शनिवार, 16 सितंबर 2017

अतुल्‍य भारत: ”ईश्‍वर” और ”आजादी” दोनों के लिए जहां आज भी दरकार है सबूतों की!

इस साल श्रीकृष्‍ण का जन्‍म दिवस और स्‍वतंत्रता दिवस दोनों एक ही दिन मनाए जा रहे हैं। एक धार्मिक पर्व है तो दूसरा राष्‍ट्रीय पर्व। एक ने अपने सखा अर्जुन को महाभारत जैसे भीषण युद्ध से पहले धर्म का वास्‍तविक अर्थ बताया तो दूसरे ने ये अहसास कराया कि आजादी कितनी बहुमूल्‍य है और गुलामी की जंजीरों में जकड़े रहना कितना कष्‍टप्रद होता है।
यूं देखा जाए तो दोनों घटनाओं के बीच कोई साम्‍य नहीं है। न समय के अनुसार और न ही विषय के अनुसार।
श्रीकृष्‍ण का जन्‍म कालगणना के अनुसार द्वापर युग में आज से करीब 5, 235 वर्ष पूर्व हुआ था जबकि देश इस बार आजादी की 70वीं वर्षगांठ मनाने जा रहा है।
इस हिसाब से देखा जाए जो श्रीकृष्‍ण के जन्‍म और देश की आजादी के बीच 5, 165 वर्षों का फासला है, किंतु आश्‍चर्यजनक रूप से दोनों घटनाओं में कई समानताएं ऐसी हैं जो चौंकाती तो हैं ही, सोचने पर भी मजबूर करती हैं।
बहुत से लोग संभवत: इस सत्‍य से वाकिफ हों कि श्रीकृष्‍ण को उन्‍हीं के कालखंड में ईश्‍वर का अवतार या परमात्‍मा न मानने वालों की भी अच्‍छी-खासी संख्‍या थी। कोई उन्‍हें मात्र एक ग्‍वाला बताता था तो कोई छलिया। किसी के लिए वह अटपटी हरकतों से लोगों को आकर्षित करने वाले सामान्‍य इंसान थे तो किसी के लिए माखनचोर।
भगवान विष्‍णु के आठवें अवतार श्रीकृष्‍ण को शायद इसीलिए कभी अपने मुंह में समूचे ब्रह्माण्‍ड का दर्शन कराना पड़ा और कभी अपना विराट रूप दिखाकर बताना पड़ा कि वह ”अवतारी पुरुष” हैं, सामान्‍य नहीं।
आज 5, 235 वर्ष बाद भी श्रीकृष्‍ण को ईश्‍वर का अवतार न मानने वालों की कोई कमी नहीं है। वह उन्‍हें पूर्ण पुरुष का दर्जा दे सकते हैं, महाभारत जैसे भीषण युद्ध का नायक मान सकते हैं, उनका 16 कलाओं में निपुण होना स्‍वीकार कर सकते हैं, बहुआयामी व्‍यक्‍तित्‍व का धनी एक आश्‍चर्यजनक इंसान मान सकते हैं परंतु ईश्‍वर मानने को तैयार नहीं होते।
हालांकि इसके लिए स्‍वयं श्रीकृष्‍ण भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं क्‍योंकि उन्‍होंने श्रीमद्भागवत् गीता में यह तो कहा है कि-
“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥” परित्राणाय साधुनाम विनाशाय च दुष्कृताम, धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे-युगे॥
अर्थात् जब-जब धर्म की हानि होने लगती है और अधर्म आगे बढ़ने लगता है, तब तब मैं स्वयं की सृष्टि करता हूं, अर्थात् जन्म लेता हूं । सज्जनों की रक्षा एवं दुष्टों के विनाश और धर्म की पुनःस्थापना के लिए मैं विभिन्न युगों (कालों) मैं अवतरित होता हूं, किंतु यह कहीं नहीं कहा कि उनके लिए ”धर्म की हानि” का मानदंड क्‍या होगा। अधर्म के बढ़ने का आंकलन कैसे किया जाएगा। सज्‍जनों की रक्षा करने का समय कब आएगा और दुष्‍टों का विनाश करने की उचित घड़ी कौन सी होगी।
वर्तमान संदर्भों को देखें तो ऐसा लगता है जैसे धर्म-अधर्म को परिभाषित करने का समय आ चुका है। सज्‍जनों की रक्षा और दुष्‍टों के दमन की सख्‍त जरूरत है परंतु गीता में कहा गया श्‍लोक दूर-दूर तक सार्थक होता नजर नहीं आ रहा।
कहा जाता है कि धार्मिक आस्‍था हर सवाल से परे होती है और धर्म अपनी मौजूदगी को स्‍वत: सिद्ध करता रहता है, फिर भी कुछ लोग धर्म पर सवाल खड़े करने तथा उसे तर्क की कसौटी पर कसने में कोई कसर नहीं छोड़ते।
ठीक इसी प्रकार देश को 70 साल पहले मिली आजादी पर भी सवालिया निशान लगाने वालों की कमी नहीं है। उनका नजरिया कहता है कि 15 अगस्‍त 1947 की रात को अंग्रेजी शासन से मिली आजादी, आधी अधूरी आजादी थी क्‍योंकि उसके बाद उन्‍हीं की कार्यप्रणाली को अपनाने वालों के हाथ में सत्ता आई। आजादी के 70 सालों बाद भी आमजनता के प्रति शासक और प्रशासकों के व्‍यवहार में बहुत ज्‍यादा अंतर नहीं आया है।
सत्ता के सोपान पर प्रतिष्‍ठापित होने वाले लोग अब भी आमजन को ”रियाया” से अधिक नहीं समझते और उसके भाग्‍य विधाता बने हुए हैं। कहने के लिए लोकतंत्र है और संविधान ने हर नागरिक को बराबर का अधिकार दे रखा है परंतु हकीकत में ऐसा है नहीं। संविधान एक ऐसी किताब मात्र बनकर रह गया है जिसकी व्‍याख्‍या सत्ता पक्ष अपने मनमाफिक करता है जबकि ”विपक्ष” अपने तरीके से करता रहता है।
”तंत्र” अब ”लोक” के लिए न रहकर ऐसे तत्‍वों के लिए रह गया है जो उसका बेहतर से बेहतर दुरुपयोग करने में माहिर हैं।
ये वो तत्‍व हैं जो संविधान से प्राप्‍त ”अभिव्‍यक्‍ति की आजादी” का अर्थ कानून के दायरे से भी बाहर जाकर निकालना चाहते हैं। वो देशद्रोह की हद तक जाकर आजादी मांगने से नहीं चूकते क्‍योंकि उनके लिए अभिव्‍यक्‍ति की आजादी का तात्‍पर्य ऐसी निरंकुशता है जिसके लिए कोई मर्यादा नहीं होनी चाहिए।
ऐसे तत्‍व चाहते हैं कि वह तो कुख्‍यात बदमाशों से लेकर सड़क छाप गुण्‍डों और यहां तक कि आतंकवादियों के लिए भी मानवाधिकार की वकालत करें किंतु सीमाओं पर खड़े उन जवानों के मानवाधिकारों का जिक्र तक न करें जो हर वक्‍त अपनी जान जोखिम में डालकर कठिन ड्यूटी को अंजाम देते रहते हैं।
वह प्रधानमंत्री को भी खुलेआम ”गालियां” देकर अभिव्‍यक्‍ति की आजादी पर खतरा मंडराने की बात करते हैं और खुद के लिए देश में आजादी की जगह, देश से ऐसी आजादी चाहते हैं जिसके तहत समूची कानून-व्‍यवस्‍था को ताक पर रखकर गद्दारों, देशद्रोहियों एवं आतंकवादियों की खुलेआम सहायता कर सकें। उनके लिए असली आजादी तभी आएगी जब वो अपने असभ्‍य आचरण का सार्वजनिक प्रदर्शन करने को स्‍वतंत्र हों और आजादी की लड़ाई लड़ने वालों के बलिदान को दरकिनार कर निर्दोषों का खून बहाने वालों का साथ दे सकें।
उनके लिए देश सही मायनों में तब स्‍वतंत्र होगा जब वो बिना किसी रोक-टोक के नक्‍सलियों के लिए काम कर सकें, उनके हित में लड़ सकें। अफजल गुरू, याकूब मेमन तथा पाकिस्‍तानी आतंकी अजमल कसाब जैसों को मिली सजा पर मातम मना सकें।
इन सबके इतर आजादी पर सवालिया निशान लगाने वालों में वो लोग भी शामिल हैं जिनकी मानें तो देश का अल्‍पसंख्‍यक समुदाय डरा हुआ है। इन लोगों के लिए अल्‍पसंख्‍यक की परिभाषा भी सिर्फ मुस्‍लिम वर्ग तक सीमित है। सिख, ईसाई, पारसी, जैन आदि इनके लिए दोयम दर्जे के अल्‍पसंख्‍यक हैं।
दरअसल डर मुस्‍लिमों में नहीं, उनके मन में है क्‍योंकि देश पर एक दक्षिणपंथी विचारधारा वाली सरकार काबिज हो गई है। लोकतंत्र की दुहाई देने वाला यह वर्ग अपने मन में व्‍याप्‍त भय के कारण लोकतांत्रिक तरीके से स्‍पष्‍ट बहुमत के साथ चुनी गई सरकार को उसका अपना कार्यकाल भी इसलिए पूरा करते नहीं देखना चाहता क्‍योंकि वह तुष्‍टीकरण की राजनीति में विश्‍वास नहीं रखती। वह ”सबका साथ, सबका विकास” की बात तो करती है लेकिन उनके सामने शीर्षासन नहीं कर रही जिनको मूर्ख बनाकर स्‍वतंत्र भारत में अधिकांश समय सत्तासुख भोगा जाता रहा।
सवा सौ करोड़ देशवासियों के लिए काम करने का दावा करने वाली सरकार के पीएम की बातों को ”आरक्षित आजादी” मांगने वाला यह वर्ग जुमलेबाजी बताने में रत्तीभर शर्म महसूस नहीं करता और ”पैसे पेड़ों पर तो नहीं उगते” जैसा जुमला बोलने वाले के कसीदे पढ़ता है।
आजादी का महत्‍व यह वर्ग इसलिए नहीं समझता क्‍योंकि यहां ईशनिंदा करने के बावजूद फांसी के फंदे पर लटकाने का कोई कानून नहीं है अन्‍यथा यीशु को मानने वाले देशों व इस्‍लाम को मानने वाले मुल्‍कों में जाकर देखें तो पता लगे कि ईश्‍वर के अस्‍तित्‍व पर उंगली उठाने का नतीजा क्‍या होता है, और आजादी किसे कहते हैं।
यह तो ऐसी मान्‍यताओं वाला देश है जहां जहरीले बिच्‍छू के काट जाने के बाद भी कहा जाता है कि यदि बिच्‍छू अपना विष वमन करने की प्रवृत्ति नहीं त्‍याग सकता तो इंसान अपनी इंसानियत क्‍यों त्‍याग दे।
शिशुपाल से पूरी सौ गालियां धैर्य के साथ सुनने के बाद ही श्रीकृष्‍ण ने उसकी गर्दन काटने के लिए सुदर्शन चक्र का इस्‍तेमाल किया क्‍योंकि वह प्रतिज्ञाबद्ध थे। श्रीकृष्‍ण ने कभी अपने ईश्‍वर होने की अनुभूति तब तक नहीं कराई, जब तक वैसा कराना जरूरी नहीं हो गया, बावजूद इसके कृष्‍ण कभी छलिया कहलाए तो कभी रणछोर। कभी ग्‍वाला बने रहे तो कभी माखनचोर।
आज 70 वर्षों बाद भी आजादी का महत्‍व न समझने वाले तथा आजादी को सत्‍ता से जोड़कर देखने वालों को भी इसका अंदाज तब लगेगा जब वो अपने मुंह से निकाले गए हर जहरीले शब्‍द की मारक क्षमता समझेंगे, और समझेंगे कि बिना आजादी के वो यदि ऐसे शब्‍दों का प्रयोग करते तो पूरी जिंदगी सलाखों के पीछे गुजारनी पड़ सकती थी।
इसे इत्‍तिफाक मान सकते हैं कि हजारों साल पहले श्रीकृष्‍ण को ईश्‍वरीय अवतार न मानने वालों की भी कमी नहीं थी और आज मात्र 70 सालों बाद भी देश को आजाद मानने पर प्रश्‍न खड़ा करने वालों की भी कोई कमी नहीं है।
जो भी हो, ”वसुधैव कुटुम्बकम” में भरोसा रखने वाला भारत केवल 70 सालों की आजादी के बाद इस मुकाम पर जरूर आ खड़ा हुआ है जहां अमेरिका जैसा मुल्‍क यह कहने पर मजबूर है कि उत्तर कोरिया द्वारा पैदा की गई समस्‍या के समाधान में भारत एक बड़ी भूमिका निभा सकता है।
दलगत राजनीति का शिकार और विशेष मानसिकता का पोषक एक खास वर्ग भले ही इस आशय का ढिंढोरा पीटे कि उसे अब भी किसी ”कथित आजादी” की दरकार है लेकिन हकीकत यही है कि आज पूरे विश्‍व में तिरंगे का सम्‍मान बढ़ रहा है और श्रीकृष्‍ण को ईश्‍वर मानकर पूजने वालों में उन फिरंगियों की तादाद अच्‍छी खासी है जिन्‍होंने सैकड़ों साल इस देश को गुलामी की जंजीरों से जकड़े रखा था।
श्रीकृष्‍ण के मुंह से बोले गए शब्‍दों की माला ”श्रीमद्भागवत गीता” पर भी आज विश्‍व के अनेक देशों में रिसर्च हो रही है और सवा सौ करोड़ की आबादी के बावजूद बिना किसी खून-खराबे के सत्ताओं की अदला-बदली होने पर भी दुनिया अचंभित है।
विश्‍व के सबसे बड़े देश का सफल लोकतंत्र यह बताने के लिए पर्याप्‍त है कि महाभारत के मैदान में जो कुछ बोला गया, वह कोई ईश्‍वरीय अवतार ही बोल सकता है और आजाद भारत में ही कोई मामूली सा इंसान तक न सिर्फ सरकार, बल्‍कि प्रधानमंत्री के लिए भी खुलेआम अपशब्‍दों का इस्‍तेमाल कर सकता है।
हैप्‍पी श्रीकृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी, हैप्‍पी स्‍वतंत्रता दिवस। जय हिंद, जय भारत…वंदे मातरम्।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

