सोमवार, 10 मई 2021

कोरोना से तो बच सकते हैं लेकिन इन वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों और भ्रम फैलाने वाले वायरसों से कैसे बचें?


 चीन के वुहान में उपजा कोरोना नामक वायरस जब से ग्‍लोबल हुआ है, तब से तमाम दूसरे वायरस भी दुनियाभर में सक्रिय हो चुके हैं। कोरोना की हर लहर के साथ इनकी संख्‍या बढ़ती जा रही है लिहाजा समझ में नहीं आ रहा इनसे बचाव कैसे किया जाए?

दो गज की दूरी और मास्‍क जरूरी, सोशल डिस्टेंसिंग, सैनिटाइजेशन, आइसोलेशन, वर्क फ्रॉम होम आदि को अपनाकर शायद कोविड-19 से तो बचा जा सकता है किंतु वैज्ञानिकों एवं विशेषज्ञों के रूप में सोशल मीडिया, वेब मीडिया, इलैक्‍ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया के जरिए फैल चुके वायरसों से बचने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा।
दुनिया अभी जहां बमुश्‍किल कोरोना की वैक्‍सीन ही ईजाद कर सकी है वहीं ये वैज्ञानिक और विशेषज्ञ दिन-रात नए-नए नतीजे निकाल कर और कोरोना के भूत, वर्तमान तथा भविष्‍य का बखान करके लोगों को भयभीत करने का काम कर रहे हैं।
लोगों के दिलो-दिमाग में भय का भूत व्‍याप्‍त करने वाले ये तत्‍व इस कदर वायरल हो चुके हैं कि आदमी “मीडिया” से दूर भागने लगा है। हालांकि ये फिर भी पीछा नहीं छोड़ रहे।
आश्‍चर्य की बात यह है कि ऐसे तत्‍वों में विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO सहित कई विकसित देशों के वो विशेषज्ञ और वैज्ञानिक भी शामिल हैं जिन्‍होंने अब तक अपनी ऐसी ही कथित योग्यता के बल पर न केवल मान-सम्‍मान बल्‍कि धन-दौलत और तमाम पुरस्‍कार भी हासिल किए हैं।
ख्‍याति प्राप्‍त ये संस्‍थाएं और व्‍यक्‍ति आज न तो कोरोना के किसी एक इलाज पर एकमत हैं और न उसके लक्षण एवं दुष्‍प्रभावों पर। सब अपनी-अपनी ढपली बजा रहे हैं जिससे आम आदमी अधिक भ्रमित हो रहा है।
इनकी मानें तो अब पृथ्‍वी से सारे रोग दूर हो चुके हैं। जो कुछ है, वो कोरोना है। समूचे विश्‍व में जितने भी लोग मर रहे हैं, वो सिर्फ और सिर्फ कोरोना से मर रहे हैं। भविष्‍य में भी हर रोग कोरोना की देन होगा क्‍योंकि इनके अनुसार उसके आफ्टर इफेक्‍ट्स ही इतने हैं कि उनमें सब-कुछ समाहित हो जाएगा।
कुल मिलाकर मौत के लिए आत्‍मा का शरीर छोड़ देना भले ही जरूरी हो किंतु तब भी कोरोना पीछा छोड़ दे, यह जरूरी नहीं है।
ऐसे में हिंदू धर्मावलंबियों को तो एक सवाल और परेशान कर रहा है कि क्‍या शरीर के खाक हो जाने पर भी कोरोना उसमें शेष रहता होगा।
क्‍या कोरोना उस फ़ीनिक्स नामक पक्षी की तरह है जिसके बारे में कहा जाता है कि उसकी राख से ही उसका पुनर्जन्‍म होता है।
यदि ऐसा है तो फिर उन धर्मों के मृत शरीरों का क्‍या जिनमें दफनाने, लटकाने अथवा दूसरे जीवों का भोजन बना देने के लिए उन्‍हें छोड़ देने का रिवाज है। वो तो बहुत खतरनाक साबित हो सकते हैं।
इस तरह कोरोना सर्वव्‍यापी हो जाएगा और उससे कभी पीछा छूटेगा ही नहीं। वो हवा में तो होगा ही, कब्र में लेटी लाश में भी होगा और जल, जंगल तथा पहाड़ों पर भी चारों ओर फैला होगा।
सिरदर्द, बदन दर्द, बुखार, खांसी, जुकाम, त्‍वचा विकार, उल्‍टियां, दस्‍त, एसिडिटी, सांस फूलना, आंखों में जलन, सुगंध एवं दुर्घन्‍ध का अहसास न होने, सीने में दर्द और यहां तक कि कम सुनाई देने तथा मुंह का स्‍वाद चले जाने जैसे अनगिनत लक्षणों के प्रचार-प्रसार से कोरोना हमारे दिमाग में तो पूरी तरह घुस ही गया है… अब इससे पहले कि वह हमें पागल कर दे सरकार को कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे मानसिक रोगियों की तादाद परेशान न करने लगे।
कहीं ऐसा न हो कि जैसे-तैसे बनाए जा रहे कोविड अस्‍पतालों को फिर पागलखानों में तब्‍दील करना पड़ जाए क्‍योंकि किसी भी बीमारी का खौफ उसके वास्‍तविक खतरे से कहीं अधिक भारी होता है।
कहते हैं कि दुनिया में सांपों की जितनी भी प्रजातियां पाई जाती हैं, उनमें से बहुत कम ही ऐसी होती हैं जिनमें आदमी को मारने लायक जहर होता हो। इसीलिए सांप के काटने पर मरने वालों में ऐसे लोगों की संख्‍या ज्‍यादा होती है जिनका दहशत में हार्टफेल हो जाता है।
बेशक कोरोना इस दौर में उपजा एक खतरनाक वायरस है और इसे गंभीरता से लेना चाहिए किंतु इसका यह मतलब नहीं कि जागरूकता के नाम पर भय का ऐसा वातावरण बना दिया जाए कि वह लोगों के अंदर घर कर बैठे। बिना किसी ठोस आधार के और रिसर्च किए बगैर उसके इतने आफ्टर इफेक्‍ट्स प्रचारित कर दिए जाएं कि कोरोना से मुक्‍ति मिलने पर भी लोग उससे मुक्‍त न हो सकें तथा मानसिक विकृति के शिकार हो जाएं।
उचित तो ये होगा कि ऐसे ज्ञानियों, विज्ञानियों तथा विशेषज्ञों के निजी निष्‍कर्षों पर सरकारें सख्‍ती के साथ लगाम लगाने की व्‍यवस्‍था करें अन्‍यथा इसके दूरगामी परिणाम भुगतने होंगे, और वो किसी भी वायरस से अधिक घातक हो सकते हैं।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शनिवार, 17 अप्रैल 2021

क्‍या “यही दिन” देखने के लिए “अपनी सरकारें” चुनते हैं ”हम भारत के लोग”?


