शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

अमित शाह की विपक्ष को “चुनौती” पर “पनौती” न बन जाए “मथुरा” BJP की गुटबाजी

यूपी में कल मुगलसराय जंक्‍शन का नाम बदलने के बाद आयोजित जनसभा के दौरान BJP के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अमित शाह ने विपक्ष को खुली चुनौती देते हुए कहा कि बुआ, बबुआ और बाबा के मिल जाने पर भी BJP ही जीतेगी।
अमित शाह ने दावा किया कि 2019 के लोकसभा चुनावों में BJP को यूपी से 2014 के मुकाबले 73 की जगह 74 सीटों पर तो जीत मिल सकती है, किंतु वह 72 नहीं हो सकतीं।
चूंकि 2019 के लोकसभा चुनावों में अब कुछ माह ही शेष हैं इसलिए BJP के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष का यूपी की धरती से किया गया यह दावा निश्‍चित ही बहुत अहमियत रखता है।
अमित शाह की संयुक्‍त विपक्ष को दी गई यह चुनौती सिर्फ विपक्ष के लिए ही नहीं, खुद BJP के लिए भी अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण है क्‍योंकि एक ओर जहां BJP के सहयोगी संगठन अक्‍सर उसके सामने समस्‍याएं खड़ी करते रहते हैं वहीं दूसरी ओर पार्टी के अंदर की गुटबाजी भी रह-रहकर सिर उठाती रहती है।
BJP के लिए 2019 का लोकसभा चुनाव 2014 के मुकाबले आसान नहीं होगा, इस बात से BJP के शीर्ष नेता भी न सिर्फ इत्तेफाक रखते हैं बल्‍कि मीडिया के सामने भी स्‍वीकारते हैं।
दरअसल, BJP का शीर्ष नेतृत्‍व भली-भांति समझ रहा है कि यदि BJP स्‍पष्‍ट बहुमत पाने में सफल नहीं हुई तो कर्नाटक वाली कहानी दोहराई जा सकती है। कर्नाटक में जिस तरह विपक्ष ने BJP को सत्ता से दूर करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था, उसने BJP को यह समझने में मदद की कि आने वाले समय में सीटों का मामूली अंतर भी उसके अरमानों पर पानी फेरने वाला होगा।
BJP में चाणक्‍य की उपाधि से विभूषित राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अमित शाह की इन सारी स्‍थिति-परिस्‍थितियों पर पैनी नजर होगी इसमें कोई संदेह नहीं, किंतु अपनी पार्टी में व्‍याप्‍त गुटबाजी पर उनकी उतनी ही पैनी नजर है, इसे लेकर संशय पैदा होता है।
दो दिन पहले मथुरा में घटी एक घटना इसका उदाहरण है। मथुरा में 04 अगस्‍त को 2019 के लोकसभा चुनावों की तैयारी के लिए BJP ने समन्‍वय समिति की बैठक बुलाई। इस बैठक में मथुरा की सांसद और प्रसिद्ध सिने अभिनेत्री दिखाई नहीं दीं जबकि उस दिन वह पहले से तय अपने कार्यक्रम के मुताबिक मथुरा में मौजूद थीं।
सांसद हेमा मालिनी का आगामी लोकसभा चुनावों की तैयारी के लिए बुलाई गई समन्‍वय समिति की बैठक में ही न पहुंचना बहुत से सवाल खड़े कर गया।
गौरतलब है कि इस बैठक में BJP के प्रदेश महामंत्री गोविंद शुक्‍ला, प्रदेश के ऊर्जा मंत्री और मथुरा-वृंदावन क्षेत्र के विधायक व प्रदेश सरकार के प्रवक्‍ता श्रीकांत शर्मा के अलावा पार्टी के बाकी तीनों विधायक, मेयर मुकेश आर्यबंधु सहित तमाम अन्‍य स्‍थानीय नेता तथा आगरा के विधायक और मथुरा के प्रभारी योगेन्‍द्र उपाध्‍याय भी मौजूद थे।
आश्‍चर्य तब हुआ जब इस सवाल का कोई एक संतोषजनक जवाब न देकर पार्टी स्‍तर से ऐसे जवाब दिए गए जो भ्रम फैलाने वाले थे। मसलन जिला मीडिया प्रभारी ने बताया कि सांसद हेमा मालिनी को बैठक की सूचना दी गई थी किंतु वह क्‍यों नहीं आईं, यह पता नहीं।
पार्टी सूत्रों की मानें तो हेमा मालिनी ने अपनी इस उपेक्षा को काफी गंभीरता से लेते हुए प्रदेश और दिल्‍ली स्‍तर पर भी शिकायत की, नतीजतन पार्टी के मथुरा प्रभारी को भविष्‍य में ऐसी गलती न होने का भरोसा दिलाना पड़ा।
उधर हेमा मालिनी ने स्‍पष्‍ट कहा है कि उन्‍हें बैठक में शामिल होने के लिए समन्‍वय समिति का कोई पत्र नहीं मिला। हेमा मालिनी ने हालांकि अपने पद व पार्टी की गरिमा का ध्‍यान रखते हुए यह भी जोड़ दिया कि शायद पार्टीजन मेरी मथुरा में मौजूदगी से अनभिज्ञ रहे होंगे।
इस सब के बावजूद मीडिया को दिए गए अपने बयान में हेमा मालिनी यह कहने से नहीं चूकीं कि कुछ लोग पार्टी में नए आए हैं इसलिए उन्‍हें पार्टी की रीति व नीति का ज्ञान नहीं है।
हेमा मालिनी का इशारा किस ओर था, इसे पार्टी और पार्टी के बाहर वाले लोग भी बखूबी समझ गए क्‍योंकि उन्‍होंने यह कहकर अपनी ताकत का अहसास करा दिया कि नए लोगों को साथ लेकर चलने की जिम्‍मेदारी भी उनकी है।
इसी दौरान हेमा मालिनी ने पार्टी में व्‍याप्‍त गुटबाजी पर जो कुछ कहा, वह चौंकाने वाला है। उन्‍होंने पहले तो मथुरा BJP में किसी तरह की गुटबाजी होने से इंकार किया किंतु फिर कहा कि यदि कोई गुटबाजी है भी तो वह समाप्‍त हो जाएगी।
उल्‍लेखनीय है कि मथुरा के जिलाध्‍यक्ष पद पर हाल ही में नगेन्‍द्र सिकरवार की नियुक्‍ति हुई है। नगेन्‍द्र सिकरवार को ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा का अत्‍यंत करीबी बताया जाता है। इससे पहले नगर निगम के लिए भी मुकेश आर्यबंधु का नाम तय कराने में श्रीकांत शर्मा की बड़ी भूमिका बताई जाती है।
श्रीकांत शर्मा यूं भी क्षेत्र में हेमा मालिनी से कहीं अधिक सक्रिय रहते हैं इसलिए ऐसे कयास भी लगाए जाने लगे हैं कि श्रीकांत शर्मा को पार्टी 2019 का लोकसभा चुनाव लड़वा सकती है। पार्टी के स्‍तर से भी इस बात के संकेत तब मिले जब यह बात निकल कर आई कि 2019 में कई महत्‍वपूर्ण हस्‍तियों का टिकट काटा जा सकता है।
यही कारण है कि चुनावों की तैयारी के लिए बुलाई गई समन्‍वय समिति की बैठक में सांसद हेमा मालिनी की अनुपस्‍थिति एक बड़ा मुद्दा बन गई और बैठक के दो दिन बाद तक उसे लेकर बयानों का सिलसिला जारी है।
जो भी हो, लेकिन समन्‍वय समिति की बैठक से उपजे हालात और उसके बाद आए बयान यह जाहिर कराने के लिए काफी हैं कि BJP में सब-कुछ ठीक तो नहीं चल रहा।
मथुरा की लोकसभा सीट हमेशा से BJP के लिए बहुत अहमियत रखती है और इसीलिए प्रत्‍येक चुनाव में मथुरा की उम्‍मीदवारी का चयन बहुत जद्दोजहद के बाद हो पाता है।
2009 के लोकसभा चुनाव में BJP ने अपना कोई उम्‍मीदवार न उतारकर रालोद को समर्थन दिया और 2014 के चुनाव में अभिनेत्री हेमा मालिनी को चुनाव लड़ाना पड़ा।
मथुरा जैसे महत्‍वपूर्ण संसदीय क्षेत्र से किसी बाहरी प्रत्‍याशी को चुनाव लड़ाने का पार्टी का निर्णय स्‍थानीय भाजपाइयों के लिए हमेशा असह्य रहा है क्‍योंकि उससे उनके अपने राजनीतिक भविष्‍य पर काले साए मंडराने लगते हैं लेकिन वह इस उम्‍मीद में कड़वा घूंट पी जाते हैं कि शायद अगली बार पार्टी उनके बारे में विचार करेगी।
मामूली उपकार पाकर अपने भविष्‍य से समझौता कर चुके कुछ भाजपाइयों की बात छोड़ दें तो ऐसे नेताओं की मथुरा में कोई कमी नहीं है जिन्‍हें लंबी रेस का घोड़ा कहा जा सकता है लेकिन पार्टी ने उनके प्रति उदासीन रवैया अपना रखा है।
लोकसभा चुनावों में 2009 से लगातार बाहरी प्रत्‍याशी और पिछले विधानसभा चुनावों में पांच में से दो बाहरी दलों से आए हुए प्रत्‍याशियों के चयन ने निष्‍ठावान भाजपाइयों को काफी आहत किया है। बसपा से आए लक्ष्‍मीनारायण चौधरी तो योगी सरकार में कबीना मंत्री भी हैं।
ऐसे में पार्टी के अंदर यदि 2019 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले कोई खिचड़ी पक रही हो तो आश्‍चर्य कैसा। आश्‍चर्य तो तब होता है जब भविष्‍य की खातिर उठने वाली हर आवाज़ को खारिज करके यह संदेश दिया जाता है कि ऑल इज़ वैल।
इस ऑल इज़ वैल के संदेश पर संशय पैदा करा देते हैं क्रिया की प्रतिक्रिया के रूप में आने वाले पार्टीजनों के बयान और अपनी-अपनी हैसियत दर्शाने वाले जवाब।
BJP के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष की चुनौती को संयुक्‍त विपक्ष किस तरह लेता है, यह तो वही जाने लेकिन यह हर कोई जानता है कि यदि मथुरा भाजपा इसी प्रकार ढपली बजाती रही तो यही ढपली राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष की चुनौती के लिए पानौती जरूर बन सकती है।
देखना यह है कि अमित शाह समय रहते चुनौती के लिए पनौती बन सकने वाली इन ढपलियों के सुर व ताल मिला पाते हैं या नहीं, अन्‍यथा चिड़ियों द्वारा खेत चुग जाने के बाद पछताने का कोई फायदा होने वाला नहीं है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

