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मंगलवार, 1 जून 2021
मथुरा रिफाइनरी के तेल का खेल: कभी किसी वजीर के गिरेबां तक हाथ डालने की हिमाकत नहीं कर पायी पुलिस
मथुरा रिफाइनरी से हो रहे तेल के खेल में जिन हमराहों पर हाथ डालकर मथुरा पुलिस उन्हें वजीर साबित करने की कोशिश कर रही है, वह दरअसल इस खेल का वजीर तो क्या, प्यादे तक नहीं हैं।वजीर तो वाकई वजीर हैं, और उनके गिरेबां तक हाथ डालने की हिमाकत आगरा तथा मथुरा पुलिस का कोई अफसर नहीं कर पाया। ये वजीर हर सत्ता में अपना रसूख कायम रखते हैं, फिर चाहे वो सत्ता सपा की हो अथवा बसपा की, और किसी गठबंधन की हो या भाजपा की ही क्यों न हो।
इन दिनों मथुरा पुलिस थोड़ी-बहुत उछल-कूद करके अपनी जो सक्रियता दिखा रही है, उसका एकमात्र कारण है तेल के खेल में अपनी संलिप्तता से बचने का प्रयास करना वर्ना क्या ऐसा संभव है कि बार-बार पाइप लाइन में सूराख करके करोड़ों का माल पार कर लिया जाए और पुलिस लकीर पीटती रहे।
ऐसा नहीं है कि मथुरा को अब तक कोई ईमानदार पुलिस अफसर मिला ही न हो, पहले कई जांबाज पुलिस अफसरों ने मथुरा रिफाइनरी से होने वाले तेल के खेल में दखल देने की कोशिश की है लेकिन आज तक न तो कोई पुलिस अफसर किसी वजीर तक पहुंच पाया और न किसी वजीर के प्यादे को अपना मोहरा बना पाया। हां, थोड़े-बहुत हाथ-पैर मारने के बाद वह खुद उन वजीरों का मोहरा जरूर बन गया और अंतत: उनके तथा उनके हलूकरों के इशारों पर नाचते देखा गया।
इसी क्रम में नाम कमाने की चाह रखने वाले कुछ पुलिस अफसर दाम भले ही कमा गए परंतु बदनाम होने से नहीं बच सके। जो ये नहीं कर पाए उन्हें तत्काल प्रभाव से स्थानांतरित कर दिया गया।
आज उनमें से कोई डीआईजी बना बैठा है तो कोई आईजी और एडीजी। एक-दो पुलिस अफसर तो डीजी बनकर सेवामुक्त भी हो लिए और आज टीवी चैनल्स पर होने वाली डिबेट्स में खाकी पहनने वालों को नैतिकता व ईमानदारी का पाठ पढ़ाते देखे व सुने जा सकते हैं।
कड़वा सच यह है कि मथुरा में रिफाइनरी स्थापित होने के बाद से शुरू हुआ तेल का खेल कभी बंद हुआ ही नहीं। एक-दो मौकों पर इसमें शिथिलता अवश्य दिखाई दी किंतु वह भी चंद दिनों के लिए।
यही कारण है कि मथुरा तथा आगरा में इस खेल के चलते एक-दो नहीं दर्जनों मनोज गोयल पैदा हुए और दर्जनों मनोज अग्रवाल व सुजीत प्रधान। तेल के खेल की जन्मकुंडली खंगाली जाए तो पता लग जाएगा कि आज उनमें से कोई नामचीन बिल्डर बन चुका है तो कोई मशहूर व्यवसाई। किसी के नाम से उद्योगपति का टैग चस्पा किया जा चुका है तो कोई जनप्रतिनिधि बनकर जनता की सेवा करने का दम भर रहा है।
इतना सब होने के बावजूद हजारों करोड़ रुपए सलाना कमाई वाले तेल के इस खेल का वजीर हमेशा सत्ता के सोपान से चिपके रहने वाला ही कोई बन पाया, और वहां तक पहुंचने के माद्दा मथुरा-आगरा के इन चिरकुटों में था नहीं। ये लोग सत्ता के गलियारों में भटकते रह गए और उन्हीं झरोखों से झांककर खुदमुख्त्यारी का दम भरते रहे।
मथुरा रिफाइनरी से होने वाले तेल के खेल में संलिप्त हमराह, हलूकर, मोहरे तथा प्यादे तक नहीं जानते कि उनकी गर्दन में बंधी डोर का छोर आखिर है किसके हाथ में। वो तो सिर्फ इतना जानते हैं कि उस डोर के इशारे पर ही उन्हें नाचना है और उसी के इशारे पर अपने अधीनस्थों को नचाना है।
पाइप लाइन में सेंध लगाकर पेट्रोलियम पदार्थों की चोरी करने और पाइप लाइन तक पहुंचने के लिए सुरंग बनाने का मथुरा में यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी कई मर्तबा ऐसे कारनामे लोग करते रहे हैं लेकिन कभी ऐसी प्रभावी कार्यवाही किसी स्तर से नहीं हुई जिसके बाद यह मान लिया जाए कि आगे वैसा हो पाना संभव नहीं होगा। हर बार सांप निकल जाने के बाद लकीर पीटने का तमाशा किया गया जिसके परिणाम स्वरूप कोई उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल नहीं हुई।
तेल शोधक कारखाना कहीं का भी हो, उसकी सुरक्षा एक अत्यंत महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है। इस जिम्मेदारी को यूं तो केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) निभाती है किंतु कई दूसरे विभागों सहित सिविल पुलिस की भी इसमें अहम भूमिका होती है।
ऐसे में रिफाइनरी के अंदर और बाहर होने वाली किसी भी गैरकानूनी गतिविधि का इतने लंबे समय तक पता न लग सके कि कोई सुरंग बनाकर पाइप लाइन से तेल निकालने में सफल हो जाए, यह हो नहीं सकता। ये तभी संभव है कि अंदर से लेकर बाहर तक और ऊपर से लेकर नीचे तक के लोगों की इसमें संलिप्तता हो और वो लोग किसी भी हद तक गिरने के लिए तत्पर हों।
रिफाइनरी से ही जुड़े सूत्रों की मानें तो तेल के इस खेल में सबसे बड़ी भूमिका मार्केटिंग डिवीजन से ताल्लुक रखने वाले उन कर्मचारियों की रहती है जो सप्लाई का काम देखते हैं और जिन्हें रिफाइनरी की ओर आने व जाने वाली एक-एक पाइप लाइन की जानकारी है।
बताया जाता है कि इन रिफाइनरी कर्मियों के पास पाइप लाइन के पूरे जाल का नक्शा रहता है और वही बता सकते हैं कि कहां-कहां वॉल्व लगे हैं तथा कहां-कहां सुरक्षा में सेंध लगाना संभव है।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार यही वो लोग हैं जिनका प्रत्यक्ष में तो तेल के खेल से कोई सरोकार नहीं रहता लेकिन इनकी कमाई लाखों नहीं करोड़ों में होती है।
