शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

मथुरा-वृंदावन में भी ब्‍याज पर लगा है आसाराम का करोड़ों रुपया

-रियल एस्‍टेट तथा सर्राफा कारोबार से जुड़े लोगों के पास है यह रुपया
-देशभर में 500 कारोबारियों को बांट रखा है आसाराम ने अपना पैसा
-सिर्फ ब्‍याज से है आसाराम की 300 करोड़ रुपए सालाना की आमदनी
Crores rupees of Asaram Bapu on interest in Mathura-Vrindavan नाबालिग से बलात्‍कार के आरोपी आसाराम बापू ने अपनी अकूत संपत्‍ति का एक हिस्‍सा देश के जिन शहरों में ब्‍याज पर उठा रखा है, उनमें मथुरा-वृंदावन भी शामिल हैं।
आसाराम बापू ने अन्‍य शहरों की तरह मथुरा-वृंदावन में भी अपना पैसा रियल एस्‍टेट तथा सर्राफा कारोबार से जुड़े लोगों को मोटी ब्‍याज पर दिया हुआ है।
यूं तो आसाराम ने अपने पैसे को ब्‍याज पर उठाने की जिम्‍मेदारी इंदौर (मध्‍य प्रदेश) निवासी चाय और रियल एस्टेट कारोबारी मोहन लुधियानी को सौंप रखी है जो आसाराम ट्रस्ट का भी पूरा कामकाज संभालता है किंतु मथुरा-वृंदावन में ब्‍याज पर दिए गए पैसों का जिम्‍मा कुछ स्‍थानीय लोगों ने भी ले रखा है। ये लोग आसाराम के तथाकथित भक्‍त बताए जाते हैं।
देशभर के करीब 500 बड़े कारोबारियों में से मथुरा-वृंदावन के कारोबारियों को भी आसाराम बापू द्वारा ब्‍याज पर करोड़ों रुपए दिए जाने का खुलासा मध्य प्रदेश के इंदौर में 16 जगहों पर चल रही इनकम टैक्‍स की जांच से हुआ है।
छापे से पता लगा है कि आसाराम ने अपनी करीब 10 हजार करोड़ रुपए की कुल संपत्‍ति में से करीब 1677 हजार करोड़ रुपए देशभर के कारोबारियों को ब्‍याज पर बांट रखे हैं जिनसे उसे लगभग 300 करोड़ रुपए की सालाना आमदनी होती है। हालांकि समाचार लिखे जाने तक छापामार कार्यवाही जारी थी लिहाजा कार्यवाही पूरी होने के बाद रकम का यह आंकड़ा बढ़ भी सकता है।
गौरतलब है कि दो साल पहले आसाराम की गिरफ्तारी के समय आसाराम के आश्रम से पुलिस को 42 बोरे दस्तावेज मिले थे। इन दस्‍तावेजों में किस-किस को कितना रुपया चलाने के लिए दिया है, इसका जिक्र था। इसके साथ ही पूरे देश में फैली प्रॉपर्टी की जानकारी भी दस्‍तावेजों में थी। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट अब इनकी जांच कर रहा है।
इंदौर में केशव नाचानी के यहां आयकर छापे से भी काफी दस्तावेज मिले थे। इनमें ब्लैक मनी के सबूत थे। इसी आधार पर सूरत की टीम ने दिल्ली इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के साथ मिलकर छापे की प्लानिंग बनाई।
इनकम टैक्‍स डिपार्टमेंट की टीम फिलहाल इंदौर में गुडरिक चाय कंपनी के मालिक लुधियानी और लुधियानी से जुड़े बिल्डर अनिल अग्रवाल, शशि भूषण खंडेलवाल, विजय अग्रवाल, तेजिंदर सिंह घुम्मन, निर्मल अग्रवाल, विष्णु गोविंद राम शर्मा, केशव नाचानी के यहां छापामार कार्यवाही कर रही है। इसके साथ ही घनश्यामदास एंड कंपनी, श्रुति स्नेक्स प्रालि, ओएसिस डेवलपर्स, श्रीराम बिल्डर्स, अपोलो रियल एस्टेट प्रालि, कोन्कोर्ड टी पैकिंग प्रालि, डिजिना रियल एस्टेट डेवलपर्स और जीएसएमटी रियल एस्टेट डेवलपर्स की भी जांच हो रही है। भोपाल में रविंद्र सिंह भाटेजा पर भी कार्यवाही जारी है। इंदौर-भोपाल के साथ ही इनकम टैक्स विभाग सूरत, बड़ौदा, अहमदाबाद, मुंबई, पुणे, कोलकाता, जयपुर और दिल्ली में भी कार्यवाही कर रहा है।
इनकम टैक्‍स विभाग से जुड़े सूत्रों की मानें तो इन बड़े शहरों के बाद मथुरा-वृंदावन जैसे धार्मिक स्‍थानों पर छापामार कार्यवाही की जायेगी और पता लगाया जायेगा कि आसाराम बापू का कितना रुपया यहां लगा है और किन-किन कारोबारियों पर है।
यह भी पता लगा है कि मथुरा-वृंदावन की तरह ही आसाराम बापू ने उत्‍तराखंड के कई धार्मिक शहरों में कारोबारियों को मोटा पैसा ब्‍याज पर दे रखा है।
उल्‍लेखनीय है कि राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्‍ली तथा एनसीआर से सटे होने और देश के प्रमुख धार्मिक स्‍थलों में शुमार होने की वजह से मथुरा-वृंदावन के रियल एस्‍टेट कारोबार में पिछले कुछ वर्षों के अंदर काफी उछाल आया है।
मथुरा-वृंदावन को प्रॉपर्टी में निवेश के लिहाज से भी काफी बेहतर माना जाता है और इसीलिए यहां रियल एस्‍टेट के नामचीन नाम अपने प्रोजेक्‍ट खड़े कर चुके हैं।
सैंकड़ों एकड़ में फैली इनकी कॉलोनियां और उनके अंदर दी जा रही सुविधाएं इस बात का सबूत हैं कि उनके निर्माण में तो मोटी लागत आती ही है, साथ ही खरीदार भी सामान्‍य व्‍यक्‍ति नहीं हो सकता।
यही नहीं, रियल एस्‍टेट के अरबों रुपए के इस कारोबार को स्‍थापित करने के लिए रियल एस्‍टेट कंपनियों को हर समय पैसों की जरूरत बनी रहती है और उन्‍हें यह पैसा आसाराम बापू जैसे धर्म के तथाकथित व्‍यापारियों से ही आसानी के साथ हासिल हो सकता है।
इन कारोबारियों को ब्‍याज पर पैसा देने वाला आसाराम बापू अकेला धार्मिक व्‍यापारी नहीं है। मथुरा-वृंदावन में अरबों रुपए लगाकर मठ, मंदिर व आश्रम बनाने वाले दूसरे सुनामधन्‍य तथाकथित साधु-संतों ने भी अपना तमाम रुपया रियल एस्‍टेट में लगा रखा है।
अब देखना यह है कि आसाराम के यहां इनकम टैक्‍स विभाग की छापामारी से खुली इस पोल का दायरा मथुरा-वृंदावन में कहां-कहां तक फैलता है और कौन-कौन उसके निशाने पर आता है।
सूत्रों की मानें तो इस छापामारी के बाद मथुरा-वृंदावन के कई सफेदपोश कारोबारियों के चेहरे बेनकाब होंगे क्‍योंकि आसाराम का अधिकांश पैसा काले धन की श्रेणी में आता है।
ऐसे में इन सफेदपोश कारोबारियों को आसाराम का पैसा ब्‍याज पर लेने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