मथुरा में मौजूद बेनामी संपत्तियों पर पड़ी अब मोदी और योगी सरकार की नजर, एक मंत्री भी निशाने पर

विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक नगरियों में शुमार कृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली मथुरा में जिस प्रकार जगह-जगह विभिन्‍न धर्मध्‍वजाएं फहराती दिखाई देती हैं, उसी प्रकार यहां कदम-कदम पर बेनामी संपत्तियों की भी भरमार है।
नरेन्‍द्र मोदी के नेतृत्‍व वाली एनडीए की सरकार तथा योगी आदित्‍यनाथ के नेतृत्‍व वाली यूपी की भाजपा सरकार से बेनामी संपत्तियों को लेकर मिल रहे कठोर संकेतों पर यदि भरोसा करें और मानें तो निकट भविष्‍य में बेनामी संपत्तियां सरकार की अगली टारगेट बनने जा रही हैं, तो तय जानिए कि उत्तर प्रदेश के अंदर मथुरा निश्‍चित ही पहला स्‍थान प्राप्‍त करेगा।
बताया जाता है कि समय-समय पर राजनीतिक पार्टियां बदलने में माहिर तथा विभिन्‍न मंत्री पदों को सुशोभित करते रहे एक नेताजी भी अरबों रुपए की बेनामी संपत्ति के मालिक हैं। इनकी बेनामी संपत्ति सर्वाधिक उसी व्‍यक्‍ति के नाम है जो कभी फोर्थक्‍लास सरकारी मुलाजिम था और हमेशा उनका खास मुंहलगा बना रहा।
गौरतलब है कि हाल ही में भाजपा के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अमित शाह ने उत्तर प्रदेश शासन को इस आशय के संकेत दिए है कि पार्टी बहुत जल्‍द कुछ मंत्रियों के साथ आरएसएस के कार्यकर्ताओं को अटैच करने वाली है।
दरअसल, अमित शाह को जानकारी मिली है कि कुछ मंत्रियों ने यूपी में शासन के इस अल्‍पकाल के अंदर ही बड़ी कमाई कर ली है। इसमें जहां कुछ दूसरे दलों से आए आदतन भ्रष्‍ट नेता हैं वहीं कुछ ऐसे भी हैं जो पहली बार मिले मौके का पूरा लाभ ईमानदार सरकार की आड़ लेकर उठा लेना चाहते हैं।
एक दूसरे दल के नेताजी का काफी पैसा मथुरा बेस्‍ड उत्तर भारत की नामचीन रियल एस्‍टेट कंपनी में लगा है और इस पैसे की देखभाल के लिए उन्‍होंने बाकायदा अपने एक खासमखास को कंपनी में डायरेक्‍टर का पद दिलवा रखा है।
केन्‍द्र में कांग्रेस की सरकार रहते एक प्रदेश स्‍तरीय कांग्रेसी नेता ने भी इस धार्मिक नगरी का विकास कराने की आड़ में जमकर अपना और अपने परिवार का विकास किया।
इन नेताजी की बेनामी संपत्तियों को जिस दिन सरकार खंगालने बैठ गई, उस दिन लोगों की आंखें फटी की फटी रह जाएंगी।
पॉश कालोनियों में कई-कई आलीशान मकानों के साथ-साथ इनका पैसा दूसरे धंधों में भी लगा है।
सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार धर्म की इस नगरी में ऐसे अधर्मियों की संख्‍या सैकड़ों नहीं, हजारों में है जो कुछ समय पहले तक रोटी-रोटी को मोहताज थे किंतु आज वह करोड़ों की बजाय अरबों में खेल रहे हैं।
ऐसे तत्‍वों में एक ओर जहां रजिस्‍ट्री ऑफिस के मामूली से कर्मचारी शामिल हैं वहीं दूसरी ओर ऐसे लोग भी हैं जो यहीं सरकारी विभाग में बतौर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी तैनात रह चुके हैं। सरकारी विभाग के ऐसे ही एक कर्मचारी की गिनती तो अब शहर के प्रसिद्ध बिल्‍डर्स एवं ठेकेदारों में की जाती है।
रियल एस्‍टेट के एक ऐसे ही बड़े कारोबारी को कुछ वर्षों पहले तक मथुरा के लोगों ने मामूली मजदूरी करते देखा है। उनके भाई भी कंधे पर टीवी उठाए-उठाए घर-घर पूरी रात फिल्‍मों के वीडियो दिखाने का काम करते थे लेकिन आज यह ”भाई लोग” बेनामी संपत्तियों के बेताज बादशाह हैं।
मथुरा में तैनात रहे पुलिस के उच्‍च अधिकारियों से लेकर उपाधीक्षक तक और दरोगा से लेकर सिपाही तक ऐसे-ऐसे हैं, जिनकी यहां करोड़ों की बेनामी संपत्ति है।
पुलिस के कई अधिकारियों की बेनामी संपत्‍तियों का संरक्षण आज भी उनके नुमाइंदे ही कर रहे हैं क्‍योंकि कागजों में वही उसके मालिक हैं।
एक दशक से अधिक मथुरा में विभिन्‍न थानों के प्रभारी पद पर रहे दरोगा की संपत्ति चौंकाने वाली है। उसके दो मकान उसके गृह जनपद में हैं जबकि करोड़ों रुपए मूल्‍य के दो मकान मथुरा में हैं। गोवर्धन के सर्वाधिक कीमती क्षेत्र में हजार वर्ग गज का प्‍लॉट है और एक प्‍लॉट नोएडा में है।
इसी प्रकार मथुरा में तैनात कई पुलिस के दरोगा और यहां तक कि सिपाहियों को भी 10 से 15 लाख रुपए मूल्‍य वाली लग्‍जरी गाड़ियां इस्‍तेमाल करते कभी भी देखा जा सकता है।
बात चाहे विकास प्राधिकरण के अधिकारी और कर्मचारियों की करें अथवा सार्वजनिक लोक निर्माण विभाग या सहायक संभागीय परिवहन विभाग की, धर्म की इस नगरी में इन विभागों के अधिकारी एवं कर्मचारियों ने जमकर लूट मचाई है। विकास प्राधिकरण में कार्यरत रहे एक कर्मचारी के तो अपने ही विभाग द्वारा विकसित एक ही कॉलोनी में आठ मकान बताए जाते हैं। एक अन्‍य पूर्व कर्मचारी की गिनती आज शहर के बड़े ठेकेदारों में होती है।
बताया जाता है कि विकास प्राधिकरण में यहां तैनात रहे कुछ अधिकारी एवं कर्मचारियों ने तो स्‍थानीय पत्रकारों को ही अपना हमराज बना रखा है। इन पत्रकारों के नाम न सिर्फ उन्‍होंने अपनी संपत्तियों ले रखी हैं बल्‍कि उनके माध्‍यम से रियल एस्‍टेट में अच्‍छा-खासा निवेश भी किया हुआ है। बेनामी संपत्ति बनाने में कई अधिकारियों की मथुरा के कारोबारियों से भी सांठगांठ सामने आई है।
पता लगा है कि अक्‍सर न्‍यायिक, पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों के इर्द-गिर्द मंडराते देखे जाने वाले इन कारोबारियों का मुख्‍य उद्देश्‍य ही उनकी भ्रष्‍टाचार से कमाई गई रकम का मुकम्‍मल बंदोबस्‍त करना है। समाजसेवियों का टैग लगाकर घूमने वाले ऐसे कारोबारी ऊपरी तौर पर तो उनके ”फैमिली फ्रेंड” बने रहते हैं किंतु असलियत में वह उनकी ब्‍लैक मनी के राजदार हैं।
बिजली विभाग के अधिकारी तथा कर्मचारियों की भी मथुरा में अकूत बेनामी संपत्‍ति बताई जाती है। मथुरा में लंबे समय तक तैनात रहे बिजली विभाग के एक क्‍लर्क और सब रजिस्‍ट्रार ऑफिस मथुरा के एक क्‍लर्क की अचल संपत्ति का आलम यह है कि शहर का कोई इलाका, कोई पॉश कॉलोनी ऐसी नहीं है जहां इनकी कीमती संपत्तियों न हों।
पिछले दिनों तो इस चक्‍कर में एक बिजली अधिकारी ने अपने यहां हुई करोड़ों रुपए मूल्‍य की चोरी का ब्‍यौरा तक पुलिस को उपलब्‍ध नहीं कराया जबकि पुलिस बार-बार उनसे चोरी गए सामान का ब्‍यौरा मांगती रही।
कहा जाता है कि अधर्म के लिए धर्म से बड़ी कोई आड़ नहीं होती। मथुरा जनपद के विभिन्‍न धार्मिक स्‍थलों में निर्मित आलीशान कॉलोनियों, मठ एवं मंदिरों और यहां तक कि हाल ही में बड़ी तेजी से खड़ी होने वाली मस्‍जिदों का सच खंगाला जाए तो पता लगेगा कि सरकार की सोच से कहीं ज्‍यादा बेनामी संपत्ति वहां मौजूद है। इनके संचालकों की सच्‍चाई पता करने के लिए उनके बही-खाते ही काफी हैं क्‍योंकि आज भी वह बहुत कुछ बोल सकते हैं, बता सकते हैं।
मथुरा जनपद में यहां-वहां फैली संपत्ति के लिए हत्‍या, लूट और डकैती के साथ-साथ लड़ाई झगड़े तक हुए हैं और होते रहते हैं किंतु पूरा सच कभी सामने नहीं आता क्‍योंकि इनमें से अधिकांश संपत्तियां बेनामी हैं।
कुछ महीनों पहले वृंदावन के एक बाबा और वहीं के एक कारोबारी के बीच करोड़ों के लेनदेन का झगड़ा सामने आया था। इस झगड़े में एक प्रदेश स्‍तरीय बाहरी नेता के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज हुई थी किंतु छद्म लेनदेन और बेनामी संपत्ति होने के कारण दोनों पक्ष ने सुलह करके विवाद निपटाना ज्‍यादा उचित समझा अन्‍यथा सच्‍चाई सामने आने पर कई चेहरों के बेनकाब होने का डर था।
बेनामी संपत्तियों के बेताज बादशाहों की फेहरिस्‍त में कुछ स्‍थानीय चिकित्‍सकों का नाम भी काफी ऊपर है। इन चिकित्‍सकों ने मथुरा ही नहीं, मथुरा से बाहर भी अच्‍छी-खासी बेनामी संपत्तियां बना रखी हैं लेकिन आजतक कानून की गिरफ्त में नहीं आए हैं।
सरकारी सूत्र बताते हैं कि केंद्र तथा प्रदेश की सरकारों ने इनका पूरा कच्‍चा चिठ्ठा तैयार कर लिया है और जिस दिन सरकारी एजेंसियों ने मथुरा को खंगालना शुरू किया, उस दिन इन सफेदपोशों को सींखचों के अंदर जाने से कोई रोक नहीं पाएगा।
शासन स्‍तर से प्राप्‍त जानकारियों के मुताबिक सात मोक्षदायिनी नगरियों में स्‍थान प्राप्‍त कृष्‍ण की इस पावन जन्‍मस्‍थली के विकास पर जिस तरह मोदी एवं योगी की सरकारें अपना पूरा ध्‍यान केंद्रित किए हुए हैं और अगले लोकसभा चुनावों तक उन्‍हें अमल में लाना चाहती हैं, उसी प्रकार वह यह भी चाहती हैं कि धर्म की आड़ लेकर अब तक यहां एकत्र की जाती रही बेनामी संपत्ति एवं काली कमाई भी सार्वजनिक हो जिससे भविष्‍य में कोई ऐसी संपत्ति बनाने से पहले एक-दो बार नहीं, कई-कई बार विचार करने पर मजबूर हो जाए।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