बताया जाता है कि ड्यूटी पर मौजूद रिफाइनरी कर्मियों के अलावा ऐसे रिफाइनरी कर्मियों की कोई कमी नहीं है जो अवकाश प्राप्त करने के बावजूद सिर्फ पाइप लाइन के नक्शों की बिना पर घर बैठे लाखों रुपए हासिल कर रहे हैं अन्यथा कितने आश्चर्य की बात है कि जिस पाइप लाइन की सुरक्षा पर बेहिसाब पैसा खर्च होता हो और जिसके अंदर चलने वाले प्रेशर तक से उसके लीकेज का पता लगाया जा सकता हो, उसमें छेद करके करोड़ों रुपए मूल्य का पेट्रोलियम पदार्थ चुरा लिया जाए फिर भी रिफाइनरी प्रशासन को तब भनक लगे जब कोई जनसामान्य अपनी जान हथेली पर रखकर अफसरों को बताने पहुंचे कि पाइप लाइन में सेंध लग चुकी है।
रिफाइनरी प्रशासन के दावों पर भरोसा करें तो समूची पाइप लाइन की एक ओर जहां नियमित चैकिंग होती है वहीं दूसरी ओर उसके ऊपर ऐसी प्लास्टिक कोटिंग भी की जाती है जिसे काटकर वॉल्व तक पहुंचना या पाइप लाइन में छेद कर पाना आसान नहीं होता। ऐसा करने की कोशिश के दौरान ही रिफाइनरी के अंदर बैठे अधिकारी व कर्मचारियों को आधुनिक उपकरणों के सहारे पता लग जाता है लेकिन यहां तो जैसे पूरे कुएं में ही भांग घुली हुई है लिहाजा आज तक मौके पर कभी कोई पकड़ा नहीं जा सका।
बहुत समय नहीं बीता जब रिफाइनरी के अंदर से सैकड़ों करोड़ रुपए मूल्य वाले पेट्रोलियम पदार्थों से भरे कंटेनर चोरी हो गए थे। तब भी इसी प्रकार शोर-शराबा हुआ और दावा किया गया कि इतनी बड़ी घटना को अंजाम देने वाला कोई अपराधी बच नहीं पाएगा, चाहे वह रिफाइनरी के अंदर बैठा हो अथवा बाहर। समय के साथ यह मामला पहले ढीला पड़ा और अब ठंडे बस्ते के हवाले किया जा चुका है।
जिस समय कृष्ण की इस पावन जन्मभूमि पर रिफाइनरी की शक्ल में एक आधुनिक मंदिर की नींव रखी जा रही थी तब कहा गया था कि मथुरा तथा मथुरा वासियों के लिए यह मंदिर बड़ा वरदान साबित होगा किंतु आज स्थिति इसके ठीक उलट है।
मथुरा रिफाइनरी आज की तारीख में तेल का अवैध कारोबार करने वालों, भ्रष्ट अफसरों, सफेदपोश नेताओं तथा पुलिस-प्रशासन के लिए भले ही वरदान बनी हुई हो किंतु मथुरा-आगरा के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं है।
रिफाइनरी के कारण वायु और जल प्रदूषण तो बढ़ा ही है, साथ ही खतरा भी बहुत बढ़ गया है। आतंकवादियों के लिए यह एक बड़ा टारगेट है और दुश्मन देशों की भी इस पर हमेशा पैनी नजर रहती है।
कहने को मथुरा रिफाइनरी अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा शहर के विकास और उसके बेहतर रख-रखाव के लिए निकालती है लेकिन यह हिस्सा कहां जाता है, इसका कभी पता नहीं लगा।
रिफाइनरी स्थापित हुए साढ़े तीन दशक होने को आए लेकिन कृष्ण की पावन जन्मस्थली आज तक अपनी गरिमा के अनुरूप विकास को तरस रही है। सड़क, बिजली, पानी, जलभराव जैसे सामान्य समस्याओं तक के समाधान में मथुरा रिफाइनरी ने कोई उल्लेखनीय भूमिका कभी अदा की हो, ऐसा याद नहीं आता। हां, इसके कारण जनसामान्य की जिंदगी हर वक्त खतरे में जरूर पड़ी रहती है क्योंकि पता नहीं कब कौन तेल को चोरी करके पैसे बनाने की जगह उसका दूसरा गलत इस्तेमाल करने की ठान ले।
मथुरा का हर जागरूक नागरिक जानता है कि रिफाइनरी की सीमा में पड़ने वाले ”बाद रेलवे स्टेशन” से लेकर तेल के भण्डारण तक में सेंध लगाकर चोरी करने का सिलसिला कभी थमा नहीं है। रेलवे स्टेशन पर जहां वैगनों से बाकयदा पाइप डालकर तेल खींच लिया जाता है वहीं गोदामों से कंटेनर के कंटेनर गायब कर दिए जाते हैं किंतु सब तमाशबीन बने रहते हैं। यही हाल रिफाइनरी के लिए बिछी पाइप लाइनों को क्षतिग्रस्त करने के मामले में है। कितनी बार पाइप लाइनों में सूराख करके करोड़ों रुपए की चपत लगाई गई है लेकिन सरकारी माल पर हाथ साफ करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानने वाले अधिकारी और कर्मचारी, अपराधियों को संरक्षण देने से नहीं चूकते। उनके लिए वह दुधारु गाय बने हुए हैं।
मथुरा की ओर आने वाली कोई सड़क हो अथवा यहां से दूसरे जनपदों एवं राज्यों को जोड़ने वाली कोई सड़क क्यों न हो, हरेक पर अवैध तेल के गोदामों का जाल बिछा मिल जाएगा लेकिन क्या मजाल कि कोई इनकी ओर आंख उठाकर देख ले।
देखेगा भी कैसे, आखिर तेल की धार से निकलने वाले पैसों की चमक किसी की भी आंखें चुंधियाने को काफी हैं। तभी तो कहावत है कि तेल देख और तेल की धार देख।
कहते हैं कि मथुरा तीन लोक से न्यारी है। कुछ समय के अंदर गधों को घोड़ों की तरह सरपट दौड़ते और फर्श से अर्श तक का सफर काफी कम समय में पूरा करते देखकर तो लगता है कि वाकई मथुरा तीन लोक से न्यारी है।
यहां हमराह पकड़े जाते हैं, हलूकर भी पकड़े जा सकते हैं लेकिन वजीरों का बाल भी बांका नहीं होता। सत्ता की खातिर उनकी निष्ठाएं बेशक लचीली हो जाती हों लेकिन उनके गोरखधंधों में लचीलापन कभी नहीं आता।
इसलिए तेल का खेल जारी था, जारी है और बदस्तूर जारी रहेगा। फॉलोअर पहले भी पकड़े जाते रहे हैं और हमेशा पकड़े जाते रहेंगे जिससे पुलिस इसी तरह अपनी पीठ खुद थपथपाती रहे किंतु वजीरों की वजारत कायम रहेगी। चुनाव का सीजन बीतने दें और फिर तेल भी देखना और तेल व तेलियाओं की धार भी।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
