शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

”खिन्‍न” होकर नहीं, ”खेल” खुल जाने के कारण रद्द किया हेमा मालिनी ने ”होली रसोत्‍सव”

भाजपा सांसद और प्रसिद्ध सिने अभिनेत्री हेमा मालिनी द्वारा अपने संसदीय क्षेत्र मथुरा में विश्‍व विख्‍यात तीर्थ स्‍थल विश्राम घाट के सामने किया जाने वाला ”होली रसोत्‍सव” कार्यक्रम रद्द होने का ठीकरा भले ही माथुर चतुर्वेद परिषद के सिर फोड़ने की कोशिश की जा रही हो किंतु हकीकत यह है कि इस कार्यक्रम के नाम पर बड़ा ”खेल” खेलने की जानकारी सार्वजनिक होने के कारण इसे रद्द किया गया है।
करोड़ों रुपए की उगाही
विश्‍वस्‍त सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार मथुरा में सांसद हेमा मालिनी द्वारा किये जाने वाले इस दो दिवसीय सांस्‍कृतिक कार्यक्रम के लिए करीब 10 करोड़ रुपए की उगाही की गई थी।
यह उगाही उन सौ लोगों से की गई जिन लोगों को यमुना की महाआरती में शामिल होने का अवसर दिया जा रहा था। ऐसे प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति से 10 लाख रुपए लिए गए थे।
यमुना की महाआरती में उत्‍तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ के भी शामिल होने की सूचना थी।
होली रसोत्‍सव के नाम से किया जाने वाला यह सांस्कृतिक महोत्‍सव 23 और 24 फरवरी को किया जाना था।
चूंकि 24 फरवरी को मथुरा के बरसाना में विश्‍व प्रसिद्ध लठामार होली के मुख्‍य अतिथि मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ हैं लिहाजा यह तय था कि योगी आदित्‍यनाथ इस कार्यक्रम में हिस्‍सा जरूर लेंगे।
इस दो दिवसीय होली रसोत्‍सव के आयोजन की तारीख 23 तथा 24 फरवरी भी इसीलिए बहुत सोच-समझ कर रखी गई थी ताकि इसमें शामिल होने के लिए योगी आदित्‍यनाथ आसानी से उपलब्‍ध हो जाएं और उनकी सहभागिता का भरपूर लाभ उठाया जा सके।
बताया जाता है कि इस पूरे कार्यक्रम का सूत्रधार मुंबई निवासी एक उद्योगपति है और इस उद्योगपति से हेमा मालिनी के काफी पुराने संबंध हैं।
सांसद का पक्ष नहीं आता सामने
हालांकि आयोजन के नाम से की गई करीब 10 करोड़ रुपए की उगाही के बावत सांसद हेमा मालिनी को कोई जानकारी है या नहीं, इसकी पुष्‍टि इसलिए नहीं हो सकी क्‍योंकि वह कभी अपना पक्ष रखने को उपलब्‍ध नहीं होतीं।
जो कुछ कहना व बताना होता है, वह उनके स्‍थानीय निजी सचिव जनार्दन शर्मा के हवाले से ही सामने आता है, और जनार्दन शर्मा करोड़ों रुपए की उगाही संबंधी जानकारी देने में न तो सक्षम हैं तथा न ही अधिकृत। यह बात अलग है कि स्‍थानीय मीडिया उन्‍हें सांसद प्रतिनिधि लिखता आया है।
सांसद के पक्ष ने इस कार्यक्रम पर होने जा रहा करीब साढ़े चार करोड़ रुपए का संभावित खर्च हेमा मालिनी द्वारा ही अपने स्‍त्रोतों से किए जाने की जानकारी तो दी किंतु यह नहीं बताया कि हेमा मालिनी के वो स्‍त्रोत कौन से हैं।
यहां सवाल यह भी उठता है कि बतौर सांसद लगभग चार साल के अपने कार्यकाल में हेमा मालिनी ने आजतक ऐसा कोई काम मथुरा के लिए नहीं किया जिसे रेखांकित किया जा सके।
सांस्‍कृति कार्यक्रम के लिए करोड़ों रुपए एकत्र करने वाली सांसद ने कभी मथुरा में किसी विकास कार्य के लिए अपने स्‍तर से धन एकत्र करने का प्रयास किया हो, ऐसी जानकारी भी नहीं मिलती।
यह भी पता लगा है कि होली रसोत्‍सव के लिए यमुना पार भव्‍य पण्‍डाल खड़ा करने से लेकर सांस्‍कृतिक कार्यक्रम की सभी तैयारियां करने जा रहे बॉलीवुड के प्रसिद्ध आर्ट डायरेक्‍टर एवं प्रोडक्‍शन डिजाइनर नितिन चंद्रकांत देसाई तक भी आयोजकों द्वारा किए जा रहे इस खेल की सूचना पहुंच गई थी इसलिए उन्‍होंने इससे अपना हाथ खींच लिया।
यह वही नितिन देसाई हैं जिन्‍होंने दिल्‍ली में आर्ट ऑफ लिविंग के संस्‍थापक श्री-श्री रविशंकर द्वारा यमुना किनारे कराए गए वर्ल्‍ड कल्‍चरल फेस्‍टीवल के लिए भी अपनी सेवाएं दीं थीं।
कार्यक्रम का आधा खर्च उठा रहा था यूपी का पर्यटन मंत्रालय 
होली रसोत्‍सव पर आने वाले कुल खर्च का आधा पैसा उत्‍तर प्रदेश के पर्यटन मंत्रालय द्वारा दिया जाना था। यह जानकारी इलाहाबाद हाईकोर्ट और एनजीटी में यमुना प्रदूषण के मुद्दे को ले जाने वाले हिंदूवादी नेता गोपेश्‍वरनाथ चतुर्वेदी ने दी।
उन्‍होंने बताया कि योगी आदित्‍यनाथ के नेतृत्‍व वाली सरकार का चूंकि मथुरा पर काफी ध्‍यान केन्‍द्रित है और वह इस तीर्थ स्‍थल को उसकी गरिमा के अनुरूप विश्‍व पटल पर स्‍थापित करना चाहते हैं इसलिए उन्‍होंने हेमा मालिनी के कार्यक्रम में शिरकत करने की हामी भरने के साथ-साथ पर्यटन मंत्रालय से आधा खर्च वहन कराने की अनुमति भी सहर्ष दे दी लेकिन प्रचारित यह किया गया कि कार्यक्रम का पूरा खर्च हेमा मालिनी अपने स्‍तर से उठाएंगी।
आरती पर नहीं रहा कोई विवाद
गोपेश्‍वर नाथ चतुर्वेदी ने यह भी बताया कि यमुना की आरती विश्राम घाट पर न करके यमुना पार से किए जाने की नई परंपरा स्‍थापित करने को लेकर शुरू में विवाद उत्‍पन्‍न हुआ था लेकिन बाद में आरती का कार्यक्रम यमुना किनारे पर ही रखने की सहमति हो जाने के बाद यह विवाद खत्‍म हो गया।
माथुर चतुर्वेद परिषद इसलिए गया एनजीटी में