खुली चुनौती: कानून-व्‍यवस्‍था की बात तो दूर, ट्रैफिक व्‍यवस्‍था ही सुधार दें सरकार

योगी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यदि कोई है तो वह है कानून-व्‍यवस्‍था को पटरी पर लाना। उत्तर प्रदेश की पूर्ववर्ती सरकारें भी कानून-व्‍यवस्‍था के मामले में असफल रही हैं। बताया जाता है कि योगी सरकार बदहाल कानून-व्‍यवस्‍था को पटरी पर लाने के लिए उत्तर प्रदेश कंट्रोल ऑफ ऑर्गनाइज्ड क्राइम ऐक्ट यानि यूपीकोका (UPCOCA) लाने पर विचार कर रही है परंतु उस ट्रैफिक व्‍यवस्‍था का क्‍या, जो न सिर्फ अनेक बड़ी दुर्घटनाओं का कारण बनी हुई है बल्‍कि अकाल मौतों के आंकड़ों में वर्ष-दर-वर्ष भारी वृद्धि की वजह भी बन रही है।
राजधानी लखनऊ सहित प्रदेश का शायद ही कोई जिला, तहसील या कस्‍बा ऐसा होगा जो पूर्णत: चरमरा चुकी यातायात व्‍यवस्‍था का शिकार न हो। कोई राष्‍ट्रीय राजमार्ग, राजमार्ग अथवा संपर्क मार्ग यातायात की अव्‍यवस्‍था से अछूता नहीं होगा। देश में जितनी अकाल मौतें अन्‍य दूसरे कारणों से नहीं होतीं, उतनी सिर्फ सड़क दुर्घटनाओं के कारण हर दिन होती हैं किंतु इस दिशा में कोई ठोस कदम उठता दिखाई नहीं देता।
जिस सड़क पर भी निकल जाएं, उसी पर आपको ओवरलोडेड ट्रक, ट्रैक्‍टर-ट्रॉली, निजी बसें, ऑटो रिक्‍शा, जुगाड़, सामान ढोने वाले पैदल रिक्‍शे तथा अन्‍य थ्री व्‍हीलर्स आदि दिखाई दे जाएंगे। अधिकांश मोटरसाइकिल चालक तो कम से कम तीन सवारियों के साथ चलना अपना जन्‍मसिद्ध अधिकार मान बैठे हैं। थोड़ी देर किसी सड़क पर नजर दौड़ा लें तो चार और यहां तक कि पांच-पांच सवारियों से लदी मोटरसाइिकलें भी खूब देखी जा सकती हैं। इन सवारियों में औरतें और अबोध बच्‍चे भी शामिल होते हैं। ऐसा लगता है जैसे आत्‍महत्‍या करके मुआवजा लेने का यह कोई नया तरीका ईजाद किया गया हो।
अधिकतम तीन सवारियों के लिए निर्धारित ऑटो रिक्‍शा में छ:-सात सवारियां उनके लगेज सहित भरकर चलना, बैट्री चालित रिक्‍शों में पांच-छ: सवारियां लादना, ट्रैक्‍टर-ट्रॉली को ट्रॉली की ऊंचाई से डेढ़ गुना अधिक तक ईंटें भरकर दौड़ाना, बुग्‍गी में इतना अधिक भूसा भरकर ले जाना कि न दाएं-बाएं कुछ दिखाई दे और न पीछे वाले को कुछ नजर आए, यह सब इतनी सामान्‍य बातें हैं कि जिन पर कोई उंगली भी उठाना जरूरी नहीं समझता।
भूसे की बुग्‍गी का जिक्र भले ही कर लें, यहां तो लोहे की सरियाएं भी ट्रक में इस कदर भरी जाती हैं कि ट्रक का पिछला हिस्‍सा कब किसकी मौत का सामान बन जाए, कहना मुश्‍किल है।
बात चाहे ग्रेटर नोएडा से आगरा तक के लिए बने यमुना एक्‍सप्रेस-वे की हो या फिर आगरा से लखनऊ तक के लिए बनाए गए एक्‍सप्रेस-वे की, दोनों ही सड़कों पर स्‍पीड नियंत्रित करने की कोई व्‍यवस्‍था नहीं है लिहाजा यमुना एक्‍सप्रेस-वे तो हर दिन कई-कई मौतों का कारण बनता है जबकि आगरा-लखनऊ एक्‍सप्रेस-वे भी विधिवत् शुरू हुए बिना ही कई जिंदगियां ले चुका है। हालांकि इस सबके लिए दोष सड़क का नहीं, उन वाहन चालकों का ही है जो लचर यातायात व्‍यवस्‍था के चलते अपनी और अपने साथ बैठी जिंदगियों को असमय काल के गाल तक पहुंचाने का बंदोबस्‍त करते हैं।
कहने के लिए सिविल पुलिस में बाकायदा यातायात पुलिस का एक विभाग होता है और संभागीय परिवहन विभाग (आरटीओ) भी इसी के लिए बना है किंतु दोनों अपने दायित्‍व की पूर्ति मात्र सुविधा शुल्‍क लेकर करते रहते हैं। दोनों ही विभागों का आलम यह है कि जितना वेतन उनके कुल कर्मचारियों को सरकार से भत्ते आदि मिलाकर भी नहीं मिलता, उतना तो हर माह उन्‍हें यातायात की इस अव्‍यवस्‍था से प्राप्‍त हो जाता है।
उदाहरण के लिए यदि उत्तर प्रदेश के विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक जनपद मथुरा को ही लें तो यहां हजारों की संख्‍या में शहर के अंदर और बाहर ऑटो रिक्‍शा, बैट्री रिक्‍शा, थ्री व्‍हीलर्स, निजी डग्‍गेमार बसें, अवैध ट्रैक्‍टर ट्रॉलियां, जुगाड़, भैंसा बुग्‍गियां, बैल गाड़ियां, स्‍कूली बसें, माल ढोने वाले पैदल रिक्‍शे आदि सड़कों पर दिन-रात दौड़ते रहते हैं।
ये सभी वाहन संबंधित विभागों को ठेकेदारों के माध्‍यम से महीनेदारी पहुंचाते हैं और इसलिए इन पर यातायात का कोई नियम या कानून लागू नहीं होता। मथुरा जनपद के बीच से गुजरने वाले करीब-करीब 90 किलोमीटर लंबे राष्‍ट्रीय राजमार्ग नंबर दो पर जगह-जगह ईंट,बजरी, गिट्टी व मिट्टी से ओवरलोडेड ट्रैक्‍टर-ट्रॉलियां, ट्रक, जुगाड़ तथा बुग्‍गियां आदि अन्‍य वाहनों का वर्चस्‍व साफ देखा जा सकता है। इनकी अवैध मंडियां खुलेआम पूरी व्‍यवस्‍था को धता बताते हुए लोगों को मौत के मुंह में भेजने का इंतजाम करती हैं किंतु किसी की क्‍या मजाल कि कोई इनसे कुछ कह सके।
तीन की जगह सात-सात सवारियां तक बैठाकर चलने वाले ऑटो रिक्‍शा चालक शहर के सभी प्रमुख तिराहों-चौराहों की आधी से अधिक सड़क इसलिए घेरे रहते हैं क्‍योंकि पुलिस उनसे महीनेदारी के साथ-साथ बेगार भी लेती है। अपने खास मेहमानों को घुमाने में तो इनका इस्‍तेमाल करती ही है, लावारिस लाशों को पोस्‍टमार्टम गृह तक पहुंचाने का काम भी इन्‍हीं से कराती है। गर्मियों में चौकी पर कहीं से पानी ढोकर लाना हो अथवा जाड़ों में अलाव जलाने के लिए लकड़ी मंगवानी हो, सारा काम ऑटो रिक्‍शों से कराया जाता है। लाखों रुपए महीने की अतिरिक्‍त आमदनी का जरिया और ऊपर से बेगार करने वाले ऑटो रिक्‍शा इसलिए हर तिराहे-चौराहे की सड़क को अपनी निजी जागीर समझते हैं और इस बारे में कुछ भी कहने वाले को अपना निजी दुश्‍मन।