राजनीति के खेल में शायद इसे ही कहते हैं सेल्‍फ गोल या हिट विकेट

सुना है कि जब समय खराब चल रहा हो तो ऊंट पर बैठे हुए इंसान को भी कुत्ता काट लेता है। इसी कहावत के दूसरे पहलू को रामचरित मानस की इस चौपाई से समझा जा सकता है कि- जाकौं प्रभु दारुण दु:ख देहीं, ताकी मति पहले हरि लेहीं।
कहने का मतलब यह है कि ”कुछ करनी कुछ करम गति, कुछ करमन के भोग”।
कांग्रेस अध्‍यक्ष राहुल गांधी का संसद में प्रधानमंत्री मोदी से गले मिलने अथवा उनके गले पड़ने के बाद आंख मारने वाला प्रसंग अभी ठीक से समाप्‍त भी नहीं हुआ था कि अब कांग्रेस की ही संस्‍था यंग इंडिया द्वारा संचालित अंग्रेजी अखबार नेशनल हेराल्‍ड के दो समाचार सुर्खियां बन गए।
पहला समाचार रविवार 29 जुलाई के अंक में पहले पन्‍ने पर इस शीर्षक से प्रकाशित हुआ- “RAFALE: MODI’S BOFORS” । हिंदी में समझें तो ”राफेल: मोदी का बोफोर्स”।
इस समाचार को किसी ”भाषा सिंह” ने लिखा है। समाचार की ज्‍यादा गहराई में न जाकर भी इसकी हेडिंग से पता लगता है कि मोदी सरकार के ‘राफेल विमान’ सौदे की तुलना राजीव गांधी सरकार में हुए ‘बोफोर्स तोप’ सौदे से की गई है।
बोफोर्स तोप सौदे को पूरा देश बोफोर्स घोटाले के रूप में जानता है और उसका साया आज तक कांग्रेस का पीछा कर रहा है। हालांकि अदालतों में इसे घोटाला साबित नहीं किया जा सका।
नेशनल हेराल्‍ड की हेडिंग ने एकबार नए सिरे से बोफोर्स के उस जिन्‍न को बोतल से बाहर लाकर खड़ा कर दिया जिसे बंद करने के लिए कांग्रेस हर जतन करती रही है।
इस हेडिंग ने बोफोर्स को लेकर इतने प्रश्‍न एकसाथ खड़े कर दिए कि उनके सामने राफेल की बात बहुत पीछे छूट गई।
कांग्रेस का कोई नेता अब यह नहीं बता पा रहा कि क्‍या उनकी नजर में बोफोर्स एक घोटाला था ?
अगर कांग्रेस इसे घोटाला स्‍वीकार करती है तो ‘सेल्‍फ गोल’ करने जैसा होगा। अर्थात अदालत के बाहर जनअदालत में कन्‍फेस करना कि बोफोर्स की खरीद में घोटाला हुआ।
और यदि कांग्रेस इसे नकारती है तो फिर उसके लिए यह जवाब देना मुश्‍किल है कि उसकी ही संस्‍था द्वारा संचालित उस अखबार में जिसकी बुनियाद स्‍वयं जवाहर लाल नेहरू ने रखी थी, बोफोर्स तोप सौदे को घोटाला करार कैसे दे दिया ?
कांग्रेस के लिए जवाब देना इसलिए और भी मुश्‍किल है कि यदि बोफोर्स तोप सौदे में किसी प्रकार का कोई घोटाला नहीं हुआ तो उसकी राफेल डील से किस आधार पर तुलना की जा रही है?
इसी प्रकार दूसरे समाचार में नेशनल हेराल्ड की वेबसाइट ने मध्‍य प्रदेश में होने जा रहे विधानसभा चुनावों को लेकर एक सर्वे रिपोर्ट छापी है। यह सर्वे स्पीक मीडिया नेटवर्क ने किया था। इस सर्वे के मुताबिक मध्य प्रदेश में इस बार भी बीजेपी की सरकार बनने जा रही है। सर्वे ये भी कहता है कि मध्यप्रदेश में सीएम शिवराज सिंह और पीएम मोदी की लोकप्रियता बरकरार है।
कांग्रेसी विचारधारा का समर्थन करने वाले अख़बार तथा उसकी वेबसाइट में छपी इन दोनों खबरों का महत्‍व इसलिए और बढ़ जाता है कि कांग्रेस इन दिनों तमाम मीडिया घरानों पर मोदी समर्थक होने का आरोप लगाती रही है।
एक तरफ तमाम मीडिया घरानों पर आरोप और दूसरी तरफ अपनी ही संस्‍था के अखबार एवं वेबसाइट पर कांग्रेस की फजीहत कुछ वैसे ही है जैसे राहुल गांधी का संसद में किया गया प्रदर्शन।
अविश्‍वास प्रस्‍ताव पर बहस के दौरान राहुल गांधी ने संसद में जब प्रधानमंत्री को गले लगाया तो दलगत राजनीति से इतर सोच रखने वालों ने इसे तब तक उनकी सुहृयता समझा जब तक कि वह आंख मारते हुए नहीं पकड़े गए थे।
आंख मारकर उन्‍होंने अपना सारा खेल बिगाड़ लिया।
कांग्रेसियों ने उसके बाद भले ही उनके बचाव में यथासंभव दलीलें दीं और एक युवा नेता ने तो पत्रकारों से ही पूछ डाला कि क्‍या उन्‍होंने अपने जीवन में कभी आंख नहीं मारी, किंतु हकीकत यह है कि राहुल गांधी सेल्‍फ गोल कर बैठे।
उनके द्वारा संसद जैसे गरिमामय स्‍थान पर आंख मारना यह सिद्ध करने में सफल रहा कि कांग्रेस की अध्‍यक्षी मिल जाने के बावजूद वह मैच्‍योर नहीं हो पाए हैं।
राहुल गांधी के बचाव में पत्रकारों से सवाल करने वाले कांग्रेस के युवा नेता भी शायद यह भूल गए कि हर क्रिया-कलाप का महत्‍व मौके और दस्‍तूर के हिसाब से तय होता है।
सवाल यह नहीं है कि राहुल गांधी ने आंख क्‍यों मारी, सवाल यह है कि संसद के अंदर उन्‍होंने अविश्‍वास प्रस्‍ताव जैसे गंभीर मुद्दे पर बहस के दौरान तब आंख क्‍यों मारी जब वह कुछ क्षण पहले ही प्रधानमंत्री को गले लगाकर यह संदेश देने की कोशिश कर रहे थे कि उनके मन में किसी के प्रति कोई घृणा का भाव नहीं है और वह घृणा करने वालों को प्‍यार से जीतना चाहते हैं।
गले मिलकर कुर्सी पर बैठते ही उनके आंख मारने का सीधा संदेश यह गया कि देखो मैंने पीएम और भाजपाइयों को कैसा मूर्ख बनाया।
राहुल गांधी और कांग्रेस यह सब-कुछ इरादतन करते हैं या स्‍वभावगत उनसे ऐसा हो जाता है, यह तो वही जानें लेकिन इतना तय है कि खास कांग्रेसियों के अलावा कांग्रेस का भी एक अच्‍छा-खासा वर्ग यह मानता है कि कहीं न कहीं कुछ लोचा जरूर है।
कांग्रेस के वयोवृद्ध लोग राहुल गांधी को युवा नेता कहते हैं और हो सकता है कि उनकी दृष्‍टि में वह युवा हों भी किंतु 50 की उम्र को छूने वाला व्‍यक्‍ति जनसामान्‍य के लिए ‘अधेड़’ हो जाता है, और किसी अधेड़ व्‍यक्‍ति से बचकानी हरकतों की उम्‍मीद कोई नहीं करता। तब तो कदापि नहीं जब पूरी पार्टी का अस्‍तित्‍व और खुद उसका राजनीतिक करियर दांव पर लगा हो।
गलतियां किसी से हो सकती हैं और कभी भी हो सकती हैं परंतु यदि कोई गलतियों से सीख न लेकर उन्‍हें दोहराने और सही ठहराने का आदी हो जाए तो उसकी मदद ऊपर वाला भी नहीं कर सकता।
संसद से लेकर सड़क तक और अपने अखबार से लेकर तमाम मीडिया के सामने किया जा रहा कांग्रेस का प्रदर्शन यह बताता है कि उसने गलतियों से सबक न सीखने की जिद पकड़ ली है। अब यह जिद मोदी के सामने झुकता हुआ न दिखने की है अथवा कांग्रेस को नीचा दिखाने की, यह बता पाना तो मुश्‍किल है लेकिन इतना बताया जा सकता है कि राजनीति के खेल में इसे ही सेल्‍फ गोल या हिट विकेट कहते हैं।
हो यह भी सकता है कि कांग्रेस तथा कांग्रेसियों का खराब समय ही उससे यह सब-कुछ करवा रहा हो और इसीलिए ऊंट पर बैठने के बाद भी कुत्‍ते द्वारा काट लिए जाने की कहावत सटीक बैठ रही हो लेकिन ऐसा मानने वालों की भी कोई कमी नहीं कि जाकौं प्रभु दारुण दु:ख देहीं, ताकी मति पहले हरि लेहीं।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