आसाराम अब भी हर साल 300 करोड़ रुपए सिर्फ ब्‍याज से कमा रहा है


Asaramइंदौर। आसाराम भले ही जोधपुर जेल में बंद है लेकिन अब भी हर साल वह 300 करोड़ रुपए सिर्फ ब्‍याज से कमा रहा है। उसने करोड़ों रुपए बाजार में ब्‍याज पर बांट रखे हैं। इनकम टैक्स के छापे में यह बात सामने आई है। मध्य प्रदेश के इंदौर में 16 जगहों पर चल रही जांच में पता चला कि आसाराम के रुपए लोन के रूप में रियल एस्टेट और सर्राफा बाजार से लेकर कई धंधों में लगे हैं। इससे आसाराम को हर साल करीब 300 करोड़ रुपए का ब्याज मिल रहा है।
एक अनुमान के मुताबिक आसाराम की प्रॉपर्टी 10 हजार करोड़ रुपए की है। उसने देशभर के 500 बड़े कारोबारियों को 1677 करोड़ रुपए लोन पर दे रखे हैं। आसाराम नाबालिग से रेप का आरोपी है।
इनकम टैक्स के छापे से खुला राज
इंदौर में डाले गए छापे में मोहन लुधियानी और बाकी कारोबारियों से मिले दस्तावेजों से आसाराम द्वारा दिए गए लोन के सबूत मिले हैं। इनकम टैक्स की पूछताछ में कई लोगों ने कबूल कर लिया है कि वे ब्याज पर पैसा चला रहे हैं। चाय और रियल एस्टेट कारोबारी मोहन लुधियानी आसाराम ट्रस्ट का पूरा कामकाज संभालता है। वह गुरुकुल स्कूल में भी डायरेक्टर है।
सूत्रों के मुताबिक इसके यहां भी लोन के रूप में करोड़ों रुपए देने के सबूत मिले हैं। जांच में श्रीराम बिल्डर के यहां जमीन में दो करोड़ रुपए से ज्यादा गड़े मिले। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की यह जांच फिलहाल जारी है।
42 बोरों में मिले दस्तावेजों ने खोली पोल
दो साल पहले आसाराम की गिरफ्तारी के समय आश्रम से पुलिस को 42 बोरे दस्तावेज मिले थे। इसमें किस-किस को कितना रुपया चलाने के लिए दिया है, इसका जिक्र था। इसके साथ ही पूरे देश में फैली प्रॉपर्टी की जानकारी थी। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट द्वारा इनकी जांच की जा रही थी। इसी तरह कुछ साल पहले इंदौर के केशव नाचानी के यहां आयकर छापे में काफी दस्तावेज मिले थे। इसमें इस ब्लैक मनी के सबूत थे। इसी आधार पर सूरत की टीम ने दिल्ली इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के साथ मिलकर छापे की प्लानिंग बनाई।
कई शहरों में जारी है कार्यवाही
इंदौर में गुडरिक चाय कंपनी के मालिक लुधियानी और लुधियानी से जुड़े बिल्डर अनिल अग्रवाल, शशि भूषण खंडेलवाल, विजय अग्रवाल, तेजिंदर सिंह घुम्मन, निर्मल अग्रवाल, विष्णु गोविंद राम शर्मा, केशव नाचानी के यहां कार्यवाही आज भी जारी है। इसके साथ ही घनश्यामदास एंड कंपनी, श्रुति स्नेक्स प्रालि, ओएसिस डेवलपर्स, श्रीराम बिल्डर्स, अपोलो रियल एस्टेट प्रालि, कोन्कोर्ड टी पैकिंग प्रालि, डिजिना रियल एस्टेट डेवलपर्स और जीएसएमटी रियल एस्टेट डेवलपर्स की भी जांच हो रही है। भोपाल में रविंद्र सिंह भाटेजा पर भी कार्यवाही जारी है। इंदौर-भोपाल के साथ ही इनकम टैक्स सूरत, बड़ौदा, अहमदाबाद, मुंबई, पुणे, कोलकाता, जयपुर और दिल्ली में भी कार्यवाही कर रहा है।
कौन है आसाराम?
आसाराम का जन्म 17 अप्रैल 1941 को बिरानी नाम के गांव में हुआ था। ये गांव अब पाकिस्तान में आता है। बंटवारे के बाद आसाराम भी अपने परिवार के साथ भारत आ गया। इसके बाद वो शहर-दर-शहर घूमता रहा लेकिन पिता की मौत के बाद वो चाय बेचने का काम करने लगा। इस दौरान आसाराम ने पढ़ाई भी छोड़ दी। महज 15 साल की उम्र में वो घर से भाग कर एक आश्रम में चला गया था। किसी तरह उसके घर वाले उसे वापस घर लाए और शादी करा दी।
आसाराम की शादी लक्ष्मी देवी के साथ हुई है। इनके दो बच्चे नारायण और भारती हुए। नारायण पिता की तरह ही संत बन गया और भारती भी साध्वी का जीवन जीने लगी। नारायण साईं की शादी जानकी के साथ हुई लेकिन वह सास लक्ष्मी के साथ अहमदाबाद के महिला आश्रम में रहकर उनकी देखभाल करती रही। शादी के पंडाल में आसाराम की घोषणा के बाद ही नारायण पांच साल तक ब्रह्मचर्य का पालन करने चला गया। इस बीच जानकी ने नारायण पर लड़कियों के साथ घूमने के आरोप भी लगाए। एमए कर चुकी आसाराम की बेटी की शादी हेमंत नाम के लड़के के साथ हुई लेकिन कुछ समय बाद इनका तलाक हो गया।
कई नामी वकील लड़ रहे हैं आसाराम का केस
डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी, राम जेठमलानी, सलमान खुर्शीद और केटीएस तुलसी सहित देश के कई जाने-माने वकील आसाराम की पैरवी कर चुके हैं।
दो साल से जेल में बंद है आसाराम
जेल में बंद हुए आसाराम बापू को दो साल हो गए हैं। आसाराम ने इस दौरान कई बार जमानत की अर्जी लगाई लेकिन वो खारिज हो गई।
हाल ही में जेल से जमानत पर छूट कर आए एक नेता ने बताया कि आसाराम को उसके पास की ही बैरक में रखा गया था। इस नेता के अनुसार रेप जैसे संगीन मामलों में कैसे सलाखों से बाहर आया जा सकता है, इसकी चर्चा भी जेल में बंद कैदियों के साथ आसाराम करता रहता है। उसके कपड़े बाहर से धुलकर आते हैं। उसे अपनी बैरक के बाहर टहलने की आज़ादी है लेकिन हिंसक प्रवृत्ति के कैदियों की बैरक के पास नहीं जाने दिया जाता। उसकी बैरक के अंदर सीसीटीवी कैमरे लगे हैं, इसी कारण उसे सोने के लिए पलंग नहीं दिया जाता है लेकिन अच्छा मोटा और आरामदायक गद्दा जरूर दे रखा है।