पुलिस और ऑटो रिक्‍शा चालकों के मध्‍य बिचौलिए का काम करने वाले ठेकेदारों की मानें तो वर्तमान हालातों में ऑटो रिक्‍शा चालक पूरी तरह निरंकुश हैं और इनको रोकने या टोकने की हिमाकत करने वाला बड़ी मुसीबत में पड़ सकता है।
मथुरा के गोवर्धन चौराहे पर ऑटो रिक्‍शा चालकों से पैसा वसूल करने वाला ठेकेदार साफ शब्‍दों में बेझिझक बताता है कि यहां 80 प्रतिशत ऑटो चालक एक समुदाय विशेष से ताल्‍लुक रखते हैं और आस-पास की बस्‍तियों में रहते हैं। पुलिस के लिए दुधारु गाय बने हुए इन ऑटो चालकों से यदि कोई चार पहिया वाहन चालक भी यदि सड़क किनारे खड़े होने की कह दे तो यह मिलकर उससे अभद्रता करने लगते हैं। टोकने वाला अगर प्रतिउत्तर देने की गलती कर बैठे तो उसकी मजामत करने से भी ये लोग नहीं चूकते क्‍योंकि पुलिस इनके हाथों पूरी तरह बिकी हुई है और हर हाल में वह इन्‍हीं का पक्ष लेती है।
दूसरी ओर रोडवेज बस के चालक भी किसी मायने में ऑटो रिक्‍शा चालकों से कम नहीं हैं। बीच सड़क पर जहां चाहे बस रोक कर सवारियों को चढ़ाना तथा उतारना इनका शौक मान सकते हैं क्‍योंकि सरकारी सेवा में होने के कारण सामान्‍यत: पुलिस इनसे कुछ नहीं कहती।
विशेष अवसरों पर बस के अंदर सवारियां ठूंस-ठूंस कर भरने और बस की छत पर भी सवारियां बैठाने से इन्‍हें कोई परहेज नहीं होता क्‍योंकि निर्धारित सीटों के बाद हर सवारी इनकी अतिरिक्‍त आमदनी का जरिया बनती है।
यातायात व्‍यवस्‍था की बदहाली में अपनी भूमिका निभाने से विकास प्राधिकरण भी कतई पीछे नहीं रहता। वहां बैठे अधिकारियों से सुविधा शुल्‍क देकर कोई भी व्‍यक्‍ति पार्किंग की सुविधा उपलब्‍ध कराए बिना अपनी दुकान, मकान, मैरिज होम, होटल, गैस्‍ट हाउस अथवा नर्सिंग होम का नक्‍शा पास करा सकता है। यहां तक कि मॉल भी खड़ा कर सकता है। फिर चाहे सड़क जाम हो या सड़क दुर्घटना, उससे उन्‍हें कोई फर्क नहीं पड़ता क्‍योंकि कोई कुछ पूछने वाला नहीं है।
व्‍यवस्‍था खुद इतनी अव्‍यवस्‍था का शिकार है कि पहले उसे ही व्‍यवस्‍था की दरकार है। संभवत: इसीलिए उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने का संकल्‍प लेकर सत्ता संभालने वाले भगवाधारी योगी आदित्‍यनाथ भी कई बार व्‍यवस्‍था के सामने बेबस नजर आते हैं। सत्ता संभालने के बाद पहले उन्‍होंने पिछली सरकारों द्वारा तैनात अधिकारियों पर भरोसा करके देखा, फिर उच्‍च अधिकारियों का तबादला किया, उसके बाद पूर्ववर्ती सरकारों के कदमों का अनुसरण करते हुए अधिकारियों को ताश के पत्तों की तरह फैंटकर भी देखा लेकिन नतीजा अब तक शून्‍य बना हुआ है। ब्‍यूरोक्रेसी किसी भी तरह योगी जी के नियंत्रण में नहीं आ रही।
सत्ता नहीं, व्‍यवस्‍था परिवर्तन की हुंकार भरने वाले भगवाधारी मुख्‍यमंत्री को फिलहाल तो ब्‍यूराक्रेसी ने नाकों चने चबवा दिए हैं। ब्‍यूरोक्रेसी की ढिठाई पर योगी जी अब नाराजगी भी जाहिर करने लगे हैं और सजा देने का ऐलान भी कर रहे हैं लेकिन अभी ब्‍यूरोक्रेसी सारे हथकंडों से बेअसर है।
ऊपर के स्‍तर पर लेन-देन की भले ही कोई शिकायत सामने न आई हो किंतु जिला और तहसील स्‍तर पर किसी भी क्षेत्र में भ्रष्‍टाचार कम होने का नाम नहीं ले रहा। खाकी को न मंत्रियों का कोई खौफ है और न मुख्‍यमंत्री का। जिले के प्रभारी अधिकारी आमजन की तो क्‍या सत्ताधारी दल के पदाधिकारियों की भी बात एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देते हैं। उनकी शिकायतों पर लखनऊ से भी संज्ञान नहीं लिया जाता। पार्टी के बहुत से पदाधिकारी यह स्‍वीकार करने में कोई संकोच नहीं करते कि प्रदेश की राजधानी ऊंचा सुनती है लिहाजा जिले के अधिकारी जायज बात भी नहीं सुनते। उनका कहना है कि भाजपा के लिए 14 वर्षों बाद सत्‍ता का वनवास भले ही खत्‍म हो गया हो किंतु हम अब भी दर-दर भटकने पर मजबूर हैं। हमारी सुनने वाला कोई नहीं।
यातायात व्‍यवस्‍था की बदहाली और उससे जुड़े भारी भ्रष्‍टाचार के बावत भी सत्ताधारी पार्टी के पदाधिकारी आक्रोश व्‍यक्‍त करते हुए बताते हैं कि हर अधिकारी चार्ज लेते वक्‍त तो व्‍यवस्‍था सुधारने का पुरजोर दावा करता है किंतु चंद दिनों बाद वह अपने कैंप कार्यालय तक सिमट कर रह जाता है।
आश्‍चर्य की बात यह है कि अधिकारियों की यह कार्यप्रणाली किसी एक जनपद में नहीं, प्रत्‍येक जनपद में देखी जा रही है परंतु इससे निपटने का कोई तरीका सरकार के पास नजर नहीं आ रहा।
योगी जी के नेतृत्‍व वाली भाजपा की सरकार को प्रदेश में सत्ता संभाले पांच महीने पूरे होने जा रहे हैं किंतु कानून-व्‍यवस्‍था के एक महत्‍वपूर्ण अंग यातायात की व्‍यवस्‍था भी अभी जस की तस है। पूरी कानून-व्‍यवस्‍था का तो कहना ही क्‍या।
ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि संपूर्ण व्‍यवस्‍था को परिवर्तित करने का दावा करने वाली योगी सरकार मात्र यातायात व्‍यवस्‍था को ही कब तक सुधार पाएगी?
सड़क सुरक्षा सप्‍ताह तो पहले भी मनाए जाते रहे हैं और अब भी मनाए जाते रहेंगे किंतु क्‍या वाकई सड़कें सुरक्षित होंगी।
क्‍या सड़कों पर उनकी लंबाई के हिसाब से फैले भ्रष्‍टाचार पर अंकुश लगेगा, पुलिस एवं आरटीओ की मिलीभगत से मनमानी करने वाले व्‍यावसायिक वाहन चालक क्‍या नियंत्रित होकर यातायात नियमों का पालन करने पर बाध्‍य होंगे? और यदि यह सब होगा तो कब तक ? इस काम के लिए भी पांच महीने कम हैं तो क्‍या पांच साल काफी होंगे ?
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

स्‍टिंग ऑपरेशन में मथुरा के कृष्‍ण मोहन मेडिकल कॉलेज पर बड़ा खुलासा: डीबार होने के बावजूद रिश्‍वत लेकर एडमीशन देने का काम जारी