 कोरोना वायरस से उपजी महामारी पूरे देश में कहर बरपा रही है। प्रतिदिन इसकी चपेट में आने वाले लोगों का आंकड़ा 2 लाख से ऊपर जा पहुंचा है। अस्‍पताल से लेकर बेड तक और दवाइयों से लेकर टेस्‍ट तक करने की व्‍यवस्‍था दम तोड़ती जा रही है। कई शहरों में तो लाशों के ढेर लगे हैं और वहां अंतिम संस्‍कार कराने के लिए भी लाइनें लग रही हैं। परिजन अपने प्रियजनों का चेहरा तक आखिरी बार देखने को तरस रहे हैं।

ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्‍या “यही दिन” देखने के लिए “अपनी सरकारें” चुनते हैं “हम भारत के लोग”?
क्‍या कहती है संविधान की प्रस्‍तावना
भारत के संविधान की प्रस्‍तावना कहती है कि “हम भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म एवं उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा व अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा एवं राष्ट्र की एकता व अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्पित होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ईस्‍वी (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत दो हजार छह विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।
इस प्रस्‍तावना को भारतीय संविधान का ‘परिचय पत्र’ कहा जाता है और इसकी उद्देशिका यह बताती है कि संविधान जनता के लिए है तथा जनता ही अंतिम सम्प्रभु है किंतु ऐसा लगता है कि आज यह प्रस्‍तावना या तो बेमानी हो चुकी है या इसके परिचय पत्र पर लिखे अक्षर इतने अधिक धुंधले हो चुके हैं कि 71 साल का बूढ़ा गणतंत्र उन्‍हें पढ़ने में असमर्थ है।
लोकशाही या राजशाही

कहने को हम दुनिया का सबसे बड़ा ‘लोकतांत्रिक’ देश हैं तथा राजशाही यहां से पूरी तरह विदा हो चुकी है परंतु गौर से देखें तो पता लगता है कि लोकशाही महज एक शब्‍द भर है और राजशाही ही चेहरा बदलकर अपना काम कर रही है।

कौन नहीं जानता कि देश की आमदनी का एक बड़ा हिस्‍सा राजनेताओं की शानो-शौकत, उनकी सुरक्षा-व्‍यवस्‍था, वेतन-भत्‍ते तथा पेंशन पर खर्च किया जाता है। इन राजनेताओं की वैभवशाली जिंदगी यह बताने के लिए काफी है कि कहलाते भले ही यह जनप्रतिनिधि हों परंतु हकीकत में बेताज बादशाह होते हैं।
वीआईपी और वीवीआईपी का तमगा हासिल ये वर्ग हर उस सुविधा पर अपना पहला हक रखता है जिसे उपलब्‍ध कराने में सरकारें सक्षम हैं।
महामारी के इस दौर में आज आम आदमी जहां खुद को कतई असहाय और बेसहारा महसूस कर रहा है, वहीं इन विशिष्‍टजनों के लिए आलीशान अस्‍पतालों के अंदर बेड एवं वेंटिलेटर ‘आरक्षित’ किए हुए हैं। ये वर्ग अपनी सुविधा से न केवल टेस्‍ट करा रहा है बल्‍कि बेहतरीन इलाज प्राप्‍त कर रहा है जबकि दूसरी ओर आम आदमी बुखार से तपता हुआ, खांसता व छींकता हुआ और अपनी जांच एवं उपचार की प्रतीक्षा में ‘लावारिस कुत्तों’ की तरह अस्‍पतालों के चक्‍कर लगा रहा है।
नेताओं की तरह संवेदनाशून्‍य हो चुके अधिकांश सरकारी अफसरान उसे तथा उसके परिजनों को दुत्‍कार रहे हैं, इधर से उधर दौड़ा रहे हैं लेकिन न कोई देखने वाला है और न सुनने वाला।
महामारी के इस दौर में एक साल से अधिक का समय बिता चुका आम आदमी पैसे से तो परेशान है ही, साथ ही सरकारी कु-व्‍यवस्‍था से अत्‍यधिक आहत है। घर में किसी के भी कोरोना की जद में आने की आशंका भर उसे हिला कर रख देती है।
दुर्भाग्‍य से रिपोर्ट पॉजिटिव आ गई तो समझो कि नगर निगम की टीम द्वारा घर को सील करने के लिए लगाए गए ”टीन के दो आड़े-तिरछे टुकड़े” उस दयनीय दशा तक ले जाने का काम करते हैं जो शायद कोरोना भी नहीं कर पाता।
माना कि कोरोना वायरस एक किस्‍म की छूत की बीमारी है और इसके लिए बीमार को अलग-थलग रखना जरूरी है किंतु इसका यह मतलब तो नहीं कि उसे इस बेहूदे तरीके से चिन्‍हित कर सामाजिक तौर पर बहिष्‍कृत कराने का काम भी किया जाए।
तमाम लोग तो इसी कारण अपनी जांच कराने को आगे नहीं आ रहे क्‍योंकि उन्‍हें बीमारी से कहीं अधिक डर इस बेहूदे सरकारी तरीके से लगता है।
प्राइवेट मेडिकल प्रैक्टिशनर को अधिकार क्‍यों नहीं
क्‍या बेहतर नहीं होगा कि इस महामारी से मुकाबले के लिए प्राइवेट मेडिकल प्रैक्टिशनर को भी सरकार वही अधिकार दे जो सरकारी अस्‍पताल के डॉक्‍टर्स को दिए हुए हैं।
फिलहाल जबकि कोरोना अपने नित नए रूप में सामने आ रहा है और उसकी कोई खास दवाई भी नहीं मिली है। जिन दवाइयों से उपचार किया जा रहा है, वह हर डॉक्‍टर जानता है तो फिर सरकार सभी प्राइवेट प्रैक्टिशनर डॉक्‍टर्स को इसके इलाज की खुली छूट क्‍यों नहीं दे रही?
क्‍यों निजी पैथोलॉजी लैब को कोरोना की जांच के लिए अधिकृत कर भीड़ और भय के उस माहौल से लोगों को मुक्‍ति नहीं दिलाई जा रही जिसके कारण वह मानसिक रूप से भी अस्‍वस्‍थ होने लगे हैं।
किसी शहर में लाशों के ढेर लगने की खबरें तो किसी शहर में स्‍वास्‍थ संसाधनों के अभाव की बातें। कहीं अस्‍पतालों में बेड के लिए भटकते लोग और टूटती सांसों को थामने के लिए ऑक्‍सीजन का अभाव तो कहीं वेंटीलेटर्स की बड़ी कमी के समाचार किसी का भी दिल दहला देने के लिए काफी हैं।
इस समय लोगों को जितनी जरूरत स्‍वास्‍थ सेवाओं की है, उससे कहीं अधिक यह अहसास कराने की है कि सरकार हर परेशानी में उसके साथ खड़ी है क्‍योंकि मानसिक संबल के बिना महामारी से जूझ पाना संभव नहीं होगा लेकिन सरकारी रवैया ऐसा अहसास करा पाने में अब तक तो पूरी तरह असफल रहा है।
नेता नगरी चुनावी दंगल में व्‍यस्‍त है और सरकारी अमला उनका हुकुम बजा लाने में, आम आदमी की शारीरिक, आर्थिक एवं मानसिक परेशानी से जैसे किसी को कोई मतलब नहीं।
कोरोना के हर रोज आसमान छू रहे आंकड़े बेशक स्‍थिति की भयावहता महसूस कराने को पर्याप्‍त हों लेकिन सरकारें अब भी डर्टी पॉलिटिक्‍स में व्‍यस्‍त हैं और आरोप-प्रत्‍यारोप के सर्वाधिक पसंदीदा खेल से लोगों को गुमराह करने का काम कर रही हैं क्‍योंकि इस काम के लिए उनके पास तंत्र है। वो ‘तंत्र’ जिसके हाथ का खिलौना है लोक और लोकशाही।
कड़वा सच यही है कि हम राजशाही के अधीन थे, अधीन हैं, और इसी के अधीन रहेंगे। सत्ता चाहे किसी दल या व्‍यक्‍ति के हाथ में क्‍यों न हो, जब तक व्‍यवस्‍था नहीं बदलेगी तब तक सत्ता की चाल, उसका चरित्र और चेहरा भी नहीं बदलेगा।
महामारी का यह दौर पता नहीं कब तक और कितने लोगों को निगलने तथा कितने लोगों को दीन-हीन बनाने के बाद खत्‍म होगा, खत्‍म होगा भी या नहीं…. इसका तो पता नहीं लेकिन इतना जरूर पता है कि यदि ‘लोकतंत्र’ की प्रस्‍तावना इसी गति से धुंधली होती चली गई तो तय समझिए कि देश में सिर्फ ‘सरकारी तंत्र’ ही बचेगा, लोक जल्‍द पूरी तरह दम तोड़ देगा।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