उन्‍होंने बताया कि जहां तक सवाल माथुर चतुर्वेद परिषद द्वारा इस मामले को नेशनल ग्रीन ट्रेब्‍यूनल (एनजीटी) में ले जाने की बात है तो परिषद ने ऐसा खुद को ”सेफ साइड” रखने के लिए किया। एनजीटी में इस पर सुनवाई के लिए 15 फरवरी की तारीख मुकर्रर की गई।
गौरतलब है कि दिल्‍ली में यमुना किनारे आध्‍यात्‍मिक गुरू श्री-श्री रविशंकर की संस्‍था आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा कराया गया वर्ल्‍ड कल्‍चरल फेस्‍टीवल तब भारी विवादों में आ गया था जब एनजीटी ने उसके आयोजकों पर 5 करोड़ रुपए का हर्जाना ठोक दिया।
एनजीटी के अनुसार इस कार्यक्रम से यमुना किनारे के प्राकृतिक वातावरण को काफी नुकसान हुआ और यमुना के प्रदूषण में भी वृद्धि हुई।
रविशंकर की संस्‍था द्वारा पेश सभी दलीलों को एनजीटी ने ठुकराते हुए भारी नाराजगी जाहिर की जबकि इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी सहित तमाम केंद्रीय मंत्री भी शामिल हुए थे।
गोपेश्‍वरनाथ चतुर्वेदी ने बताया कि उनके द्वारा स्‍वयं हेमा मालिनी से बात किए जाने और ऊर्जा मंत्री व स्‍थानीय विधायक श्रीकांत शर्मा द्वारा समझाने के बाद विश्राम घाट के सामने आरती किए जाने का मुद्दा भले ही हल हो गया किंतु यमुना किनारे कार्यक्रम करने के संबंध में एनजीटी द्वारा तय दिशा-निर्देशों का उल्‍लंघन होने की पूरी आशंका थी।
दरअसल, इन आदेश-निर्देशों के अनुसार यमुना किनारे कोई भी आयोजन यमुना की धारा से 500 मीटर की दूरी पर ही किया जा सकता है लेकिन हेमा मालिनी द्वारा कराए जाने वाले कार्यक्रम की तैयारियां यह बता रहीं थीं कि इसमें एनजीटी के आदेश-निर्देशों को ताक पर रखा जाना तय है।
पर्यटन सचिव ने किया था स्‍थलीय निरीक्षण
गोपेश्‍वर नाथ चतुर्वेदी ने बताया कि ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा के माध्‍यम से पर्यटन सचिव अवनीश अवस्‍थी तक यह आशंका पहुंचाई गई, जिसके बाद अवनीश अवस्‍थी स्‍वयं यहां आए और उन्‍होंने स्‍थलीय निरीक्षण भी किया।
अवनीश अवस्‍थी से माथुर चतुर्वेद परिषद के प्रतिनिधियों सहित उस परिवार ने भी मुलाकात की जो अब तक परंपरागत रूप से विश्राम घाट पर यमुना आरती करता रहा है।
बताया जाता है कि पर्यटन सचिव अवनीश अवस्‍थी ने हेमा मालिनी द्वारा किए जाने वाले कार्यक्रम के बाद उत्‍पन्‍न होने वाली परिस्‍थितियों से मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ को भी अवगत करा दिया।
इस कार्यक्रम में प्रस्‍तुति देने के लिए पंडित जसराज, हरिप्रसाद चौरसिया, कैलाश खेर व शोभना सेठ सहित पर्यटन सचिव अवनीश अवस्‍थी की पत्‍नी व प्रसिद्ध लोक कलाकार मालिनी अवस्‍थी जैसे सिद्धहस्‍त कलाकार अपनी स्‍वीकृति दे चुके थे।
यही कारण है कि हेमा मालिनी की ओर से कार्यक्रम रद्द किए जाने का ठीकरा माथुर चतुर्वेद परिषद के सिर फोड़े जाने की कोशिश तो की जा रही है परंतु यह बताने को कोई तैयार नहीं कि सांसाद हेमा मालिनी ने किन स्‍त्रोतों से इसके लिए करोड़ों रुपए एकत्र किए।
मथुरा से ही ताल्‍लुक रखने वाले उस उद्योगपति की इसमें क्‍या भूमिका है जिसके न सिर्फ हेमा मालिनी से पुराने संबंध हैं बल्‍कि मुंबई स्‍थित उनका निवास भी उसी क्षेत्र में हैं जिस क्षेत्र में हेमा मालिनी का है।
यदि हेमा मालिनी मथुरा के विकास तथा यहां पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए ही सारा आयोजन कर रहीं थीं तो उन्‍होंने इससे जुड़े लोगों को भरोसे में क्‍यों नहीं लिया। क्‍यों नहीं जानना चाहा कि यमुना किनारे कार्यक्रम करने के कोई दिशा-निर्देश एनजीटी ने जारी किए हुए हैं और क्‍यों यह तक जानने का प्रयास नहीं किया कि यमुना आरती का कार्यक्रम वह अपनी इच्‍छा से परंपरा को समझे बिना निर्धारित नहीं कर सकतीं।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

खूब ”हंसी” मर्दानी वह तो…

हमारे कांग्रेसी भाई पिछले दो दिनों से मोदी जी और किरन रिजिजू पर बहुत लाल-पीले हो रहे हैं।
कांग्रेसियों का आरोप है कि पीएम ने और गृह राज्‍य मंत्री ने उनकी महिला नेता रेणुका चौधरी को सांकेतिक रूप से ”शूपर्णखा” बताकर न सिर्फ रेणुका चौधरी का बल्‍कि संपूर्ण महिलाओं का भारी अपमान किया है जबकि बात ”इत्‍तू सी” थी कि बेचारी रेणुका चौधरी राज्‍यसभा में पीएम के अभिभाषण पर ”बुक्‍का फाड़” हंसी हंस रहीं थीं।
मेरी अपने कांग्रेसी भाइयों से करबद्ध प्रार्थना है कि रेणुका चौधरी को ”महिला” घोषित करने से पहले उनके बारे में सही-सही और पूरी जानकारी प्राप्‍त कर लें क्‍योंकि आधे अधूरे ज्ञान के आधार पर रेणुका जी को महिला घोषित करना भी रेणुका जी का अपमान है और इसके लिए रेणुका जी अपनी ही पार्टी के उन नेताओं पर ”अट्टहास” कर सकती हैं जो उन्‍हें महिला बताकर उनकी मर्दानगी को चुनौती दे रहे हैं।
रेणुका जी के बारे में पूरी जानकारी करने के लिए कांग्रेसी भाइयों को तनिक उनके राजनीतिक करियर की ओर झांकना होगा।
बताते हैं कि रेणुका जी के राजनीतिक सफर की शुरूआत टीडीपी अर्थात तेलगु देशम पार्टी से हुई थी।
टीडीपी के फाउंडर एनटी रामा राव यानि एनटीआर कहते थे कि रेणुका चौधरी ‘टीडीपी में इकलौती मर्द’ हैं.
हालांकि 1994 में रेणुका चौधरी टीडीपी से नाराज़ हो गईं और इस सदमे में 1996 के दौरान एनटीआर दुनिया से कूच कर गए.