मथुरा के पाली डूंगरा में सौंख रोड पर स्‍थित कृष्‍ण मोहन मेडिकल कॉलेज का बड़ा घपला सामने आया है। एक न्‍यूज़ चैनल द्वारा किए गए स्‍टिंग ऑपरेशन से पता चलता है कि वर्ष 2017-18 और वर्ष 2018-19 यानि दो वर्ष के लिए कृष्‍ण मोहन मेडिकल कॉलेज को मिनिस्‍ट्री ऑफ हेल्‍थ एंड फैमिली वेलफेअर से डीबार कर दिए जाने के बावजूद उसका मैनेजमेंट रिश्‍वत लेकर एडमीशन लेने के लिए तैयार था।
यही नहीं, जब न्‍यूज़ चैनल के रिपोर्टर ने स्‍टुडेंट का परिजन बनकर एडमीशन कन्‍फर्म करने का जवाब घर पर बात करने के बाद अगले हफ्ते देने की बात कही तो मैनेजमेंट के नुमाइंदे ने बाकायदा यह कहा कि अगले हफ्ते की स्‍थिति अगले हफ्ते बताएंगे। मैनेजमेंट के नुमाइंदे के कहने का आशय यह था कि आज जिस रेट में एडमीशन संभव है, उस रेट में अगले हफ्ते एडमीशन होगा या नहीं, यह उस समय की स्‍थितियों पर निर्भर होगा।
कृष्‍ण मोहन मेडिकल कॉलेज का यह दुस्‍साहस इसलिए बहुत अहमियत रखता है कि उसके द्वारा मिनिस्‍ट्री ऑफ हेल्‍थ एंड फैमिली वेलफेअर के समक्ष अपना पूरा पक्ष रखने के बाद भी मिनिस्‍ट्री ने उसे न सिर्फ दो साल के लिए डीबार किया बल्‍कि यह आदेश भी दिया कि भविष्‍य में कृष्‍ण मोहन मेडिकल कॉलेज तभी एडमीशन लेने के लिए अधिकृत होगा जब एमसीआई की टीम इंस्‍पेक्‍शन करके क्‍लीनचिट दे देगी। साथ ही एमसीआई, कॉलेज द्वारा दी गई 2 करोड़ रुपए की बैंक गारंटी भी कैश करा लेगी।
यहां यह जानकारी देना जरूरी है कि एमसीआई की टीम इससे पहले दो बार जब कृष्‍ण मोहन मेडिकल कॉलेज का नियमानुसार इंस्‍पेक्‍शन करने पहुंची तो पहली बार उसे कॉलेज के डीन ने यह कहकर टहला दिया कि वह कॉलेज के चेयरमैन की इजाजत के बिना इंस्‍पेक्‍शन की परमीशन नहीं दे सकते। दूसरी बार इस दलील के साथ वापस कर दिया कि उसने मिनिस्‍ट्री ऑफ हेल्‍थ एंड फैमिली वेलफेअर के सामने अभी अपना पक्ष नहीं रखा है इसलिए जब वह निर्धारित तिथि पर अपना पक्ष रख दे तब इंस्‍पैक्‍शन किया जाए।
गौरतलब है कि वर्ष 2016-17 में केंद्र सरकार की मिनिस्‍ट्री ऑफ हैल्‍थ एंड फैमिली वेलफेअर ने कृष्‍ण मोहन मेडिकल कॉलेज को 150 स्‍टुडेंट्स के एडमीशन की सशर्त परमीशन सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एमसीआई की ओवरसाइट कमेटी से प्राप्‍त रिपोर्ट के आधार पर दी थी।
शर्त के अनुसार अगले सत्र में एडमीशन के लिए कॉलेज को मिनिस्‍ट्री ऑफ हेल्‍थ एंड फैमिली वेलफेअर के सभी नियमों को पूरा करके एमसीआई की टीम का इंस्‍पेक्‍शन कराकर क्‍लीन चिट लेनी थी।
कॉलेज के संचालकों की बदनीयती और शासन को खुली चुनौती देने का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि मिनिस्‍ट्री ऑफ हैल्‍थ एंड फैमिली वेलफेअर के सामने हियरिंग पूरी हो जाने से पहले जब एमसीआई की टीम इंस्‍पेक्‍शन के लिए कॉलेज पहुंची थी तो वहां उसे ओपीडी ब्‍लॉक के रजिस्‍टर्ड काउंटर पर मात्र दो मरीज मिले जबकि कंसलटेशन रूम पूरी तरह खाली पड़ा था। फर्स्‍ट फ्लोर पर स्‍थित आईपीडी, मेडिकल वार्ड, टीबी चेस्‍ट वार्ड में ताला पड़ा था।
एमसीआई ने अपनी फाइनल इंस्‍पेक्‍शन रिपोर्ट में कृष्‍ण मेडिकल कॉलेज की जो दयनीय दशा बताई है, उसके अनुसार कॉलेज की फैकल्‍टी 86.15 प्रतिशत कम पाई गई। इसी प्रकार रेजीडेंट डॉक्‍टर्स 89.13 प्रतिशत कम मिले। किसी भी वार्ड में कोई मरीज कमेटी को नहीं मिला।
एमसीआई की रिपोर्ट के अनुसार कॉलेज में इसी प्रकार की कुल 19 बड़ी कमियां पाई गईं। इन कमियों से साफ पता लग रहा था कि कृष्‍ण मोहन मेडिकल कॉलेज एक ओर जहां मिनिस्‍ट्री ऑफ हेल्‍थ एंड फैमिली वेलफेअर, एमसीआई व सुप्रीम कोर्ट सहित शिकायतकर्ताओं की आंखों में भी धूल झोंक रहा है वहीं दूसरी ओर इन सभी को खुली चुनौती देते हुए लाखों रुपए अतिरिक्‍त वसूल कर एडमीशन देने का काम कर रहा है।
यह हाल तो तब है जबकि प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी सहित यूपी के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ भ्रष्‍टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाए हुए हैं और देशभर में भ्रष्‍टाचारियों के खिलाफ मुहिम चल रही है।
शिक्षा और विशेषकर मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में हो रहे इस भ्रष्‍टाचार का सर्वाधिक चिंताजनक पहलू यह है कि इस तरह बनने वाले डॉक्‍टर जब सरकारी अथवा निजी क्षेत्र में प्रेक्‍टिस करने उतरेंगे तो लोगों की जेब तथा जिंदगी पर कितने भारी पड़ेंगे।
देखना यह होगा कि कृष्‍ण मोहन मेडिकल कॉलेज के संचालकों द्वारा ”आजतक” न्‍यूज़ चैनल के स्‍टिंग ऑपरेशन में एडमीशन ने लिए खुलेआम रिश्‍वत मांगते हुए दिखाए जाने के बाद भी अब इनके खिलाफ कोई ठोस कार्यवाही हो पाती है अथवा नहीं।
या फिर ये शिक्षा माफिया इसी प्रकार मनमानी करने को स्‍वतंत्र रहते हैं और अच्‍छे तथा पेशेवर कॉलेजों की भी छवि खराब करने को आजाद रहते हैं।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

एक सैकड़ा मोदी और दो सैकड़ा योगी भी नहीं बदल सकते व्‍यवस्‍थाएं!