बुधवार, 31 मार्च 2021

एक कथावाचक मदारी, दो जमूरे कारोबारी और भगवान बद्री विशाल का स्‍वर्ण छत्र

 एक युवा कथावाचक मदारी, उसकी डुगडुगी पर नाचने वाले दो जमूरे कारोबारी… और भगवान बद्री विशाल का स्‍वर्ण छत्र।

ये कहानी है उस धंधे की जिसे परवान तो चढ़ाया जाता है धर्म के सहारे लेकिन नतीजा निकलता है पाप से भरी गठरी के रूप में। फिर भी फायदे में रहता है सिर्फ और सिर्फ कथावाचक मदारी।
उत्तराखंड की पहाड़ी वादियों में बैठे भगवान बद्री विशाल को तो शायद पता भी नहीं लगा होगा कि योगीराज भगवान श्रीकृष्‍ण की पावन क्रीड़ा स्‍थली वृंदावन में बैठा कोई कथावाचक अपनी डुगडुगी बजाकर उनके नाम पर न केवल पंजाब के लुधियाना में तमाशा लगाकर धर्म की दुकान सजा रहा है बल्‍कि मथुरा एवं लुधियाना के दो कारोबारियों को जमूरे की तरह नचा भी रहा है।
सैकड़ों किलोमीटर दूर बैठे भगवान बद्री विशाल शायद ही जानते होंगे कि मदारी ने जमूरों के कान में ऐसा कौन सा मंत्र फूंका कि आज मदारी उनका सबकुछ लूटकर भी चैन की बंशी बजा रहा है और जमूरे एक-दूसरे की जान के दुश्‍मन बन बैठे हैं।
स्‍थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि मदारी द्वारा मदहोश किए गए जमूरे अब कोर्ट, कचहरी और जेल के सींखचों तक भागमभाग कर रहे हैं परंतु मिल-बैठकर बात करने को तैयार नहीं है।
माल पर हाथ साफ करने में माहिर मदारी एक दशक से जमूरों को नचा रहा है और जमूरे नाच रहे हैं। पहले छत्र के ‘नीचे’ नाच रहे थे, और अब छत्र के ‘ऊपर’ नाच रहे हैं।
पहले छत्र की शोभायात्रा निकालकर नाच रहे थे लेकिन अब अपना जुलूस निकलवाकर नाच रहे हैं, किंतु इस सबके बीच मदारी अपने धंधे में मशगूल है। वो एक और नई जगह डुगडुगी बजाकर नए जमूरे जुटा रहा है ताकि अपने लिए एक नया चांदी का सिंहासन हासिल कर सके, नया कॉन्‍ट्रैक्‍ट साइन कर सके। ऐसा कॉन्‍ट्रैक्‍ट जिसमें न वो ब्रोकर है और न पार्टी।
मदारी की मदहोश कर देने वाली फितरत तो देखिए कि इस सब के बावजूद जमूरे उसके एक इशारे पर करोड़ों का लेन-देन कर लेते हैं। सैकड़ों लोगों को साथ लेकर भगवान बद्री विशाल को धोखा दे आते हैं। एक-दूसरे के खिलाफ आपराधिक केस भी दर्ज कराते हैं। लोअर कोर्ट से लेकर हाई कोर्ट और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट के चक्‍कर भी काटते हैं परंतु मदारी को इस सबमें शामिल नहीं करते जबकि सारे तमाशे का सूत्रधार मदारी ही है।
मदारी मजे ले रहा है, वह लगातार अपनी डुगडुगी बजा रहा है जिससे उठी तरंगें संभवत: जमूरों के सोचने व समझने की शक्‍ति छीन लेती हैं और इसीलिए जमूरे कुछ कुछ अस्‍पष्‍ट सा बुदबुदाते तो हैं परंतु न साफ बोल पा रहे हैं, न कुछ बता पा रहे हैं।
बताते हैं कि कथावाचक मदारी को जब कभी अपनी डुगडुगी की आवाज मंद पड़ती महसूस होती है तो वह इसमें अपनी मां की आवाज को भी मिला लेता है। फिर वात्‍सल्‍य की चाशनी में लपेटकर मां इन जमूरों से कहती है… मैं हूं न! तुम क्‍यों चिंता करते हो। जैसा मैं कहूं, वैसा करते जाओ, तुम्‍हारा इसी में भला है।
इसे कलियुग का प्रभाव कहें या मदारी की डुगडुगी से निकलने वाली जादुई लय का प्रभाव कि एक ओर जहां सैकड़ों लोग भगवान बद्री विशाल के दरबार में जाकर साढ़े तीन किलो सोने से अधिक का छत्र चढ़ा आते हैं वहीं दूसरी ओर एक जमूरा दूसरे जमूरे को उस कॉन्‍ट्रैक्‍ट के बदले एक करोड़ से ऊपर की रकम दे बैठता है, जिस कॉन्‍ट्रैक्‍ट पर न कॉन्‍ट्रैक्‍ट लेने वाले के साइन हैं और न देने वाले के। और जिसके साइन हैं, उसने सबसे सिर्फ लिया ही लिया है, कभी कुछ दिया नहीं। उस मदारी ने कृष्‍ण की क्रीड़ा स्‍थली से लेकर जन्‍मस्‍थली तक और फिर पंजाब के लुधियाना से लेकर उत्तराखंड के बद्रीनाथ धाम तक सैकड़ों लोगों को मात्र डुगडुगी बजाकर मजमा लगवाया है।
अब जमूरे बेशक दिल्‍ली-चंडीगढ़ और मथुरा-वृंदावन के बीच भटक रहे हों लेकिन मदारी का मजमा जारी है। उसकी डुगडुगी बिना रुके बज रही है क्‍योंकि उसके धर्म का धंधा जमूरों के बिना चल नहीं सकता।
उसकी आवाज अब एक नई जगह गूंज रही है। अदृश्‍य डोर से बंधे जमूरों से वह पूछ रहा है…हां तो जमूरो, मेरे इशारों पर नाचोगे…जो कहूंगा, वो करोगे… सोने-चांदी के सिंहासन भेंट करोगे… कांट्रेक्‍ट साइन कराओगे…कोर्ट-कचहरी के चक्‍कर लगाने पर भी मेरा नाम तो नहीं लोगे…मेरे एक इशारे पर आयोजन-प्रयोजन करते रहोगे। और अंत में मेरे धर्म के धंधे को धार दोगे तथा उससे अर्जित संपत्ति पर मुझे बिना हील-हुज्‍जत किए ‘पर्याप्‍त ब्‍याज’ तो दोगे।
अब सिर्फ स्‍वीकृति में सिर हिलाओ और चलते बनो। मुंह से मेरे खिलाफ एक शब्‍द निकालने का मतलब तुम समझते ही हो, इसलिए समझदार बने रहो और मेरे छत्र की छाया में बने रहो।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