डॉ. सुब्रह्मण्यम् स्वामी ने विनीत नारायण को बताया 21 वीं सदी का नटवर लाल, सीएम योगी आदित्‍यनाथ से की जांच की मांग, ब्रज फाउंडेशन ने दिया जवाब

वृंदावन निवासी विनीत नारायण को भाजपा के राज्‍यसभा सदस्‍य और तेजतर्रार नेता डॉ. सुब्रह्मण्यम् स्वामी ने 21 वीं सदी का नटवर लाल बताते हुए उनके द्वारा संचालित संस्‍था ‘द ब्रज फाउंडेशन’ की जांच सीबीआई से कराने को कहा है।
डॉ. सुब्रह्मण्यम् स्वामी ने इस सम्‍बन्‍ध में आठ पन्‍नों का एक पत्र उत्तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ को सौंपा है और खुद ट्वीट करके इसकी जानकारी दी है।

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दूसरी ओर इस पत्र के बारे में पूछे जाने पर विनीत नारायण ने प्रेस रिलीज के माध्‍यम से कहा है कि ‘द ब्रज फाउंडेशन’ पर डॉ. सुब्रह्मण्यम् स्वामी द्वारा लगाए गए सभी सनसनीखेज आरोपों का जवाब प्रमाण सहित ‘द ब्रज फाउंडेशन’ सीबीआई को इस अनुरोध के साथ सौंपने जा रही है कि सीबीआई इन सभी आरोपों की तुरंत निष्पक्ष जांच करवाए।
दरअसल सोनिया गांधी, राहुल गांधी, पी चिदंबरम तथा स्‍वर्गीय जयललिता जैसे दिग्‍गज नेताओं को अदालत के कठघरे तक ले जाने वाले भाजपा के फायरब्रांड नेता सुब्रह्मण्यम् स्वामी ने यूपी के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ को कल 28 जुलाई के दिन सौंपे अपने पत्र में विनीत नारायण तथा ‘द ब्रज फाउंडेशन’ पर अत्‍यंत गंभीर आरोप लगाए हैं।
सुब्रह्मण्यम् स्वामी के अनुसार मायावती सरकार में दो अन्‍य संस्‍थाओं के माध्‍यम से विनीत नारायण की संस्‍था ‘द ब्रज फाउंडेशन’ ने ब्रज क्षेत्र का मास्‍टर प्‍लान बनाने के नाम पर 57 लाख 65 हजार रुपए हड़प लिए।
सुब्रह्मण्यम् स्वामी का आरोप है कि ”धाम सेवा” की आड़ लेकर देश के बड़े उद्योगपतियों से पैसा उगाहने वाले विनीत नारायण और उनकी संस्‍था ‘द ब्रज फाउंडेशन’ एक्‍चुअली ”दाम सेवा” में लिप्‍त है।
यही कारण है कि मथुरा जनपद में ‘द ब्रज फाउंडेशन’ द्वारा कराये गए प्राचीन कुंडों एवं जलाशयों के जीर्णोद्धार को एनजीटी ने नियम विरुद्ध बताकर सख्‍त कार्यवाही करने के निर्देश जिला प्रशासन को दिए।
सुब्रह्मण्यम् स्वामी ने विनीत नारायण पर तमाम गरीब किसानों को उनकी भूमि से बेदखल करने का भी आरोप लगाया है।
सुब्रह्मण्यम् स्वामी ने यूपी के सीएम योगी आदित्‍यनाथ को लिखा है कि मथुरा के लिए बनाई गई ‘हृदय योजना’ में अपने राजनीतिक प्रभाव से ‘द ब्रज फाउंडेशन’ को ‘सिटी एंकर’ नामित कराकर विनीत नारायण ने पूरी योजना को ही पलीता लगा दिया है, बावजूद इसके अब तक उनके खिलाफ कोई कार्यवाही अमल में नहीं लाई गई है।
उन्‍होंने मथुरा की ‘हृदय योजना’ से विनीत नारायण और उनकी संस्‍था ‘द ब्रज फाउंडेशन’ को तत्‍काल बेदखल करने की भी मांग की है ताकि मथुरा के विनाश को रोका जा सके।
साथ ही ‘द ब्रज फाउंडेशन’ की समस्‍त गतिविधियों पर रोक लगाने तथा उसके आर्थिक लेनदेन को भी प्रतिबंधित करने की मांग सुब्रह्मण्यम् स्वामी ने अपने पत्र में की है।
पत्र में स्‍वामी ने इस बात का भी उल्‍लेख किया है कि मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण में उपाध्‍यक्ष के पद पर काबिज रहीं आईएएस अधिकारी यशु रुस्‍तगी ने हृदय योजना को गलत तौर-तरीकों से प्रभावित करने पर ‘द ब्रज फाउंडेशन’ से जुड़े राघव मित्तल के खिलाफ थाना सदर बाजार में आईपीसी की धारा 353, 183 व 186 और आपराधिक कानून (संसोधन) की धारा 7 के तहत केस दर्ज कराया था। सदर बाजार पुलिस 12 अप्रैल 2018 को इस केस में आरोप पत्र भी दायर कर चुकी है जिसका नंबर 253/18 है।
स्‍वामी ने ‘द ब्रज फाउंडेशन’ के पदाधिकारियों पर आपराधिक गतिविधियों में लिप्‍त रहने तथा सरकारी अफसरों को डरा-धमका कर उन्‍हें अपने कर्तव्‍य निर्वहन से रोकने जैसा गंभीर आरोप भी लगाया है।
स्‍वामी के आरोपों पर द ब्रज फाउंडेशन के सचिव व कालचक्र समाचार ब्यूरो के प्रबंधकीय संपादक रजनीश कपूर ने बाकायदा प्रेस-विज्ञप्ति जारी की है। इस विज्ञप्‍ति के माध्‍यम से कपूर ने सीबीआई को आश्वस्त किया है कि आरोपों के संदर्भ में जो भी जानकारी मांगी जाएगी, उसे द ब्रज फाउंडेशन सहर्ष उपलब्ध कराएगी।
विज्ञप्‍ति के अनुसार इससे पहले 19 जून 2018 को द ब्रज फाउंडेशन के अध्यक्ष विनीत नारायण ने संस्‍था का पिछले 13 वर्ष का आय-व्यय का संपूर्ण ब्यौरा भारत के नियंत्रक व महालेखाकार राजीव महर्षि को इस अनुरोध पत्र के साथ सौंपा था कि उनकी संस्था के विरूद्ध आय-व्यय के मामले में किसी भी तरह की जांच करवा ली जाए ताकि झूठे आरोप लगाने वाले बेनकाब हो सकें।
आज जारी विज्ञाप्ति में कपूर ने बताया है कि गत 4 जून 2018 को उन्होंने भारत सरकार के प्रवर्तन निदेशालय के एक ताकतवर अधिकारी राजेश्वर सिंह के विरूद्ध सर्वोच्च न्यायालय में आय से अधिक संपत्ति के मामले की जांच करवाने के लिए जनहित याचिका दायर की थी क्योंकि उन पर अपने पद का दुरुपयोग कर अकूत संपत्ति अर्जित करने के आरोप हैं।
उनके इस कदम से डा. स्वामी बुरी तरह विचलित हो गए और द ब्रज फाउंडेशन के विरुद्ध अनर्गल प्रलाप करने लगे।
कपूर ने आश्चर्य व्‍यक्‍त किया है कि भ्रष्टाचार के आरोपी एक जूनियर अधिकारी के खिलाफ जांच होने से डा. स्वामी इतना क्यों घबरा रहें हैं उनके इस अधिकारी से क्या सम्बन्ध हैं ?
कपूर के अनुसार डा. स्वामी ने इस केस में हस्तक्षेप करके तथा राजेश्वर सिंह ने रजनीश कपूर के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अदालत की अवमानना का मुकद्दमा दायर करके उन्‍हें डराने-धमकाने की भी कोशिश की पर सर्वोच्च न्यायालय ने इनकी कोशिशों पर पानी फेर दिया और दोनों की याचिकाएं अस्वीकार कर रजनीश कपूर की याचिका पर 27 जून 2018 को राजेश्वर सिंह के विरूद्ध जांच की छूट दे दी, जिस पर पहले रोक लगी थी।