एक सैकड़ा मोदी और दो सैकड़ा योगी भी देश तथा प्रदेश की व्‍यवस्‍था नहीं बदल सकते क्‍योंकि झूठ, धोखा, फरेब, बेईमानी, भ्रष्‍टाचार जैसे आचरण न सिर्फ इस देश के शासक और प्रशासकों की बड़ी जमात में शामिल हैं बल्‍कि अधिकांश लोगों की भी फितरत का हिस्‍सा हैं।
गौर करें तो पाएंगे कि सरकारी क्षेत्र ही नहीं, निजी क्षेत्र में भी सिर्फ और सिर्फ झूठ का कारोबार फल-फूल रहा है। जिसे देखो वह सामने वाले की आंखों में मिर्च झोंकने को बैठा है ताकि उसे लूटा जा सके।
टीवी पर आने वाले 99 प्रतिशत विज्ञापन झूठ का करोबार करके देश की जनता को लूट रहे हैं। कोई टूथपेस्‍ट में ”नमक” न होने के बहाने बेवकूफ बना रहा है तो कोई टूथपेस्‍ट को ”वेदशक्‍ति” से लैस बताता है। एक अन्‍य कंपनी का टूथपेस्‍ट करने वाले की सांसें इस कदर महकती हैं कि राह चलती लड़की उसे किस करने पहुंच जाती है और उसकी सांसों में अपनी सांसें समाहित कर देती है।
कोई एक कंपनी साबुन में चांदी का वर्क बताकर उल्‍लू बना रही है तो दूसरी कंपनी टॉयलेट सोप में हल्‍दी और चंदन के गुण बताकर ठग रही है। किसी साबुन कंपनी का दावा है कि उसका साबुन इस्‍तेमाल करने वाले हर बीमारी से बचे रहते हैं तो कोई कंपनी कहती है कि उसके साबुन से स्‍किन चमकने लगती है।
कोई खास कंपनी अपनी बनियाइन पहनने वाले को ही ”महाबली” दर्शाती है तो दूसरी कंपनी अपनी बनियाइन पहनने वाले को ”शेर” के समकक्ष साबित करने पर तुली है। खास विदेशी कंपनी का पेय पीने वाला तो इस कदर तूफानी हो जाता है कि उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं रहता। इसी प्रकार खास चॉकलेट खाने वाले की बुद्धि अचानक ”आइंस्‍टीन” जैसे वैज्ञानिक को पीछे छोड़ देती है। उसकी बुद्धि इतनी तेज हो जाती है कि वह किसी घटना के होने से पहले उसका पता लगा लेता है। और तो और एक विज्ञापन के अनुसार तो उसकी कंपनी के चॉकलेट की भूख आदमी को औरत और औरत को आदमी में तब्‍दील करने की क्षमता रखती है।
एक खास कंपनी के डी-ओ इस्‍तेमाल करने वाले लड़के को देखते ही सड़क चलती तमाम लड़कियों की कामेच्‍छा जागृत हो जाती है तो ऐसी ही किसी कंपनी का परफ्यूम लगाने वाले लड़के के पीछे लड़कियां दीवानों की तरह भागने लगती हैं।
झूठ और फरेब के इन कारोबारों की पूरी कथा लिखने बैठा जाए तो हजार पेज भी कम पड़ जाएंगे। दो-तीन मोटे उपन्‍यास इतने में पूरे हो सकते हैं किंतु झूठ के करोबार का वर्णन फिर भी अधूरा रह जाएगा।
आश्‍चर्य की बात तो यह है कि झूठ, फरेब और शत-प्रतिशत धोखे के इस कारोबार का चौबीसों घंटे सभी टीवी चैनल व अखबार प्रसारण व प्रकाशन करते हैं किंतु कोई इन पर उंगली तक नहीं उठाता। लोग ठगे जा रहे हैं और सरकार तमाशबीन बनी हुई है।
सत्‍यवादी राजा हरिश्‍चंद्र का अवतार और हर किसी को कठघरे में खड़ा करने वाला मीडिया धोखे के इस धंधे में उनका सहभागी है क्‍योंकि उसी से उनके चैनल एवं अखबार चल रहे हैं। करोड़ों-अरबों की कमाई उन्‍हीं से होती है लिहाजा उनका हर झूठ सिर माथे।
विज्ञापनों की धोखाधड़ी के धंधे में शामिल मीडिया खुद भी झूठ का करोबार करने में पीछे नहीं है। इसका बड़ा उदाहरण है टीवी पर हर रोज और दिन में कई-कई बार कराए जाने वाले वो पैनल डिस्‍कशन जिनमें सत्ता पक्ष तथा विपक्ष के प्रवक्‍ताओं सहित विषय के अनुसार विशेषज्ञ शामिल होते हैं।
सत्‍ता पक्ष के प्रवक्‍ताओं की बात करें तो पैनल डिस्‍कशन में पार्टी के प्रवक्‍ता आते हैं, न कि सरकार के। इसी प्रकार विपक्षी पार्टी के प्रवक्‍ता डिस्‍कशन का हिस्‍सा बनते हैं।
सारे देश को मूर्ख समझने वाले इलैक्‍ट्रॉनिक मीडिया से कोई यह पूछने वाला नहीं है कि हे स्‍वघोषित बुद्धिजीवियो, किसी पार्टी का प्रवक्‍ता सरकार की नीति-रीतियों का जवाबदेह कैसे हो सकता है और कैसे वह सरकार के कामकाज का विश्‍लेषण कर सकता है। कोई सत्‍ताधारी पार्टी, अपने किसी प्रवक्‍ता को न तो सरकारी नीतिगत निर्णयों से अवगत कराती है और न सरकारी मीटिंग्‍स का हिस्‍सा बनाती है। उसे सरकार अथवा किसी सरकारी नुमाइंदे को भी सलाह-मशविरा देने का हक नहीं होता। पार्टी में भी उसका कद इतना बड़ा नहीं होता कि वह किसी मुद्दे पर अपना विचार हाईकमान तक पहुंचा सके। यही हाल विपक्षी पार्टी के प्रवक्‍ता का होता है। उस बेचारे की तो महीनों-महीनों अपने हाईकमान से मुलाकात भी होना संभव नहीं होता। जाहिर है कि ऐसे में अनेक गंभीर विषयों पर हर रोज होने वाले पैनल डिस्‍कशन किसी काम के नहीं। वह निरर्थक हैं क्‍योंकि न तो सत्‍ताधारी पार्टी के प्रवक्‍ता उनके निहितार्थ को प्रभावित करने का माद्दा रखते हैं और न विपक्षी प्रवक्‍ता कोई ठोस कदम उठवाने में सहायक हो सकते हैं।
सभी प्रमुख पार्टियों के प्रवक्‍ता अगर कोई काम पूरी काबिलियत के साथ करते हैं तो वो काम है एक-दूसरे की पार्टियों पर दोषारोपण करना। टीवी ऐंकर का प्रश्‍न कैसा भी क्‍योंन हो, जवाब में वह तुलनात्‍मक अध्‍ययन शुरू कर देते हैं। कई बार तो आपराधिक आरोपों के बारे में भी इस आशय की दलील देने लगते हैं कि फलां पार्टी के शासन में ऐसा नहीं हुआ क्‍या। जैसे एक पार्टी के शासन में कोई अपराध कभी हुआ तो दूसरी पार्टी को उस तरह के अपराध करने का लाइसेंस मिल गया हो।
यही हाल उन कथित विशेषज्ञों का है जिन्‍हें अवकाश प्राप्‍ति के बाद उनका अपना विभाग तक नहीं पूछता, सलाह मानना तो बहुत दूर रहा। उनका टीवी पर आना मात्र अपनी भड़ास निकालने तथा चेहरा चमकाने तक सीमित है। ऐसे में विचारणीय प्रश्‍न यह है कि टीवी पर दिन-रात कराए जाने वाली इन बहसों का जब कोई परिणाम निकलना ही नहीं होता और इन बहसों में शामिल लोग किसी अच्‍छी या बुरी सलाह को अपने आकाओं तक पहुंचाने का अधिकार नहीं रखते तो ऐसी बहसें किस काम की। हां, इनसे टीवी चैनल की टीआरपी जरूर ऊपर-नीचे होती है अर्थात वही पब्‍लिक को बेवकूफ बनाकर अपना उल्‍लू सीधा करने का धंधा। निरर्थक बहसों से सार्थक कमाई।
मोदी सरकार ने नोटबंदी की तो विपक्ष ने पूरा देश सिर पर उठा लिया। संसद ठप्‍प और सड़कें जाम कर दीं। नौटंकी यहां तक कि कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी खुद नोट बदलवाने का दिखावा करने के लिए बैंक के बाहर लाइन में जाकर खड़े हो गए। मोदी के कदम को जनविरोधी और गरीबों की जिंदगी से खिलवाड़ करने वाला बताया गया, लेकिन किसी ने यह नहीं सोचा कि दशकों बाद सत्ता हासिल करने वाली एनडीए अपने लिए आत्‍मघाती कदम क्‍यों उठाऐगी। विपक्ष के तमाशे में व्‍यापारियों के भी एक वर्ग ने साथ दिया। नोटबंदी के बाद हुए पांच राज्‍यों के चुनावों ने जवाब दे दिया, लेकिन विपक्ष से किसी ने जवाब नहीं मांगा कि संसद ठप्‍प करने तथा सड़कों को जाम करने से हुए नुकसान की भरपाई कौन करेगा।
सेना द्वारा पाकिस्‍तान के खिलाफ की गई जिस सर्जीकल स्‍ट्राइक को हजारों किलोमीटर दूर बैठे अमेरिका तक ने स्‍वीकार किया, उस सर्जीकल स्‍ट्राइक पर हमारे देश के कई विपक्षी नेताओं ने सवाल खड़े कर दिए। उन्‍हें सर्जीकल स्‍ट्राइक के सबूत चाहिए थे क्‍योंकि उनकी दुकानदारी ऐसे ही फरेबी बातों से चलती है। उनकी गुमनाम जिंदगी को प्रसिद्धि मिलती है क्‍योंकि मीडिया ऐसी बकवासों पर भी बहस जो कराता है।
नेता नगरी की करतूतों का एक दूसरा पहलू भी है परंतु दुर्भाग्‍य से उन करतूतों पर कोई धरना-प्रदर्शन, आंदोलन अथवा विरोध नहीं होता। टीवी भी उन पर बहस नहीं कराता। यह पहलू बड़ा मजेदार है। इस पर रिसर्च की जा सकती है।
पहलू यह है कि लगभग हर मुद्दे पर परम विरोधाभाषी और एक-दूसरे की जान के दुश्‍मन व खून के प्‍यासे दिखाई देने वाले हमारे राजनीतिक दल, तब पूरी तरह एकस्‍वर से बोलते सुने जाते हैं जब बात आती है इनके वेतन-भत्‍तों एवं सुख-सुविधाओं में बढ़ोत्तरी की। इस पहलू को देखें तो लगता है जैसे सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं और सहोदर हैं। कुर्सी-कुर्सी करना इनके प्रिय खेल का हिस्‍सा है। म्‍यूजिकल चेयर नामक गेम की तरह। शतरंज की बिसात बिछाए बैठे इन विभिन्‍न राजनीतिक दलों के लिए जनता, गरीब, गरीबी, बेरोजगारी, कानून-व्‍यवस्‍था, देशहित, राष्‍ट्रहित, जनहित आदि-आदि बहुत से मोहरे हैं जिनका प्रयोग यह म्‍यूजिकल चेयर के गेम में करते हैं।
म्‍यूचुअल अंडरस्‍टेंडिंग के तहत यह बारी-बारी से इन मोहरों को इस्‍तेमाल करते हैं और जब जरूरत होती है तब धर्म, जाति तथा संप्रदाय आदि के नाम पर मरवा भी देते हैं। शह और मात के लिए यह सब जरूरी जो होता है। कुल मिलाकर आंखों में धूल झोंकने का काम पिछले करीब 70 वर्षों से बदस्‍तूर जारी है लेकिन आज तक कोई पकड़ नहीं पाया।
कहने को यहां दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था है, इस व्‍यवस्‍था के तहत चुनाव भी होते हैं। लोग बड़ी संख्‍या में मतदान करते हैं। व्‍यवस्‍था परिवर्तित होते दिखती भी है लेकिन परिवर्तित होती नहीं क्‍योंकि सांपनाथ कहें या नागनाथ, सत्ता तो उन्‍हीं में से किसी एक को मिलनी है। स्‍वतंत्रता के बाद से ही ऐसे मुकम्‍मल इंतजाम कर दिए गए कि सूरतें बेशक बदलती रहें, किंतु सीरत नहीं बदलनी चाहिए। जनता को विकल्‍प ही ऐसे दो कि उसके पास कोई विकल्‍प हो ही नहीं। वह सांपनाथ या नागनाथ में से ही किसी एक को चुनने पर मजबूर रहे।
हाल ही में समाजवादी पार्टी के सांसद नरेश अग्रवाल ने सदन के अंदर पहले तो हिंदू देवी-देवताओं पर शर्मनाक टिप्‍पणी की, और जब उसे किसी अखबार ने छाप दिया तो कहने लगे कि संबंधित पत्रकारों को विशेषाधिकार हनन का दोषी मानते हुए खिंचवाया जाए जिससे फिर कोई पत्रकार माननीयों के मान से खिलवाड़ न कर सके।