कहीं ऐसा न हो कि जैसे-तैसे बनाए जा रहे कोविड अस्पतालों को फिर पागलखानों में तब्दील करना पड़ जाए
चीन के वुहान में उपजा कोरोना नामक वायरस जब से ग्लोबल हुआ है, तब से तमाम दूसरे वायरस भी दुनियाभर में सक्रिय हो चुके हैं। कोरोना की हर लहर के साथ इनकी संख्या बढ़ती जा रही है लिहाजा समझ में नहीं आ रहा इनसे बचाव कैसे किया जाए?दो गज की दूरी और मास्क जरूरी, सोशल डिस्टेंसिंग, सैनिटाइजेशन, आइसोलेशन, वर्क फ्रॉम होम आदि को अपनाकर शायद कोविड-19 से तो बचा जा सकता है किंतु वैज्ञानिकों एवं विशेषज्ञों के रूप में सोशल मीडिया, वेब मीडिया, इलैक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया के जरिए फैल चुके वायरसों से बचने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा।
दुनिया अभी जहां बमुश्किल कोरोना की वैक्सीन ही ईजाद कर सकी है वहीं ये वैज्ञानिक और विशेषज्ञ दिन-रात नए-नए नतीजे निकाल कर और कोरोना के भूत, वर्तमान तथा भविष्य का बखान करके लोगों को भयभीत करने का काम कर रहे हैं।
लोगों के दिलो-दिमाग में भय का भूत व्याप्त करने वाले ये तत्व इस कदर वायरल हो चुके हैं कि आदमी “मीडिया” से दूर भागने लगा है। हालांकि ये फिर भी पीछा नहीं छोड़ रहे।
आश्चर्य की बात यह है कि ऐसे तत्वों में विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO सहित कई विकसित देशों के वो विशेषज्ञ और वैज्ञानिक भी शामिल हैं जिन्होंने अब तक अपनी ऐसी ही कथित योग्यता के बल पर न केवल मान-सम्मान बल्कि धन-दौलत और तमाम पुरस्कार भी हासिल किए हैं।
ख्याति प्राप्त ये संस्थाएं और व्यक्ति आज न तो कोरोना के किसी एक इलाज पर एकमत हैं और न उसके लक्षण एवं दुष्प्रभावों पर। सब अपनी-अपनी ढपली बजा रहे हैं जिससे आम आदमी अधिक भ्रमित हो रहा है।
इनकी मानें तो अब पृथ्वी से सारे रोग दूर हो चुके हैं। जो कुछ है, वो कोरोना है। समूचे विश्व में जितने भी लोग मर रहे हैं, वो सिर्फ और सिर्फ कोरोना से मर रहे हैं। भविष्य में भी हर रोग कोरोना की देन होगा क्योंकि इनके अनुसार उसके आफ्टर इफेक्ट्स ही इतने हैं कि उनमें सब-कुछ समाहित हो जाएगा।
कुल मिलाकर मौत के लिए आत्मा का शरीर छोड़ देना भले ही जरूरी हो किंतु तब भी कोरोना पीछा छोड़ दे, यह जरूरी नहीं है।
ऐसे में हिंदू धर्मावलंबियों को तो एक सवाल और परेशान कर रहा है कि क्या शरीर के खाक हो जाने पर भी कोरोना उसमें शेष रहता होगा।
क्या कोरोना उस फ़ीनिक्स नामक पक्षी की तरह है जिसके बारे में कहा जाता है कि उसकी राख से ही उसका पुनर्जन्म होता है।
यदि ऐसा है तो फिर उन धर्मों के मृत शरीरों का क्या जिनमें दफनाने, लटकाने अथवा दूसरे जीवों का भोजन बना देने के लिए उन्हें छोड़ देने का रिवाज है। वो तो बहुत खतरनाक साबित हो सकते हैं।
इस तरह कोरोना सर्वव्यापी हो जाएगा और उससे कभी पीछा छूटेगा ही नहीं। वो हवा में तो होगा ही, कब्र में लेटी लाश में भी होगा और जल, जंगल तथा पहाड़ों पर भी चारों ओर फैला होगा।
सिरदर्द, बदन दर्द, बुखार, खांसी, जुकाम, त्वचा विकार, उल्टियां, दस्त, एसिडिटी, सांस फूलना, आंखों में जलन, सुगंध एवं दुर्गन्ध का अहसास न होने, सीने में दर्द और यहां तक कि कम सुनाई देने तथा मुंह का स्वाद चले जाने जैसे अनगिनत लक्षणों के प्रचार-प्रसार से कोरोना हमारे दिमाग में तो पूरी तरह घुस ही गया है… अब इससे पहले कि वह हमें पागल कर दे, सरकार को कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे मानसिक रोगियों की तादाद परेशान न करने लगे।
कहीं ऐसा न हो कि जैसे-तैसे बनाए जा रहे कोविड अस्पतालों को फिर पागलखानों में तब्दील करना पड़ जाए क्योंकि किसी भी बीमारी का खौफ उसके वास्तविक खतरे से कहीं अधिक भारी होता है।
कहते हैं कि दुनिया में सांपों की जितनी भी प्रजातियां पाई जाती हैं, उनमें से बहुत कम ही ऐसी होती हैं जिनमें आदमी को मारने लायक जहर होता हो। इसीलिए सांप के काटने पर मरने वालों में ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा होती है जिनका दहशत में हार्टफेल हो जाता है।
बेशक कोरोना इस दौर में उपजा एक खतरनाक वायरस है और इसे गंभीरता से लेना चाहिए किंतु इसका यह मतलब नहीं कि जागरूकता के नाम पर भय का ऐसा वातावरण बना दिया जाए कि वह लोगों के अंदर घर कर बैठे। बिना किसी ठोस आधार के और रिसर्च किए बगैर उसके इतने आफ्टर इफेक्ट्स प्रचारित कर दिए जाएं कि कोरोना से मुक्ति मिलने पर भी लोग उससे मुक्त न हो सकें तथा मानसिक विकृति के शिकार हो जाएं।
उचित तो ये होगा कि ऐसे ज्ञानियों, विज्ञानियों तथा विशेषज्ञों के निजी निष्कर्षों पर सरकारें सख्ती के साथ लगाम लगाने की व्यवस्था करें अन्यथा इसके दूरगामी परिणाम भुगतने होंगे, और वो किसी भी वायरस से अधिक घातक हो सकते हैं।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
जेल के अंदर गैंगवार पर आश्चर्य नहीं, आश्चर्य है मथुरा व बागपत के बाद चित्रकूट में भी 9 MM पिस्टल के यूज... पर?