बहरहाल, रेणुका चौधरी की टीडीपी और एनटी रामा राव से नाराज़गी चाहे जिस कारण भी रही हो किंतु इस वजह से तो नहीं थी कि उन्‍होंने रेणुका जी को पार्टी का ”इकलौता मर्द” घोषित किया था।
टीडीपी के सूत्रों ने भी इस बात की पुष्‍टि की है कि रेणुका जी ने अपनी ”मर्दानगी” को लेकर कभी कोई चुनौती तत्‍कालीन पार्टी या एनटीआर को नहीं दी।
हालांकि टीडीपी की कमान जब चंद्रबाबू नायडू के हाथों में आ गई तब पार्टी के कुछ उत्‍साही कार्यकताओं ने रेणुका जी को एक नया नाम ”जंबो” भी दिया था जिसका अर्थ भिन्‍न-भिन्‍न परिस्‍थितियों में भिन्न-भिन्‍न लोगों द्वारा भिन्‍न-भिन्‍न तरीकों से निकाला जाता रहा।
खैर, 1998 ख़त्म होते-होते रेणुका जी कांग्रेस में आ गईं किंतु कांग्रेस ज्‍वाइन करने के बाद से लेकर अब तक करीब 19 सालों के दरमियां रेणुका जी ने एनटीआर से मिले मर्दानगी के तमगे को वापस नहीं लौटाया लिहाजा यह मान लेने में कोई आपत्ति नहीं है कि वह आज भी खुद को ”मर्द” मानती हैं।
कांग्रेसी भाइयों ने हो सकता है कि उनकी मर्दानगी का समुचित प्रचार प्रसार इसलिए न किया हो कि टीडीपी की तरह रेणुका जी कांग्रेस में ”अकेली मर्द” नहीं रह गई थीं किंतु कभी इस बात का खण्‍डन भी नहीं किया। अलबत्ता रेणुका जी अपने बयानों से समय-समय पर यह साबित करती रहीं कि वह एनटीआर के आंकलन पर शत-प्रतिशत खरी उतरती हैं।
उदाहरण के तौर पर उनके द्वारा ”बलात्कारों” के संबंध में दिया गया वो बयान प्रस्‍तुत किया जा सकता है जिसमें वह कहती हैं कि रोज-रोज रेप पर क्‍या चर्चा करना। रेप तो होते ही रहते हैं।
रेणुका जी के बयान की तुलना माननीय मुलायम सिंह जी के उस बयान से की जा सकती है जिसमें उन्‍होंने बढ़ते ”बलात्‍कारों” पर कहा था कि ऐसी छोटी-मोटी भूल बच्‍चों से हो जाती हैं। इन्‍हें इतना तूल नहीं देना चाहिए।
राजनीति के प्रकांड पंडित और हर बात पर बहस करने के लिए टीवी चैनलों से आमंत्रण प्राप्‍त विद्वतजनों ने मुलायम सिंह के बयान को पुरूषों की कुत्‍सित मानसिकता घोषित किया था। विद्वतजनों की बात कौन झुठला सकता है, अत: यह मान लेने में कोई बुराई नहीं कि ”पुरूषों” की मानसिकता शायद ऐसी ही होती होगी।
वैसे भी चैनलों से सर्टीफाइड विद्वतजनों में पुरुष ही नहीं, महिलाएं भी शामिल रहती हैं इसलिए उनके निष्‍कर्ष गलत कहे भी नहीं जा सकते।
जाहिर है कि रेणुका जी का बढ़ते ”बलात्‍कारों” पर खीझ कर दिया गया बयान सर्वसम्‍मति से उनकी पुरूषोचित मानसिकता का द्योतक है और यह साबित करता है कि उनकी मौलिक सोच भी पुरूषों से ज्‍यादा मिलती है, अपेक्षाकृत महिलाओं के।
ऐसे में यह सवाल उठना स्‍वाभाविक है कि रेणुका जी के मामले में ”कांग्रेसी भाई” किसी राजनीतिक साजिश के तहत उन्‍हें महिला साबित करने के लिए नरेन्‍द्र भाई मोदी के कथन और किरन रिजिजू की वीडियो पोस्‍ट का सहारा तो नहीं ले रहे क्‍योंकि राजनीति में कुछ भी संभव है। जैसे…कहीं पै निगाहें और कहीं पै निशाना, कुशल राजनीति की प्राथमिकताओं में शुमार रहता है।
इधर एक बात घड़े में से निकल कर यह भी आ रही है कि आधी आबादी को जब पूरे अधिकार देने की बात की जा रही है और यह माना जा रहा है कि महिलाएं किसी मामले में पुरुषों से कम नहीं हैं तो फिर भाई रेणुका जी की हंसी को महिला की हंसी साबित किसलिए किया जा रहा है। लोगों को इसके पीछे षड्यंत्र की ”बू” आ रही है।
”मेंगो पीपुल” की मानें तो रेणुका जी ”सांसद” हैं, न कि ”सांसदी”। राजनीति में महिलाओं के लिए ”आरक्षण” का बिल भी अभी अधर में लटका हुआ है। वह सामान्‍य सीट से राज्‍यसभा पहुंची हैं, फिर उनके पद को महिला सांसद और पुरूष सांसद के खांचे में बांटना किस हद तक उचित है।
अगर यूं ही बिना आरक्षण लिए-दिए बंटवारा हो गया तो महिलाओं के लिए प्रस्‍तावित ”आरक्षण” गया पानी में। ये तो कोई बात नहीं हुई।
माना भी यही जाता है कि कोई पद कभी पुल्‍लिंग अथवा स्‍त्रीलिंग नहीं होता। ऐसा होता तो ”राष्‍ट्रपति” के पद पर काबिज होने वाली महिला को ”राष्‍ट्रपत्‍नी” कहा जाता और महिला ”जिलाधिकारी” को ”जिलाधिकारिणी”। ऐसा नहीं होता न।
इस लिहाज से भी रेणुका चौधरी को महिला सांसद कहना, संसद और संविधान का अपमान है क्‍योंकि संविधान ने पुरुष और महिला को सांसद की हैसियत से समान अधिकार दिए हैं। समाज के अंदर महिला और पुरुषों की हंसी इस 21वीं सदी में भी विभाजित नहीं है। हंसी…हंसी है। फिर चाहे वह महिला की हो या पुरूष की।
…तो मेरा अपने कांग्रेसी भाइयों से निवेदन है कि पहले रेणुका जी की मर्दानगी और उनके संसदीय अधिकार और कर्तव्‍यों पर पार्टी के अंदर बहस कराकर तय कर लें कि क्‍या यह मामला एक महिला का है या फिर उसी तरह किसी सांसद का है जिस तरह मोदी जी और किरन रिजिजू का है। वह हंस दी और उन्‍होंने हंसा दिया।
कांग्रेसियों को रेणुका जी की मर्दानगी पर प्रश्‍न खड़ा करने से पहले उस घटना को भी याद करना होगा जब टीडीपी में रहते रेणुका जी थाने के अंदर घुसकर अपने उन तीन ”मर्द” समर्थकों को छुड़ा ले गई थीं जिन्‍हें पुलिस ने एक प्लॉट पर कब्ज़े को लेकर हिरासत में ले लिया था।
रेणुका जी की मर्दानगी को चुनौती देने से पहले कांग्रेसी भाइयों को उनके बयानों पर रिसर्च करनी पड़ सकती है। रेणुका जी एक बार मुख्‍यमंत्री चंद्रबाबू नायडू को ‘बस स्टैंड के पास खड़ा जेबकतरा’ बता चुकी हैं और राज्‍यसभा की ही सांसद व प्रसिद्ध अभिनेत्री जयप्रदा को ‘बिंबो’
गौरतलब है कि बिंबो का एक अर्थ कमअक्‍ल खूबसूरत औरत भी होता है। और जयप्रदा के लिए यह बात उन्‍होंने बाकायदा एक टीवी चैनल पर कही थी।
जो भी हो, जयप्रदा को दी गई उपाधि भी यह साबित करती है कि रेणुका जी महिलाओं के प्रति कितना आदरभाव रखती हैं और उनकी दृष्‍टि में खुबसूरती के मायने क्‍या हैं।
सामान्‍य तौर पर ऐसे विचार पुरूषों के माने जाते हैं कि खूबसूरत महिलाएं अक्‍सर कमअक्‍ल होती हैं। पुरूषों से रेणुका जी की सोच का इस कदर मिलना कुछ तो इशारा करता है।
समूची कांग्रेस की तो कांग्रेसी जानें लेकिन मुझे अब उस बेचारे एक अदद कांग्रेसी तहसीन पूनावाला की फिक्र है जिसने मणिशंकर अय्यर के साथ-साथ रेणुका जी को भी पार्टी पर बोझ बता दिया और कहा कि राज्यसभा में उनकी हंसी से मैं छटपटा गया।
कहीं ऐसा न हो कि राज्‍यसभा से ध्‍यान हटते ही रेणुका जी तहसीन पूनावाला को निशाने पर ले लें और एकबार फिर साबित कर दें कि वह टीडीपी में ही नहीं, कांग्रेस में भी अकेली मर्द हैं। वह हंसकर फंसती नहीं हैं, फंसाती हैं। उनकी हंसी को चेलेंज करना चायवाले ये लेकर पूनावाला तक को भारी पड़ सकता है।
इस दौर में भले ही महाभारत का युद्ध न हो, और न हो राम-रावण का युद्ध, किंतु वाकयुद्ध तो हो सकता है। कहीं द्रोपदी को जिम्‍मेदार ठहराया जाता है, कहीं शूपर्णखा को लेकिन हकीकत तो यह है कि ”हंसी” हर वक्‍त मुफीद नहीं होती। कभी हंसने वालों के लिए तो कभी हंसाने वाले के लिए ”साढ़े साती” बन जाती है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शैतानी हो या साजिश…लेकिन ”निष्‍कलंक” नहीं रह पाया ”योगीराज”

योगी जी…क्‍या अब आप कभी यह कह सकेंगे कि मेरे शासनकाल में उत्तर प्रदेश के अंदर कोई सांप्रदायिक उपद्रव नहीं हुआ?