सोमवार, 1 फ़रवरी 2021

UP चुनाव 2022: RSS ने की मथुरा की 5 सीटों में से 3 पर प्रत्‍याशी बदलने की संस्‍तुति


मथुरा। भारतीय जनता पार्टी ने 2022 में होने वाले यूपी विधानसभा चुनावों की तैयारी पूरी श‍िद्दत के साथ अपनी पहचान के मुताबिक शुरू कर दी है।

चूंकि ये चुनाव अगले साल के प्रथम चरण में ही प्रस्‍तावित हैं इसलिए भाजपा की पहल को जल्‍दबाजी नहीं माना जा सकता। हालांकि दूसरी पार्टियां फिलहाल मात्र गुणा-भाग लगाने तक सीमित हैं।
योगी आदित्‍यनाथ के पास यूपी की सत्ता बरकरार रखने के लिए एक ओर जहां भाजपा कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती वहीं दूसरी ओर राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ (RSS) भी उसमें सक्रिय भूमिका निभाने उतर चुका है।
बताया जाता है कि पिछले दिनों 4 दिवसीय प्रवास पर वृंदावन आए संघ प्रमुख मोहन भागवत ने मथुरा की सभी 5 विधानसभा सीटों का ‘फीडबैक’ लेने के बाद 3 विधानसभा सीटों पर प्रत्‍याशी बदलने की संस्‍तुति की है।
कौन-कौन सी सीट पर हैं कमजोर कड़ी
संघ से जुड़े सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार जिन 3 सीटों पर भाजपा से प्रत्‍याशी बदलने को कहा गया है उनमें से दो भाजपा के मूल प्रत्‍याशी हैं और एक आयातित भाजपायी हैं।
पार्टी सूत्रों ने इस संस्‍तुति की पुष्‍टि करते हुए बताया कि आयातित भाजपायी के बारे में संघ प्रमुख को काफी गंभीर शिकायतें मिली हैं जिनमें ‘भ्रष्‍टाचार’ तथा ‘चौथ वसूली’ जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं।
संघ को प्राप्‍त सूचना के अनुसार बड़े पैमाने पर निजी स्‍वार्थों की पूर्ति में लिप्‍त ये ‘माननीय’ अपने क्षेत्र की जनता के बीच सक्रिय नहीं रहते और अधिकांशत: शहर में पाए जाते हैं लिहाजा जनता इनसे आजिज़ आ चुकी है।
कॉकटेल कल्‍चर के आदी इन महानुभाव ने मौका देखकर भाजपा का दामन भले ही थाम लिया किंतु पुरानी आदतें नहीं छोड़ पा रहे और हर वक्‍त धनोपार्जन की जुगाड़ में लगे रहते हैं। इनकी इसी फितरत को पिछले कुछ समय में अच्‍छी-खासी शौहरत प्राप्‍त हुई है जो आगामी चुनाव में पार्टी के लिए मुसीबत खड़ी कर सकती है।
संघ की लिस्‍ट में दूसरे नकारा प्रत्‍याशी वो बताए गए हैं जो हैं तो मूल रूप से भाजपा के किंतु मतदाताओं के मन में उनके प्रति वर्ष-दर-वर्ष रोष बढ़ता जा रहा है। हो सकता है चुनाव का बिगुल बजते-बजते यह रोष विस्‍फोटक रूप धारण कर ले इसलिए संघ चाहता है कि समय रहते इनका विकल्‍प तलाश लिया जाए।
बड़ी जिम्‍मेदारी संभाल रहे इस प्रत्‍याशी को लेकर जनाक्रोश का अंदाज संघ को इस बात से भी लगा कि यह पार्टीजनों के बीच भी अपनी कोई साख बनाने में नाकाम रहे हैं और मात्र कुछ खास लोगों से घिरे रहते हैं।
जाहिर है कि पार्टी कार्यकर्ताओं को खुद से दूर रखने के कारण यह आम जनता से भी दूर हो चुके हैं, जिस कारण इन पर फिर से दांव लगाना भाजपा को भारी पड़ सकता है।
पहले ही स्‍थानीय भाजपाइयों पर थोपे गए इन ‘माननीय’ को नापसंद करने वालों की संख्‍या अब इतनी बढ़ गई है कि बड़े पद के बावजूद यह यहां बौने नजर आते हैं।
संघ को मिले फीडबैक के मुताबिक पार्टी को स्‍थानीय स्‍तर पर कई-कई गुटों में बांट देने का काम इन्‍होंने बखूबी पूरा किया है। ऐसे में यदि इन्‍हें एक मौका और दिया गया तो कोई आश्‍चर्य नहीं कि पार्टी की मथुरा की इकाई इस बार हाथ झटक कर खड़ी हो जाए।
भाई-भतीजे और भांजों से घिरे रहने वाले इन महाशय से पार्टी कार्यकर्ता अपने कामों के लिए भी मुलाकात करने को तरस जाते हैं, फिर आम आदमी की तो हैसियत ही क्‍या है जो इनसे मिल सके।
इसी प्रकार संघ ने एक तीसरे प्रत्‍याशी पर भी रिस्‍क न लेने की सलाह दी है। मूल रूप भाजपायी इन महाशय की ‘छवि’ पार्टी को नुकसान पहुंचा सकती है। इसलिए संघ का मानना है कि इनकी जगह जमीन से जुड़े किसी क्षेत्रीय युवा प्रत्‍याशी को इस मर्तबा मौका दिया जाए ताकि पार्टी की वर्षों पुरानी मुराद पूरी हो सके।
दरअसल, संघ ने अपनी संस्‍तुति में इस बात का भी खास ख्‍याल रखा है कि 2022 में प्रस्‍तावित चुनावों पर कृषि कानूनों से उपजी नाराजगी का कोई असर न हो।
संघ की सोच इस मायने में इसलिए अहम हो सकती है कि यूपी विधानसभा के चुनावों तक विपक्षी पार्टियां कृषि कानूनों को लेकर किसानों के मध्‍य फैलाए जा रहे भ्रम को बरकरार रखने की पूरी कोशिश करेंगी।
इन हालातों में भाजपा के वही प्रत्‍याशी उनकी काट हो सकते हैं जिनका न सिर्फ जनाधार मजबूत हो बल्‍कि वो ग्रामीण परिवेश से जुड़े हों और ग्रामीण मतदाता को अपनेपन का अहसास कराते हों।
संघ ने जिन 3 प्रत्‍याशियों को बदलने की संस्‍तुति की है, वो तीनों इस कसौटी पर खरे उतरते दिखाई नहीं देते। हो सकता है उनकी पृष्‍ठभूमि कभी ग्रामीण रही हो किंतु आज वह खेत, किसान, खलिहान या ग्रामीण जीवन से बहुत दूर दिखाई देते हैं।