उत्तर प्रदेश के चित्रकूट में कल जेल के अंदर हुई गैंगवार न तो कोई नई बात है और न बहुत आश्चर्य जताने वाली क्योंकि पूर्व में भी जेल के अंदर ऐसी गैंगवार होती रही हैं।सोचने की बात यदि कोई है तो वो ये कि मथुरा जिला कारागार में हुई गैंगवार के बाद बागपत जेल में हुई गैंगवार और अब चित्रकूट जेल की गैंगवार में आश्चर्यजनक रूप से 9 एमएम पिस्टल का ही इस्तेमाल हुआ है।
बागपत जिला जेल में 09 जुलाई 2018 को कुख्यात माफिया डॉन मुन्ना बजरंगी को गोलियों से भून डाला गया।
इससे पहले 17 जनवरी 2015 की दोपहर मथुरा जिला जेल में हुई गोलीबारी के दौरान एक गैंग से अक्षय सोलंकी को मौत के घाट उतार दिया गया। दूसरे गैंग से राजकुमार शर्मा, दीपक वर्मा और राजेश ऊर्फ टोंटा घायल हुए।
दूसरे ही दिन 18 जनवरी को टोंटा को तब गोलियों से भून डाला गया जब उसे इलाज के लिए एंबुलेंस में भारी पुलिस फोर्स के साथ मथुरा की तत्कालीन एसएसपी मंजिल सैनी आगरा ले जा रही थीं।
मथुरा के फरह थाना क्षेत्र में नेशनल हाईवे नंबर 2 पर मथुरा-आगरा के बीच पचासों पुलिसकर्मियों के रहते एंबुलेंस के अंदर राजेश टोंटा को गोलियों से छलनी कर दिया गया और पुलिस न तो एक भी बदमाश को मौके से पकड़ सकी और न टोंटा के साथ एंबुलेंस में मौजूद कोई पुलिसकर्मी घायल हुआ।
मिली जानकारी के अनुसार मुन्ना बजरंगी की हत्या में सिर्फ एक असलाह का इस्तेमाल हुआ किंतु मथुरा जिला जेल में हुई गैंगवार के दौरान दोनों पक्षों ने आधुनिक हथियार चलाए। पुलिस की कहानी के अनुसार इस गैंगवार में इस्तेमाल किए गए 9 एमएम हथियार बंदी रक्षक कैलाश गुप्ता ने पहुंचाए थे। इस गैंगवार के बाद मथुरा जिला जेल से बरामद दोनों हथियार 9 एमएम (प्रतिबंधित बोर) के थे।
इत्तेफाक देखिए कि मुन्ना बजरंगी की हत्या में भी इसी बोर के हथियार को इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई।
अब चित्रकूट जिला जेल की गैंगवार में भी 9 एमएम पिस्टल इस्तेमाल किए जाने की बात कही गई है।
कुल मिलाकर यदि ये कहा जाए कि उत्तर प्रदेश की जेलें हर दौर में कुख्यात अपराधियों के लिए सजा का ठिकाना न होकर संरक्षण के केंद्र रही हैं तो कुछ गलत नहीं होगा। राज चाहे आज योगी का हो अथवा इससे पहले अखिलेश, मुलायम या मायावती का।
भाजपा के सहयोग से सरकार चला रही मायावती के शासनकाल के दौरान 1995 में मथुरा जिला कारागार के अंदर वाले गेट पर भाड़े के बदमाशों ने किशन पुटरो की हत्या कर दी थी। इस हत्याकांड में तब किशन पुटरो के अलावा जेल का एक सफाईकर्मी भी मारा गया।
कहने का आशय यह है कि उत्तर प्रदेश की जेलों में एक लंबे समय से कुख्यात अपराधी मनमानी करते रहे हैं। यह बात अलग है कि जिस तरह आज योगी आदित्यनाथ पहले से बेहतर कानून-व्यवस्था होने का दावा करते हैं, उसी तरह मायावती और अखिलेश भी अपने-अपने समय में कानून का राज होने का दावा करते थे किंतु सच्चाई यही है जो आज चित्रकूट जेल से सामने आई है या इससे पहले मुन्ना बजरंगी की हत्या के रूप में बागपत जेल से और अक्षय सोलंकी की हत्या के रूप में मथुरा जिला कारागार से सामने आई थी।
मथुरा और बागपत के बाद अब चित्रकूट की गैंगवार में भी 9 एमएम पिस्टल का इस्तेमाल किया जाना यह साबित करता है कि किसी न किसी स्तर पर जितनी आवश्यकता प्रदेश के जेल तंत्र को परखने की है, उससे ज्यादा यह जानने की है कि आखिर एक ही किस्म का हथियार जेलों के अंदर क्यों और कैसे पहुंच रहा है। कहीं इसके पीछे भी समूचे प्रदेश में जेल तंत्र तथा अपराधियों का विशेष गठजोड़ तो काम नहीं कर रहा।
मायावती और अखिलेश राज के बाद अब योगीराज में भी जेल के अंदर की ये गैंगवार साबित करती है कि यहां सरकारें भले ही बदलती हों लेकिन बाकी कुछ नहीं बदलता। निश्चित ही इसके लिए वो व्यवस्था दोषी है जिसके चलते पूरे तंत्र का बुरी तरह राजनीतिकरण हो चुका है। ऐसे में जाहिर है कि जब तक इस राजनीतिकरण को खत्म नहीं किया जाता तब तक न सड़क पर अपराध कम होंगे और न जेल के अंदर।
-Legend News
सोमवार, 10 मई 2021
कोरोना से तो बच सकते हैं लेकिन इन वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों और भ्रम फैलाने वाले वायरसों से कैसे बचें?
चीन के वुहान में उपजा कोरोना नामक वायरस जब से ग्लोबल हुआ है, तब से तमाम दूसरे वायरस भी दुनियाभर में सक्रिय हो चुके हैं। कोरोना की हर लहर के साथ इनकी संख्या बढ़ती जा रही है लिहाजा समझ में नहीं आ रहा इनसे बचाव कैसे किया जाए?दो गज की दूरी और मास्क जरूरी, सोशल डिस्टेंसिंग, सैनिटाइजेशन, आइसोलेशन, वर्क फ्रॉम होम आदि को अपनाकर शायद कोविड-19 से तो बचा जा सकता है किंतु वैज्ञानिकों एवं विशेषज्ञों के रूप में सोशल मीडिया, वेब मीडिया, इलैक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया के जरिए फैल चुके वायरसों से बचने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा।
दुनिया अभी जहां बमुश्किल कोरोना की वैक्सीन ही ईजाद कर सकी है वहीं ये वैज्ञानिक और विशेषज्ञ दिन-रात नए-नए नतीजे निकाल कर और कोरोना के भूत, वर्तमान तथा भविष्य का बखान करके लोगों को भयभीत करने का काम कर रहे हैं।
लोगों के दिलो-दिमाग में भय का भूत व्याप्त करने वाले ये तत्व इस कदर वायरल हो चुके हैं कि आदमी “मीडिया” से दूर भागने लगा है। हालांकि ये फिर भी पीछा नहीं छोड़ रहे।
आश्चर्य की बात यह है कि ऐसे तत्वों में विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO सहित कई विकसित देशों के वो विशेषज्ञ और वैज्ञानिक भी शामिल हैं जिन्होंने अब तक अपनी ऐसी ही कथित योग्यता के बल पर न केवल मान-सम्मान बल्कि धन-दौलत और तमाम पुरस्कार भी हासिल किए हैं।
ख्याति प्राप्त ये संस्थाएं और व्यक्ति आज न तो कोरोना के किसी एक इलाज पर एकमत हैं और न उसके लक्षण एवं दुष्प्रभावों पर। सब अपनी-अपनी ढपली बजा रहे हैं जिससे आम आदमी अधिक भ्रमित हो रहा है।
इनकी मानें तो अब पृथ्वी से सारे रोग दूर हो चुके हैं। जो कुछ है, वो कोरोना है। समूचे विश्व में जितने भी लोग मर रहे हैं, वो सिर्फ और सिर्फ कोरोना से मर रहे हैं। भविष्य में भी हर रोग कोरोना की देन होगा क्योंकि इनके अनुसार उसके आफ्टर इफेक्ट्स ही इतने हैं कि उनमें सब-कुछ समाहित हो जाएगा।
कुल मिलाकर मौत के लिए आत्मा का शरीर छोड़ देना भले ही जरूरी हो किंतु तब भी कोरोना पीछा छोड़ दे, यह जरूरी नहीं है।
ऐसे में हिंदू धर्मावलंबियों को तो एक सवाल और परेशान कर रहा है कि क्या शरीर के खाक हो जाने पर भी कोरोना उसमें शेष रहता होगा।
क्या कोरोना उस फ़ीनिक्स नामक पक्षी की तरह है जिसके बारे में कहा जाता है कि उसकी राख से ही उसका पुनर्जन्म होता है।
यदि ऐसा है तो फिर उन धर्मों के मृत शरीरों का क्या जिनमें दफनाने, लटकाने अथवा दूसरे जीवों का भोजन बना देने के लिए उन्हें छोड़ देने का रिवाज है। वो तो बहुत खतरनाक साबित हो सकते हैं।