कपूर के अनुसार तभी से डॉ. स्वामी बुरी तरह बौखलाए हुए हैं और इसी क्रम में उन्होंने मुख्यमंत्री योगी को ये बेबुनियाद आरोप पत्र भेजकर सनसनी पैदा करने का प्रयास किया है।
इसी संदर्भ में द ब्रज फाउंडेशन के अध्‍यक्ष विनीत नारायण का कहना है कि, ‘पत्रकारिता और ब्रज में जो कुछ मैंने गत 40 वर्षों में किया है, वह पूरे देश के सामने खुली किताब की तरह है। मैं हर तरह की जांच का स्वागत करूंगा और यह अपेक्षा रखूंगा कि आरोप गलत सिद्ध होने पर आरोप लगाने वाले अपनी सजा अभी से स्वयं ही तय कर लें जिससे फिर मुझे नाहक उनके विरुद्ध मानहानि का मुकदमा दायर न करना पड़े।’
-Legend news

एक मिनट में ‘मैगी’ भले ही न बने, लेकिन ‘हेमा जी’ सीएम बन सकती हैं…कोई शक !

मथुरा की सांसद और बॉलिवुड की स्‍वप्‍न सुंदरी हेमा मालिनी जी ने दो दिन पहले राजस्‍थान के बांसवाड़ा में दावा किया कि वह यदि चाहें तो एक मिनट के अंदर ‘मुख्‍यमंत्री’ बन सकती हैं।
सुन रहे हैं न योगी जी।
हालांकि कुछ लोग कहते हैं कि एक मिनट में तो ‘मैगी’ भी नहीं बन सकती जी…फिर हेमा जी ‘सीएम’ कैसे बन सकती हैं।
मेरा मानना है कि ऐसा कहने वाले विरोधी (भाजपा के नहीं, हेमा जी के) रहे होंगे अन्‍यथा हेमा जी तो हेमा जी हैं, क्‍या नहीं कर सकतीं। गनीमत है उन्‍होंने यह नहीं कहा कि मैं चाहूं तो एक मिनट में ‘पीएम’ बन सकती हूं।
हेमा जी यहीं नहीं रुकीं। उन्‍होंने कहा, लेकिन मैं ऐसा चाहती नहीं हूं क्‍योंकि इससे मेरा “फ्री मूवमेंट” रुक जायेगा। मैं “बंध” जाऊंगी।
यू नो…”बंधन” उन्‍हें पसंद नहीं है। उससे ”आजादी” छिन जाती है।
हेमा जी की बात में तो दम है। उन्‍होंने शादी बेशक की, किंतु शादी के ”बंधन” में कभी नहीं बंधी। ”मूवमेंट” उनका शादी के बाद भी उतना ही ‘फ्री’ रहा, जितना कि शोले में ‘बसंती’ बनकर रहा था।
मथुरा की जनता को भी अब यह बात भली-भंति समझ में आ गई होगी कि उन्‍हें ‘बंधन’ नहीं ‘फ्री मूवमेंट’ पसंद है इसीलिए वह मथुरा की जनता के चाहने से नहीं, अपनी मर्जी से अपने संसदीय क्षेत्र में ‘मूव’ करती हैं।
बहरहाल, मुझे तो योगी जी की चिंता हो रही है। सोच रहा हूं कि ‘गोरखनाथ मठ’ के इंतजामात दुरुस्‍त करवा दूं क्‍योंकि पता नहीं कब हेमा जी चाह बैठें और कब योगी जी की ‘मठ’ वापसी तय हो जाए।
पीएम पद 2019 से पहले वेेकेंट नहीं है और मोदी जी का उसे फिलहाल छोड़ने का इरादा भी नजर नहीं आता क्‍योंकि वह मठ से नहीं हठ से आए थे, इसलिए हेमा जी ने यदि चाह लिया तो योगी जी के पास ‘मठ’ लौटने के अलावा कोई विकल्‍प बचेगा नहीं।
मेरी तो योगी जी को यही सलाह है कि प्रदेश को सुधारने का ख्‍वाब देखना छोड़ो और जैसे भी हो लोकसभा चुनावों तक का समय निकाल लो।
चूंकि 2019 का लोकसभा चुनाव हेमा जी मथुरा से ही दोबारा लड़ने का मन बना चुकी हैं इसलिए हो सकता है कि 2019 में उनकी निगाहें पीएम पद पर जा टिकें। भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार का पहला पीएम ‘बनारस’ से हो सकता है तो दूसरा ‘मथुरा’ से नहीं हो सकता है क्‍या। ऐसा हुआ तो योगी जी बाकी ढाई-तीन साल और यूपी के ‘मठाधीश’ बने रह सकते हैं।
हेमा जी ने बांसवाड़ा में यह भी बताया कि उन्‍होंने सांसद बनने से पहले भी पार्टी यानी भाजपा के लिए बहुत काम किया था।
जब सांसद बनने का मन किया तो एक मिनट में मथुरा की सांसद बन गईं। इसके बाद चार साल से अनवरत मथुरा का विकास करा रही हैं। मथुरा में यमुना तो वर्षों से बह रही थी किंतु ‘गंगा’…(विकास की) उन्‍होंने लाकर बहा दी।
मथुरा के लिए हेमा जी ‘भागीरथ’ बनकर आईं और भाजपा की जटाओं के माध्‍यम से विकास की गंगा उलझा कर मथुरा में बहा दी। दो दिन की बारिश में पूरे जिले ने देखी है वो विकास की गंगा।
यमुना पर याद आया। हेमा जी ने तो यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने के भी बहुत प्रयास किए। अपने ‘फ्री मूवमेंट’ में से कुछ समय का ‘बंधन’ स्‍वीकार कर यमुना के किनारे अपने नृत्‍य का कार्यक्रम फिक्‍स किया लेकिन ‘यमुना पुत्रों’ ने एनजीटी से मिलकर उसमें रोड़ा अटका दिया।
‘यमुना पुत्र’ शायद तब नहीं जानते थे कि हेमा जी जिस काम की ठान लें, उसे रोक पाना किसी के बस में नहीं। उन्‍होंने मथुरा की वेटरनरी यूूनिवर्सिटी में न सिर्फ नृत्‍य का झक्‍कास कार्यक्रम किया बल्‍कि यह भी बताया कि यमुना को प्रदूषित करने और रखने में ऐसे ही ‘विघ्न संतोषियों’ का बड़ा हाथ है।
अब जबकि हेमा जी ने इस आशय का रहस्‍योद्घाटन किया है कि वह चाहें तो एक मिनट में मुख्‍यमंत्री बन सकती हैं, तब जाकर समझ में आया कि योगी जी क्‍यों उनके नृत्‍य कार्यक्रम में वेटरनरी यूूनिवर्सिटी दौड़े-दौड़े चले आए थे।
हमें भले ही अब जाकर पता लगा हो किंतु योगी जी तो जानते होंगे न कि हेमा जी जिस ‘मिनट’ चाह लेंगी, उस ‘मिनट’ उनकी ‘मठ’ वापसी हो जाएगी इसलिए बेचारे बरसाने से पहले वेटरनरी पहुंचे।
भाई! किसी को शक हो तो हो, मैगी चाहे दो मिनट से पहले न बनती हो, लेकिन मुझे पूरा विश्‍वास है कि हेमा जी चाह लेंगी तो एक मिनट में “सीएम” (अपने यूपी की) बन ही जायेंगी।
पीएम के काम की उन्‍होंने बांसवाड़ा में तारीफ की है जिससे साफ जाहिर है कि वह पीएम के काम से खुश हैं और पीएम की कुर्सी को 2018 में तो कोई खतरा नहीं है।
2019 की राम जानें। वह हेमा जी के मूड पर निर्भर करता है कि ‘सीएम’ बनना चाहती हैं या ‘पीएम’ बनना।
कुछ लोग यह कहते भी पाये गए हैं कि 2019 में यदि हेमा जी की ‘वन मिनट’ इच्‍छा ने जोर मारा तो संभव है ‘मोदी’ जी की जगह ‘योगी’ जी और योगी जी की जगह ‘हेमा’ जी दिखाई दें। सांसदी का क्‍या है, योगी जी ने भी त्‍यागी थी यूपी की खातिर 2017 में । 2019 में हेमा जी त्‍याग देंगी। वन मिनट…मैं अभी आता हूं। मेरी ‘मैगी’ उबल रही है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