आत्‍मप्रशंसा से अभिभूत समाजवादी सरकार

इधर उत्‍तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों के लिए अब दो साल से भी कम समय बचा है और उधर अखिलेश यादव के नेतृत्‍व वाली समाजवादी कुनबे की सरकार अपनी आत्‍मप्रशंसा से अभिभूत है। वो उस कहावत को सिद्ध कर रही है कि दीपक जब बुझने को होता है तब ज्‍यादा रोशनी देता है।
अखिलेश यादव पर भरोसा करके जनता ने समाजवादी पार्टी को स्‍पष्‍ट बहुमत इस उम्‍मीद में दिया था कि एक ऊर्जावान युवा नेता संभवत: सूबे की सूरत बदल देगा और उत्‍तर प्रदेश की गिनती देश के उत्‍तम प्रदेशों में होने लगेगी किंतु अखिलेश यादव ने साबित कर दिया कि न तो हर चमकने वाली चीज सोना होती है तथा ना ही हर युवा ऊर्जावान हो सकता है।
आज उत्‍तर प्रदेश के हालात बद से बदतर हो चुके हैं। बात चाहे कानून-व्‍यवस्‍था की हो या फिर बिजली-पानी व सड़क आदि की। भ्रष्‍टाचार की हो अथवा औद्योगिक विकास की, रोजी-रोजगार की हो या व्‍यापार की, हर मायने में सरकार पूरी तरह फेल है और समाजवादी कुनबे को चुहलबाजी सूझ रही है।
सार्वजनिक मंचों से कभी समाजवादी कुनबे के भीष्‍मपितामह मुलायम सिंह यादव कहते हैं कि अखिलेश ब्‍यूराक्रेसी को हेंडिल करना नहीं जानते तो कभी कहते हैं कि उन्‍हें 100 में से 100 नंबर दिये जा सकते हैं।
एक पल कहते हैं कि यदि आज चुनाव हो जाएं तो हम फिर सत्‍ता में नहीं आ सकते तो दूसरे पल अपने मंत्रियों और पदाधिकारियों की फौज से पूछते हैं कि जितवा तो दोगे ना।
मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव के चचा शिवपाल यादव अधिकारियों को लेकर उन पर सार्वजनिक मंच से कटाक्ष करते हैं तो वहीं मुख्‍यमंत्री उन्‍हें जवाब देते हैं कि अब मुझे अधिकारियों को चलाना आ गया है।
तू मेरी पीठ खुजा, मैं तेरी खुजा देता हूं कि तर्ज पर पूरा समाजवादी कुनबा कभी आत्‍मप्रशंसा में मुग्‍ध हो जाता है तो कभी 2017 को याद करके अपने अंदर बैठे भय को दूर करने की कोशिश करता प्रतीत होता है।
पूरा प्रदेश बिजली की भारी किल्‍लत और कानून-व्‍यवस्‍था की बदहाली से त्रस्‍त है लेकिन समाजवादी कुनबा ”जो दिन कटें आनंद में जीवन कौ फल सोई…को चरितार्थ कर रहा है। जिनकी जुबान तक साफ नहीं है, वह नदियां साफ करने की बात कर रहे हैं। मुलायम से लेकर अखिलेश तक के बयानों को टीवी चैनल वाले अब लिखकर देने लगे हैं क्‍योंकि वह क्‍या बोल गए…इसका सिर्फ अंदाज ही लगाया जा सकता है। सुन पाना संभव नहीं है।
अखिलेश सरकार बिना कुछ सोचे-समझे भ्रष्‍टाचार का पर्याय बन चुके यादव सिंह की सुप्रीम कोर्ट में पैरवी कर रही है और सरकारी नौकरियों में यादवों की भर्ती करके सरकार का स्‍थाई रूप से यादवीकरण करने में लगी है।
कभी-कभी ऐसा लगता है कि समाजवादी कुनबे का बुझता हुआ दीपक इस प्रयास में है कि यादव सिंह जैसों को बचाकर तथा यादवों की अधिक से अधिक भर्ती करके कानून के शिकंजे से बच पाने का बेशक असफल ही सही किंतु आखिरी प्रयास कर लिया जाए। यूं भी कहते हैं पहलवानों का बुढ़ापा बड़ा कष्‍टप्रद होता है। मुलायम सिंह ने बड़ी अखाड़ेबाजी की है और अब भी अखाड़ा खोदने से बाज नहीं आ रहे। कहीं ऐसा न हो कि उनकी यही अखाड़ेबाजी उनके साथ-साथ पूरे कुनबे को ले डूबे।
नि:संदेह यादव सिंह की तूती माया सरकार में भी बोलती रही और जैसे-जैसे यादव सिंह पर सीबीआई का शिकंजा कसेगा, वैसे-वैसे मायावती की मायावी दुनिया का सच भी सामने आयेगा लेकिन समाजवादी कुनबे के भी बच पाने की उम्‍मीद कम ही है।
यादव सिंह की सही तरीके से जांच हो जाती है तो तय मानिए कि धुर-विरोधी माया-मुलायम एक ही जगह दिखाई देंगे। वो जगह कौन सी हो सकती है, इसका अंदाज लगाना कोई बहुत मुश्‍किल काम नहीं है।
फिलहाल सूबे की सत्‍ता पर काबिज समाजवादी कुनबा अपनी शान में कसीदे पढ़ता रहे या चुहलबाजी में मशगूल रहे परंतु इतना तय है कि जनता सब देख भी रही है और सुन भी रही है।
उसे पैर पटकते-पटकते जैसे तीन साल से ऊपर का समय बीत गया वैसे ही बाकी करीब दो साल भी काट लेगी लेकिन 2017 के चुनाव निश्‍चित ही अपना अंदाज कुछ अलग ही बयां करेंगे क्‍योंकि अति हर चीज की बुरी होती है। नशा चाहे सत्‍ता का हो या बोतल का, उतना ही करना चाहिए जितना खुद को झिल जाए और जिससे कोई दूसरा प्रभावित न हो। जब नशा सिर चढ़कर बोलने लगता है और दूसरों को प्रभावित करता है तो नागरिक ऐसा अभिनंदन करते हैं कि उसकी गूंज कई दशकों तक सुनाई देती है। कई बार तो उसकी गूंज में कई-कई पीढ़ियों दबकर रह जाती है।
-लीजेंड न्‍यूज़

बुधवार, 26 अगस्त 2015

मथुरा की कानून-व्‍यवस्‍था भी ”समाजवादी”