इस तरह कोरोना सर्वव्यापी हो जाएगा और उससे कभी पीछा छूटेगा ही नहीं। वो हवा में तो होगा ही, कब्र में लेटी लाश में भी होगा और जल, जंगल तथा पहाड़ों पर भी चारों ओर फैला होगा।
सिरदर्द, बदन दर्द, बुखार, खांसी, जुकाम, त्वचा विकार, उल्टियां, दस्त, एसिडिटी, सांस फूलना, आंखों में जलन, सुगंध एवं दुर्घन्ध का अहसास न होने, सीने में दर्द और यहां तक कि कम सुनाई देने तथा मुंह का स्वाद चले जाने जैसे अनगिनत लक्षणों के प्रचार-प्रसार से कोरोना हमारे दिमाग में तो पूरी तरह घुस ही गया है… अब इससे पहले कि वह हमें पागल कर दे सरकार को कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे मानसिक रोगियों की तादाद परेशान न करने लगे।
कहीं ऐसा न हो कि जैसे-तैसे बनाए जा रहे कोविड अस्पतालों को फिर पागलखानों में तब्दील करना पड़ जाए क्योंकि किसी भी बीमारी का खौफ उसके वास्तविक खतरे से कहीं अधिक भारी होता है।
कहते हैं कि दुनिया में सांपों की जितनी भी प्रजातियां पाई जाती हैं, उनमें से बहुत कम ही ऐसी होती हैं जिनमें आदमी को मारने लायक जहर होता हो। इसीलिए सांप के काटने पर मरने वालों में ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा होती है जिनका दहशत में हार्टफेल हो जाता है।
बेशक कोरोना इस दौर में उपजा एक खतरनाक वायरस है और इसे गंभीरता से लेना चाहिए किंतु इसका यह मतलब नहीं कि जागरूकता के नाम पर भय का ऐसा वातावरण बना दिया जाए कि वह लोगों के अंदर घर कर बैठे। बिना किसी ठोस आधार के और रिसर्च किए बगैर उसके इतने आफ्टर इफेक्ट्स प्रचारित कर दिए जाएं कि कोरोना से मुक्ति मिलने पर भी लोग उससे मुक्त न हो सकें तथा मानसिक विकृति के शिकार हो जाएं।
उचित तो ये होगा कि ऐसे ज्ञानियों, विज्ञानियों तथा विशेषज्ञों के निजी निष्कर्षों पर सरकारें सख्ती के साथ लगाम लगाने की व्यवस्था करें अन्यथा इसके दूरगामी परिणाम भुगतने होंगे, और वो किसी भी वायरस से अधिक घातक हो सकते हैं।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
शनिवार, 17 अप्रैल 2021
क्या “यही दिन” देखने के लिए “अपनी सरकारें” चुनते हैं ”हम भारत के लोग”?
कोरोना वायरस से उपजी महामारी पूरे देश में कहर बरपा रही है। प्रतिदिन इसकी चपेट में आने वाले लोगों का आंकड़ा 2 लाख से ऊपर जा पहुंचा है। अस्पताल से लेकर बेड तक और दवाइयों से लेकर टेस्ट तक करने की व्यवस्था दम तोड़ती जा रही है। कई शहरों में तो लाशों के ढेर लगे हैं और वहां अंतिम संस्कार कराने के लिए भी लाइनें लग रही हैं। परिजन अपने प्रियजनों का चेहरा तक आखिरी बार देखने को तरस रहे हैं।ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या “यही दिन” देखने के लिए “अपनी सरकारें” चुनते हैं “हम भारत के लोग”?
क्या कहती है संविधान की प्रस्तावना
भारत के संविधान की प्रस्तावना कहती है कि “हम भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म एवं उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा व अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा एवं राष्ट्र की एकता व अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्पित होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ईस्वी (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत दो हजार छह विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।
इस प्रस्तावना को भारतीय संविधान का ‘परिचय पत्र’ कहा जाता है और इसकी उद्देशिका यह बताती है कि संविधान जनता के लिए है तथा जनता ही अंतिम सम्प्रभु है किंतु ऐसा लगता है कि आज यह प्रस्तावना या तो बेमानी हो चुकी है या इसके परिचय पत्र पर लिखे अक्षर इतने अधिक धुंधले हो चुके हैं कि 71 साल का बूढ़ा गणतंत्र उन्हें पढ़ने में असमर्थ है।
लोकशाही या राजशाही
कहने को हम दुनिया का सबसे बड़ा ‘लोकतांत्रिक’ देश हैं तथा राजशाही यहां से पूरी तरह विदा हो चुकी है परंतु गौर से देखें तो पता लगता है कि लोकशाही महज एक शब्द भर है और राजशाही ही चेहरा बदलकर अपना काम कर रही है।
कौन नहीं जानता कि देश की आमदनी का एक बड़ा हिस्सा राजनेताओं की शानो-शौकत, उनकी सुरक्षा-व्यवस्था, वेतन-भत्ते तथा पेंशन पर खर्च किया जाता है। इन राजनेताओं की वैभवशाली जिंदगी यह बताने के लिए काफी है कि कहलाते भले ही यह जनप्रतिनिधि हों परंतु हकीकत में बेताज बादशाह होते हैं।
वीआईपी और वीवीआईपी का तमगा हासिल ये वर्ग हर उस सुविधा पर अपना पहला हक रखता है जिसे उपलब्ध कराने में सरकारें सक्षम हैं।
महामारी के इस दौर में आज आम आदमी जहां खुद को कतई असहाय और बेसहारा महसूस कर रहा है, वहीं इन विशिष्टजनों के लिए आलीशान अस्पतालों के अंदर बेड एवं वेंटिलेटर ‘आरक्षित’ किए हुए हैं। ये वर्ग अपनी सुविधा से न केवल टेस्ट करा रहा है बल्कि बेहतरीन इलाज प्राप्त कर रहा है जबकि दूसरी ओर आम आदमी बुखार से तपता हुआ, खांसता व छींकता हुआ और अपनी जांच एवं उपचार की प्रतीक्षा में ‘लावारिस कुत्तों’ की तरह अस्पतालों के चक्कर लगा रहा है।
नेताओं की तरह संवेदनाशून्य हो चुके अधिकांश सरकारी अफसरान उसे तथा उसके परिजनों को दुत्कार रहे हैं, इधर से उधर दौड़ा रहे हैं लेकिन न कोई देखने वाला है और न सुनने वाला।
महामारी के इस दौर में एक साल से अधिक का समय बिता चुका आम आदमी पैसे से तो परेशान है ही, साथ ही सरकारी कु-व्यवस्था से अत्यधिक आहत है। घर में किसी के भी कोरोना की जद में आने की आशंका भर उसे हिला कर रख देती है।
दुर्भाग्य से रिपोर्ट पॉजिटिव आ गई तो समझो कि नगर निगम की टीम द्वारा घर को सील करने के लिए लगाए गए ”टीन के दो आड़े-तिरछे टुकड़े” उस दयनीय दशा तक ले जाने का काम करते हैं जो शायद कोरोना भी नहीं कर पाता।
माना कि कोरोना वायरस एक किस्म की छूत की बीमारी है और इसके लिए बीमार को अलग-थलग रखना जरूरी है किंतु इसका यह मतलब तो नहीं कि उसे इस बेहूदे तरीके से चिन्हित कर सामाजिक तौर पर बहिष्कृत कराने का काम भी किया जाए।
तमाम लोग तो इसी कारण अपनी जांच कराने को आगे नहीं आ रहे क्योंकि उन्हें बीमारी से कहीं अधिक डर इस बेहूदे सरकारी तरीके से लगता है।
प्राइवेट मेडिकल प्रैक्टिशनर को अधिकार क्यों नहीं
क्या बेहतर नहीं होगा कि इस महामारी से मुकाबले के लिए प्राइवेट मेडिकल प्रैक्टिशनर को भी सरकार वही अधिकार दे जो सरकारी अस्पताल के डॉक्टर्स को दिए हुए हैं।
फिलहाल जबकि कोरोना अपने नित नए रूप में सामने आ रहा है और उसकी कोई खास दवाई भी नहीं मिली है। जिन दवाइयों से उपचार किया जा रहा है, वह हर डॉक्टर जानता है तो फिर सरकार सभी प्राइवेट प्रैक्टिशनर डॉक्टर्स को इसके इलाज की खुली छूट क्यों नहीं दे रही?