सरकारें तो बदलीं लेकिन नहीं बदली मथुरा की तस्‍वीर: नेता मस्‍त, अधिकारी ‘व्‍यस्‍त’, जनता त्रस्‍त

महाभारत नायक योगीराज श्रीकृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली में इस वक्‍त चारों ओर भाजपा का परचम लहरा रहा है। सांसद भाजपा की, पांच में से चार विधायक भाजपा के, जिला पंचायत अध्‍यक्ष भाजपा की और मेयर भी भाजपा के। चार में से दो विधायक कबीना मंत्री।
सोने पर सुहागा ये कि उत्तर प्रदेश से लेकर केंद्र तक भी भाजपा की ही सरकार।
लेकिन भगवा के इस स्‍वर्णिम काल में भी भगवान कृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली का गौरव प्राप्‍त मथुरा नगरी जस की तस है। जैसी माया और अखिलेश के राज में थी, वैसी ही आज भी है।
कांग्रेस के शासनकान में जवाहर लाल नेहरू नेशनल अरबन रिन्‍यूअल मिशन अर्थात ‘जे नर्म’ का जमकर ढिंढोरा पीटा गया और कहा गया कि उससे मथुरा की काया पलट जाएगी, किंतु नतीजा ढाक के तीन पात रहा।
सैकड़ों करोड़ रुपए भ्रष्‍ट व्‍यवस्‍था की भेंट चढ़ गए लेकिन मथुरा में नाले-नालियों एवं सीवर की गंदगी तक के निकास का मुकम्‍मल इंतजाम नहीं हो पाया। हुआ तो ये कि मथुरा की तत्‍कालीन नगर पालिका अध्‍यक्ष मनीषा गुप्‍ता करीब दो करोड़ रुपए के घोटाले में फंस गई जो आज भी न्‍यायालय में लंबित है।
2014 में मोदी सरकार बनने के बाद जब यूपी में योगी राज आया तो मथुरा के लोगों को उम्‍मीद बंधी की अब शायद मथुरा के दिन बहुरेंगे परंतु एकसाल बीत जाने पर भी मथुरा की दयनीय दशा बरकरार है।
बात चाहे साफ-सफाई की हो अथवा यातायात व्‍यवस्‍था की, अपराध की हो या व्‍यापार की। कहीं कुछ नहीं बदला।
योगी आदित्‍यनाथ के शपथ ग्रहण करने के साथ ही शहर के बीचोंबीच मयंक चेन नामक सर्राफा व्‍यवसाई के यहां दो व्‍यवसाइयों की हत्‍या करके करोड़ों के माल की डकैती डालकर बदमाशों ने जो चुनौती भाजपा सरकार को दी थी, वह आजतक कायम है। लूट, डकैती, चोरी, हत्‍या, राहजनी, बलात्‍कार और टटलुओं द्वारा किए जाने वाले विशेष अपराधों के ग्राफ में कोई कमी नहीं आई है।
चंद दिनों मथुरा के एसएसपी रहे प्रभाकर चौधरी ने यातायात व्‍यवस्‍था में अपनी इच्‍छाशक्‍ति के बल पर आमूल-चूल परिवर्तन करके जरूर दिखाया लेकिन उनका स्‍थानांतरण होते ही हर दिन जाम लगने का सिलसिला फिर शुरू हो चुका है।
गंदगी के मामले में तो मथुरा ने सबसे निचले पायदान तक भी न पहुंचकर सिद्ध कर दिया कि नगर पालिका को नगर निगम में तब्‍दील करके नगरीय क्षेत्र का नहीं, गंदगी के साम्राज्‍य का भी विस्‍तार किया है।
कहने को मथुरा सहित उससे जुडे विभिन्‍न धार्मिक स्‍थलों का कायाकल्‍प करने के लिए अरबों रुपए की योजनाएं बनाई गई हैं, कुछ पर काम भी चल रहा है किंतु सच्‍चाई यह है कि ऐसी योजनाएं मायावती के शासन में रहते भी बनी थीं और अखिलेश राज में भी। अब योगीराज उसी लकीर पर काम कर रहा है परंतु धरातल पर हालात बदलते दिखाई नहीं दे रहे। हर योजना किसी न किसी वजह से अटकी पड़ी है।
यहां तक कि करीब 180 एकड़ में फैले जिस सरकारी ‘जवाहर बाग’ को राजनीतिक संरक्षण प्राप्‍त माफिया रामवृक्ष यादव के चंगुल से मुक्‍त कराने में दो पुलिस अधिकारी शहीद हो गए, उसका स्‍वरूप बदलने के लिए बनाई गई योजना भी अभी रेंग रही है।
यह हाल तो तब है जबकि सरकार ने पूरे ब्रज क्षेत्र के विकास को ‘उत्तर प्रदेश ब्रजतीर्थ विकास परिषद’ का गठन कर उसकी कमान पूर्व प्रशासनिक अधिकारी नागेन्‍द्र प्रताप तथा पूर्व पुलिस अधिकारी शैलजाकांत मिश्र के अनुभवी हाथों में सौंप रखी है। यह दोनों अधिकारी अपने सेवाकाल में लंबे समय तक मथुरा में तैनात भी रह चुके हैं।
इनके अलावा सांसद हेमा मालिनी ने भी ‘ब्रजभूमि विकास ट्रस्‍ट’ के नाम से एक संस्‍था रजिस्‍टर्ड करा रखी है जिसमें न सिर्फ हेमा मालिनी बल्‍कि उनके समधी व भाई सहित करीब आधा दर्जन लोग ट्रस्‍टी हैं।
करोड़ों देशवासियों की आराध्‍य यमुना मैया तो निश्‍चित ही खून के आंसू रो रही होगी क्‍योंकि उसके साथ अनवरत छल किया जा रहा है। उसके साथ छल करने में कोई शासक पीछे नहीं रहा। यमुना जल हाथ में लेकर सौगंध खाने वाले और यमुना की पूजा करके चुनाव का पर्चा दाखिल करने वाले नेताओं ने यमुना को कहीं का नहीं छोड़ा। हरियाणा में हिंदूवादी सरकार बन जाने पर भी हथिनी कुंड से यमुना के लिए पानी उपलब्‍ध कराने का कोई रास्‍ता निकालना तो दूर, उसे लेकर चर्चा तक की आवश्‍यकता महसूस नहीं की जा रही। मथुरा-वृंदावन के अधिकांश नाले सीधे यमुना में गिर रहे हैं नतीजतन यमुना का जल स्‍नान अथवा पान करने लायक तक नहीं है।
जीवन दायिनी और मोक्ष प्रदायिनी यमुना का प्रदूषित जल आज क्षेत्रीय नागरिकों के जीवन पर संकट का कारण बन चुका है। अनेक लोग यमुना के प्रदूषित जल की वजह से गंभीर बीमारियों का शिकार हो चुके हैं।
यह बात अलग है कि यमुना को ‘मां’ का दर्जा देने के कारण बहुत से लोग आज भी यमुना को इसके लिए जिम्‍मेदार नहीं ठहराते किंतु नेताओं को जिम्‍मेदार मानने से पूरी तरह इत्तेफाक रखते हैं।
सच भी यही है कि यमुना मैली हुई है तो नेताओं की कथनी और करनी में चले आ रहे भेद के कारण, न कि उसके अपने कारण। यमुना को गंदगी का पर्याय बना देने में नेताओं की वादाखिलाफी ने बड़ी भूमिका अदा की है।
आश्‍चर्य की बात यह भी है कि मथुरा जैसे विश्‍वविख्‍यात धार्मिक स्‍थल की बदहाली बरकरार रखकर भाजपा 2019 के लोकसभा चुनावों में 2014 की अपनी कामयाबी दोहराने के सपने देख रही है।
माना कि यूपी की पूर्ववर्ती सरकारें भी कृष्‍ण की नगरी को उसका गौरवपूर्ण स्‍वरूप दिलाने में असफल रहीं किंतु योगीराज से नाराजगी की बड़ी वजह उसके द्वारा धार्मिक स्‍थानों के पूर्ण विकास का सपना दिखाना तथा उत्तर प्रदेश को भयमुक्‍त करके उत्तम प्रदेश के रूप में स्‍थापित करने का भरोसा दिलाना है।
बाकी बात रही स्‍थानीय भाजपा नेताओं की तो उनकी दयनीय दशा का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि 2009 के लोकसभा चुनावों में पार्टी को रालोद के युवराज जयंत चौधरी का समर्थन करना पड़ा और 2014 में स्‍वप्‍न सुंदरी को मथुरा लाना पड़ा।
2019 के लिए भी फिलहाल तो कोई ऐसा चेहरा सामने दिखाई नहीं दे रहा जो हेमा मालिनी की जगह ले सके लिहाजा यदि हेमा मालिनी की जगह किसी और के बावत सोचा भी जाता है तो पार्टी एकबार फिर किसी बाहरी को नए रैपर में लपेटकर पेश कर सकती है किंतु मथुरा का भाग्‍य विधाता होगा तो बाहरी ही।
ऐसे में यह कह पाना बेहद मुश्‍किल है कि मथुरा को उसका गौरवशाली अतीत कब तक नसीब होगा और कब तक यमुना प्रदूषण मुक्‍त हो पाएगी।
कब तिराहे-चौराहों को जाम के झाम से और सड़कों को अतिक्रमण की मानसिकता से मुक्‍ति मिलेगी। कब मथुरावासियों सहित यहां आने वाले पर्यटक व तीर्थयात्री भयमुक्‍त होकर भ्रमण कर सकेंगे। कब जलभराव जैसी मामूली सी समस्‍या का समाधान होगा और कब टटलुओं के लूट का कारोबार ध्‍वस्‍त होगा।
कहने को एक साल काफी कम है और चार साल बाकी हैं, किंतु बताने को पंद्रह साल का कारनामा भी है जिसने मथुरा तथा मथुरावासियों एवं ब्रज और ब्रजवासियों सहित यमुना मैया को भी सिर्फ ठगा ही ठगा है।
अंत में कहने को मात्र यही शेष रह जाता है कि ”ठग जाने ठगही की माया और खग ही जाने खग की भाषा”।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

लोकसभा चुनाव 2019: 120 सांसदों का पत्ता काटने की तैयारी में भाजपा, डेढ़ दर्जन मंत्री भी शामिल