- surendra chaturvedi 

रविवार, 24 जनवरी 2021

उत्तर प्रदेश में अधिकारियों के लिए अगर कहीं स्‍वर्ग है तो वह यहीं है… यहीं है… यहीं है

 प्रशासनिक आधार पर 18 मंडलों वाले उत्तर प्रदेश में यूं तो 75 जिले हैं किंतु ऐसे जिलों की संख्‍या बहुत कम है, जो अधिकारियों को मुफीद बैठते हैं।

ऐसे जिलों में कृष्‍ण की जन्‍मस्‍थली का गौरव प्राप्‍त ‘मथुरा’ का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है।

वैकुण्‍ठ से भी श्रेष्‍ठ और तीन लोक से न्‍यारी नगरी की उपमा प्राप्‍त मथुरा को उन सप्‍तपुरियों में भी शुमार किया जाता है जिन्‍हें मोक्षदायिनी माना गया है।
एक ओर हरियाणा तथा दूसरी ओर राजस्‍थान की सीमा से सटे इस विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक स्‍थल की एक विशेषता यहां से राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्‍ली का अत्‍यधिक नजदीक होना भी है।
कभी लखनऊ के लिए किसी सीधे रास्‍ते को तरसने वाले इस जनपद से आज प्रदेश की राजधानी तक मात्र पांच घंटों के अंदर पहुंचा जा सकता है।
अधिकारियों के लिए सर्वाधिक मुफीद क्‍यों?
इन सब सुविधाओं के बावजूद मथुरा में ऐसा कुछ अतिरिक्‍त भी है जो पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को इतना अधिक प्रिय है कि वो न सिर्फ यहां लंबी से लंबी पोस्‍टिंग चाहते हैं बल्‍कि बार-बार यहीं पोस्‍टिंग कराना चाहते हैं।
क्‍या है ऐसा?
इस सवाल पर थोड़ी गंभीरता से गौर किया जाए तो स्‍थिति आसानी से स्‍पष्‍ट हो जाती है।
उदाहरण के लिए मथुरा का आम नागरिक शांतिप्रिय है और चैन से जिंदगी गुजारने में यकीन रखता है। टकराव का रास्‍ता चुनना उसे पसंद नहीं है और उसकी यह आदतें अधिकारियों का काम काफी आसान बना देती हैं।
आम मथुरावासी की इन आदतों के कारण ‘सुविधा शुल्‍क’ सर्वसुलभ है क्‍योंकि अमन पसंद स्‍थानीय नागरिक अधिकारियों को दाम देकर काम कराने में अधिक रुचि लेता है अपेक्षाकृत अन्‍य तरीकों के।
अधिकारियों के काम में दखल ‘ना’ के बराबर
शासन में मथुरा का प्रतिनिधित्व हमेशा बने रहने तथा सत्ता के गलियारों से बराबर आमदरफ्त होते हुए भी यह एक ऐसा जिला है जिसके बाबत यह कहा जा सकता है कि यहां कोई नेता ही नहीं है। नेताओं के नाम पर कुछ है तो चापलूसों की फौज, दलालों का जमघट और बिना रीढ़ वाले वो जंतु जिन्‍हें साष्‍टांग करने में महारत हासिल है।
सरकार चाहे सपा की रही हो या बसपा की, गठबंधन से चल रही हो अथवा पूर्ण बहुमत से लेकिन मथुरा को हमेशा तरजीह दी गई।
मथुरा के लोगों ने वो दौर भी देखा है जब यहां के कुल जमा पांच में से चार विधायक मंत्री हुआ करते थे किंतु तब भी इस जिले में तूती बोलती थी तो सिर्फ अधिकारियों की। मंत्री रहते हुए अधिकारियों के सामने मिमियाने वाले नेता यहां हर दौर में पाये जाते रहे हैं।
इसका ज्वलंत उदाहरण है हाल ही में घटी वो घटना जब प्रदेश के कद्दावर मंत्री, सरकार के प्रवक्‍ता और मथुरा-वृंदावन सीट से विधायक श्रीकांत शर्मा को स्‍थानीय अधिकारियों के खिलाफ सीधे मुख्‍यमंत्री के नाम इसलिए पत्र लिखना पड़ा क्‍योंकि प्रस्‍तावित कुंभ मेले के इंतजामों को वो उनके कहने से तरजीह नहीं दे रहे थे।
हुआ भी वही, मुख्‍यमंत्री तक शिकायत पहुंचने के बाद ही कुंभ मेले से जुड़े अधिकारियों ने सक्रियता दिखाई अन्‍यथा न तो उनके ऊपर ऊर्जा मंत्री का भारी भरकम पद कोई प्रभाव डाल पा रहा था और न संत-महंतों की नाराजगी कोई असर छोड़ रही थी।
हर जिले में अधिकारियों को उनकी जिम्‍मेदारी का अहसास कराने वाला दूसरा सर्वाधिक प्रभावशाली तबका होता है ‘पत्रकारों’ का, किंतु बात करें कृष्‍ण नगरी की तो यहां ‘पत्रकारों’ की संख्‍या भले ही सैकड़ों में हो परंतु ‘पत्रकारिता’ करने वाले ढूंढे नहीं मिलते।
नेता नगरी से कदम-ताल मिलाते हुए अधिकांश पत्रकार अधिकारियों की जी-हजूरी में अपना समय जाया करना अधिक उपयुक्‍त समझते हैं क्‍योंकि किसी एक अधिकारी की कृपा भी उनके लिए पर्याप्‍त होती है।
अधिकारी के कृपा पात्र बनते ही उनकी आर्थिक एवं सामाजिक दरिद्रता तो दूर होने ही लगती है, साथ ही घर-परिवार व नाते रिश्‍तेदारों में रुतबा भी बढ़ जाता है।
सुबह से शाम तक कलेक्‍ट्रेट के इर्द-गिर्द घूमने वाले तथाकथित पत्रकारों की एक जमात को तो इसलिए भी अधिकारियों का वरदहस्‍त जरूरी होता है क्‍योंकि उसके बिना उनके गोरखधंधे बंद हो जाएंगे और वो कानून के शिकंजे में इस कदर फंसेंगे कि लंबे समय तक उससे बाहर आना संभव नहीं होगा।