कासगंज में जो कुछ हुआ, वह कैसे हुआ और क्‍या उसके पीछे कोई साजिश थी…यह जांच का विषय है लिहाजा निष्‍कर्ष निकलने तक इस बावत कुछ भी नहीं कहा जा सकता किंतु यह जरूर कहा जा सकता है कि तमाम मुठभेड़ों के बावजूद न तो आपकी ”खाकी” अपराधियों के मन में भय बैठा सकी और न आप ”खाकी” के मन में।
एक सर्वमान्‍य सूक्‍ति है कि बेहतर शासन-प्रशासन चलाने के लिए सरकार का ”इकबाल” बुलंद होना लाजिमी है। जब सरकार का इकबाल बुलंद होता है तो सरकारी नुमाइंदे अपनी पूरी निष्‍ठा, लगन व ईमानदारी से सक्रिय रहते हैं। उनकी सक्रियता ही अपराधियों के लिए भय का वातावरण बनाती है और जनसामान्‍य के अंदर सुरक्षा की भावना पैदा करती है।
नि:संदेह उत्तर प्रदेश की कानून-व्‍यवस्‍था काफी पहले से बदहाल थी और आम लोगों का ”सरकारों” से भरोसा उठ चुका था परन्‍तु अब तो यह भरोसा पैदा होना चाहिए।
देश के इस सबसे बड़े राज्‍य की कमान योगी आदित्‍यनाथ ने 19 मार्च 2017 को संभाली थी। इस हिसाब से उनकी सरकार को आज 10 महीने और 13 दिन पूरे हो चुके हैं लेकिन प्रदेश के कई जिले ऐसे हैं जहां बदमाश पूरी तरह बेखौफ दिखाई देते हैं।
खुद सीएम योगी आदित्‍यनाथ ने इसी महीने की 23 तारीख को सहारनपुर, मथुरा और लखनऊ में लगातार हो रहीं गंभीर आपराधिक वारदातों पर नाराजगी जताई थी। उन्‍होंने प्रदेश के आला पुलिस अधिकारियों को तलब करके पूछा था कि अगर अपराधियों पर प्रभावी अंकुश नहीं लग पा रहा तो जिलों में बैठे पुलिस अधिकारी कर क्‍या रहे हैं। उनसे काम नहीं हो पा रहा तो वह पद छोड़ दें।
23 जनवरी को मुख्‍यमंत्री द्वारा अपनी मंशा स्‍पष्‍ट कर देने के बाद भी तीसरे ही दिन 26 जनवरी पर गणतंत्र दिवस की तिरंगा यात्रा में हुई कासगंज की घटना ने यह साबित कर दिया कि न तो ”योगी राज” से ”खाकी” की कार्यप्रणाली प्रभावित हुई है और न ”खाकी” से बदमाशों में कोई भय उत्‍पन्‍न हुआ है।
गौरतलब है कि प्रदेश के राज्‍यपाल रामनाइक ने भी कासगंज की घटना को उत्तर प्रदेश के लिए ”कलंक” बताया है। राज्‍यपाल इससे पहले भी कानून-व्‍यवस्‍था पर असंतोष जाहिर कर चुके हैं।
रामनाइक के बयान इसलिए ज्‍यादा महत्‍व रखते हैं क्‍योंकि पिछले कुछ वर्षों से राज्‍यपाल का पद भी दलगत राजनीति का शिकार होने लगा था और अमूमन राज्‍यपालों की छवि का आंकलन राजनीतिक नजरिए से किया जा रहा था।
कानून-व्‍यवस्‍था और कासगंज में हुई हिंसा पर राज्‍यपाल के रूप में रामनाइक के बयानों ने निश्‍चित ही इस पद की गरिमा बढ़ाई है किंतु सवाल यह खड़ा होता है कि क्‍या उनके बयानों को शासन-प्रशासन भी गंभीरता से लेगा ?
योगी आदित्‍यनाथ द्वारा उत्तर प्रदेश में 21वें मुख्‍यमंत्री की शपथ लेने के मात्र 15 दिनों के बाद “Legend News” ने सबसे बड़ी चुनौती: क्‍या पुलिस का DNA बदल पाएगी योगी सरकार ?” शीर्षक से लिखा था कि जरूरत से ज्‍यादा राजनीतिक दखल, भ्रष्‍टाचार, जातिवाद और अनुशासनहीनता के चलते पुलिस पूर्णत: निरंकुश हो चुकी है।
प्रदेश के तत्‍कालीन डीजीपी जावीद अहमद ने खुद स्‍वीकारा था कि पुलिस में काफी लोगों की अपराधियों से सांठगांठ है। पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश अर्थात मेरठ, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद, नोएडा, मथुरा, आगरा आदि में उन्‍होंने ऐसे पुलिसकर्मियों की भरमार बताई जो अपराधियों से मिले हुए हैं। जावीद अहमद ने हालांकि ऐसे पुलिसजनों की सूची तैयार कर उनके खिलाफ कठोर कार्यवाही करने की बात कही थी लेकिन यह काम इतना आसान नहीं था, लिहाजा न वो कर पाए और न उनके बाद बने दूसरे डीजीपी।
कासगंज की घटना को समय रहते नियंत्रित न कर पाना और चार-पांच दिनों तक उसका सुलगते रहना, यह साबित करता है कि स्‍थानीय पुलिस पूरी तरह फेल रही। कुछ पूर्व पुलिस अधिकारियों सहित आईजी तथा कमिश्‍नर ने भी यह माना है कि पुलिस की लापरवाही ने कासगंज के हालातों को ज्‍यादा बिगाड़ दिया।
यूं भी नामजद आरोपियों के घर से असलहों का बरामद होना और तिरंगा यात्रा के दौरान माहौल बिगड़ने की भनक तक न लग पाना, यह बताता है कि स्‍थानीय पुलिस-प्रशासन किस तरह काम कर रहा था।
योगी आदित्‍यनाथ से प्रदेश को बड़ी उम्‍मीदें हैं। उनके गेरुआ वस्‍त्र भरोसा दिलाते हैं लेकिन ”भय” के बिना ”प्रीति” नहीं होती, इसे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने भी माना था।
गोस्‍वामी तुलसीदास कृत रामायण की यह चौपाई यहां गौरतलब है-
विनय न मानत जलधि जड़, गए तीन दिन बीत।
बोले राम सकोप तब, भय बिन होय न प्रीत।।
इसके अलावा ”चाणक्‍य नीति” भी कहती है कि ”दंड” प्रक्रिया का सख्‍ती पूर्वक प्रयोग किए बिना समाज में शांति स्‍थापित नहीं हो सकती।
”चाणक्‍य नीति” के इस गूढ़ार्थ को समझा जाए तो ”दंड” प्रक्रिया का सख्‍ती पूर्वक प्रयोग हर उस व्‍यक्‍ति, वर्ग अथवा गुट पर किया जाना चाहिए जो कानून-व्‍यवस्था में बाधा उत्‍पन्‍न करता हो। फिर वह शासन-प्रशासन के अंग ही क्‍यों न हों।
उत्तर प्रदेश जितना बड़ा है, उतनी ही बड़ी हो जाती हैं यहां कानून-व्‍यवस्‍था का राज कायम करने की जिम्‍मेदारियां।
माना कि उत्तर प्रदेश इससे पहले अनेक बार इतने बड़े-बड़े सांप्रदायिक उपद्रवों की आग में झुलसा है कि कासगंज में हुए उपद्रव की उनसे तुलना नहीं की जा सकती, किंतु दाग तो दाग है। योगी आदित्‍यनाथ के नेतृत्‍व वाली भाजपा सरकार पर यह दाग लग चुका है। अब यह छोटा हो या बड़ा, लेकिन दाग तो है।
कासगंज की घटना चाहे शैतानी हो या किसी साजिश का हिस्‍सा, किंतु इसमें दोराय नहीं कि योगी राज ”निष्‍कलंक” नहीं रह पाया।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शनिवार, 27 जनवरी 2018