2019 के लोकसभा चुनावों में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी करीब 120 सिटिंग सांसदों का पत्ता काटने वाली है। इनमें करीब डेढ़ दर्जन सांसद तो ऐसे हैं जो वर्तमान मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री बने बैठे हैं। पार्टी अब इन सांसदों को टिकट देने के ही मूड में नहीं है।
इस बावत पार्टी के शीर्ष नेतृत्‍व द्वारा की गई मीटिंग में उपस्‍थित रहे सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार भाजपा अपने इस समय मौजूद कुल 273 लोकसभा सदस्‍यों में से लगभग 45 प्रतिशत सदस्‍यों का पत्ता काटने की तैयारी कर चुकी है जिनमें वो 19 सांसद भी शामिल हैं जो 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले 75 साल की उम्र पूरी करने वाले हैं।
75 साल और उससे अधिक की उम्र वाले ऐसे सांसदों में पार्टी के मार्गदर्शक मंडल से लालकृष्‍ण आडवाणी तथा मुरली मनोहर जोशी के अलावा करिया मुंडा, शांता कुमार, भुवनचंद्र खंडूरी, लीलाधरभाई वाघेला, कलराज मिश्र, रामटहल चौधरी, हुकुमदेव नारायण यादव के नाम प्रमुख हैं।
बताया जाता है कि 75 साल की उम्र पूरी करने वाले सांसदों के अलावा जिन सांसदों का टिकट 2019 में काटा जाना है, उनकी परफॉरमेंस के बारे में पार्टी ने विभिन्‍न स्‍तर पर अपने सोर्सेज से फीडबैक ले लिया है।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक फीडबैक देने वालों में राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ यानि आरएसएस के अलावा चुनिंदा पार्टी कार्यकर्ता तो हैं ही, साथ ही कुछ प्राइवेट एजेंसीज तथा ”नमो एप” की भी महत्‍वपूर्ण भूमिका रही है।
इन सभी सोर्सेज ने सीधे प्रधानमंत्री मोदी को अपने-अपने सर्वे से अवगत कराया है और इसी आधार पर यह निर्णय लेने की तैयारी की गई है ताकि समय रहते 2019 के लिए लोकप्रिय व ईमानदार चेहरों को तलाश लिया जाए।
गत दिनों हरियाणा के सूरजकुंड में इस विषय पर पार्टी के शीर्ष नेतृत्‍व द्वारा की गई बैठक में राष्‍ट्रीय सचिव और महासचिव एवं आरएसएस के वरिष्‍ठ नेता भी मौजूद थे। इस बैठक में विस्‍तृत रूप से इस बात पर चर्चा के बाद सहमति बनी कि नाकाबिल सिटिंग सांसदों को टिकट न दिया जाए।
ऐसे सांसदों में सबसे अहम नाम विदेश मंत्री और मध्‍य प्रदेश के विदिशा से सांसद सुषमा स्‍वराज का है क्‍योंकि विदिशा की जनता सुषमा स्‍वराज से खासी नाराज बताई गई है। इसके अलावा नीति आयोग ने भी विदिशा की विकास संबंधी रिपोर्ट को बहुत खराब बताया है।
बताया जाता है कि संगठन के सचिव और महासचिवों ने अपनी रिपोर्ट में जिन सांसदों की जनता के बीच परफॉरमेंस और पॉपुलेरिटी पूअर बताई गई है, उनकी संख्‍या एक सैकड़ा से अधिक है।
ऐसे सभी सांसदों को पार्टी ने अंतिम रूप से अधिकतम 6 माह का समय इसलिए दिया है कि यदि वह इस दौरान अपनी परफॉरमेंस को पूअर से प्रॉपर बना पाते हैं तो उन्‍हें चुनाव लड़ाने के बावत विचार किया जा सकता है।
पार्टी ने ये समय भी इसलिए दिया है ताकि इसी वर्ष चार राज्‍यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों के नतीजे भी सामने आ जाएं और वहां के सिटिंग भाजपा सांसदों की परफॉरमेंस का ठोस आकलन किया जा सके।
इन सब के अलावा पार्टी उन सांसदों को रीप्‍लेस करने का पूरा मन बना चुकी है जिन्‍होंने पार्टी के अंदर रहकर मोदी सरकार के काम-काज की न सिर्फ तीखी आलोचना की है बल्‍कि समय-समय पर पार्टी को नुकसान पहुंचाने का काम भी किया है।
पार्टी के अंदरुनी और अत्‍यंत भरोसमंद इन सूत्रों के अनुसार 2019 के लोकसभा चुनावों में जिन सांसदों का पत्ता काटा जाना है उनमें से करीब डेढ़ दर्जन ने उत्तर प्रदेश से जबकि 26 ने मध्‍यप्रदेश जीत हासिल की थी। बाकी का ताल्‍लुक राजस्‍थान, बिहार, मध्‍य प्रदेश, कर्नाटक व गुजरात से है।
इस सबके बीच पार्टी ने इस बात का भी पूरा ख्‍याल रखा है कि विपक्ष का संभावित गठबंधन कौन-कौन से और कहां-कहां के उम्‍मीदवारों को प्रभावित कर सकता है।
उल्‍लेखनीय है कि मथुरा भी ऐसा ही संसदीय क्षेत्र है जहां विपक्ष का संभावित गठबंधन भाजपा के सामने संकट खड़े कर सकता है।
मथुरा से 2014 में भी भाजपा ने बाहरी प्रत्‍याशी सिने अभिनेत्री हेमा मालिनी को चुनाव लड़वाया क्‍योंकि तब यहां पार्टी को कोई जिताऊ कद्दावर प्रत्‍याशी नहीं मिल सका था।
बाहरी प्रत्‍याशियों को लेकर मथुरा की जनता का जैसा कटु अनुभव पूर्व में रहा है, उसमें फिलहाल कोई उल्‍लेखनीय प्रगति नहीं हो सकी है। बात चाहे हरियाणा से आए मनीराम बागड़ी की हो अथवा फर्रुखाबाद से आए डॉ. सच्‍चिदानंद हरि साक्षी महाराज की। रालोद के युवराज जयंत चौधरी की हो अथवा मायानगरी से आईं स्‍वप्‍न सुंदरी हेमा मालिनी की।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