पत्रकारों का ये वर्ग अधिकारियों की जी-हजूरी में इतना मुस्‍तैद रहता है कि उनके निजी शौक और ऐब भी पूरे कराने में परहेज नहीं करता।
लोकतंत्र के चौथे खंभे को इस स्‍थिति में देख किसी को भी पत्रकारों और पत्रकारिता से भी घृणा हो सकती है लेकिन इन कथित पत्रकारों को खुद से कभी घृणा नहीं होती इसलिए वो पूरी शिद्दत के साथ हमेशा अधिकारियों के सामने दुम हिलाते देखे जा सकते हैं।
पत्रकारों की यही वो श्रेणी है जिनके बल पर पत्रकारों को कई-कई गुटों में बांटकर अधिकारी अपना उल्‍लू सीधा करते रहते हैं। अधिकारियों द्वारा डाले हुए टुकड़ों पर जीविका और जिजीविषा पाने वाले ये तत्‍व उनके साथ एक अदद फोटो खिंचवाने तक को लालायित रहते हैं और ‘पत्रकारिता दिवस’ पर भी आयोजन-प्रायोजनों के जरिए उन्‍हें सम्‍मानित करने का मौका नहीं चूकते।
घोर आश्‍चर्य की बात तो यह है कि इतना सब करने के बाद भी बमुश्‍किल वह मात्र उतना ही हासिल कर पाते हैं जितना कि कोई नेता अपने चमचों को सुबह-शाम बख़्शीश में दिलवा देता है।
नेता और पत्रकारों के अलावा हर जिले में एक तीसरा वर्ग भी होता है जो अधिकारियों की कार्यप्रणाली को ऑब्जर्व करता है। सामाजिक संगठनों के रूप में सक्रिय यह वर्ग चूंकि सुविधा संपन्‍न पाया जाता है इसलिए इसकी समाज में महत्ता बड़ी होती है।
महाभारत नायक योगीराज श्रीकृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली में भी ऐसे संगठन तो बहुत पाए जाते हैं लेकिन वो भी नेता और पत्रकारों की तरह चापलूसी के माध्‍यम से अपनी दुकान चलाने में माहिर हैं।
इस तबके के लोगों का भी कार्य नेता और पत्रकारों की भांति किसी न किसी तरह अधिकारियों का सानिध्‍य पाना और इसके लिए हद से भी गुजर जाना है।
इस वर्ग के लोगों से जुड़ा यह कड़वा सच जानकर कोई भी हैरान हुए बिना नहीं रह सकता कि ये वर्ग अधिकारियों को खुश करने के लिए थ्री डब्‍ल्‍यू यानी वाइन, वेल्‍थ और यहां तक कि वुमैन का इंतजाम करने से भी पीछे नहीं हटता।
यही कारण है कि विश्‍व प्रसिद्ध इस धार्मिक जनपद में एकबार पोस्‍टिंग पा जाने वाला अधिकारी एक ओर जहां बार-बार यहां पोस्‍टिंग पाने की कोशिश में लगा रहता है वहीं दूसरी ओर यहां से चले जाने अथवा नौकरी से अवकाश प्राप्‍ति के बाद भी किसी ने किसी रूप में यहीं मंडराता रहता है। वर्तमान में भी कई अधिकारी इसकी जीती जागती नजीर हैं लेकिन क्‍या मजाल कि कोई उनके ऊपर उंगली भी उठा सके।
भांग, भोजन तथा भजन के लिए विश्‍व के पटल पर विशिष्‍ट पहचान रखने वाली मथुरा नगरी ने ऐसे कई अधिकारी देखे हैं जिन्‍होंने यहां की एक अदद पोस्‍टिंग से अपनी तीन-तीन पीढ़ियों का मुकम्‍मल इंतजाम कर लिया लेकिन उनका बाल तक बांका नहीं हो सका।
ऐसे-ऐसे नेता उसके सामने हैं जो कुछ वर्षों पहले तक लंबे-लंबे कुर्ते पहनकर कचहरी पर दिन-रात छोटे-मोटे कामों के लिए चक्‍कर लगाते थे लेकिन आज करोड़ों नहीं अरबों की संपत्ति के मालिक हैं। शहर के तमाम व्‍यवसायी उनके द्वारा किए गए पैसे के निवेश से अपनी शानो-शौकत बनाए हुए हैं।
जिनकी औकात एक दुपहिया खरीदने की नहीं हुआ करती थी और कचहरी तक जाने के लिए भी किसी से लिफ्ट पाने का मौका तलाशले थे आज उनके गुर्गे कई-कई लग्‍जरी गाड़ियों के मालिक हैं।
अधिकारियों और नेताओं के इस वर्ग की अंधी कमाई से बहुत से मशहूर शिक्षण संस्‍थान संचालित हो रहे हैं और भूमाफिया बेनामी संपत्ति एकत्र कर रहे हैं।
पत्रकारों का एक खास वर्ग भी अपनी औकात से अधिक धन अर्जित करके इनके संरक्षण में ही अपनी सुरक्षा देखता है इसलिए उन्‍हें उपकृत करने का कोई अवसर हाथ से निकलने नहीं देता।
‘अंधे पीसें कुत्ते खाएं’ की कहावत को चरितार्थ करने के कारण ही मथुरा आज तक अधिकारियों के लिए दुधारू गाय साबित होता रहा है और उस गरिमामय मुकाम को हासिल करने के लिए तरस रहा है जिसका वह सही मायनों में हकदार है।
बात चाहे कालिंदी के कलुष की हो या निरंकुश अधिकारियों की, भ्रष्‍टाचार की हो या बदहाली की। कृष्‍ण की नगरी हर मामले में अपनी कलंक कथा खुद कहती है, लेकिन सुनने और देखने वाला कोई नहीं। सुनेगा और देखेगा भी कैसे, जब जिम्‍मेदार वर्ग ही आंख, कान व मुंह बंद करके बैठा होगा।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी 