यूं तो समूचे सूबे में कानून-व्‍यवस्‍था की बदहाली के उदाहरण हर रोज सामने आते हैं लेकिन यदि बात करें सिर्फ विश्‍व विख्‍यात धार्मिक जनपद मथुरा की तो ऐसा लगता है कि यहां कानून-व्‍यवस्‍था भी ”समाजवादी” हो गई है।मसलन…जाकी रही भावना जैसी। जिसे अच्‍छी समझनी हो, वो अच्‍छी समझ ले और जिसे बदहाल समझनी हो, वो बदहाल समझ ले। इस मामले में अभिव्‍यक्‍ति की पूरी स्‍वतंत्रता है।
वैसे आम आदमी जो न समाजवादी है और न बहुजन समाजी है, न कांग्रेसी है और न भाजपायी है, न रालोद का वोटर है और न वामपंथी है…उसके अनुसार यहां कानून-व्‍यवस्‍था अब केवल एक ऐसा मुहावरा है जिसका इस्‍तेमाल अधिकारीगण अपनी सुविधा अनुसार करते रहते हैं।
कृष्‍ण की जन्‍मस्‍थली में तैनात होने वाले अधिकारियों को यह सुविधा स्‍वत: सुलभ हो जाती है क्‍योंकि यहां नेता और पत्रकार केवल दर्शनीय हुंडी की तरह हैं। अधिकांश नेता और पत्रकारों का मूल कर्म दलाली और मूल धर्म चापलूसी बन चुका है।
चोरी, डकैती, हत्‍या, लूट, बलात्‍कार, बलवा जैसे तमाम अपराध हर दिन होने के बावजूद मथुरा के नेता और पत्रकार अपने मूल कर्म व मूल धर्म को निभाना नहीं भूलते।
कहने को यहां सत्‍ताधारी समाजवादी पार्टी की एक जिला इकाई भी है और उसके पदाधिकारी भी हैं लेकिन उनका कानून-व्‍यवस्‍था से दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं।
दरअसल वो कन्‍फ्यूज हैं कि कानून-व्‍यवस्‍था के मामले में किसकी परिभाषा को उचित मानकर चलें।
जैसे प्रदेश पुलिस के मुखिया कहते हैं कि कानून-व्‍यवस्‍था नि:संदेह संतोषजनक नहीं है। पार्टी के मुखिया का भी यही मत है। वो कहते हैं कि यदि आज की तारीख में चुनाव हो जाएं तो पार्टी निश्‍चित हार जायेगी। उनके लघु भ्राता प्रोफेसर रामगोपाल की मानें तो स्‍थिति इतनी बुरी भी नहीं है जितनी प्रचारित की जा रही है। जबकि ”लिखा-पढ़ी” में मुख्‍यमंत्री पद संभाले बैठे अखिलेश यादव का कहना है कि उत्‍तर प्रदेश की कानून-व्‍यवस्‍था उत्‍तम है और यहां का पुलिस-प्रशासन बहुत अच्‍छा काम कर रहा है। दूसरे राज्‍यों से तो बहुत ही बेहतर परफॉरमेंस है उसकी।
ऐसे में किसकी परिभाषा को सही माना जाए और किसे गलत साबित किया जाए, यह एक बड़ी समस्‍या है।
मथुरा में एक पूर्व मंत्री के घर चोरी होती है तो कहा जाता है कि सुरक्षा बढ़वाने के लिए ऐसा प्रचार किया गया है। व्‍यापारी के यहां डकैती पड़ती है तो बता दिया जाता है कि पुराने परिचित ने डाली है। समय मिलने दो, पकड़ भी लेंगे। हाईवे पर वारदात होती है तो अगली वारदात का इंतजार इसलिए करना पड़ता है जिससे पता लग सके कि अपराधियों की कार्यप्रणाली है क्‍या। वो हरियाणा से आये थे या राजस्‍थान से। यह भी संभव है कि उनका राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र से सीधा कनैक्‍शन हो।
हां, इस बीच कुछ उचक्‍के टाइप के बदमाश पकड़ कर गुड वर्क कर लिया जाता है जिसे स्‍थानीय मीडिया पूरा कवरेज देकर साबित कर देता है कि मथुरा का पुलिस-प्रशासन निठल्‍ला चिंतन नहीं कर रहा। साथ में काम भी कर रहा है। एक्‍टिव है।
थोड़े ही दिन पहले की बात है जब मथुरा पुलिस की स्‍वाट टीम का बड़ा कारनामा जाहिर हुआ। बिना काम किए वैसा कारनामा कर पाना संभव था क्‍या।
स्‍वाट टीम के कारनामे ने साबित कर दिया कि वह दिन-रात काम कर रही है। यह बात अलग है कि वह काम किसके लिए और क्‍यों कर रही है। इस बात का जवाब देना न स्‍वाट टीम के लिए जरूरी है और न उनके लिए जिनके मातहत वह काम करती है। जांच चल रही है…नतीजा निकलेगा तो बता दिया जायेगा। नहीं निकला तो आगे देखा जायेगा।
आज यहां एसएसपी डॉ. राकेश सिंह हैं, इनसे पहले मंजिल सैनी थीं। उनसे भी पहले नितिन तिवारी थे। अधिकारी आते-जाते रहते हैं, कानून-व्‍यवस्‍था जस की तस रहती है। अधिकारी अस्‍थाई हैं, कानून-व्‍यवस्‍था स्‍थाई है।
मथुरा में हर अधिकारी सेवाभाव के साथ आता है। कृष्‍ण की पावन जन्‍मभूमि पर मिली तैनाती से वह धन्‍य हो जाता है। उसे समस्‍त ब्रजवासियों और ब्रजभूमि में आने वाले लोगों के अंदर कृष्‍णावतार दिखाई देने लगता है।
कृष्‍णावतार पर कानून का उपयोग करके वह इहिलोक और परलोक नहीं बिगाड़ना चाहता। बकौल मुलायम सिंह कृष्‍ण भी तो समाजवादी थे। यादव थे…इसका मतलब समाजवादी थे।
यहां कहा भी जाता है कि सभी भूमि गोपाल की। जब सब गोपाल का है तो गोपालाओं का क्‍या दोष। वह तो समाजवादी कानून के हिसाब से ही चलेंगे ना।
कृष्‍ण की भूमि पर तैनाती पाकर उसकी भक्‍ति में लीन अधिकारी इस सत्‍य से वाकिफ हो जाते हैं कि एक होता है कानून…और एक होता है समाजवादी कानून।
समाजवादी कानून सबको बराबरी का दर्जा देता है। लुटने वाले को भी और लूटने वाले को भी। पिटने वाले को भी और पीटने वाले को भी।
कागजी घोड़े सदा दौड़ते रहे हैं और सदा दौड़ते रहेंगे। बाकी अदालतें हैं न। वो भी तो देखेंगी कि कानून क्‍या है और व्‍यवस्‍था क्‍या है। कानून समाजवादी है और व्‍यवस्‍था मुलायमवादी है। चार लोग रेप नहीं कर सकते, इस सत्‍य से पर्दा हर कोई नहीं उठा सकता। पता नहीं ये गैंगरेप जैसा घिनौना शब्‍द किस मूर्ख ने ईजाद किया और किसने कानून का जामा पहना दिया।
उत्‍तर प्रदेश ऐसे कानून को स्‍वीकार नहीं करता। नेताजी को रेप स्‍वीकार है, रेपिस्‍ट स्‍वीकार हैं…गलती हो जाती है किंतु गैंगरेप स्‍वीकार नहीं क्‍योंकि वह गलती से भी नहीं किया जा सकता। संभव ही नहीं है।
ठीक उसी तरह जैसे कानून-व्‍यवस्‍था की बदहाली संभव नहीं है। वह कुछ गैर समाजवादी विरोधी दलों के दिमाग की उपज है। उनके द्वारा किया जाने वाला दुष्‍प्रचार है।
कानून-व्‍यवस्‍था कैसे बदहाल हो सकती है। वो बदहाल कर तो सकती है, खुद बदहाल हो नहीं सकती।
-लीजेंड न्‍यूज़

शनिवार, 8 अगस्त 2015

यक्ष प्रश्‍नों का भी कुछ कीजिए राजा युधिष्‍ठिर!