वाह योगी जी वाह….यही है तबादला नीति…जो छिनरे, वो ही डोली के संग

ब्रज में एक कहावत है। कहावत कुछ ऐसे है- जो छिनरे, वो ही डोली के संग। समझने वाले समझ गए होंगे, और न समझे वो अनाड़ी हैं।
फिलहाल यह कहावत याद आई है मथुरा में एसएसपी के पद पर कार्यरत युवा आईपीएस अधिकारी प्रभाकर चौधरी के स्‍थानांतरण से। बात निकली है तो दूर तक जायेगी ही। प्रभाकर चौधरी के स्‍थानांतरण से याद आया कि कुछ और भी स्‍थानांतरण योगीराज में ऐसे हुए हैं जिन पर यह कहावत सटीक सिद्ध होती है, लेकिन पहले बात प्रभाकर चौधरी की।
पुलिस की आम छवि के विपरीत प्रभाकर चौधरी ने बहुत कम समय में मथुरा की जनता को अपनी कार्यशैली से प्रभावित किया। प्रभाकर चौधरी ने मथुरा की यातायात व्‍यवस्‍था में आमूल-चूल परिवर्तन करके यह साबित कर दिया कि इच्‍छाशक्‍ति हो तो लाइलाज रोग भी दुरुस्‍त किया जा सकता है। जिन-तिराहों चौराहों पर तिपहिया वाहन चालकों का पूरी तरह कब्‍जा रहता था और थाना-चौकियों की पुलिस के संरक्षण में वह खुलेआम गुण्‍डागर्दी करते थे, प्रभाकर चौधरी ने उन्‍हें पूरी तरह हद में रहना सिखा दिया। होलीगेट और भरतपुर के अंदर चाहे जब माल उतरवाने वालों को समझा दिया कि अधिकारी कड़क हो तो नोटों की खनक भी काम नहीं आती।
आम जनता को सुकून और महकमे में बेचैनी से प्रभाकर चौधरी की कार्यप्रणाली का अंदाज लगाया जा सकता है। हालांकि इंस्‍पेक्‍टर से ऊपर के अधिकारियों ने उनके रहते भी थाने-चौकियों से निर्धारित महीनेदारी वसूलने में कोताही नहीं बरती जिसे थाना-चौकी प्रभारी ”मरे पर मार” की संज्ञा दिया करते थे किंतु फिर भी प्रभाकर चौधरी की ईमानदारी के कायल थे।
बेशक प्रभाकर चौधरी के कार्यकाल में अपराधों पर बहुत प्रभावी अंकुश नहीं लग पाया किंतु उसके लिए उनके प्रयास निश्‍चित ही सार्थक रहे।
शुरू-शुरू में तो प्रभाकर चौधरी पर सत्ताधारी पार्टी के नेता भी फख्र किया करते थे किंतु धीरे-धीरे वह कुछ नेताओं की आंखों में खटकने लगे। ऐसे नेताओं को उस दिन मौका मिल गया जिस दिन उप मुख्‍यमंत्री दिनेश शर्मा के मथुरा आगमन पर प्रभाकर चौधरी ने कुछ नेताओं को प्रोटोकॉल तोड़कर मुलाकात करने से रोका। इन नेताओं की एसएसपी से झड़प हुई और उन्‍होंने पार्टी को हाजिर-नाजिर जानकर शपथ उठा ली कि जब तक प्रभाकर चौधरी का मथुरा से बिस्‍तर नहीं बंधवा देंगे तब तक ”जय श्रीराम” नहीं बोलेंगे।
नेताओं की शपथ रंग लाई और प्रभाकर चौधरी का तबादला कर दिया गया। अभी प्रभाकर चौधरी ने चार्ज छोड़ा भी नहीं था कि चौराहों-तिराहों पर यातायात की दुर्व्‍यवस्‍था और तिपहिया वाहन चालकों की रंगदारी दिखाई देने लगी। हर दिन हजार पांच सौ के नोट घर ले जाने वालों ने चैन की सांस ली और उनकी तिपहिया चालकों से जुगलबंदी फिर दिखाई देने लगी। अब एकबार जिला नए सिरे से बबलू कुमार के हवाले है। देखना यह है कि बबलू कुमार यहां अपनी दूसरी पारी में कितने कारगर साबित होते हैं।
वैसे बबलू कुमार मथुरा के लिए और मथुरा बबलू कुमार के लिए अपरिचित नहीं है। पूरे देश में सपा शासन का ”डंका” बजवाने वाले उस ”जवाहर बाग कांड” के बाद बबलू कुमार को मथुरा का एसएसपी बनाकर भेजा गया था जिसमें दो जांबाज पुलिस अफसरों की शहादत हुई थी। इन अधिकारियों की हत्‍या का केस अब भले ही सीबीआई के हवाले हो लेकिन न्‍याय की दरकार के लिए अब भी बहुत कुछ पुलिस के हाथ में है। शायद बबलू कुमार कुछ काम आ जाएं।
अब बात करते हैं आगरा की। आगरा में योगी सरकार ने दो दिन पहले जिलाधिकारी के पद पर एनजी रविकुमार को भेजा है। एनजी रविकुमार मथुरा में काफी वक्‍त तक इस पद को सुशोभित कर चुके हैं। बहिन मायावती के कार्यकाल में उन्‍होंने मथुरा की शोभा बढ़ाई थी।
डीएम के रूप में एनजी रविकुमार ने यहां कितनी शोहरत हासिल की थी, इसे हर जिम्‍मेदार नागरिक बता सकता है। वह अपनी दक्षिण भारतीय शैली वाली हिंदी में और कुछ भले ही ठीक से न समझा पाते हों किंतु ”मतलब की बात” भली-भांति समझा देते थे, नतीजतन उनके रहते एसएसपी सिर्फ ”अंगूठे” का प्रयोग कर पाए क्‍योंकि पुलिस का भी सारा काम डीएम एनजी रवि कुमार निपटा दिया करते थे।
संभवत: यही कारण है कि एनजी रविकुमार को आगरा जैसे महानगर का जिलाधिकारी बनाना लोगों को हजम नहीं हो रहा। हजम इसलिए भी नहीं हो रहा क्‍योंकि बुआ-भतीजे की सरकारों को पानी पी-पीकर कोसने वाले योगी जी और उनके मंत्रिमण्‍डलीय सहयोगी अब उनके मुंहलगे अधिकारियों को ही अपनी नाक का बाल कैसे बना सकते हैं।
याद रहे कि बबलू कुमार भी अखिलेश यादव की गुड बुक में सबसे ऊपर थे और इसीलिए उन्‍हें मथुरा की कमान बेहद विपरीत परिस्‍थितियों में सौंपी गई थी। बबलू कुमार पर तब कानून-व्‍यवस्‍था के साथ-साथ जवाहर बाग कांड से डेमेज हुई सपा की इमेज को भी संभालने की जिम्‍‍‍‍‍‍‍‍मेदारी थी।