क्यों निजी पैथोलॉजी लैब को कोरोना की जांच के लिए अधिकृत कर भीड़ और भय के उस माहौल से लोगों को मुक्ति नहीं दिलाई जा रही जिसके कारण वह मानसिक रूप से भी अस्वस्थ होने लगे हैं।
किसी शहर में लाशों के ढेर लगने की खबरें तो किसी शहर में स्वास्थ संसाधनों के अभाव की बातें। कहीं अस्पतालों में बेड के लिए भटकते लोग और टूटती सांसों को थामने के लिए ऑक्सीजन का अभाव तो कहीं वेंटीलेटर्स की बड़ी कमी के समाचार किसी का भी दिल दहला देने के लिए काफी हैं।
इस समय लोगों को जितनी जरूरत स्वास्थ सेवाओं की है, उससे कहीं अधिक यह अहसास कराने की है कि सरकार हर परेशानी में उसके साथ खड़ी है क्योंकि मानसिक संबल के बिना महामारी से जूझ पाना संभव नहीं होगा लेकिन सरकारी रवैया ऐसा अहसास करा पाने में अब तक तो पूरी तरह असफल रहा है।
नेता नगरी चुनावी दंगल में व्यस्त है और सरकारी अमला उनका हुकुम बजा लाने में, आम आदमी की शारीरिक, आर्थिक एवं मानसिक परेशानी से जैसे किसी को कोई मतलब नहीं।
कोरोना के हर रोज आसमान छू रहे आंकड़े बेशक स्थिति की भयावहता महसूस कराने को पर्याप्त हों लेकिन सरकारें अब भी डर्टी पॉलिटिक्स में व्यस्त हैं और आरोप-प्रत्यारोप के सर्वाधिक पसंदीदा खेल से लोगों को गुमराह करने का काम कर रही हैं क्योंकि इस काम के लिए उनके पास तंत्र है। वो ‘तंत्र’ जिसके हाथ का खिलौना है लोक और लोकशाही।
कड़वा सच यही है कि हम राजशाही के अधीन थे, अधीन हैं, और इसी के अधीन रहेंगे। सत्ता चाहे किसी दल या व्यक्ति के हाथ में क्यों न हो, जब तक व्यवस्था नहीं बदलेगी तब तक सत्ता की चाल, उसका चरित्र और चेहरा भी नहीं बदलेगा।
महामारी का यह दौर पता नहीं कब तक और कितने लोगों को निगलने तथा कितने लोगों को दीन-हीन बनाने के बाद खत्म होगा, खत्म होगा भी या नहीं…. इसका तो पता नहीं लेकिन इतना जरूर पता है कि यदि ‘लोकतंत्र’ की प्रस्तावना इसी गति से धुंधली होती चली गई तो तय समझिए कि देश में सिर्फ ‘सरकारी तंत्र’ ही बचेगा, लोक जल्द पूरी तरह दम तोड़ देगा।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
बुधवार, 31 मार्च 2021
एक कथावाचक मदारी, दो जमूरे कारोबारी और भगवान बद्री विशाल का स्वर्ण छत्र
एक युवा कथावाचक मदारी, उसकी डुगडुगी पर नाचने वाले दो जमूरे कारोबारी… और भगवान बद्री विशाल का स्वर्ण छत्र।ये कहानी है उस धंधे की जिसे परवान तो चढ़ाया जाता है धर्म के सहारे लेकिन नतीजा निकलता है पाप से भरी गठरी के रूप में। फिर भी फायदे में रहता है सिर्फ और सिर्फ कथावाचक मदारी।
उत्तराखंड की पहाड़ी वादियों में बैठे भगवान बद्री विशाल को तो शायद पता भी नहीं लगा होगा कि योगीराज भगवान श्रीकृष्ण की पावन क्रीड़ा स्थली वृंदावन में बैठा कोई कथावाचक अपनी डुगडुगी बजाकर उनके नाम पर न केवल पंजाब के लुधियाना में तमाशा लगाकर धर्म की दुकान सजा रहा है बल्कि मथुरा एवं लुधियाना के दो कारोबारियों को जमूरे की तरह नचा भी रहा है।
सैकड़ों किलोमीटर दूर बैठे भगवान बद्री विशाल शायद ही जानते होंगे कि मदारी ने जमूरों के कान में ऐसा कौन सा मंत्र फूंका कि आज मदारी उनका सबकुछ लूटकर भी चैन की बंशी बजा रहा है और जमूरे एक-दूसरे की जान के दुश्मन बन बैठे हैं।
स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि मदारी द्वारा मदहोश किए गए जमूरे अब कोर्ट, कचहरी और जेल के सींखचों तक भागमभाग कर रहे हैं परंतु मिल-बैठकर बात करने को तैयार नहीं है।
माल पर हाथ साफ करने में माहिर मदारी एक दशक से जमूरों को नचा रहा है और जमूरे नाच रहे हैं। पहले छत्र के ‘नीचे’ नाच रहे थे, और अब छत्र के ‘ऊपर’ नाच रहे हैं।
पहले छत्र की शोभायात्रा निकालकर नाच रहे थे लेकिन अब अपना जुलूस निकलवाकर नाच रहे हैं, किंतु इस सबके बीच मदारी अपने धंधे में मशगूल है। वो एक और नई जगह डुगडुगी बजाकर नए जमूरे जुटा रहा है ताकि अपने लिए एक नया चांदी का सिंहासन हासिल कर सके, नया कॉन्ट्रैक्ट साइन कर सके। ऐसा कॉन्ट्रैक्ट जिसमें न वो ब्रोकर है और न पार्टी।
मदारी की मदहोश कर देने वाली फितरत तो देखिए कि इस सब के बावजूद जमूरे उसके एक इशारे पर करोड़ों का लेन-देन कर लेते हैं। सैकड़ों लोगों को साथ लेकर भगवान बद्री विशाल को धोखा दे आते हैं। एक-दूसरे के खिलाफ आपराधिक केस भी दर्ज कराते हैं। लोअर कोर्ट से लेकर हाई कोर्ट और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट के चक्कर भी काटते हैं परंतु मदारी को इस सबमें शामिल नहीं करते जबकि सारे तमाशे का सूत्रधार मदारी ही है।
मदारी मजे ले रहा है, वह लगातार अपनी डुगडुगी बजा रहा है जिससे उठी तरंगें संभवत: जमूरों के सोचने व समझने की शक्ति छीन लेती हैं और इसीलिए जमूरे कुछ कुछ अस्पष्ट सा बुदबुदाते तो हैं परंतु न साफ बोल पा रहे हैं, न कुछ बता पा रहे हैं।
बताते हैं कि कथावाचक मदारी को जब कभी अपनी डुगडुगी की आवाज मंद पड़ती महसूस होती है तो वह इसमें अपनी मां की आवाज को भी मिला लेता है। फिर वात्सल्य की चाशनी में लपेटकर मां इन जमूरों से कहती है… मैं हूं न! तुम क्यों चिंता करते हो। जैसा मैं कहूं, वैसा करते जाओ, तुम्हारा इसी में भला है।
