधी अपने-अपने तरीके से परिभाषित करें किंतु आम जनता के मन में उन्‍होंने उम्‍मीद की किरण जगाई है। पिछले एक दशक से जिस तरह पूरे देश को दूर-दूर तक कोई रोशनी नजर नहीं आ रही थी, आज वहां दूर से ही सही परंतु दिए टिमटिमाते दिखाई देने लगे हैं।
बात चाहे स्‍वच्‍छ भारत के लिए अभियान की हो या फिर भ्रष्‍टाचार मुक्‍त शासन-प्रशासन मुहैया कराने के प्रयासों की, सीमा पर पाकिस्‍तान को मुंहतोड़ जवाब देने की हो अथवा चीन की आंखों में आंख डालकर रेल लाइन बिछाने की प्रक्रिया शुरू करने की, देशवासियों को कतरा-कतरा रोशनी सुकून जरूर दे रही है।
दलगत राजनीति से इतर यदि सोचें तो मात्र 6 महीने से भी कम के इस कार्यकाल में यह उपलब्‍धियां कम नहीं कही जा सकतीं।
दलगत राजनीति अपनी जगह है लेकिन देश अपनी जगह। क्‍या यह ज्‍यादा उचित नहीं होगा कि दलगत राजनीति से ऊपर उठकर इस दीवाली हम कुछ अलग नजरिया अपनाएं। हम स्‍वस्‍थ राजनीति करें। जहां विरोध जरूरी न हो, वहां विरोध न करें और सरकार के उन कार्यों के लिए उसे अवश्‍य प्रोत्‍साहित करें जिनसे आमजन का हित जुड़ा हो... जिनसे देश का हित जुड़ा हो... क्‍योंकि दीवाली सिर्फ अपने-अपने घरों में झालरें लटका कर आतिशबाजी कर लेने भर का त्‍यौहार नहीं है। दीवाली सबको साथ लेकर चलने, सबको खुशियां बांटने और सबके दुखदर्द में शरीक होने का नाम है। संभवत: इसीलिए दीवाली पर तोहफे बांटने का रिवाज कायम है।
नीरज की इसी कविता में बीच की पंक्‍तियां इसी ओर इशारा करती हैं-
नई ज्योति के धर नए पंख झिलमिल
उड़े मर्त्य मिट्टी गगन स्वर्ग छू ले
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी
निशा की गली में तिमिर राह भूले
खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगमग
ऊषा जा न पाए, निशा आ ना पाए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए

-Legendnews  

बुधवार, 15 अक्टूबर 2014

अनेक गलगोटियाओं से भरा पड़ा है शिक्षा व्‍यवसाय

122 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी के मामले में गलगोटिया यूनीवर्सिटी के मालिकानों का फंसना तो शिक्षा के क्षेत्र में माफिया की सक्रियता का एक उदाहरण भर है। सच तो यह है कि एक वर्ग विशेष ने निजी शिक्षण संस्‍थाएं संचालित करने की आड़ में शिक्षा के क्षेत्र को अवैध पैसा कमाने की खान बना लिया है।
आश्‍चर्य की बात तो यह है कि शिक्षा का व्‍यवसायीकरण करके उसके माध्‍यम से बेहिसाब अवैध संपत्‍ति अर्जित करने वाला शिक्षा माफिया अब खुलेआम खुद को शिक्षाविद् कहता है।
विचारणीय है यह स्‍थिति कि चंद वर्षों पहले तक जहां किसी अच्‍छे-खासे शहर में बमुश्‍किल एक-दो शिक्षण संस्‍थान ऐसे होते थे जिनमें आधुनिक शिक्षा लिया जाना संभव था, वहां अचानक शिक्षण संस्‍थाओं की फेहरिस्‍त इतनी लंबी कैसे हो गई?
वह भी तब जबकि पहले अधिकांश शिक्षण संस्‍थाएं किसी न किसी संस्‍था द्वारा संचालित की जाती थीं न कि व्‍यक्‍ति विशेष द्वारा और आज एक-एक व्‍यक्‍ति दर्जन या आधा दर्जन शिक्षण संस्‍थाओं का मालिक बन बैठा है।
जाहिर है कि शिक्षा के व्‍यवसाय में कमाई का कोई न कोई ऐसा वैध अथवा अवैध स्‍त्रोत तो है जिससे बहुत कम समय के अंदर करोड़ों नहीं, अरबों रुपए की लागत वाले अत्‍याधुनिक शिक्षण संस्‍थान खड़े किये जा सकते हैं।
अगर हम बात करें मथुरा की तो करीब डेढ़ दशक पहले तक यहां किशोरी रमण महाविद्यालय तथा बीएसए यानि बाबू शिवनाथ अग्रवाल महाविद्यालय के रूप में मात्र दो ही डिग्री कॉलेज हुआ करते थे और इन दोनों महाविद्यालयों का संचालन अलग-अलग संस्‍थाएं करती थीं। दूसरे स्‍कूल-कॉलेज भी इन्‍हीं संस्‍थाओं से संचालित होते थे लेकिन डेढ़ दशक के अंदर यह धार्मिक नगरी अचानक न सिर्फ टेक्‍नीकल एजुकेशन का हब बन गई बल्‍कि गली-गली और मोहल्‍ले-मोहल्‍ले कंम्‍प्‍यूटर इंस्‍टीट्यूट भी खुल गये।
कल तक इनमें से किसी पर भू माफिया का तो किसी पर चांदी और क्रिकेट के सट्टेबाज का ठप्‍पा लगा था, आज वह अपने नाम से पहले बड़े फख्र के साथ शिक्षाविद् जोड़ रहे हैं।
यही नहीं, राजनीति में असफल लोग भी जब शिक्षा के व्‍यवसाय में उतरे तो वह सफल हो गये और आज कई-कई शिक्षण संस्‍थाओं के मालिक बनकर देश के भविष्‍य से खिलवाड़ कर रहे हैं।
कई बड़े शिक्षा व्‍यवसाई तो ऐसे हैं जिनकी संतानें होटलों में अय्याशी करती पकड़ी गई हैं लेकिन आज वही इन बड़ी शिक्षण संस्‍थाओं में बड़े-बड़े पदों को सुशोभित कर रहे हैं। ठीक उसी तरह जिस तरह गलगोटिया यूनीवर्सिटी के मालिक सुनील गलगोटिया का पुत्र ध्रुव गलगोटिया शिक्षा की इस अपनी दुकान में डायरेक्‍टर के पद पर काबिज़ था।
शिक्षा के व्‍यवसायीकरण का इससे बड़ा दुर्भाग्‍य और क्‍या हो सकता है कि तमाम बड़ी शिक्षण संस्‍थाओं के मालिक अंगूठा टेक हैं और उनकी अय्याश औलादें बमुश्‍किल हाईस्‍कूल व इंटरमीडियेट तक की शिक्षा ग्रहण कर पाने में सफल हुई हैं। जिन्‍होंने डिग्रियां हासिल की हैं, उनकी डिग्रियां भी संदिग्‍ध हैं क्‍योंकि वह अपनी शिक्षण संस्‍थाएं खुलने के बाद जुगाड़ करके हासिल की हैं।
जहां तक सवाल इन शिक्षा व्‍यवसाइयों की नैतिकता का है, तो गलगोटियाओं का कारनामा साबित करता है कि नैतिकता उनके लिए कोई मायने नहीं रखती। अपने कॉलेज और यूनीविर्सिटीज में शिक्षा के साथ-साथ उच्‍च नैतिक शिक्षा देने का ढिंढोरा पीटने वाले ये शिक्षा व्‍यवसाई व्‍यक्‍तिगत जिंदगी में कितने नैतिक हैं, इससे शायद ही कोई अपरिचित हो।
मथुरा के एक नामचीन शिक्षा व्‍यवसाई का अपने ही संस्‍थान में बड़े पद पर काबिज की हुई अधेड़ महिला से क्‍या रिश्‍ता है और वह उस संस्‍थान में इस मुकाम तक कैसे पहुंची,  यह सर्वविदित है लेकिन आज ऐसे चरित्रहीन लोग शिक्षाविद् तथा समाजसेवी का तमगा लगाये हुए हैं।
छात्रों के साथ स्‍कॉलरशिप से लेकर प्‍लेसमेंट तक के नाम पर खुली धोखाधड़ी करने तथा उनके अभिभावकों को जमकर लूटने वाले इन तथाकथित शिक्षाविदों के बीच इन दिनों खुद को पुरस्‍कृत कराने की एक होड़ और चल पड़ी है। एक शिक्षा माफिया कहीं से एक सम्‍मान हासिल करके लाता है तो दूसरा शिक्षा माफिया दूसरे दिन कहीं किसी और से कोई सम्‍मान ले आता है। इस तरह एक-एक शिक्षा माफिया, दर्जनों पुरस्‍कार तथा सम्‍मान प्राप्‍त है जबकि यह सम्‍मान व पुरस्‍कार कैसे लिए जाते हैं, किसी से छिपा नहीं है।
आज भले ही गलगोटिया का ही सच सामने आया हो, लेकिन वह दिन दूर नहीं जब पता लगेगा कि दो दूनी चार करने में अधिकांश शिक्षा माफिया एक-दूसरे से पीछे नहीं हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में माफियाराज के पनपने की सूचना चूंकि अब केंद्र सरकार से भी छिपी नहीं रही इसलिए केंद्र की भी इस पर नजरें लगी हैं। निकट भविष्‍य में अब शिक्षा माफिया यदि सरकार के निशाने पर हो और हर जिले में गलगोटियाओं व उनके परिजनों की धरपकड़ शुरू हो जाए तो कोई आश्‍चर्य नहीं क्‍योंकि हर गलगोटिया अंत तक आखिरी दांव फेंकने में माहिर होता है। वह व्‍यवस्‍था की आंखों में धूल झोंकने के सभी इंतजाम करता है। यह बात दीगर है कि भ्रष्‍टाचार के इस दौर में भी कानून जब अपना शिकंजा कसता है तो न कोई गलगोटिया बचता है और न आसाराम बापू व तरुण तेजपाल जैसे सामाजिक अपराधी और न सुब्रत राय सहारा जैसे आर्थिक अपराधी।
बस देखना यह होता है कि किसका नंबर कब आता है।
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष

मंगलवार, 14 अक्टूबर 2014

गलगोटिया यूनीवर्सिटी के डायरेक्टर और उनकी मां गिरफ्तार

122 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी के मामले में थाना हरीपर्वत पुलिस ने गलगोटिया विश्वविद्यालय के निदेशक ध्रुव गलगोटिया और पद्मिनी गलगोटिया को गुड़गांव से गिरफ्तार कर लिया।
पद्मिनी, शंकुतला एजुकेशनल सोसाइटी के चेयरमैन सुनील गलगोटिया की पत्नी हैं। उनके खिलाफ मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की कोर्ट ने गैर जमानती वारंट जारी किया था।
बता दें कि संजय प्लेस स्थित एसई इन्वेस्टमेंट कंपनी के असिस्टेंट मैनेजर गिर्राज किशोर शर्मा ने एक महीने पहले थाना हरीपर्वत में मुकद्दमा दर्ज कराया था।
शर्मा की शिकायत थी कि नोएडा की शकुंतला एजुकेशनल एवं वेलफेयर सोसाइटी ने कंपनी से सन 2010 से 2012 के बीच में 80 लाख रुपये के 10 लोन स्वीकृत कराए। इनमें संस्था से जुड़े गलगोटिया विश्वविद्यालय के नाम से भी लोन शामिल था।
स्वीकृत लोन का पैसा संस्था को 24 किस्तों में ब्याज के साथ अदा करना था लेकिन कुछ किश्‍तों के भुगतान के बाद अदायगी बंद कर दी गई। इसके बाद इन्वेस्टमेंट कंपनी ने संस्था को नोटिस जारी ‌किया।
कंपनी को ब्याज समेत करीब 122 करोड़ रुपये का बकाया अदा करना है। मुकद्दमे में एजुकेशनल सोसाइटी के चेयरमैन सुनील गलगोटिया, डायरेक्टर पद्मिनी गलगोटिया, ध्रुव गलगोटिया और श्रीमती जुगनू गलगोटिया को नामजद किया गया।
ऋण अदायगी बंद करने के बाद शकुंतला एजुकेशन सोसाइटी ने दिल्ली हाईकोर्ट में आरविटेशन दाखिल किया, जिसमें सोसाइटी को भारी घाटे में‌ दिखाया गया। साथ ही गलगोटिया विश्वविद्यालय को अलग संस्थान बताया गया।
जांच कर रही थाना हरीपर्वत पुलिस ने आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं होने पर सीजेएम खलीकुज्जमा की अदालत में गैर जमानती वारंट जारी करने का प्रार्थना पत्र दिया गया था।
अदालत ने चारों आरोपियों को वारंट जारी किए थे। इसके बाद सुनील गलगोटिया ने हाईकोर्ट से गिरफ्तारी पर स्थगनादेश ले लिया था, बाकी लोगों को स्थगनादेश नहीं मिल सका था।
सोमवार को थाना हरीपर्वत पुलिस की टीम ने डायरेक्टर ध्रुव गलगोटिया और उनकी मां पद्मिनी गलगोटिया को गुड़गांव से गिरफ्तार कर लिया। टीम दोपहर तक दोनों को आगरा लेकर आएगी।
-Legendnews
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