सीधा सा मतलब यह है कि जिन सड़क छापों को जनता ने विकल्‍प न होने की मजबूरी में नेता बना दिया, वह तो सबकुछ बोलने को स्‍वतंत्र हैं लेकिन पत्रकार को उनके शर्मनाक कृत्‍य सामने लाने की भी स्‍वतंत्रता नहीं है। ये तो चंद उदाहरण हैं अन्‍यथा माननीयों के कुकृत्‍यों से स्‍वतंत्र भारत का इतिहास भरा पड़ा है।
झूठ बोलकर और जनता से फरेब करके सदन के माननीय सदस्‍य तथा मंत्री बनने वाले लोगों पर क्‍या किसी अदालत में इस बात के लिए मुकद्दमा चला कि उन्‍होंने देश को धोखा क्‍यों दिया। क्‍यों झूठे वायदे करके जनता को ठगा। क्‍यों उनके अपने पास तो हर सुख-सुविधा होती है लेकिन आम जनता छोटी-छोटी जरूरतों के लिए व्‍यवस्‍था की कदम-कदम पर बना दी गई चौखटों पर माथा रगड़ती फिरती है।
इतने तो पूरे देशभर में मंदिर-मस्‍जिद, गुरद्वारे और चर्च भी नहीं होंगे जितने कि व्‍यवस्‍थाओं के जाल बुने हुए हैं। परेशानी में पड़े हुए व्‍यक्‍ति को समझ में ही नहीं आता कि वह शुरू कहां से करे। शुरू कर भी दे तो खत्‍म कहां जाकर होगा। इसी जन्‍म में उसकी परेशानी का निदान हो जाएगा या फिर और कई जन्‍म लेने पड़ेंगे। न पहले पायदान का पता है और न आखिरी का। एकबार फंस गया व्‍यवस्‍था के भंवरजाल में तो फिर उबरना केवल ”संभावना” पर निर्भर है।
जो न्‍याय व्‍यवस्‍था किसी भी ”आम आदमी” की आखिरी उम्‍मीद होती है, वह दरअसल ”खास लोगों को उपलब्‍ध है। आम आदमी को तो वहां भी तारीख ही मिलती है, हर तारीख पर एक नई तारीख।
भारत, दुनिया का एक अकेला ऐसा अजूबा मुल्‍क है जहां न्‍यायाधीश ही न्‍यायाधीश को नियुक्‍त करते हैं, वही तय करते हैं कि कौन कहां होगा और वही ”मानना” तथा ”अवमानना” की परिभाषा निर्धारित करते हैं।
न्‍याय व्‍यवस्‍था का मजाक देखिए कि जिनके आगे विद्वान न्‍यायाधीश लिखा जाता है, उनकी विद्वता को उन्‍हीं के साथी खुली चुनौती देते हैं और उनके फैसलों को गलत साबित करते हैं लेकिन जिम्‍मेदारी किसी पर तय नहीं होती। सेशन कोर्ट जो निर्णय देता है, उसे हाईकोर्ट पूरी तरह पलट देता है और हाईकोर्ट जो फैसला सुनाता है, उसे सुप्रीम कोर्ट पूरी तरह खारिज करके नए सिरे से सुनवाई का आदेश सुना देता है। आखिर सब के सब विद्वान न्‍यायाधीश जो हैं। पुलिस का एक दरोगा यदि अपनी तफ्तीश में गलती कर दे तो उसे कठघरे में खड़ा किया जा सकता है किंतु विद्वान न्‍यायाधीश पूरा फैसला गलत सुना दे तो भी सिर्फ उच्‍च न्‍यायालय में अपीलभर की जा सकती है। वो अपील जिसे स्‍वीकार करना अथवा न करना एक अन्‍य विद्वान न्‍यायाधीश का ”विशेषाधिकार” है।
कितनी अजीब है ये व्‍यवस्‍था कि जिस काम के लिए ”विद्वान न्‍यायाधीश” के पद पर नियुक्‍ति हुई है, जिसके लिए सरकार वेतन-भत्ते देती है, मान-सम्‍मान और अनेक सुख सुविधाएं देती है, समाज में प्रतिष्‍ठा मिलती है, उसी काम पर प्रश्‍नचिन्‍ह लगता है लेकिन जवाबदेही तय नहीं होती।
रामजन्‍मभूमि का केस कई दशकों तक हाईकोर्ट में चलता है, और जब तीन जजों की बैंच उस पर फैसला सुनाती है तो सर्वोच्‍च न्‍यायालय कहता है कि यह कैसा फैसला है। यह फैसला तो किसी दृष्‍टि से उचित है ही नहीं। अब फिर कई वर्षों से वह केस सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
अब अगर बात करें लोकतंत्र के तीसरे स्‍तंभ यानि कार्यपालिका की, तो वह भी झूठ ही झूठ परोस रही है। जनहित जैसे शब्‍द और लोकतंत्र की व्‍यवस्‍था उसके लिए केवल वहीं तक सीमित है जहां तक उससे उसके अपने स्‍वार्थ पूरे होते हों, बाकी तो सब दिखावा है। उनके लोकतंत्र में लोक कहीं होता ही नहीं, सिर्फ तंत्र ही तंत्र होता है जो उन्‍हें स्‍वतंत्र व ”लोक” को परतंत्र बनाकर रखता है।
उत्तर प्रदेश में योगी सरकार आ गई, बड़ी उम्‍मीदों के साथ जनता ने सत्ता परिवर्तन किया। भाजपा ने भी कहा था कि यह सत्ता का नहीं, व्‍यवस्‍था का परिवर्तन होगा लेकिन व्‍यवस्‍था है कि कहीं से बदलने का नाम नहीं ले रही। न पुलिस का रवैया बदला और न प्रशासन का। जब कुछ बदल ही नहीं रहा तो कानून-व्‍यवस्‍था बदलेगी कैसे।
योगी जी ने भी अपनी पूर्ववर्ती सरकारों की तरह अफसरों को ताश के पत्‍तों की भांति फैंट कर देख लिया किंतु नतीजा वही ढाक के तीन पात बना हुआ है। झूठ का कारोबार बदस्‍तूर जारी है। ठगों के मायाजाल की तरह सरकार को वही दिखाया जाता है जो वह देखना चाहती है। जनता दर्शन, दिग्‍दर्शन बनकर रह गया। गधे को घोड़ा और गाय के बछड़े को गधे का बच्‍चा बताकर आंखों में धूल झोंकी जा रही है। उत्तर प्रदेश, उत्तम प्रदेश बनने का सपना आंखों में पाले योगी जी और मोदी जी की ओर टकटकी लगाकर देख रहा है किंतु व्‍यवस्‍थाएं जस की तस हैं।
पेट्रोल पंपों की घटतौली का हाल शुरू में ही सामने आ जाने के बावजूद एक ठेल-ढकेल लगाने वाले से लेकर मॉल में बैठा दुकानदार तक घटतौली करने से नहीं चूक रहा। कल की ही खबर है कि बांट-माप विभाग ने छापेमारी की तो पता लगा कि तीन किलोमीटर के दायरे में मौजूद एक भी दुकानदार ऐसा नहीं मिला जो ग्राहक को पूरा सामान तौलकर दे रहा हो। कोई 18 ग्राम कम दे रहा है तो कोई 20 ग्राम। इस पर तुर्रा यह कि सरकार व्‍यापारियों की विरोधी है।
हर किस्‍म का टैक्‍स अदा करता है ग्राहक, लेकिन रोता है व्‍यापारी। बंद और धरना प्रदर्शन करता है करोबारी। कैसी विडंबना है कि बेईमानी करने से रोकने की व्‍यवस्‍था की जाती है तो वह गलत और बेईमानी करने की छूट मिल जाए तो वह सही।
एक मजदूर तक बीड़ी फूंकने और चाय की चुस्‍की लेते हुए घड़ी पर नजर रखता है कि कब पांच बजें और कब वह काम छोड़कर जाए। उसका ध्‍यान काम की जगह दिहाड़ी पूरी करने पर लगा रहता है।
सीमा पर तैनात जवान बेशक अपनी जान जोखिम में डालकर देश तथा देशवासियों की सुरक्षा करते हैं किंतु किसी जवान के शहीद हो जाने पर उसके परिजन जिस तरह तमाशा खड़ा करते हैं और जायज-नाजायज मांगों को सामने रखकर सरकार को ब्‍लैकमेल करते हैं, क्‍या वह उचित है। निश्‍चित ही हर शहीद के परिजन ऐसा नहीं करते किंतु पिछले कुछ समय से अधिकांश परिजनों को यही करते देखा गया है। यहां तक कि बहुत से परिवारीजन तो शहीद के शव तक की बेकद्री करने पर आमादा हो जाते हैं। अंतिम संस्‍कार करने को तैयार नहीं होते।
कानून-व्‍यवस्‍था में बड़ी भूमिका निभाने वाली पुलिस का तो कहना ही क्‍या। पुलिस की चाल और उसका चरित्र जिस दिन बदल जाएगा, उस दिन शायद इस देश में बदलाव की पहली किरण फूटेगी।
यही कारण है कि मोदी की दिल्‍ली हो या योगी की यूपी, क्राइम कहीं कम होता नजर नहीं आता। आंकड़ों की बाजीगरी अथवा राजनीति के दांवपेचों से चाहे कोई दावा कुछ भी कर ले किंतु हकीकत यही है कि खाकी को खुराक दे पाने में हर सरकार असफल है जबकि खाकी ही किसी सरकार की असफलता या सफलता तय करने का मानक बनती है।
अपराध चाहे टीवी पर आने वाले फर्जी विज्ञापनों से जुड़ा हो अथवा सड़क पर और किसी चारदीवारी के अंदर हो, बिजली चोरी का हो अथवा घटतौली का, सामाजिक न्‍याय व्‍यवस्‍था से ताल्‍लुक रखता हो या फिर न्‍यायिक व्‍यवस्‍था से, पुलिस की भूमिका हर जगह महत्‍वपूर्ण हो जाती है क्‍योंकि कि अंतत: पुलिस ही वह ”बॉडी” है जो तत्‍काल व प्रभावी भूमिका अदा करती है। कहने को जांच एजेंसियों की देश में कोई कमी नहीं है किंतु अंग्रेजों के जमाने से चला आ रहा खाकी का खौफ सर्वाधिक कारगर साबित होता है।
किसी तरह खाकी के चाल-चरित्र में समय की मांग के अनुरूप बदलाव हो जाए और वह अपने सूत्र वाक्‍य ”परित्राणय साधुनाम, विनाशाय च दुष्‍कृताम” को सार्थक सिद्ध करने लगे तो निश्‍चित ही कोई एक मोदी तथा कोई एक योगी देश तथा प्रदेश को बदलने में सक्षम साबित होगा अन्‍यथा मोदी एवं योगियों की फौज भी उस बदलाव की वाहक नहीं बन सकती जिसकी उम्‍मीद आम जनता ”सरकारों” से करती चली आ रही है।
हालांकि बदलाव के लिए उस आम आदमी को भी बदलना होगा जिससे ईमानदारी पूर्वक अपना-अपना काम करने की अपेक्षा की जाती है। जिससे देशहित को सर्वेपरि समझने की उम्‍मीद रखी जाती है।
उस न्‍यायपालिका को भी बदलना होगा जो हर देशवासी के लिए उम्‍मीद की आखिरी किरण है। उस ब्‍यूरोक्रेसी को भी बदलना होगा जो 70वां स्‍वतंत्रता दिवस मनाने के लिए भले ही तैयार हों परंतु ”लाटसाहिबी” के अहम् से अब भी स्‍वतंत्र नहीं हो पाए हैं।
और हां, उन माननीयों को तो बदलना ही होगा जिन्‍होंने बेमन के साथ अपनी गाड़ियों के ऊपर से लालबत्‍ती भले ही हटा ली हो किंतु दिमाग से वीवीआईपी कल्‍चर नहीं हटा पाए हैं। उन्‍हें अपने वेतन-भत्ते तो बहुत कम लगते हैं किंतु अपने आचार-व्‍यवहार में कोई कमी नजर नहीं आती। शासक होने की उनकी ”बू” खत्‍म होने का नाम नहीं ले रही।
यही वो बू है जो सत्ता बदलने के बावजूद व्‍यवस्‍था बदलने में आड़े आती है क्‍योंकि व्‍यवस्‍था उस अहम् की तुष्‍टि करने का माध्‍यम रही है जो विशिष्‍ट तथा अति विशिष्‍ट होने का अहसास कराती है।
व्‍यवस्‍था बदलनी है तो सत्ता के सोपान पर बैठकर भी विशिष्‍टता के भाव को किनारे करना होगा अन्‍यथा झूठ, धोखा, फरेब, बेईमानी, भ्रष्‍टाचार का यह कारोबार हर स्‍तर पर उसी तरह जारी रहेगा जिस तरह आज भी जारी है।
बदलाव मोदी और योगियों के हाथ में कमान आ जाने से नहीं, उस सोच से होगा जिसमें राष्‍ट्रहित सर्वोपरि है और जो ”सर्वे भवन्तु सुखिनः” में पूर्ण आस्‍था व विश्‍वास के साथ जीवन जीने की परंपरा कायम कर सकती है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शनिवार, 27 मई 2017