मंत्री महोदय! पुलिस में ”निकम्‍मेपन” की परिभाषा कुछ और है

सुना है कल प्रदेश के ऊर्जा मंत्री तथा योगी सरकार के प्रवक्‍ता श्रीकांत शर्मा ने मथुरा के एसएसपी स्‍वप्‍निल ममगाई और जिलाधिकारी सर्वज्ञराम मिश्र से कहा कि ”निकम्‍मे” थानाध्‍यक्षों एवं दरोगाओं को चिन्‍हित कर उनके खिलाफ कार्यवाही करें।
श्रीकांत शर्मा मथुरा में ही शहरी सीट से विधायक हैं और कस्‍बा गोवर्धन अंतर्गत गांव गांठौली के मूल निवासी हैं।
श्रीकांत शर्मा कल मथुरा पुलिस लाइन में कानून-व्‍यवस्‍था के मुद्दे पर जिलाधिकारी और एसएसपी सहित सभी प्रमुख पुलिस अधिकारियों के साथ बैठक कर रहे थे।
ऊर्जा मंत्री के अनुसार पुलिस विभाग में अब भी ”निचले स्‍तर पर” अवैध वसूली हो रही है और दरोगाओं की नाक के नीचे सिपाही उगाही कर रहे हैं।
पहली नजर में देखने से ऐसा लगता है कि जैसे प्रदेश के ऊर्जा मंत्री को पुलिस महकमे के बावत बहुत-कुछ पता है और नीचे से ऊपर तक व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार तथा निकम्‍मेपन से वह परिचित हैं, किंतु गहराई से देखें तो पता लगेगा कि उन्‍होंने जो भी कहा वह उस रटी-रटाई स्‍क्रिप्‍ट का हिस्‍सा था जिसे सरकार में रहते सब बोलते हैं क्‍योंकि यही सरकारी भाषा है।
श्रीकांत शर्मा शायद नहीं जानते कि पुलिस में जिन ”निकम्‍मे” थानाध्‍यक्षों और दरोगाओं को चिन्‍हित कर उनके खिलाफ कार्यवाही की बात वह कर रहे हैं, उन्‍हें विभाग में ”कमाऊ पूत” अथवा ”दुधारु गाय” कहा जाता है। वह विभागीय अधिकारियों के नजरिए से काबिल हैं तभी तो थाना और चौकियों के प्रभारी बने हुए हैं, अन्‍यथा कृष्‍ण जन्‍मभूमि व शाही मस्‍जिद ईदगाह की सुरक्षा ड्यूटी में लगे होते।
प्रदेश के ऊर्जा मंत्री को संभवत: यह भी नहीं पता कि पुलिस ही नहीं, लगभग समूचे सरकारी महकमों में ”निकम्‍मेपन” की परिभाषा कुछ और है। यहां निकम्‍मे कर्मचारी की पहचान ”कामचोर” या काम न करने वाले के तौर पर नहीं बल्‍कि ऐसे कमाऊ पूत के रूप में होती है जो सूखी मिट्टी से भी तेल निकालना जानता हो।
ऊर्जा मंत्री को कौन समझाए कि जिस तरह के ”निकम्‍मे” थानाध्‍यक्षों, दरोगाओं और रिश्‍वतखोर सिपाहियों को चिन्‍हित कर उनके खिलाफ कार्यवाही करने का फरमान वह सुना रहे हैं, यदि उस पर अक्षरश: अमल हुआ तो प्रदेश सरकार को पुलिस विभाग में तत्‍काल नए सिरे से भर्ती करने की जरूररत पड़ जाएगी।
दरअसल, ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा कल ही इससे पहले मथुरा के थाना हाईवे अंतर्गत ग्राम मोहनपुर अडूकी में उस 8 वर्षीय बच्‍चे माधव के परिजनों से मिलकर आए थे जिसकी 17 जनवरी बुधवार को कथित मुठभेड़ के दौरान पुलिस की गोली लगने से तब मौत हो गई थी, जब वह खेत पर अपनी बहनों के साथ बेर तोड़ने गया हुआ था।
”चेतक” मोबाइल के जिन दो सिपाहियों की गोलीबारी का माधव शिकार हुआ उनकी अमानवीयता का आलम यह रहा कि वह बच्‍चे को खेत में ही तड़पता छोड़कर भाग खड़े हुए नतीजतन अस्‍पताल पहुंचाते-पहुंचाते उसकी मौत हो गई। अगर समय पर उसे पुलिस वाले ही अस्‍पताल ले गए होते तो हो सकता है उसकी जान बच जाती।
योगी सरकार ने हालांकि बच्‍चे के परिजनों को 5 लाख रुपए की आर्थिक सहायता देकर तथा आगरा जोन के आईजी राजा श्रीवास्‍तव द्वारा दो सब इंस्‍पेक्‍टरों सहित चार पुलिसकर्मियों को निलंबित कर पीड़ित परिवार के घाव पर मरहम लगाने की कोशिश की है लेकिन सवाल यह है कि इसमें नया क्‍या है। यह तो हर सरकार में होता है और कुछ दिन बाद फिर कहीं न कहीं पुलिस की ऐसी ही कोई कहानी सामने आती है। भद्रजनों के लिए ”खाकी” एक किस्‍म के ”खौफ” का पर्याय बन चुकी है। ऐसा खौफ जो स्‍वतंत्रता के 70 सालों बाद भी मिटने का नाम नहीं ले रहा।
योगी राज में हो रही मुठभेड़ों से भले ही कई ईनामी बदमाश जान गंवा चुके हों और तमाम पकड़े भी गए हों परंतु ऐसा कहीं नहीं लगता कि पुलिस का इकबाल बुलंद हुआ हो और आपराधिक वारदातों पर प्रभावी अंकुश लग पाया हो। जितने बदमाश मारे नहीं गए, उससे कई गुना अधिक संगीन वारदातें सामने आ चुकी हैं।
ऊर्जा मंत्री को याद होगा कि थाना हाईवे क्षेत्र की ही अमर कॉलोनी में हुए दोहरे हत्‍याकांड को पुलिस आजतक नहीं खोल पाई है जबकि तमाम धरने-प्रदर्शनों के बाद यह मामला न सिर्फ विधानसभा में उठ चुका है बल्‍कि हाईकोर्ट भी जा पहुंचा है और केस का अनावरण न होने की वजह से परिवार की बड़ी पुत्री आत्‍महत्‍या कर चुकी है।
इसी प्रकार बहुचर्चित रौनक हत्‍याकांड का भी पुलिस पर्दाफाश नहीं कर पाई है और इस मामले में आए दिन धरने-प्रदर्शन किए जा रहे हैं।
लूट, डकैती, चोरी और हत्‍याएं तो जैसे इस धार्मिक नगरी की पहचान बन चुके हैं क्‍योंकि शायद ही कोई दिन ऐसा व्‍यतीत होता है जिस दिन बदमाशों द्वारा पुलिस को खुली चुनौती न दी जा रही हो। चेन स्‍नेचिंग, लड़कियों से छेड़छाड़, वाहन चोरी आदि के साथ-साथ बढ़ते साइबर अपराधों की तो कोई गिनती ही नहीं है।
योगी आदित्‍यनाथ के शपथ ग्रहण करते ही मथुरा में दो युवा सर्राफा व्‍यवसाइयों की हत्‍या करके करोड़ों रुपए के आभूषण लूट कर ले जाने की जघन्‍य वारदात को शायद ही कोई अभी भूल पाया हो।
यहां अपराधियों के दुस्‍साहस का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि योगी सरकार के दस महीने बाद भी चंद रोज पहले मात्र एक दिन के अंतराल में बदमाशों ने एक ओर जहां प्रदेश के कबीना मंत्री चौधरी लक्ष्‍मीनारायण की गैस ऐजेंसी का लाखों रुपया लूट लिया वहीं दूसरी ओर उनके समधी की गोली मारकर हत्‍या कर दी। चौधरी लक्ष्‍मीनारायण मथुरा की ही छाता विधानसभा सीट से भाजपा की टिकट पर निर्वाचित हैं।