यक्ष प्रश्नों का जहाँ पहरा कड़ा हो,
जिस सरोवर के किनारे
भय खड़ा हो,
उस जलाशय का न पानी पीजिए
राजा युधिष्ठिर।
बंद पानी में
बड़ा आक्रोश होता,
पी अगर ले, आदमी बेहोश होता,
प्यास आख़िर प्यास है, सह लीजिए,
राजा युधिष्ठिर।
जो विकारी वासनाएँ कस न पाए,
मुश्किलों में
जो कभी भी हँस न पाए,
कामनाओं को तिलांजलि दीजिए
राजा युधिष्ठिर।
प्यास जब सातों समंदर
लांघ जाए,
यक्ष किन्नर देव नर सबको हराए,
का-पुरुष बन कर जिए
तो क्या जिए?
राजा युधिष्ठिर।
पी गई यह प्यास शोणित की नदी को,
गालियाँ क्या दें व्यवस्था बेतुकी को,
इस तरह की प्यास का कुछ कीजिए
राजा युधिष्ठिर।

मथुरा में जन्‍मे और इसी वर्ष 11 फरवरी 2015 को ‘नि:शब्‍द’ हुए डा. विष्‍णु विराट ने यह कविता पता नहीं कब लिखी थी और किस उद्देश्‍य के साथ लिखी थी, यह तो कहना मुश्‍किल है अलबत्‍ता इत्‍तिफाक देखिए कि वर्तमान दौर में उनकी यह कविता व्‍यवस्‍था पर किस कदर गहरी चोट करती है जैसे लगता है कि भविष्‍य को वह अपनी मृत्‍यु से पहले ही रेखांकित कर गये हों।

धर्मराज युधिष्‍ठिर को केंद्र में रखकर लिखी गई इस कविता की तरह आज हमारा देश भी तमाम यक्ष प्रश्‍नों के पहरे में घुटकर रह गया है। स्‍वतंत्रता पाने के 67 सालों बाद भी आमजन भयभीत है। वह डरा हुआ है न केवल खुद को लेकर बल्‍कि देश के भी भविष्‍य को लेकर क्‍योंकि देश का भविष्‍य स्‍वर्णिम दिखाई देगा तभी तो उसका अपना भविष्‍य उज्‍ज्‍वल नजर आयेगा।
अभी तो हाल यह है कि सत्‍ताएं बदलती हैं। सत्‍ताओं के साथ कुछ चेहरे भी बदलते हैं लेकिन नहीं बदलती तो वो व्‍यवस्‍था जिसकी उम्‍मीद में चुनाव दर चुनाव आम आदमी अपने मताधिकार का इस्‍तेमाल करता है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि चुप्‍पी चाहे सत्‍ता के शिखर पर बैठे लोगों की हो या फिर जमीन से चिपके हुए आमजन की, होती बहुत महत्‍वपूर्ण है। हर तूफान से पहले प्रकृति शायद इसीलिए खामोशी ओढ़ लेती है।
2014 में हुए लोकसभा चुनावों के बाद आज जिस तरह की खामोशी समूचे राजनीतिक वातावरण में व्‍याप्‍त है, वह भयावह है। भयावह इसलिए कि ऊपरी तौर पर भरपूर कोलाहल सुनाई पड़ रहा है, संसद का मानसून सत्र हंगामे की भेंट चढ़ने जा रहा है। शीतकालीन सत्र पर भी अभी से आशंकाओं के बादल मंडराने लगे हैं किंतु सारे कोलाहल और हंगामे के बीच कहीं से कोई उत्‍तर नहीं मिल रहा। कोई समाधान नहीं सूझ रहा लिहाजा देश जैसे ठहर गया है। अगर कोई चाप सुनाई भी देती है तो सिर्फ रेंगने की, उसमें कहीं कोई गति नहीं है। सिर्फ दुर्गति है।
आमजन खुद को हर बार ठगा हुआ और अभिशप्‍त पाता है। उसे समझ में नहीं आता कि राजनीतिक कुतर्कों के बीच वह अपने तर्क किसके सामने रखे और कैसे व कब रखे। जिस वोट की ताकत पर वह सत्‍ता बदलने का माद्दा रखता है, वह ताकत भी बेमानी तथा निरर्थक प्रतीत होती है।
आमजन अब भी भूखा है, अब भी प्‍यासा है लेकिन राजनीति व राजनेताओं की भूख और प्‍यास हवस में तब्‍दील हो चुकी है। नीति व नैतिकता केवल किताबी शब्‍द बनकर रह गए हैं।
अब कोई राजा युधिष्‍ठिर अपनी कामनाओं, अपनी वासनाओं को तिलांजलि देने के लिए तैयार ही नहीं है। लगता है कि 21 वीं सदी में किसी और महाभारत की पटकथा तैयार हो रही है।
राजनेताओं की प्‍यास सातों समंदर लांघ रही है। यक्ष, किन्नर, देव, नर सबको हरा रही है। का-पुरुष बनकर जीने से किसी को परहेज नहीं रहा। आमजन की उम्‍मीद के सारे स्‍त्रोत सूखते दिखाई देते हैं। कहने को लोकतंत्र है परंतु आमजन जितना परतंत्र 67 साल पहले था, उतना ही परतंत्र आज भी है। व्‍यवस्‍था के तीनों संवैधानिक स्‍तंभ विधायिका, न्‍यायपालिका तथा कार्यपालिका…और कथित चौथा स्‍तंभ पत्रकारिता भी किसी अंधी सुरंग में तब्‍दील हो चुके हैं। यहां रौशनी की कोई किरण कभी दिखाई देती भी है तो सामर्थ्‍यवान को दिखाई देती है। असमर्थ व्‍यक्‍ति असहाय है। उसकी पीड़ा तक को व्‍यावसायिक या फिर निजी स्‍वार्थों की तराजू में तोलने के बाद महसूस करने का उपक्रम किया जाता है। वह लाभ पहुंचा सकती है तो ठीक अन्‍यथा नक्‍कारखाने में बहुत सी तूतियां समय-समय पर चीखकर स्‍वत: खामोश हो लेती हैं।
जिस न्‍यायपालिका से किसी भी आमजन की अंतिम आस बंधी होती है, वह न्‍यायपालिका खुद इतने बंधनों और किंतु-परंतुओं में उलझती जा रही है कि उसे खुद अब एक दिशा की दरकार है। सवाल बड़ा यह है कि दिग्‍दर्शक को दिशा दिखाए तो दिखाये कौन?
टकराव के हालात मात्र राजनीति तक शेष नहीं रहे, वह उस मुकाम तक जा पहुंचे हैं जहां से पूरी व्‍यवस्‍था के चरमराने का खतरा मंडराने लगा है। न्‍याय के इंतजार में कोई थक-हार कर बैठ जाता है तो कोई हताश होकर वहां टकटकी लगाकर देखने लगता है, जहां कहते हैं कि कोई परमात्‍मा विराजमान है। वास्‍तव का परमात्‍मा। जिसे लोगों ने अपनी सुविधा से अलग-अलग नाम और अलग-अलग काम दे रखे हैं।
कहते हैं वह ऊपर बैठा-बैठा सबको देखता है, सबकी सुनता है लेकिन कब देखता है और कब सुनता है, इसका पता न सुनाने वाले को लगता है और न टकटकी लगाकर देखने वालों को।
हालात तो कुछ ऐसा बयां करते हैं जैसे 21 वीं सदी का आमजन ही ऊपर वाले को देख रहा है। देख रहा है कि वह कब और कैसे महाभारत में कहे गये अपने शब्‍दों को साकार करने आता है।
कहते हैं कि उसे भी निराकार से साकार होने के लिए किसी आकार की जरूरत पड़ती है।
तो क्‍या हमारी व्‍यवस्‍था भी कोई आकार ले रही है। इस बेतुकी व्‍यवस्‍था से ही कोई तुक निकलेगा और वह सबको तृप्‍त करने का उपाय करने में सक्षम होगा?
कुछ पता नहीं…लेकिन डॉ. विष्‍णु विराट सही लिखते हैं कि-
पी गई यह प्यास शोणित की नदी को,
गालियाँ क्या दें व्यवस्था बेतुकी को,
इस तरह की प्यास का कुछ कीजिए
राजा युधिष्ठिर।
यक्ष प्रश्‍नों का जवाब दिए बिना…ठहरे हुए सरोवर से प्‍यास बुझाने के लिए बाध्‍य असहायों को राजा युधिष्‍ठिर कब उत्‍तर देकर पुनर्जीवित करते हैं, यह भी अपने आप में एक यक्ष प्रश्‍न बन चुका है। नई व्‍यवस्‍था के नए राजा युधिष्‍ठिर के लिए नए यक्ष प्रश्‍न।
ऐसे-ऐसे यक्ष प्रश्‍न जिनके उत्‍तर अब शायद इस युग के राजा युधिष्‍ठिर को भी तलाशने पड़ रहे हैं।
इधर यक्ष प्रश्‍नों को भी उत्‍तर का इंतजार है राजा युधिष्‍ठिर!
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