…और अब चैप्‍टर क्‍लोज

दो हत्‍याएं, करोड़ों की लूट, विधाता के धाम से विधानभवन तक गूंज, फिर उसकी भी अनुगूंज। अनशन, धरना-प्रदर्शन व बंद, सत्ता पक्ष व विपक्ष के दौरे, सवाल…सवाल और सवाल।
सवालों के जवाब में तीन कुख्‍यात भाइयों और उनके तीन हलूकरों की गिरफ्तारी, मात्र 20 लाख रुपए मूल्‍य के माल की कथित बरामदगी…और चैप्‍टर क्‍लोज।
पुलिस-प्रशासन मुर्दाबाद का नारा, चार दिन के अंतराल में पुलिस-प्रशासन जिंदाबाद में ”तरमीम” हो गया। बेडवर्क, गुडवर्क बन गया। चार दिन में पराई होते-होते एक पार्टी फिर से अपनी हो गई। राजनीति की रोटी सेंकने का प्रयास करने वालों के मंसूबे धरे-धरे के धरे रह गए। मरने वालों की चिता ठीक से ठंडी भी नहीं हुई कि पुलिस को प्रशस्‍ति पत्र बांट दिए गए। इनाम-इकराम से नवाजे जाने का ऐलान कर दिया गया। सम्‍मान समारोह की तैयारियां होने लगीं। राम राज्‍य लौट आया। जिंदगी से लेकर व्‍यापार तक सब अपने ढर्रे पर वापस।
कौन कह सकता है कि इसी महीने की 15 तारीख को मयंक चेन पर हुई जघन्‍य वारदात के बाद धर्म की यह छोटी सी दुनिया उबल रही थी। बच्‍चे से लेकर बूढे़ तक की जुबान सिर्फ यही बोल रही थी कि बहुत बुरा हुआ।
20 मई को भोर होते-होते वही जुबान पलटने लगी। सूर्य चढ़ने के साथ शहर का पारा नॉर्मल होने लगा। जो लोग खाकी को खाक में मिला देने को आतुर थे, वही लोग उसकी शान में कसीदे पढ़ने लगे। यही है फितरत और यही असलियत भी।
पुलिस जानती है कि उसकी स्‍क्रिप्‍ट पर उंगली उठाने की हिमाकत प्रथम तो कोई करता नहीं, और यदि कोई करता भी है तो जवाब देने की जरूरत नहीं।
प्रेस कांफ्रेंस होती हैं लेकिन लकीर पीटने के लिए। सवाल उठाने का दौर बीत गया। सवाल किसी को अच्‍छे नहीं लगते। जवाब सुहाते हैं।
मीडिया की आवाज़ नक्‍कारखाने की तूती बनकर रह गई है और मीडियाकर्मी मीडिएटर। वह न तो आवाज़ उठाते हैं और न आवाज़ बनते हैं, वह आवाज़ मिलाते हैं। जिसकी ढपली, उसका राग।
लिखा-पढ़ी में व्‍यापारी बेशक कमजोर हो किंतु पुलिस चुस्‍त-दुरुस्‍त है। उसने हवा का रुख भांपकर घटना के दूसरे दिन ही कर लिया एक तीर से कई निशाने साधने का इंतजाम। सांप मर जाए और लाठी भी जस की तस बनी रहे, इस कला में खाकी का कोई मुकाबला नहीं।
एक मृतक के परिजनों को आश्‍वासन की पोटली थमा दी तो दूसरे के परिजनों को सड़क पर मिली गहनों की पोटली। होगा कोई सर्राफ जिसने रख लिए लाखों के जेवरात।
होंगे कोई कर्मचारी व कारीगर जिनकी बदनीयत ने घायल अवस्‍था में गोलियों का धुंआ साफ होने से पहले ही सर्राफ को थमा दी जेवरात व नकदी की वह पोटली। पुलिस को अब इस सबसे क्‍या मतलब।
किसने की सर्राफों की सुरागरसी, कौन था आस्‍तीन का सांप..सारे प्रश्‍न अपनी जगह। प्रश्‍न शेष हैं तो रहें, उत्तर दिया जा चुका है। देखेंगे, देख रहे हैं और देखते रहेंगे।
किसी को छोड़ेंगे नहीं, लाखों का माल मिल गया अब करोड़ों के लिए भी कोशिश करेंगे लेकिन पहले ब्‍यौरा तो दो।
चार दिन में चार हजार बार पुलिस से उसके काम का हिसाब मांगा गया, पर कारोबार का हिसाब अब तक नहीं मिला। अब क्‍या बदमाश बताएंगे कि कितना माल लूट कर ले गए।
पहले हिसाब दो, फिर हिसाब मांगो। नहीं दे सकते तो हिसाब-किताब बराबर समझो। बहुतों का हिसाब इसी तरह हुआ है बराबर। गोली मारीं, गोली खाईं…इनका भी तो हिसाब देना है, और अकेले देना है। बदमाशों के असलाह से फायर निकले या फुहार, इससे किसी को क्‍या वास्‍ता। बदमाश खाकी को और खाकी बदमाशों को, दोनों एक-दूसरे को बहुत अच्‍छी तरह जानते हैं। दोनों के असलाह भी परस्‍पर पहचानते हैं। कितनी मार करनी है, कैसी करनी है, सब उन्‍हें पता होता है। आखिर चोली-दामन का साथ है। किसी एक घटना से कैसे छूट सकता है यह साथ।
यूं भी यूपी बहुत बड़ा है। कोई योगी आए या भोगी, कर्मयोगियों को फर्क नहीं पड़ता। ज्‍यादा से ज्‍यादा क्‍या? इधर या उधर।
वसीम बरेलवी का एक शेर, और बात खत्‍म।
जहां रहेगा, वहीं रोशनी लुटाएगा।
किसी चराग़ का अपना मकां नहीं होता।।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

यक्ष प्रश्‍नों का जवाब दिए बिना पुलिस ने “मयंक चेन” पर हुए मर्डर व लूट को खोलने का किया दावा

मथुरा। एक मुठभेड़ के बाद पुलिस ने आज आधा दर्जन बदमाशों को पकड़कर ज्‍यूलिरी फर्म ”मयंक चेन” पर हुए डबल मर्डर व करोड़ों रुपए की लूट के पर्दाफाश का दावा किया है।
15 मई की रात करीब साढ़े आठ बजे शहर के मध्‍य कोयला वाली गली में स्‍थित मयंक चेन नामक ज्‍यूलिरी फर्म पर आधा दर्जन सशस्‍त्र बदमाशों ने धावा बोला और अंधाधुंध गोलीबारी करके विकास एवं मेघ अग्रवाल की हत्‍या कर दी तथा विकास के भाई मयंक सहित तीन लोगों को गंभीर रूप से घायल कर दिया।
बदमाश यहां से करोड़ों रुपए मूल्‍य का सोना तथा लाखों रुपए नकद ले जाने में सफल रहे।
 घटना  से  जुड़ा  बीडियो  यहां  देखें - 

 https://youtu.be/5ESX391bTU4


बदमाशों द्वारा की गई यह दुस्‍साहसिक वारदात दुकान के अंदर लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई किंतु अधिकांश बदमाशों के चेहरे कपड़े व हैलमेट से ढके होने के कारण उनकी पहचान करना मुश्‍किल हो रहा था।
हमलावर बदमाशों में से एक का चेहरा आधा खुला था। पुलिस का दावा है कि वही कुख्‍यात ईनामी अपराधी राकेश उर्फ रंगा है, जो गैंग का सरगना भी है।
रंगा का एक अन्‍य भाई बिल्‍ला हत्‍या के दूसरे मामले में काफी समय से जेल के अंदर निरुद्ध है।

रंगा और बिल्‍ला के नाम से कुख्‍यात यह दोनों भाई सबसे पहले तब सुर्खियों में आए जब करीब डेढ़ दशक पूर्व इन्‍होंने होलीगेट के अंदर भीड़ भरे छत्ता बाजार से आर के ज्‍वैलर्स के कर्मचारी को गोली मारकर भारी मात्रा में सोने के जेवरात व नकदी लूट ली।
दीपावली से ठीक दो दिन पहले की गई इस लूट के बाद भी शहर में काफी हंगामा हुआ था। रंगा-बिल्‍ला पकड़े तब भी गए थे और पुलिस ने इनके कब्‍जे से लूट का पूरा माल बरामद होने की बात भी कही थी किंतु बताया जाता है कि अधिकांश माल की बरामदगी नहीं हो सकी क्‍योंकि पीड़ित सर्राफा व्‍यापारी ने अंत तक अपने नुकसान का ब्‍यौरा पुलिस को नहीं दिया।
इसके बाद इन दोनों भाइयों ने एक मामूली सी बात पर अपने पड़ोसी भूलेश्‍वर चतुर्वेदी को समझौते के बहाने घर बुलाकर उसकी हत्‍या कर दी। बाद में भूलेश्‍वर के बड़े भाई तोलेश्‍वर उर्फ तोले बाबा को भी तब मार दिया गया जब वह भूलेश्‍वर के केस की पैरवी के लिए कचहरी जा रहा था। हत्‍या के इन्‍हीं मामलों में रंगा का भाई बिल्‍ला इन दिनों मथुरा जिला कारागार में बंद है।
इस रंजिश के चलते रंगा-बिल्‍ला के चाचा विजय को भी चौबिया पाड़ा क्षेत्र में मार दिया गया था।
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार राकेश उर्फ रंगा पर फिलहाल एक दर्जन संगीन मामले दर्ज हैं साथ ही 15 हजार रुपए का ईनाम भी घोषित है।
पुलिस का दावा है कि पकड़े गए बदमाशों में शामिल कुख्‍यात ईनामी बदमाश राकेश उर्फ रंगा ही वह शख्‍स है जो मयंक चेन से प्राप्‍त सीसीटीवी फुटेज में प्रमुख रूप से दिखाई दे रहा है।
रंगा के साथ पुलिस ने उसके दो छोटे भाई नीरज एवं चीनी उर्फ कामेश को भी पकड़ा है। गिरफ्त में आए बाकी तीन बदमाशों के नाम आयुष, विष्‍णु उर्फ छोटे तथा आदित्‍य बताए गए हैं।
बताया जाता है कि पुलिस से मुठभेड़ में नीरज गंभीर रूप से घायल हुआ है और उसे गोली लगी है तथा रंगा व चीनी भी घायल हैं।
पुलिस ने इनके कब्‍जे से 20 लाख रुपए मूल्‍य के सोने व हीरे के आभूषण तथा असलाह और मय सिम कार्ड मोबाइल की बरामदगी दिखाई है।
सीसीटीवी फुटेज में दिखाई देने वाले नकाबपोश बदमाश यही थे, इसका पता तो फुटेज की फॉरेंसिक जांच के बाद ही लगेगा अलबत्ता पुलिस ने इस बावत बुलाई गई अपनी प्रेस वार्ता में ऐसी कोई जानकारी नहीं दी कि बदमाशों के कब्‍जे से बरामद माल 16 मई को मयंक चेन के पड़ोसी सर्राफ के यहां से मिले माल से अलग है। यहां यह जान लेना भी जरूरी है कि पुलिस को अब तक पीड़ित व्‍यापारियों ने लूट के माल का कोई ब्‍यौरा नहीं दिया और न ही एफआईआर में इसकी कोई जानकारी दी गई थी।
गौरतलब है कि 16 मई को बरामद वह माल पांच व्‍यापारियों की कमेटी के सामने सीओ सिटी जगदीश सिंह ने मृतक व्‍यापारी मेघ अग्रवाल के पिता को इस शर्त पर सौंप दिया था कि इसे बरामदगी मानते हुए पुलिस की जरूरत के हिसाब से प्रस्‍तुत किया जाएगा।
इसके ठीक विपरीत व्‍यापारियों का कहना था कि उस माल के मिलने में पुलिस की कोई भूमिका नहीं थी। उसे पड़ोसी सर्राफा व्‍यापारी ने व्‍यापारियों को दिया था लिहाजा उसे बरामदगी नहीं माना जा सकता।
पुलिस द्वारा रंगा गैंग से दिखाई जा रही 20 लाख रुपए मूल्‍य की बरामदगी का कोई विस्‍तृत ब्‍यौरा न दिए जाने और आज सुबह ही मेघ अग्रवाल के पिता महेश अग्रवाल द्वारा यह कहे जाने कि उनके ऊपर पुलिस सौंपे गए माल को देने का दबाव बना रही है, यह संदेह होना स्‍वाभाविक है कि पुलिस जिसे रंगा गैंग से बरामद माल बता रही है वह कहीं मेघ अग्रवाल के पिता को सौंपा गया माल ही तो नहीं है।
यदि ऐसा है तो पुलिस के पास बरामदगी के नाम पर रह क्‍या जाता है और कोर्ट में पुलिस का यह गुडवर्क पीड़ित को कितनी राहत दिला सकेगा।
सीसीटीवी फुटेज में दिखाई देने वाले चेहरों से पकड़े गए बदमाशों की शिनाख्‍त पर भी लोग उंगली उठा रहे हैं। बहुत से लोगों का लग रहा है कि जो आधे या पूरे खुले चेहरे सीसीटीवी की फुटेज में दिखाई दे रहे हैं, उनसे पकड़े गए बदमाशों का चेहरा हूबहू मेल खाता नजर नहीं आता।
बहरहाल, इसमें कोई दो राय नहीं कि रंगा-बिल्‍ला के नाम से मशहूर चार भाइयों के इस गैंग की इलाके में भारी दहशत थी और आम आदमी तथा व्‍यापारी इनसे खौफ खाते थे। आसपड़ोस में भी इन्‍होंने आतंक फैला रखा था।
यही कारण है कि न सिर्फ शहर के लोगों ने बल्‍कि आस-पड़ोस के लोगों ने भी इनके पकड़े जाने पर राहत की सांस ली है और चौबिया पाड़ा क्षेत्र में जश्‍न का माहौल बना हुआ है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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