ऐसा नहीं है ”खाकी” का यह हाल सिर्फ मथुरा तक सीमित हो, प्रदेशभर में उसकी कार्यप्रणाली करीब-करीब एक जैसी है। सरकारें बदलती हैं किंतु ”खाकी” का चरित्र नहीं बदलता।
यही कारण है कि मथुरा हो या मुजफ्फरनगर और शामली हो या सहारनपुर, हर जगह उसका वही चेहरा सामने आता है जो उसकी स्‍थाई पहचान बन चुका है।
इसी गुरूवार रात की बात है। सहारनपुर जिले में बेरी बाग इलाके के मंगलनगर चौक पर एक बाइक अनियंत्रित होकर खंभे से जा टकराई और बाइक सवार दो किशोर गंभीर घायल हो गए। नुमाइश कैंप सेतिया विहार निवासी ये दोनों किशोर अर्पित खुराना और सन्नी तड़पते रहे लेकिन मौके पर पहुंचे पुलिसजनों ने उन्‍हें इसलिए अस्‍पताल ले जाने से मना कर दिया क्‍योंकि घायलों के खून से उनकी सरकारी गाड़ी गंदी हो जाती। बाद में जब इन नाबालिगों को किसी अन्‍य वाहन से अस्‍पताल पहुंचाया गया तो पता लगा कि तब तक वह दम तोड़ चुके थे।
बेशक पुलिस विभाग में भी अच्‍छे लोग हैं और वह हरसंभव जहां मानवता का परिचय देते हैं वहीं आमजनता के बीच बन चुकी पुलिस की अमानवीय छवि को दूर करने का प्रयास भी करते हैं किंतु ऐसे लोगों की संख्‍या इतनी कम है कि उनके सारे प्रयासों पर मथुरा व सहारनपुर जैसी घटनाएं पानी फेर देती हैं।
बेहतर होगा कि योगी आदित्‍यनाथ सरकार ”खाकी” के मूल चरित्र में परिवर्तन करने की कोशिश करे, न कि पूर्ववर्ती सरकारों की तरह हर बड़ी वारदात के बाद रटे-रटाए तरीके अपनाकर लीपापोती करके काम चलाए।
हर कोई जानता है कि पुलिस की चाल व चरित्र में आमूल-चूल परिर्वतन किए बिना उसके विभागीय सूत्र वाक्‍य ” परित्राणाय साधूनाम, विनाशाय च दुष्‍कृताम” को सार्थक कर पाना संभव नहीं होगा, और पुलिस में परिवर्तन तभी हो सकता है जब सरकारें एवं उसके नुमाइंदे रटी-रटाई स्‍क्रिप्‍ट पढ़ने की बजाय समस्‍या की उस जड़ को समाप्‍त करने की कोशिश करें जो परतंत्रता से स्‍वतंत्रता तक का सफर पूरा करने के बावजूद गहराई में समाई हुई है।
स्‍वयं सीएम योगी आदित्‍नाथ हों या उनके नुमाइंदे ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा, उन्‍हें समझना होगा कि ”खाकी” को बंदर घुड़की से बदलना संभव नहीं है।
खाकी के क्रिया-कलापों को बदलना है तो पहले सरकारी कार्यप्रणाली बदलनी होगी और सरकारी कार्यप्रणाली बदलने के लिए उस ”वीआईपी संस्‍कृति” को बदलना होगा जो आमजन का दर्द समझने में असहाय है। जिसके लिए किसी परिवार के ”भविष्‍य” की कीमत मात्र 5 लाख रुपए है। जिसके लिए सड़क पर तड़पते दुर्घटना के शिकार किशोरवय लड़कों की जिंदगी केवल इसलिए बेमानी है क्‍योंकि वो जिस सरकारी गाड़ी को इस्‍तेमाल करते हैं वह उनके खून से गंदी हो जाएगी।
सरकार और सरकारी कर्मचारियों की रग-रग में समा चुकी इस वीआईपी संस्‍कृति से मुक्‍ति पाए बिना न तो अपराध और अपराधियों से मुक्‍ति मिल सकेगी और न कानून का राज स्‍थापित हो पाएगा। फिर चाहे और अगले दस साल ”कोई योगी” सरकार चलाता रहे अथवा पूरे पांच साल कोई सत्‍ता का भोगी काबिज होकर चला जाए।
-www.legendnews.in

शनिवार, 13 जनवरी 2018

चौराहे पर न्‍यायपालिका, दोराहे पर लोग

देश के इतिहास में बेशक यह पहली बार हुआ हो…या फिर अंतिम भी हो…किंतु जिन सामान्‍य जनों का वास्‍ता अपने जीवन में कभी भी कोर्ट-कचहरी से पड़ा है वह भली-भांति जानते हैं कि जो कुछ कल सुप्रीम कोर्ट के चार विद्वान न्‍यायाधीशों ने प्रेस कांफ्रेंस करके कहा, उसमें नया कुछ नहीं था।
नया था तो केवल इतना कि सर्वोच्‍च न्‍यायालय के चार सीनियर मोस्‍ट न्‍यायाधीश उन बातों को कहने ”सड़क पर” यानि ”प्रेस के सामने” आ गए जो बातें सामान्‍यत: दबी-ढकी रहती हैं और जिन्‍हें सब जानते-समझते हुए भी सार्वजनिक करने की हिम्‍मत नहीं कर पाते।
न्‍यायाधीशों ने जिन बातों को अपना ”दर्द” बताकर प्रेस के सामने पेश किया, वह एक ऐसी कड़वी सच्‍चाई है जो समूची न्‍यायपालिका में नीचे से लेकर ऊपर तक व्‍याप्‍त है और जिसे हर वो व्‍यक्‍ति प्रतिदिन भोगता है जिसके अंदर कहीं ”ईमानदारी” की लौ लगी हुई है। फिर चाहे वह कोई जज हो, न्‍याय विभाग का कोई कर्मचारी हो अथवा वकील ही क्‍यों न हो। रही बात वादी और प्रतिवादियों की, तो उसकी स्‍थिति ऐसे निरीह व्‍यक्‍ति की तरह होती है जो किसी कोने में जाकर सिसक तो सकता है किंतु उस सिसकी की आवाज़ किसी के कानों तक नहीं पहुंचा सकता क्‍योंकि सवाल देश की न्‍याय व्‍यवस्‍था का है। उस न्‍याय व्‍यवस्‍था का जो लोकतंत्र में आस्‍था रखने वाले हर शख्‍स की आखिरी उम्‍मीद होती है।
आप इसे यूं भी कह सकते हैं कि स्‍वतंत्र भारत में न्‍यायपालिका अपनी बात कहने के लिए भले ही पहली बार ”चौराहे” पर आकर खड़ी हुई हो परंतु लोग तो न्‍याय की आस में कई दशकों से ”दोराहे” पर खड़े हैं। उन्‍हें समझ में नहीं आता कि वह त्‍वरित व उचित न्‍याय के लिए किस दरवाजे पर जाकर खड़े हों। विधायिका के, कार्यपालिका के या न्‍यायपालिका के।
विधायिका अर्थात् ”नेतानगरी” का हाल यहां बताने की जरूरत ही नहीं है और कार्यपालिका में व्‍याप्‍त ”भ्रष्‍टाचार” से त्‍वरित व उचित न्‍याय की उम्‍मीद पालना बेमानी है। बिना पैसे के अधिकांश सरकारी कर्मचारियों के पांव अंगद की तरह एक स्‍थान पर जमे रहते हैं। बिना चाय-पानी के उन्‍हें उठवाना तो दूर, हिला पाना भी संभव नहीं होता।