शुक्रवार, 15 जनवरी 2021

डॉ. निर्विकल्‍प अपहरण कांड: मुठभेड़, या फिर फिरौती पचाने और सफेदपोशों को बचाने का मुकम्‍मल इंतजाम


 यूपी STF ने कल एक लाख रुपए के इनामी बदमाश अनूप चौधरी को भी एक मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार दिखाकर डॉ. निर्विकल्‍प के अपहरण से फिरौती में वसूले गए पूरे 52 लाख रुपए पचाने और उन सफेदपोश अपराधियों को बचा ले जाने का मुकम्‍मल इंतजाम कर लिया जिनमें कुछ वर्दीधारी तो कुछ बिना वर्दी वाले शामिल रहे थे।

मथुरा जनपद के ही थाना नौहझील अंतर्गत गांव कोलाहार निवासी अनूप चौधरी को पुलिस शुरू से डॉ. निर्विकल्‍प अपहरण केस का मास्‍टर माइंड बताती रही किंतु सब जानते हैं कि इस अपहरण में मास्‍टर माइंड कोई था तो वो थी पुलिस और उसके सहयोगी ऐसे सफेदपोश जिन्‍होंने डॉक्‍टर को आसान शिकार बताकर 52 लाख रुपए की मोटी रकम चंद मिनटों में वसूल कर ली।
कथित मास्‍टर माइंड अनूप चौधरी से कल हुई मुठभेड़ की कहानी के मुताबिक उसे STF ने नोएडा में दिल्‍ली बॉर्डर पर पकड़ा और जब यमुना एक्‍सप्रेस वे के रास्‍ते मथुरा के थाना हाईवे लेकर आ रही थी तब उसने सुरीर कोतवाली क्षेत्र में एक सिपाही की पिस्‍टल छीनकर पुलिस पर फायरिंग करते हुए भागने का प्रयास किया। जवाबी कार्यवाही में अनूप चौधरी घायल हो गया, जिसके बाद उसे जिला अस्‍पताल मथुरा में उपचार के लिए भर्ती करा दिया गया।
पुलिस और बदमाशों के बीच मुठभेड़ की हर कहानी यूं तो लगभग एक जैसी होती है इसलिए सतही तौर पर इसमें भी कुछ गलत नहीं है परंतु बारीकी से देखेंगे तो पता लगेगा कि ये ‘विशेष मुठभेड़’ दरअसल फिरौती की उस पूरी रकम को पचाने के साथ-साथ उन बावर्दी और सफेदपोश अपराधियों को साफ बचा ले जाने के लिए की गई जिन्‍होंने डॉ. निर्विकल्‍प को अगवा कराया।
यहां यह जान लेना जरूरी है कि STF को प्रदेशभर में कहीं से भी गिरफ्तारी करने का अधिकार प्राप्‍त है लिहाजा STF नोएडा ने अनूप चौधरी को दिल्‍ली बॉर्डर पर पकड़ लिया लेकिन नोएडा में गिरफ्तारी नहीं दिखाई। आखिर क्‍यों?
इसी एक सवाल से खड़े हो जाते हैं बहुत से सवाल
जैसे STF चाहती तो नोएडा में ही उससे चौबीस घंटे तो कानूनन पूछताछ कर सकती थी और इस दौरान यह जान सकती थी कि डॉ. निर्विकल्‍प को उठाने का आइडिया किसने तथा क्‍यों दिया?
अनूप चौधरी को इस बात की गारंटी किसने दी थी कि डॉ. निर्विकल्‍प इतनी बड़ी फिरौती देने के बावजूद अपना मुंह नहीं खोलेंगे?
अनूप चौधरी को उसी पॉश कॉलोनी राधापुरम एस्‍टेट में किसने और किस मकसद से मकान किराए पर दिलवाया जिसमें डॉ. निर्विकल्‍प रहते हैं?
डॉ. निर्विकल्‍प को उठाने के बाद चंद घंटों में मिली फिरौती की इतनी बड़ी रकम कहां गई और क्‍यों व किसके भरोसे उन्‍होंने डॉक्‍टर को इस शर्त के साथ रिहा कर दिया कि वह एक महीने के अंदर शेष तयशुदा 50 लाख रुपए और उन तक पहुंचा देंगे?
ऐसे कौन से कारण रहे कि एक हाईप्रोफाइल अपहरण पर मुंह सिलकर बैठने वाली मथुरा पुलिस ने दो महीने बाद अपनी ओर से एफआईआर दर्ज कर एफआईआर लिखाने वाले थाना प्रभारी को ही निलंबित कर अपने कर्तव्‍य की इतिश्री कर ली। तब भी जबकि इंस्‍पेक्‍टर को इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय के आदेश से बहाल कर दिया गया?
इन सब सवालों का जवाब इसमें निहित है कि यदि अनूप चौधरी को STF नोएडा में गिरफ्तार दिखाती तो एक ओर उसे जहां नोएडा पुलिस को भरोसे में लेना पड़ता वहीं दूसरी ओर नोएडा कोर्ट से मथुरा लाने की परमिशन लेनी पड़ती।
ऐसा करने पर डॉ. निर्विकल्‍प के अपहरण की पूरी सच्‍ची कथा सामने आने का डर था लिहाजा बिना लिखा-पढ़ी एसटीएफ उसे नोएडा से मथुरा लेकर चल दी, फिर संबंधित थाने पर पहुंचने से पहले मुठभेड़ को अंजाम दिया जिससे सांप मर जाए और लाठी भी न टूटे।
जाहिर है कि मुठभेड़ के बाद आरोपी को जितना जरूरी अस्‍पताल पहुंचाना था, उतना ही जरूरी उसकी गिरफ्तारी दिखाना भी था ताकि अगले चौबीस घंटों के अंदर उसकी कोर्ट में पेशी की जा सके।
घायलावस्‍था में पूछताछ का चिरपरिचित पुलिसिया तरीका काम नहीं आने का, और ठीक होने पर अगर पूछताछ करनी जरूरी समझी जाएगी तो कोर्ट से लोकल पुलिस को कस्‍टडी रिमांड पानी होगी।
रिमांड मिल भी गई तो वो टाइम बाउंड होगी। यानी सब-कुछ उस प्‍लान के मुताबिक किया गया जिससे केस ‘दाखिल दफ्तर’ हो जाए और किसी के पास उंगली उठाने की गुंजाइश भी न रहे।
एसटीएफ हो या मथुरा पुलिस, ऐसे केस में गुंजाइश छोड़ी भी कैसे जा सकती है जिसमें दो-दो उच्‍चाधिकारियों का नाम उछला हो और जिसके सूत्रधार वो सफेदपोश हों जिनका रहमो-करम सदा ‘खाकी पर’ बना रहता हो।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शुक्रवार, 8 जनवरी 2021