मंगलवार, 4 अगस्त 2015

संसद में सियार ?

क्‍या भारतीय संसद में सियार भी घुस आए हैं?
क्‍या सदन में अब सियारों का ऐसा झुण्‍ड सक्रिय है जिसकी आवाज़ के सामने दूसरी सारी आवाजें दबकर रह गई हैं?
लगता तो ऐसा ही है क्‍यों कि संसद भवन से इन दिनों सिर्फ हू-हू की आवाजें आ रही हैं। बाकी आवाजें तो कहीं खो सी गई हैं।
हंगामा क्‍यूं बरपा है, नेताओं के अलावा किसी की समझ में नहीं आ रहा। हंगामे के जो कारण सामने आ रहे हैं, वो बेमानी नजर आते हैं।
कम से कम इतने मायने तो नहीं रखते कि संसद का पूरा सत्र ही हंगामे की भेंट चढ़ा दिया जाए।
बहरहाल, लोकसभा अध्‍यक्ष द्वारा 25 कांग्रेसी सदस्‍यों को 5 दिन के लिए निलंबित कर दिए जाने के बाद अब लगभग यह तय है कि संसद का मानसून सत्र यूं ही हंगामे की भेंट चढ़ने वाला है।
एक अनुमान के अनुसार सत्र के साथ लोकसभा और राज्‍यसभा में चल रहे इस हंगामे की भेंट जनता की गाढ़ी कमाई का करीब 250 करोड़ रुपया भी चढ़ जायेगा। ये वो आंकड़ा है जो संसद की कार्यवाही पर प्रतिघंटे आने वाले खर्च का जोड़ है।
दलगत राजनीति से इतर जो लोग आम आदमी की परिभाषा के दायरे में आते हैं उन्‍हें समझ में नहीं आ रहा कि इस स्‍थिति के लिए दोष किसे दें। भारी बहुमत देकर सत्‍ता पर बैठाई गई भारतीय जनता पार्टी व उसके सहयोगी दलों को अथवा कांग्रेस या कुकरमुत्‍तों की तरह उग आई उन दूसरी पार्टियों को जो दो-दो, चार-चार सदस्‍यों के बल पर विपक्षी दल तो कहलाती ही हैं।
आरोप-प्रत्‍यारोप का हाल यह है कि सत्‍तापक्ष और विपक्ष दोनों संसद बाधित करने के लिए एक-दूसरे को जिम्‍मेदार ठहरा रहे हैं।
कांग्रेस का कुतर्क है- चूंकि यूपीए की सरकार में भाजपा ने संसद नहीं चलने दी थी इसलिए अब हम उसी का अनुसरण करके क्‍या गलत कर रहे हैं। भाजपा कहती है कि तब स्‍थितियां और थीं। हजारों नहीं, लाखों करोड़ रुपए के घोटाले हुए और उनमें कांग्रेसी मंत्रियों की संलिप्‍तता प्रथम दृष्‍ट्या साबित हो रही थी लिहाजा उस स्‍थिति की तुलना आज की स्‍थितियों से किया जाना किसी तरह सही नहीं है।
ललित मोदी को कथित सहयोग के मुद्दे पर सुषमा स्‍वराज और वसुंधरा राजे के ऊपर लगाये जा रहे आरोप बेबुनियाद हैं और इसीलिए कांग्रेस बहस से भाग रही है।
दरअसल पिछले कुछ वर्षों से राजनीतिक दलों ने आरोप-प्रत्‍यारोप की एक नई परंपरा ईजाद की है। इस परंपरा के तहत किया यही जाता है जो आज कांग्रेस कर रही है।
यूपीए की सरकार में हुए घोटालों का जवाब यह कहकर दिया जाता था कि एनडीए की सरकार में भी यह सब हुआ था। बात चाहे लाखों करोड़ के कोयला घोटाले की रही हो अथवा 2जी घोटाले और कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स में हुए घोटालों की। घोटालों का जवाब घोटालों से देने की इस नई परंपरा का ही नतीजा है कि आज संसद ठप्‍प है और तमाम बिल लटके पड़े हैं।
उत्‍तर प्रदेश के जनपद गोंडा अंतर्गत गांव परसपुर में जन्‍मे एक क्रांतिकारी कवि हुए हैं जिन्‍हें ‘अदम गोंडवी’ के नाम से जाना जाता है।
अदम गोंडवी का न तो कभी ज्‍योतिष विद्या से कोई संबंध रहा और ना उन्‍होंने कोई भविष्‍यवाणी की, उन्‍होंने तो बस जुबानी जमा खर्च किया। किंतु उनका ये जुबानी जमाखर्च इत्‍तफाखन आज की राजनीति और राजनेताओं पर इतना ज्‍यादा सटीक बैठता है कि लगता है जैसे वह भविष्‍य को बखूबी भांप चुके थे।
देश को स्‍वतंत्रता मिलने के मात्र दो महीने बाद पैदा हुए अदम गोंडवी सन् 2011 तक जीवित रहे परंतु इस बीच उन्‍होंने इतना कुछ कह डाला कि जिसे कहने को शताब्‍दियां भी कम पड़ सकती हैं।
राजनीति और राजनेता उनके निशाने पर हमेशा रहे क्‍योंकि उन्‍होंने एक ऐसा जीवन जिया जो देश के कर्णधारों की कथनी और करनी के भेद को न सिर्फ कदम-कदम पर भुगतता है बल्‍कि उसके बीच बुरी तरह पिसता भी है। वह खुद भुक्‍तभोगी थे इसलिए उनकी तल्‍खी रचनाओं का हिस्‍सा बन जाती थी।
एक जगह उन्‍होंने लिखा है-
कितना प्रतिगामी रहा भोगे हुए क्षण का इतिहास।
त्रासदी, कुंठा, घुटन, संत्रास लेकर क्‍या करें।।
अदम गोंडवी के पास शब्‍द थे किंतु देश की एक बड़ी आबादी नि:शब्‍द है। क्‍या बोले और किससे बोले। उनसे जिन्‍हें पूरा एक दशक दिया शासन चलाने को या उनसे जिन्‍हें ऐतिहासिक बहुमत देकर काबिज कराया यह सोचकर कि शायद अब अच्‍छे दिन देखने को मिल जाएं।
अदम गोंडवी ने सही खाका खींचा था उस भारत मां का जिसे उसकी अपनी औलादें लज्‍जित करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रहीं।
उन्‍होंने लिखा था-
मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की।
यह समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की।।
आप कहते हैं इसे जिस देश का स्वर्णिम अतीत।
वो कहानी है महज़ प्रतिरोध की, संत्रास की।।
यक्ष प्रश्नों में उलझ कर रह गई बूढ़ी सदी।
ये परीक्षा की घड़ी है क्या हमारे व्यास की?
भारत माँ की एक तस्वीर मैंने यूँ बनाई है।
बँधी है एक बेबस गाय खूँटे में कसाई के।।
इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का।
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है।।
हाल ही में पंजाब के गुरदासपुर में आतंकी हमला हुआ। यह न तो कोई पहला हमला था और न इसे आखिरी माना जा सकता है। बावजूद इसके सो-कॉल्‍ड बुद्धिजीवियों का एक बड़ा तबका 1993 के मुंबई बम धमाकों के आरोपी याकूब मेमन की फांसी पर विलाप करता रहा। उसे मृत्‍युदण्‍ड से बचाने का हरसंभव प्रयास करता रहा।
पता नहीं गोंडवी ने कितने दिन पहले लिखा था यह सब कि-
कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले।
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है।।
लेकिन आज भी हालात जस के तस हैं। कोई अंतर नजर नहीं आता। फिर चाहे मसला बाहरी सुरक्षा का हो या आंतरिक सुरक्षा का।
देश में औरतों की इज्‍जत इस कदर सस्‍ती हो गई है कि हर दिन उससे जुड़ी खबरें शीर्ष पर होती हैं। कहा यह जाता है कि अब यह सब बहुत बढ़ गया है परंतु अदम गोंडवी की कविता तो कुछ और कहती है। वह बताती है कि आज बेशक औरतों की इज्‍जत को भी सियासी नफे-नुकसान का हिस्‍सा बना दिया गया हो और इसलिए उस पर भरपूर सियासत की जा रही हो लेकिन हालात इस मामले में भी पहले कोई बहुत अच्‍छे नहीं रहे।
गोंडवी की ये दो लाइनें साफ करती हैं-
आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में।