रही बात न्‍यापालिका की तो उसके बारे में बहुत पहले से कहावत प्रचलित है कि ”कचहरी” की ईंट-ईंट पैसा मांगती है। चार विद्वान न्‍यायाधीश हालांकि सुप्रीम कोर्ट में सब-कुछ ठीक न चलने की शिकायत लेकर 70 साल बाद चौराहे पर आए हों किंतु यह शिकायत न तो मात्र सुप्रीम कोर्ट की है और न सिर्फ उनकी अपनी। ऐसी शिकायतें जिला अदालतों से लेकर उच्‍च न्‍यायालयों तक में कदम-कदम पर बिखरी पड़ी हैं। इतना अवश्‍य है कि इन शिकायतों को न तो कोई एकत्र करता है और न उठाता है क्‍योंकि सवाल न्‍यायपालिका का जो है। वो न्‍यायपालिका जिसकी बात-बात में अवमानना हो जाती है। तब भी जबकि सवाल किसी न्‍यायाधीश के निजी आचरण से जुड़ा हो न कि न्‍याय व्‍यवस्‍था से, क्‍योंकि न्‍यायाधीश के आचरण को भी न्‍यायपालिका से जोड़कर देखा जाने लगा है।
शायद ही किसी अधिवक्‍ता ने कभी इस मुतल्‍लिक कोई याचिका दायर की हो कि न्‍यायपालिका की अवमानना को जनहित में परिभाषित किया जाए और स्‍पष्‍ट किया जाए कि किसी न्‍यायाधीश के निजी आचरण पर टिप्‍पणी करना न्‍यायपालिका की अवमानना कैसे हो सकती है।
आम आदमी जिसके लिए लोकतंत्र का यह स्‍तंभ न्‍याय पाने की आखिरी सीढ़ी होता है, वह इस सीढ़ी से निराश होने के बाद खुद को कितना ठगा महसूस करता है इसका इल्‍म उसे ही होता है किसी न्‍यायाधीश को नहीं।
तारीख पर तारीख…तारीख पर तारीख…किसी जुमले की तरह हिंदी फिल्‍म का हिस्‍सा तो बन गया लेकिन अदालतों से मिलने वाली तारीखों की कोई आखिरी तारीख अब तक मुकर्रर नहीं हो पाई, नतीजतन अनगिनत लोग हर साल न्‍याय की उम्‍मीद पाले लोकतंत्र के ”माई लॉर्ड” से परलोक के ”लॉर्ड” की अदालत में शिफ्ट कर जाते हैं और उसके बाद भी ”माई लॉर्ड” की अदालत से पीड़ित के किसी परिजन को हाजिर होने का फरमान जारी होना बंद नहीं होता।
जस्टिस जे चेलामेश्वरम, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ़ द्वारा लोकतंत्र को खतरे में बताकर उठाई गईं समस्‍याएं हालांकि पहली नजर में व्‍यक्‍तिगत अहम से उपजी समस्‍याएं दिखाई देती हैं और इसलिए बहुत से पूर्व विद्वान न्‍यायाधीश व अधिवक्‍तागण यह कह भी रहे हैं कि उन्‍हें अपने दायरे के अंदर रहकर समस्‍याओं के समाधान का रास्‍ता निकालना चाहिए था परंतु परिस्‍थितियां वैसी नहीं हैं जैसी सतही तौर पर दिखाई देती हैं।
जिला स्‍तरीय अदालतों में भी बहुत से जिला एवं सत्र न्‍यायाधीश अपनी और अपने नजदीकी जजों की ”सुविधा” के हिसाब से केस सुनवाई के लिए भेजते हैं। निचली अदालतों में भी ”पैसा और प्रभाव” अधिकांश जजों के सिर चढ़कर बोलता है। लोअर कोर्ट अपने जजों की कार्यप्रणाली के नियम व कानून विरुद्ध किस्‍से-कहानियों से भरे पड़े रहते हैं। किसी भी जिला अदालत में कार्यरत कुल न्‍यायाधीशों में से ईमानदार न्‍यायाधीशों का पता करने जाएं तो उंगलियों पर गिने जाने लायक न्‍यायाधीश ही उस श्रेणी में आते हैं।
लोअर कोर्ट से लेकर हाई कोर्ट तक और हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक सेटिंग-गेटिंग का खेल बड़े पैमाने पर चलता है, यह किसी से छिपा नहीं है। यह बात अलग है कि खुलकर कहने की हिमाकत हर कोई नहीं कर सकता।
बहुत दिन नहीं हुए जब सुप्रीम कोर्ट के मशहूर वकील और देश के पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण ने यह कहकर तहलका मचा दिया था कि स्‍वतंत्र भारत में आजतक जितने भी लोग चीफ जस्‍टिस की कुर्सी पर काबिज रहे हैं, उनमें से अधिकांश ईमानदार नहीं कहे जा सकते। शांति भूषण के कथन पर न्‍यायपालिका को जैसे सांप सूंघ गया। एकबार तो ऐसी बातें उठीं कि शांति भूषण के खिलाफ कोर्ट की अवमानना का केस चलाया जाएगा लेकिन हुआ कुछ नहीं। जाहिर है कि शांति भूषण का कथन अतिशयोक्‍ति नहीं था और इसीलिए उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही करने का साहस नहीं हुआ।
शांति भूषण, इन्‍हीं प्रसिद्ध वकील प्रशांत भूषण के पिता हैं जिन्‍होंने कल जजों की प्रेस कांफ्रेंस के संदर्भ में कहा है कि समस्‍या का समाधान उसे दबाने से नहीं, सार्वजनिक करने के बाद ही निकलता है।
प्रशांत भूषण के अनुसार एकसाथ चार वरिष्‍ठ न्‍यायाधीशों को यदि प्रेस कांफ्रेंस करके अपनी बात कहनी पड़ी तो समस्‍या की गंभीरता का अंदाज लगाया जा सकता है।
हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट के सीनियर अधिवक्‍ता प्रशांत भूषण कुछ निजी कारणोंवश प्रेस कांफ्रेंस करने वाले न्‍यायाधीशों को सही ठहरा रहे हों, हो सकता है कि चारों न्‍यायाधीश भी व्‍यक्‍तिगत कारणों से चीफ जस्‍टिस की कार्यप्रणाली पर उंगली उठा रहे हों लेकिन समस्‍याएं हैं और नीचे से ऊपर तक है, इससे कोई इंकार नहीं कर सकता।
बात चाहे कॉलेजियम सिस्टम की हो अथवा उन निर्णयों की जिन पर उंगली उठी हैं, न्‍यायाधीश के साथ-साथ न्‍यायप्रणाली पर भी आम आदमी के भरोसे को कमजोर करती हैं।
पिछले कुछ वर्षों के अंदर उच्‍च और उच्‍चतम न्‍यायालयों से तमाम ऐसे निर्णय हुए हैं जिन पर न सिर्फ उंगलियां उठी हैं बल्‍कि वो मीडिया तथा जनता के बीच चर्चा का विषय भी बने हैं। बहुत से निर्णय ऐसे आए हैं जिन पर खुद सर्वोच्‍च न्‍यायालय को पुनर्विचार करना पड़ा है और कुछ में तो निर्णय बदले भी गए हैं। हाल ही में ट्रांस जैंडर्स को लेकर आया फैसला उनमें से एक है।
लोअर कोर्ट के आदेश को हाई कोर्ट द्वारा पलट देना और हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूरी तरह गलत ठहरा देना तो अब जैसे आम बात हो गई है। जन सामान्‍य को विद्वान न्‍यायाधीशों के ऐसे निर्णय यह सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि आखिर कौन से न्‍यायाधीश का निर्णय सही माना जाए?