कोरोना की स्‍वदेशी वैक्‍सीन का विरोध करने वाले नेता और पंडित नेहरू की भविष्‍यवाणी


 




कोरोना की स्‍वदेशी वैक्‍सीन के विरोध से याद आया कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपने दौर में मासिक पत्र ‘विक्रम’ के लिए कुछ लेख लिखे थे क्‍योंकि इस पत्र के संपादक पंडित नेहरू के अभिन्‍न मित्र पद्मभूषण पंडित सूर्यनारायण व्‍यास थे।

इनमें से एक लेख में पंडित नेहरू ने लिखा था कि लंदन में बनाए गए ‘मैडम तुसॉद’ के “चैम्‍बर्स ऑफ हॉरर्स” नामक अनोखे “अजायबघर” की तरह “हिंदुस्‍तान” में भी कभी न कभी एक “अजायबघर” कायम किया जाएगा।
इस अजायबघर में हमारे बहुत से मंत्रियों की मूर्तियां स्‍थापित की जाएंगी ताकि आने वाली पीढ़ियां यह जान सकें कि इस देश के अंदर कैसे-कैसे ‘नमूने’ सत्ता का सुख भोग कर चले गए।
लेख के मुताबिक उस आने वाले स्‍वर्ण युग में अध्‍यापक अपने छात्रों को इन नेताओं की आदमकद मूर्तियां दिखाकर बताएंगे कि ऐसे-ऐसे लोग हमारे देश के मंत्री रहे थे। यहां तक कि इनमें से कई के हाथों में तो राज्‍यों की कमान भी रही थी और वो अपने से कहीं अधिक बुद्धिमान लोगों पर हुकूमत करते थे।
अध्‍यापक अपने छात्रों को बताएंगे कि उस जमाने में योग्‍यता, प्रतिभा, ज्ञान अथवा जनता को प्रभावित करने जैसे गुणों के आधार पर किसी को सत्ता नहीं मिलती थी, बल्‍कि भेड़ों की तरह जनता को हांकने की क्षमता रखने वाला ही पद के योग्‍य समझा जाता था।
वह विद्यार्थियों को यह भी बताएंगे कि उस युग में सच्‍चाई के साथ देश सेवा करने की मंशा रखना और सिद्धांतों को लेकर दृढ़ता दिखाना ऐसे अवगुण थे जिनसे शासन के भूखे नेता खुद तो हमेशा दूर रहते ही थे, साथ ही ऐसे शासकों का अकारण विरोध करते थे।
पंडित नेहरू ने इस लेख में यह भी लिखा है कि इन नेताओं को किसी विषय, विभाग और आविष्‍कारों के बारे में उतनी भी जानकारी नहीं होगी जितनी कि किसी कुली या मजदूर को ‘मंगलग्रह’ के बारे में हो सकती है।
अंत में पंडित नेहरू लिखते हैं कि… ”और आने वाले युग का विद्यार्थी इन नेताओं की आदमकद मूर्तियां देखकर यह सोचने पर मजबूर होगा कि जिन राजनीति‍ज्ञों एवं मंत्रियों को अत्‍यधिक बुद्धिमान समझा जाता रहा, वो वास्‍तव में कितने बुद्धिहीन तथा अक्‍ल से अंधे थे।
उस दौर के विद्यार्थियों को ऐसी जनता पर भी आश्‍चर्य होगा जो शेर की खाल ओढ़कर सत्ता हासिल करने वाले इन ‘गीदड़ों’ से शासित होती रही।
पंडित नेहरू के बारे में इस बात से तो कोई इंकार नहीं कर सकता कि वो कुशल राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ अच्‍छे दूरदृष्‍टा भी थे, किंतु आज जिस तरह कोरोना जैसे घातक वायरस की वैक्‍सीन का वो नेता विरोध कर रहे हैं जिन्‍होंने कभी देश व प्रदेश के बड़े-बड़े पदों को सुशोभित किया है, उन्‍हें देखकर लगता है कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री संभवत: बहुत काबिल ‘भविष्‍यवक्‍ता’ भी रहे होंगे।
बहरहाल, आज जिस तरह एक महामारी से मुकाबले के लिए देश के वैज्ञानिकों ने बहुत कम समय में वैक्‍सीन तैयार करके समूचे विश्‍व को चौंका दिया है, उस पर गर्व करने की बजाय सत्तापक्ष के अंधे विरोध पर उतारू देश के कुछ नेता पंडित नेहरू की लेखनी और उनकी दूरदृष्‍टि को शत-प्रतिशत सच साबित अवश्‍य कर रहे हैं।
ये बात और है कि लंदन में बने मैडम तुसॉद के “चैम्‍बर्स ऑफ हॉरर्स” नामक अनोखे “अयाबघर” की कमी फिलहाल हिंदुस्‍तान की जनता को खल रही है। उम्‍मीद है कि पंडित नेहरू की यह भविष्‍यवाणी भी जल्‍द पूरी होगी।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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