इसे कलियुग का प्रभाव कहें या मदारी की डुगडुगी से निकलने वाली जादुई लय का प्रभाव कि एक ओर जहां सैकड़ों लोग भगवान बद्री विशाल के दरबार में जाकर साढ़े तीन किलो सोने से अधिक का छत्र चढ़ा आते हैं वहीं दूसरी ओर एक जमूरा दूसरे जमूरे को उस कॉन्ट्रैक्ट के बदले एक करोड़ से ऊपर की रकम दे बैठता है, जिस कॉन्ट्रैक्ट पर न कॉन्ट्रैक्ट लेने वाले के साइन हैं और न देने वाले के। और जिसके साइन हैं, उसने सबसे सिर्फ लिया ही लिया है, कभी कुछ दिया नहीं। उस मदारी ने कृष्ण की क्रीड़ा स्थली से लेकर जन्मस्थली तक और फिर पंजाब के लुधियाना से लेकर उत्तराखंड के बद्रीनाथ धाम तक सैकड़ों लोगों को मात्र डुगडुगी बजाकर मजमा लगवाया है।
अब जमूरे बेशक दिल्ली-चंडीगढ़ और मथुरा-वृंदावन के बीच भटक रहे हों लेकिन मदारी का मजमा जारी है। उसकी डुगडुगी बिना रुके बज रही है क्योंकि उसके धर्म का धंधा जमूरों के बिना चल नहीं सकता।
उसकी आवाज अब एक नई जगह गूंज रही है। अदृश्य डोर से बंधे जमूरों से वह पूछ रहा है…हां तो जमूरो, मेरे इशारों पर नाचोगे…जो कहूंगा, वो करोगे… सोने-चांदी के सिंहासन भेंट करोगे… कांट्रेक्ट साइन कराओगे…कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने पर भी मेरा नाम तो नहीं लोगे…मेरे एक इशारे पर आयोजन-प्रयोजन करते रहोगे। और अंत में मेरे धर्म के धंधे को धार दोगे तथा उससे अर्जित संपत्ति पर मुझे बिना हील-हुज्जत किए ‘पर्याप्त ब्याज’ तो दोगे।
अब सिर्फ स्वीकृति में सिर हिलाओ और चलते बनो। मुंह से मेरे खिलाफ एक शब्द निकालने का मतलब तुम समझते ही हो, इसलिए समझदार बने रहो और मेरे छत्र की छाया में बने रहो।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
उत्तराखंड की पहाड़ी वादियों में बैठे भगवान बद्री विशाल को तो शायद पता भी नहीं लगा होगा कि योगीराज भगवान श्रीकृष्ण की पावन क्रीड़ा स्थली वृंदावन में बैठा कोई कथावाचक अपनी डुगडुगी बजाकर उनके नाम पर न केवल पंजाब के लुधियाना में तमाशा लगाकर धर्म की दुकान सजा रहा है बल्कि मथुरा एवं लुधियाना के दो कारोबारियों को जमूरे की तरह नचा भी रहा है।
सैकड़ों किलोमीटर दूर बैठे भगवान बद्री विशाल शायद ही जानते होंगे कि मदारी ने जमूरों के कान में ऐसा कौन सा मंत्र फूंका कि आज मदारी उनका सबकुछ लूटकर भी चैन की बंशी बजा रहा है और जमूरे एक-दूसरे की जान के दुश्मन बन बैठे हैं।
स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि मदारी द्वारा मदहोश किए गए जमूरे अब कोर्ट, कचहरी और जेल के सींखचों तक भागमभाग कर रहे हैं परंतु मिल-बैठकर बात करने को तैयार नहीं है।
माल पर हाथ साफ करने में माहिर मदारी एक दशक से जमूरों को नचा रहा है और जमूरे नाच रहे हैं। पहले छत्र के ‘नीचे’ नाच रहे थे, और अब छत्र के ‘ऊपर’ नाच रहे हैं।
पहले छत्र की शोभायात्रा निकालकर नाच रहे थे लेकिन अब अपना जुलूस निकलवाकर नाच रहे हैं, किंतु इस सबके बीच मदारी अपने धंधे में मशगूल है। वो एक और नई जगह डुगडुगी बजाकर नए जमूरे जुटा रहा है ताकि अपने लिए एक नया चांदी का सिंहासन हासिल कर सके, नया कॉन्ट्रैक्ट साइन कर सके। ऐसा कॉन्ट्रैक्ट जिसमें न वो ब्रोकर है और न पार्टी।
मदारी की मदहोश कर देने वाली फितरत तो देखिए कि इस सब के बावजूद जमूरे उसके एक इशारे पर करोड़ों का लेन-देन कर लेते हैं। सैकड़ों लोगों को साथ लेकर भगवान बद्री विशाल को धोखा दे आते हैं। एक-दूसरे के खिलाफ आपराधिक केस भी दर्ज कराते हैं। लोअर कोर्ट से लेकर हाई कोर्ट और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट के चक्कर भी काटते हैं परंतु मदारी को इस सबमें शामिल नहीं करते जबकि सारे तमाशे का सूत्रधार मदारी ही है।
मदारी मजे ले रहा है, वह लगातार अपनी डुगडुगी बजा रहा है जिससे उठी तरंगें संभवत: जमूरों के सोचने व समझने की शक्ति छीन लेती हैं और इसीलिए जमूरे कुछ कुछ अस्पष्ट सा बुदबुदाते तो हैं परंतु न साफ बोल पा रहे हैं, न कुछ बता पा रहे हैं।
बताते हैं कि कथावाचक मदारी को जब कभी अपनी डुगडुगी की आवाज मंद पड़ती महसूस होती है तो वह इसमें अपनी मां की आवाज को भी मिला लेता है। फिर वात्सल्य की चाशनी में लपेटकर मां इन जमूरों से कहती है… मैं हूं न! तुम क्यों चिंता करते हो। जैसा मैं कहूं, वैसा करते जाओ, तुम्हारा इसी में भला है।
इसे कलियुग का प्रभाव कहें या मदारी की डुगडुगी से निकलने वाली जादुई लय का प्रभाव कि एक ओर जहां सैकड़ों लोग भगवान बद्री विशाल के दरबार में जाकर साढ़े तीन किलो सोने से अधिक का छत्र चढ़ा आते हैं वहीं दूसरी ओर एक जमूरा दूसरे जमूरे को उस कॉन्ट्रैक्ट के बदले एक करोड़ से ऊपर की रकम दे बैठता है, जिस कॉन्ट्रैक्ट पर न कॉन्ट्रैक्ट लेने वाले के साइन हैं और न देने वाले के। और जिसके साइन हैं, उसने सबसे सिर्फ लिया ही लिया है, कभी कुछ दिया नहीं। उस मदारी ने कृष्ण की क्रीड़ा स्थली से लेकर जन्मस्थली तक और फिर पंजाब के लुधियाना से लेकर उत्तराखंड के बद्रीनाथ धाम तक सैकड़ों लोगों को मात्र डुगडुगी बजाकर मजमा लगवाया है।
अब जमूरे बेशक दिल्ली-चंडीगढ़ और मथुरा-वृंदावन के बीच भटक रहे हों लेकिन मदारी का मजमा जारी है। उसकी डुगडुगी बिना रुके बज रही है क्योंकि उसके धर्म का धंधा जमूरों के बिना चल नहीं सकता।