क्या पता उसको कि कोई भेड़िया है घात में।।
अदम गोंडवी को दुनिया से कूच किये साढ़े तीन साल हो गए, और कितने ऐसे अदम गोंडवी और कूच कर जायेंगे जो स्‍वतंत्रता के 67 सालों बाद भी सच्‍ची स्‍वतंत्रता का ख्‍वाब मन में संजोए बैठे हैं।
इसी 27 जुलाई को देश के पूर्व राष्‍ट्रपति एपीजे अब्‍दुल कलाम उसी दिन हुए गुरदासपुर आतंकी हमले तथा संसद की कार्यवाही न चलने की चिंता लिए दुनिया छोड़ गए लेकिन न सत्‍तापक्ष ने अपनी जिद छोड़ी न विपक्ष ने। संसद उनके रहते भी ठप्‍प पड़ी थी और उनके जाने के बाद भी ठप्‍प पड़ी है। कहने को राष्‍ट्रीय शोक है किंतु सच तो यह है कि ‘शोक’ मनाने की परंपराएं भी अब ‘शौक’ पूरे करने के काम आती हैं। मानसून सत्र संसद बाधित करने का शौक पूरा करने के काम आ रहा है। जनहित के नाम पर पूरा किये जाने वाले इस शौक से यदि निजी हित साधे जाते हैं तो इसमें कोई बुराई नजर नहीं आती। आखिर जनप्रतिनिधि भी जनहित की आड़ नहीं लेंगे तो कौन लेगा जबकि उन्‍हें तो जनता ने चुना ही इसलिए है।
संविधान की रचना करने वालों ने शायद ही कभी कल्‍पना की हो कि संविधान में दर्ज इबारत की व्‍याख्‍या इस कदर बेहूदे तरीकों से तोड़ी-मरोड़ी जायेगी। इस कदर उसकी छीछालेदर होगी कि मूल आत्‍मा का पता तक लगाना बड़े-बड़े विशेषज्ञों के लिए मुश्‍किल हो जायेगा।
संविधान प्रदत्‍त अधिकारों को तो बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जायेगा किंतु कर्तव्‍यों का कोई जिक्र नहीं होगा।
सांसदों पर की गई छोटी सी टिप्‍पणी को संसद की अवमानना में तब्‍दील कर देने वाले माननीय क्‍या कभी नहीं सोचेंगे कि वो किस कदर संसद की मान-मर्यादा को हर पल तार-तार कर रहे हैं। क्‍या उन्‍हें कभी अपने किये पर लज्‍जा का अनुभव होगा, संभवत: नहीं। ये बात अलग है कि उंगलियों पर गिने जाने लायक कुछ माननीय वर्तमान हालातों से द्रवित हैं और अपना दुख व रोष भी प्रकट करते हैं किंतु इस भीड़तंत्र में उनकी सुनता ही कौन है।
लोकसभा और राज्‍यसभा की तरह ही है विधानसभाओं का भी हाल। ताजा उदाहरण दिल्‍ली विधानसभा का है।
कल की ही बात है। महिला सुरक्षा के मुद्दे पर चर्चा के लिए विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया था किंतु इसका उपयोग किया गया केवल पुलिस कमिश्नर और प्रधानमंत्री को गाली देने के लिए।
स्‍थिति का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि सत्‍ताधारी आम आदमी पार्टी के ही एक विधायक पंकज पुष्कर को कहना पड़ा कि यह सिर्फ समय और जनता के पैसे की बर्बादी है।
सत्र बुलाने के पीछे सरकार की मंशा महिलाओं की सुरक्षा न होकर राजनीतिक नजर आती है। सरकार में नकारात्मक विचारों को सुनने का धैर्य नहीं है और एक तरह के फ्लोर मैनेजमेंट की प्रवृत्ति पैदा हो गई है।
पंकज पुष्कर तो इतने नाराज हुए कि टी ब्रेक के बाद वह विधानसभा से ही चले गए।
देश के सामने अनगिनित समस्‍याएं हैं। प्रदेशों की सत्‍ता पार्टियों की जगह परिवारों के हाथ में है। आम आदमी को अपनी समस्‍याओं के समाधान की बात तो दूर उन्‍हें सही कानों पहुंचाने का भी कोई उपाय नहीं सूझ रहा। मामूली से मामूली परेशानी के लिए उसे दर-दर भटकना पड़ता है।
राजनीतिक पार्टियां अपनी कई-कई पीढ़ियों का इंतजाम कर रही हैं। कोई गांधी बाबा के नाम पर तिजोरी भर रहा है तो कोई बाबा साहब अंबेडकर के नाम पर। कोई लोहिया की आड़ में जनता को लोहे के चने चबाने पर मजबूर कर रहा है तो कोई दीनदयाल उपाध्‍याय और श्‍यामाप्रसाद मुखर्जी के नाम पर।
अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता के हवाले से नेताओं की जुबान इतनी बेलगाम हो चुकी है कि पता ही नहीं चलता कि वो गालियां बक रहे हैं या संसदीय भाषा में गालियों को समाहित कर रहे हैं।
मुझे नहीं पता कि कुत्‍ते जब एक-दूसरे पर भौंकते हैं तो गालियां देते हैं या नहीं। उनके यहां गालियां संसदीय होती हैं या असंसदीय। लेकिन इतना जरूर पता है कि हमारे देश के नेताओं ने अब गालियों को संसदीय दर्जा दे दिया है। चाहे वह अघोषित ही क्‍यों न हो।
ऐसा नहीं होता तो परस्‍पर इतने अधिक अनर्गल प्रलाप के बाद किसी की तो मानहानि हुई होती। किसी को तो बुरा लगता। तमाशबीन बनी जनता को बुरा लगता है किंतु माननीयों को नहीं। आश्‍चर्य होता है।
कई बार ऐसा भी लगता है कि आश्‍चर्य किस बात का, यह सब उस म्‍यूचल अंडरस्‍टेंडिंग का हिस्‍सा है जिसके तहत सत्‍ता हस्‍तांतरण का खेल पूरी शांति के साथ खेला जाता है और जिसे आमजन लोकतंत्र समझता है।
सच तो यह है कि जिसे आमजन लोकतंत्र समझ कर खुद को बहला लेता है, उसकी असलियत कुछ और है। लोकतंत्र को अंग्रेजी में डेमोक्रेसी कहते हैं पर सच यह है कि यहां न डेमोक्रेसी है न ब्‍यूरोक्रेसी, यहां तो सिर्फ हिप्‍पोक्रेसी है। एक ऐसी हिप्‍पोक्रेसी जिसे डेमोक्रेसी और ब्‍यूराक्रेसी मिलकर अंजाम दे रही हैं ताकि जनता का कन्‍फ्यूजन बरकरार रहे।
यहां भी सुकून देता है बाबा अदम गोंडवीं का यह कथन कि-
जनता के पास एक ही चारा है बगावत।
यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में।।
उम्‍मीद है कि अदम गोंडवी की बाकी कविताओं में छिपा सत्‍य जिस प्रकार आज चरितार्थ हो रहा है, उसी तरह यह दो लाइनें भी अंतत: चरितार्थ होंगी।
किसी के भी धैर्य की परीक्षा लेना उचित नहीं होता, फिर ये तो जनता है। जनता जिसे ‘जनार्दन’ की संज्ञा दी जाती है।
करते रहिए संसद बाधित, मत चलने दीजिए विधानसभाओं के सत्र, एक खास समय पर जनता की आंखों में मिर्च झोंक कर सत्‍ता तो हथियाई जा सकती है किंतु उसे हमेशा के लिए अंधा बनाकर रखना नामुमकिन है।
इंतजार कीजिए और देखिए कि आगे-आगे होता है क्‍या।
जनता की बदहाली और बेबसी का तमाशा देखने वाले खुद तमाशा बनकर न रह जाएं। दुनिया बड़ी तेजी से करवट बदल रही है। तमाम देशों के सत्‍ताधारियों का हश्र उसका उदाहरण है, सब्र का बांध जब टूटता है तो सैलाब बन जाता है।
यह बांध सबको बहाकर ले जाए, उससे पहले दो मिनट का मौन संसद में रखकर विचार कर लीजिए कि सवा अरब की आबादी आपके आचरण को देख भी रही है और सुन भी रही है।
आप चाहें तो सवा अरब से खुद को अलग कर लीजिए क्‍यों कि आप तो माननीय हैं। वो माननीय जिन्‍हें न अपने मान की परवाह है और न संसद के अवमान की।
ईश्‍वर आपकी मदद करे।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