ये अलग बात है कि उसके बाद हुए चुनावों ने बता दिया कि जवाहर बाग कांड का असर मथुरा तक सीमित नहीं रहा, वह प्रदेशव्‍यापी हो चुका था लिहाजा बबलू कुमार जैसे अधिकारी कितनी थेगड़ी लगाते और कहां तक लगाते।
समाजवादियों की बेहद करीबी एक ऐसी ही महिला आईपीएस अधिकारी का नाम है मंजिल सैनी। तमाम उपाधियों से विभूषित मंजिल सैनी भी अखिलेश राज में लंबे समय तक मथुरा की एसएसपी रहीं। मथुरा में उन्‍होंने अपने व्‍यक्‍तिगत रिश्‍ते भी खूब निभाए और राजनीतिक रिश्‍ते भी परवान चढ़ाए। पूजा-पाठों में बढ़-चढ़कर हिस्‍सा लिया और जमकर अपनी भी पूजा कराई।
अखिलेश के चचा उन दिनों जब मथुरा का दौरा करने आते थे तो मंजिल सैनी पर उनकी कृपा ऐसे बरसती थी जैसे वह सपा परिवार का ही हिस्‍सा हों।
सपा के शासनकाल में किसी के भी मुंह से यह चर्चा सुनाई देना आम था कि मंजिल सैनी के पति की अखिलेश के एक मित्र और पार्टी पदाधिकारी से गहरी छनती थी। यहां तक कि कारोबार में भागीदारी भी थी।
यही मंजिल सैनी योगीराज में मेरठ की एसएसपी बनाई गईं और दबंग महिला अधिकारी के ”मौखिक खिताब” से भी नवाजी गईं। वो भी तब जबकि मंजिल सैनी के रहते मेरठ में अपराध और अपराधी नित नई मंजिल चढ़ते चले गए।
कुछ समय पहले मंजिल सैनी मेरठ से तब रुखसत हुईं जब खुद उन्‍होंने व्‍यक्‍तिगत कारणों से हटना चाहा अन्‍यथा योगीराज में उन पर पूरी कृपा बरस रही थी।
ये तो मात्र तीन उदाहरण हैं वरना प्रदेश ऐसे अनेक उदाहरणों से भरा पड़ा है। जाहिर है कि सवाल तो उठेंगे।
सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं कि योगी जी की भाषा में बहुत से अपराधियों को ‘ठोकने’ के बावजूद यूपी के अपराध का ग्राफ है कि नीचे आने का नाम नहीं ले रहा। गिनती गिनने के लिए निश्‍चित ही बहुत से इनामी अपराधी पुलिस की गोलियों के काम आ गए परंतु अमन कायम फिर भी नहीं हो पा रहा।
लोग कह रहे हैं कि ठोका-ठाकी तो योगीराज से पहले भी चलती रही है और पुलिस के अधिकारियों को ”शतकवीर” जैसी ”नाजायज उपाधियों” से नवाजा जाता रहा है इसलिए ठोकने-ठाकना बहुत प्रभाव नहीं छोड़ता। प्रभाव तो तभी पड़ता है जब नतीजा धरातल पर दिखाई दे।
बात यहीं आकर अटक जाती है क्‍योंकि धरातल पर तो वही अधिकारी हैं जिनके लिए सब धान बाईस पसेरी रहता है। बुआ रहें या बबुआ और योगी रहें या भोगी, उनकी चवन्‍नी तब भी चल रही थी और अब भी चल रही है। न अतीत का आकलन न भविष्‍य की चिंता।
योगी जी सोच रहे होंगे कि अभी साल ही तो पूरा हुआ है। चार साल बाकी हैं। वह शायद भूल रहे हैं राजनीति में प्‍याज के बढ़ते दाम भी खून के आंसू रुला देते हैं, फिर ये तो चलती हुई चवन्‍नियां हैं।
आप पहली बार मुख्‍यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हुए हो, और ये लोग हर शासन में पद पर काबिज रहे हैं। विश्‍वास करना ठीक है किंतु अंधविश्‍वास आत्‍मघाती होता है। भरोसे का खून तभी किया जा सकता है जब जरूरत से ज्‍यादा भरोसा होता है।
प्रदेश में मेहनती और ईमानदार अधिकारियों की कमी न कभी थी और न होगी, लेकिन दृष्‍टिभ्रम पहले भी था और अब भी है। नहीं होता तो घुटे हुए महात्‍माओं को बार-बार आजमाने की जरूरत नहीं पड़ती।
ये दृष्‍टिभ्रम ही रहा होगा जब अखिलेश को मुख्‍यमंत्री का पद गंवाने के बाद यह कहना पड़ा कि कल तक जो अधिकारी मेरे जूठे कप-प्‍लेट उठाते थे, वही आज साजिश रचकर सरकारी बंगले में तोड़-फोड़ का आरोप मेरे मत्‍थे मढ़ रहे हैं।
योगी जी…उत्तर प्रदेश न तो गुरू गोरखनाथ का मठ है और न समूचे प्रदेश की जनता उस मठ की अनुयायी है।
आपको मठ से निकालकार देश के इस सबसे बड़े प्रदेश की कमान यदि सौंपी गई है तो उसका खास मकसद भी है। उस मकसद को घुटे हुए महात्‍माओं पर आंख बंद करके भरोसा करने में जाया न किया जाए तो अच्‍छा है।
चले हुए कारतूसों को चलाने की कोशिश अक्‍लमंदी नहीं। आजमाए हुओं को आजमाना भी तर्कसंगत नहीं। पार्टी के किसी एक वर्ग की शिकायतों को आधार बनाकर अच्‍छे अधिकारियों का तीन-तीन महीने में तबादला होता रहा तो न घर के रहेंगे न घाट के। कुछ आम जनता की भी सुन लें, वक्‍त जरूरत काम आएगी।
कहते हैं- राजा, योगी, अग्‍नि, जल…इनकी उल्‍टी रीत…बचते रहिओ परशुराम, थोड़ी रखियो प्रीत।
आप तो ”राजा” और ”योगी” का दुर्लभ कॉम्‍बीनेशन हैं। हमें जितनी प्रीति दिखानी थी, उतनी दिखा दी। अब आप जानें और आपकी रीति।
मानो तो देवता वरना पत्‍थर। 2019 में सिर्फ कुछ महीने शेष हैं। फिर परीक्षा अधिकारियों की नहीं, आपकी और आपके फैसलों की होगी।
जय श्रीराम, जय भारत, जय हिंद।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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