उसकी आवाज अब एक नई जगह गूंज रही है। अदृश्य डोर से बंधे जमूरों से वह पूछ रहा है…हां तो जमूरो, मेरे इशारों पर नाचोगे…जो कहूंगा, वो करोगे… सोने-चांदी के सिंहासन भेंट करोगे… कांट्रेक्ट साइन कराओगे…कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने पर भी मेरा नाम तो नहीं लोगे…मेरे एक इशारे पर आयोजन-प्रयोजन करते रहोगे। और अंत में मेरे धर्म के धंधे को धार दोगे तथा उससे अर्जित संपत्ति पर मुझे बिना हील-हुज्जत किए ‘पर्याप्त ब्याज’ तो दोगे।
अब सिर्फ स्वीकृति में सिर हिलाओ और चलते बनो। मुंह से मेरे खिलाफ एक शब्द निकालने का मतलब तुम समझते ही हो, इसलिए समझदार बने रहो और मेरे छत्र की छाया में बने रहो।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
सोमवार, 1 फ़रवरी 2021
UP चुनाव 2022: RSS ने की मथुरा की 5 सीटों में से 3 पर प्रत्याशी बदलने की संस्तुति
मथुरा। भारतीय जनता पार्टी ने 2022 में होने वाले यूपी विधानसभा चुनावों की तैयारी पूरी शिद्दत के साथ अपनी पहचान के मुताबिक शुरू कर दी है।चूंकि ये चुनाव अगले साल के प्रथम चरण में ही प्रस्तावित हैं इसलिए भाजपा की पहल को जल्दबाजी नहीं माना जा सकता। हालांकि दूसरी पार्टियां फिलहाल मात्र गुणा-भाग लगाने तक सीमित हैं।
योगी आदित्यनाथ के पास यूपी की सत्ता बरकरार रखने के लिए एक ओर जहां भाजपा कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) भी उसमें सक्रिय भूमिका निभाने उतर चुका है।
बताया जाता है कि पिछले दिनों 4 दिवसीय प्रवास पर वृंदावन आए संघ प्रमुख मोहन भागवत ने मथुरा की सभी 5 विधानसभा सीटों का ‘फीडबैक’ लेने के बाद 3 विधानसभा सीटों पर प्रत्याशी बदलने की संस्तुति की है।
कौन-कौन सी सीट पर हैं कमजोर कड़ी
संघ से जुड़े सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार जिन 3 सीटों पर भाजपा से प्रत्याशी बदलने को कहा गया है उनमें से दो भाजपा के मूल प्रत्याशी हैं और एक आयातित भाजपायी हैं।
पार्टी सूत्रों ने इस संस्तुति की पुष्टि करते हुए बताया कि आयातित भाजपायी के बारे में संघ प्रमुख को काफी गंभीर शिकायतें मिली हैं जिनमें ‘भ्रष्टाचार’ तथा ‘चौथ वसूली’ जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं।
संघ को प्राप्त सूचना के अनुसार बड़े पैमाने पर निजी स्वार्थों की पूर्ति में लिप्त ये ‘माननीय’ अपने क्षेत्र की जनता के बीच सक्रिय नहीं रहते और अधिकांशत: शहर में पाए जाते हैं लिहाजा जनता इनसे आजिज़ आ चुकी है।
कॉकटेल कल्चर के आदी इन महानुभाव ने मौका देखकर भाजपा का दामन भले ही थाम लिया किंतु पुरानी आदतें नहीं छोड़ पा रहे और हर वक्त धनोपार्जन की जुगाड़ में लगे रहते हैं। इनकी इसी फितरत को पिछले कुछ समय में अच्छी-खासी शौहरत प्राप्त हुई है जो आगामी चुनाव में पार्टी के लिए मुसीबत खड़ी कर सकती है।
संघ की लिस्ट में दूसरे नकारा प्रत्याशी वो बताए गए हैं जो हैं तो मूल रूप से भाजपा के किंतु मतदाताओं के मन में उनके प्रति वर्ष-दर-वर्ष रोष बढ़ता जा रहा है। हो सकता है चुनाव का बिगुल बजते-बजते यह रोष विस्फोटक रूप धारण कर ले इसलिए संघ चाहता है कि समय रहते इनका विकल्प तलाश लिया जाए।
बड़ी जिम्मेदारी संभाल रहे इस प्रत्याशी को लेकर जनाक्रोश का अंदाज संघ को इस बात से भी लगा कि यह पार्टीजनों के बीच भी अपनी कोई साख बनाने में नाकाम रहे हैं और मात्र कुछ खास लोगों से घिरे रहते हैं।
जाहिर है कि पार्टी कार्यकर्ताओं को खुद से दूर रखने के कारण यह आम जनता से भी दूर हो चुके हैं, जिस कारण इन पर फिर से दांव लगाना भाजपा को भारी पड़ सकता है।
पहले ही स्थानीय भाजपाइयों पर थोपे गए इन ‘माननीय’ को नापसंद करने वालों की संख्या अब इतनी बढ़ गई है कि बड़े पद के बावजूद यह यहां बौने नजर आते हैं।
संघ को मिले फीडबैक के मुताबिक पार्टी को स्थानीय स्तर पर कई-कई गुटों में बांट देने का काम इन्होंने बखूबी पूरा किया है। ऐसे में यदि इन्हें एक मौका और दिया गया तो कोई आश्चर्य नहीं कि पार्टी की मथुरा की इकाई इस बार हाथ झटक कर खड़ी हो जाए।
भाई-भतीजे और भांजों से घिरे रहने वाले इन महाशय से पार्टी कार्यकर्ता अपने कामों के लिए भी मुलाकात करने को तरस जाते हैं, फिर आम आदमी की तो हैसियत ही क्या है जो इनसे मिल सके।
इसी प्रकार संघ ने एक तीसरे प्रत्याशी पर भी रिस्क न लेने की सलाह दी है। मूल रूप भाजपायी इन महाशय की ‘छवि’ पार्टी को नुकसान पहुंचा सकती है। इसलिए संघ का मानना है कि इनकी जगह जमीन से जुड़े किसी क्षेत्रीय युवा प्रत्याशी को इस मर्तबा मौका दिया जाए ताकि पार्टी की वर्षों पुरानी मुराद पूरी हो सके।
दरअसल, संघ ने अपनी संस्तुति में इस बात का भी खास ख्याल रखा है कि 2022 में प्रस्तावित चुनावों पर कृषि कानूनों से उपजी नाराजगी का कोई असर न हो।
संघ की सोच इस मायने में इसलिए अहम हो सकती है कि यूपी विधानसभा के चुनावों तक विपक्षी पार्टियां कृषि कानूनों को लेकर किसानों के मध्य फैलाए जा रहे भ्रम को बरकरार रखने की पूरी कोशिश करेंगी।
इन हालातों में भाजपा के वही प्रत्याशी उनकी काट हो सकते हैं जिनका न सिर्फ जनाधार मजबूत हो बल्कि वो ग्रामीण परिवेश से जुड़े हों और ग्रामीण मतदाता को अपनेपन का अहसास कराते हों।
संघ ने जिन 3 प्रत्याशियों को बदलने की संस्तुति की है, वो तीनों इस कसौटी पर खरे उतरते दिखाई नहीं देते। हो सकता है उनकी पृष्ठभूमि कभी ग्रामीण रही हो किंतु आज वह खेत, किसान, खलिहान या ग्रामीण जीवन से बहुत दूर दिखाई देते हैं।
- surendra chaturvedi
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