रविवार, 26 जुलाई 2015

व्यापम घोटाले के विसलब्लोअर की पत्नी से 10 लाख रुपए बरामद

इंदौर। मध्य प्रदेश के कुख्यात व्यापम घोटाले के विसलब्लोअर प्रशांत पांडेय की पत्नी मेघना से पुलिस ने शनिवार रात 10 लाख रुपए बरामद किए हैं। पुलिस ने मेघना को हिरासत में लेकर पूछताछ की और उनसे कथित तौर पर हवाला की शंका में करीब 10 लाख रुपए जब्त किए।
पांडेय का आरोप है कि उच्चतम न्यायालय द्वारा उनकी याचिका पर व्यापम घोटाले की सीबीआई जांच का आदेश दिए जाने के बाद प्रदेश सरकार उनके परिवार को परेशान कर रही है।
पुलिस अधीक्षक (पूर्वी क्षेत्र) ओपी त्रिपाठी ने बताया कि पुलिस को जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम के सामने स्थित निजी फर्म लक्ष्मी मोटर्स के पास हवाला के लेन-देन के बारे में मुखबिर से सूचना मिली थी।
इस सूचना पर पुलिस जब मौके पर पहुंची, तो मेघना पांडेय इस फर्म के दफ्तर से एक बैग लेकर आते दिखाई दीं। मेघना इस निजी फर्म में एचआर मैनेजर के पद पर काम करती हैं।
त्रिपाठी ने बताया कि एक महिला पुलिस अधिकारी ने जब मेघना के कब्जे से मिले बैग की तलाशी ली, तो इसमें नौ लाख 96 हजार रुपए पाए गए।
इस रकम के बारे में मेघना पुलिस को ‘संतोषजनक जवाब’ नहीं दे सकीं और मामला ‘संदिग्ध’ पाया गया लिहाजा यह रकम दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 102 के तहत जब्त कर ली गई और पूछताछ के बाद मेघना को छोड़ दिया गया।
पुलिस अधीक्षक ने बताया कि पुलिस ने मेघना के कब्जे से जब्त संदिग्ध रकम के बारे में आयकर विभाग और अन्य संबंधित महकमों को सूचना दे दी है। मामले में विस्तृत जांच जारी है।
दूसरी ओर व्यापम घोटाले के विसलब्लोअर प्रशांत पांडेय ने आरोप लगाया कि पुलिस ने प्रदेश सरकार के इशारे पर उनकी पत्नी को अवैध तौर पर हिरासत में रखा और उनके परिवार की ‘मेहनत की कमाई के’ 10 लाख रुपए जबरन जब्त कर लिए।
पांडेय ने कहा, ‘उच्चतम न्यायालय द्वारा मेरी याचिका पर व्यापम घोटाले और इससे जुडे़ लोगों की संदिग्ध हालात में मौत के मामलों की सीबीआई जांच का आदेश दिए जाने के बाद प्रदेश सरकार के इशारे पर मेरे परिवार को परेशान किया जा रहा है।’
उन्होंने कहा कि पुलिस ने उनकी पत्नी के कब्जे से करीब 10 लाख रुपए की जो रकम जब्त की, वह उनके परिवार ने अपनी मेहनत की कमाई से पिछले 10 साल के दौरान बचाई थी। उनके परिवार ने इस रकम के बारे में अपने आयकर रिटर्न में भी जानकारी दी थी। पांडे ने कहा, ‘हम किराए के घर में रहते हैं। हमें एक फ्लैट बुक करने के लिए बिल्डर को करीब 10 लाख रुपए देने थे लेकिन इससे पहले ही पुलिस ने अपनी ताकत का दुरुपयोग करते हुए यह रकम मेरी पत्नी के कब्जे से जब्त कर ली।’
-एजेंसी
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