आम आदमी के समझ से परे हैं यह बातें कि जिन सबूतों और गवाहों के आधार पर एक न्‍यायाधीश किसी को सजा सुनाता है या बरी कर देता है, वही सबूत और गवाह दूसरे न्‍यायाधीश के लिए बेमानी कैसे हो जाते हैं?
माना कि लोअर कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक की व्‍यवस्‍था मुकम्‍मल न्‍याय देने के लिए ही की गई है परंतु जब अधिकांश मामलों में रद्दोबदल दिखाई देता है तो सवाल खड़े होना लाजिमी है।
राम जन्‍मभूमि बनाम बाबरी मस्‍जिद से लेकर आरुषी हत्‍याकांड तक और 2जी घोटाले से लेकर आदर्श सोसायटी घोटाले तक के उदाहरण हमारे सामने हैं। इन सभी मामलों में आजतक न्‍याय की दरकार है।
कई-कई दशकों का इंतजार भी इस बात की गारंटी देने में असमर्थ है कि उसके बाद जो न्‍याय मिलेगा, वह निर्विवाद होगा।
यही कारण है कि आज न्‍यायपालिका और न्‍यायाधीश भी बहस का मुद्दा बन गए हैं और उनके प्रति अवमानना का भय समाप्‍त होता जा रहा है।
अब आखिर में यदि बात करें लोकतंत्र के उस चौथे स्‍तंभ की जिसके सामने सर्वोच्‍च न्‍यायालय के चार-चार न्‍यायाधीशों को अपनी बात कहने के लिए आना पड़ा, वह सिर्फ एक ऐसा झुनझुना है जिसे बजाया तो जा सकता है लेकिन नतीजा निकलवाने के काम नहीं लाया जा सकता क्‍योंकि उसे लोकतंत्र के चौथे स्‍तंभ की उपमा मात्र ”जुबानी” प्राप्‍त है। उसे ऐसा कोई संवैधानिक अधिकार हासिल नहीं है जैसा विधायिका, कार्यपालिका और न्‍याय पालिका को प्राप्‍त है।
लोकतंत्र का लोक इस ”दर्जाप्राप्‍त” चौथे स्‍तंभ से उम्‍मीद तो बहुत रखता है लेकिन उसकी उम्‍मीदें पहले तीन संवैधानिक स्‍तंभों की मंशा के बिना पूरी नहीं हो सकतीं।
संभवत: यही कारण है कि प्रेस से मीडिया के रूप में परिवर्तित होने वाला यह चौथा खंभा स्‍वतंत्रता के सात दशक पूरे हो जाने के बावजूद ”भोंपू” से अधिक कुछ बन नहीं पाया। एक ऐसा भोंपू जिसे कोई भी अपनी जरूरत और सुविधा के हिसाब से जब चाहे जब बजा कर तो चला जाता है परंतु उसे सशक्‍त व समर्थ करने की बात तक नहीं करता।
सुप्रीम कोर्ट के चार विद्वान न्‍यायाधीशों ने भी अपनी जरूरत के लिए इस भोंपू का इस्‍तेमाल जरूर किया है लेकिन ये न्‍यायाधीश भली-भांति जानते हैं कि भोंपू रहेगा आखिर भोंपू ही इसीलिए सॉलीसीटर जनरल का बयान गौर करने लायक है।
सॉलीसीटर जनरल के. के. वेणुगोपाल ने कल ही साफ कर दिया था कि बहुत जल्‍द इस समस्‍या का समाधान मिल-बैठकर कर लिया जाएगा। वेणुगोपाल के बयान का निहितार्थ यही निकलता है कि हाल-फिलहाल किसी स्‍तर पर व्‍यवस्‍था में कोई भी परिवर्तन होने नहीं जा रहा। फिर किसी नए ऐसे ऐतिहासिक धमाके तक यथास्‍थिति कायम रहनी है। मीडिया का भोंपू भी मियादी बुखार की तरह ज्‍यादा से ज्‍यादा तीन दिन तक शोर मचाकर चुप हो ही जाएगा।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

सोमवार, 1 जनवरी 2018

राज्‍यचिन्‍ह के दुरुपयोग पर Speaker सख्‍त: पूर्व मुख्‍यमंत्रियों सहित ढाई हजार पूर्व विधायकों को जारी किया पत्र, पहली बार लिया गया संज्ञान

Speaker ह्रदय नरायाण दीक्षित ने सभी पूर्व विधायकों को निर्देश दिया कि वे उनके लेटरहेड पर राज्यचिन्ह का प्रयोग बंद करें
लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार के राज्यचिन्ह का बड़े पैमाने पर किया जा रहा दुरुपयोग अब Speaker को अखरने लगा है। इस पर कड़ा रुख दिखाते हुए Speaker ह्रदय नरायाण दीक्षित ने सभी पूर्व विधायकों को निर्देश दिया कि वे उनके लेटरहेड पर राज्यचिन्ह का प्रयोग बंद करें।
 
पूर्व मुख्यमंत्री पर भी आदेश होगा लागू
Speaker ने निर्देश दिया है कि यह आदेश सिर्फ पूर्व विधायकों पर ही नहीं बल्कि पूर्व मुख्यमंत्रियों पर भी लागू होगा। जो उत्तर प्रदेश विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य हैं, सिर्फ वही राज्यचिन्ह का प्रयोग कर सकते हैं।
पहली बार जारी हुआ आदेश
ऐसा पहली बार हुआ है कि इस तरह का आदेश स्पीकर ने जारी किया हो। इससे सदन के पूर्व सदस्यों के राज्यचिन्ह के प्रयोग पर प्रतिबंध लग सकेगा।
प्रमुख सचिव विधानसभा प्रदीप दुबे ने बताया कि इस तरह का पत्र 2,500 पूर्व विधायकों और विधान परिषद के सदस्यों को जारी किया गया है। उन्हें पत्र में कहा गया है कि विधानसभा या उत्तर प्रदेश सरकार के चिन्ह का प्रयोग उनके लेटरहेड पर बंद कर दें।
बड़े पैमाने पर हो रहा यह अवैध काम 
Speaker ह्रदय नारायण दीक्षित ने बताया कि कोई भी पूर्व विधायक या पूर्व विधान परिषद सदस्‍य जिसके पास अब सदन की सदस्यता नहीं है, वह सरकारी चिन्ह का प्रयोग नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्यवश, उनके संज्ञान में यह आया है कि राज्यचिन्ह का प्रयोग लगातार सदन के पूर्व सदस्यों द्वारा बड़े पैमाने पर किया जा रहा है।
राज्यपाल ने की थी शिकायत
उन्होंने कहा कि यह गैरकानूनी है क्योंकि जब कोई सदन का सदस्य नहीं होता तो वह राज्यचिन्ह का प्रयोग नहीं कर सकता है। उन्होंने कहा कि कुछ समय पहले राज्यपाल राम नाईक उनके संज्ञान में यह मामला लाए थे। उन्होंने एक पूर्व विधायक का पत्र दिखाते हुए उन्हें बताया कि किस तरह पूर्व विधायकों द्वारा राज्यचिन्ह वाले लेटरहेड पर पत्राचार किया जा रहा है।
राज्यपाल ने उन्हें कहा कि यह अवैध है और इस पर कार्यवाही की जाए। उसके बाद उन्होंने उनके सचिवालय से इस संबंध में तत्काल एक एडवाइजरी जारी करने को कहा।
सदन में कहा था न पार करें लक्ष्मण रेखा
हाल ही में हुए शीतकालीन सत्र में उन्होंने घोषणा की थी कि विधानसभा के सदस्य उनकी लक्ष्मण रेखा पार न करें। उन्होंने सख्त लहजे में कहा था कि वह सदन अनुशासनहीनता कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे। सदन में निरंतर सीटी बजाई जाए, कागज की गेदें बनाकर राज्यपाल या कुर्सियों पर फेकी जाएं। सदन में बैनर और प्लेकार्ड्स लेकर प्रदर्शन किया जाए यह भी उन्हें बर्दाश्त नहीं है।
-Legend News
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...