सोमवार, 9 अगस्त 2021

बड़ा सवाल: यूपी में इस बार कौन बनेगा मुख्‍यमंत्री… बुआ, बबुआ, बबली या बाबा?


 उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में यूं तो अभी पूरे 6 महीने बाकी हैं लेकिन यह बड़ा सवाल उछलने लगा है कि इस बार मुख्‍यमंत्री बनेगा कौन?

चार नाम मुक़ाबिल हैं। बुआ, बबुआ, बबली और बाबा। 2017 के चुनाव में बुआ और बबुआ साथ थे किंतु इस मर्तबा आमने-सामने होंगे।
बबली पहली बार सीएम की संभावित उम्‍मीदवार हैं। हालांकि अंत तक उनकी पार्टी का ऊंट किस करवट बैठेगा, कहना थोड़ा मुश्‍किल है।
शेष रहे बाबा… तो उनका कोई विकल्‍प नहीं है इसलिए अपनी पार्टी के वही सीएम कैंडिडेट होंगे, इसमें किसी को कोई शक-शुबहा नहीं होना चाहिए। ये अलग बात है कि शक पैदा करने का भरसक प्रयत्‍न किया गया परंतु समय रहते उसकी हवा निकाल दी गई।
हवा निकली तो कुछ चेहरों की हवाइयां उड़ना स्‍वाभाविक था लेकिन चुनाव की चर्चा हवा टाइट करने की इजाजत नहीं देती इसलिए सबसे पहला कार्ड खेला बुआ ने।
ऐसा लगा जैसे किसी ने उन्‍हें झिंझोड़ कर नींद से उठा दिया हो, लिहाजा कल तक बुझी-बुझी सी बुआ ने ब्राह्मणों पर दांव लगाते हुए अयोध्‍या से प्रबुद्ध सम्‍मेलनों के आयोजन की शुरूआत कर डाली।
उन्‍होंने इतना भी नहीं सोचा कि जिन सजातीय बंधु-बांधवों ने उन्‍हें अर्श से फर्श तक पहुंचाया, वो क्‍या सोचेंगे। जिन्‍होंने साइकिल के डंडे की सवारी से उतारकर हाथी की सवारी करवाई, उनके कलेजे पर क्‍या बीतेगी। तिलक, तराजू और तलवार जैसे नारे का क्‍या होगा।
परंपरागत रूप से ‘स्‍वर्गीय’ कहलाने के हकदार उन कांशीराम की आत्‍मा कितनी बेचैन होगी, जिन्‍होंने कभी IAS बनने का सपना संजोने वाली एक आम सी लड़की को देखकर कहा था कि एक दिन सैकड़ों IAS तुम्‍हारे ‘चाकर’ होंगे।
यही नहीं, प्रदेश के उन 17 फीसदी अल्‍पसंख्‍यकों का धनीधोरी कौन होगा, जो कल तक यही समझते रहे कि हाथी ही उनका एकमात्र साथी है और साइकिल पंक्‍चर होने के बाद हाथी में ही वो दम बाकी है जिसकी सूंड के सहारे वह कमल को सबक सिखा सकते हैं।
बहरहाल, ब्राह्मणों को लेकर खेले गए बुआ के इस धोबी पछाड़ दांव ने बबुआ की पेशानी पर बल डलवा दिए और वो भी तत्‍काल ‘ब्राह्मण मोड’ में आते हुए बोले कि हम न सिर्फ ब्राह्मण सम्‍मेलन करेंगे बल्‍कि सरकार बनते ही प्रदेश के हर जिले में भगवान परशुराम के मंदिर स्‍थापित कराएंगे।
सरकार बनाने को लेकर बबुआ के कॉन्‍फिडेंस का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्‍होंने 350 सीटें जीतने का दावा करते हुए यहां तक कह दिया कि उन्‍हें 400 सीटें भी मिल सकती हैं क्‍योंकि बाबा से लोग बहुतई नाराज हैं।
बबुआ के दावे पर प्रश्‍नचिन्‍ह लगाने का अधिकार पार्टी में किसी को है नहीं, इसलिए किसी ने लगाया भी नहीं। आखिर पिछले पांच साल से वो निठल्‍ला चिंतन कर रहे थे। Twitter-Twitter भी खेल रहे थे जिससे तत्‍काल साफ पता लग जाता है कि कितने करोड़ फॉलोअर हैं।
अब इतने विश्‍वसनीय सोशल मीडिया प्‍लेटफॉर्म से मिल रहे इनपुट को अवॉइड तो नहीं किया जा सकता न। वहां सक्रिय लोग इतने नकारा नहीं हो सकते कि 350 से 400 का आंकड़ा बताकर 35-40 पर ला पटकें।
सरकारी एजेंसियों को तो बाबा ने ऐसी पट्टी पढ़ाई है कि वो अब बबुआ के भरोसे की रही नहीं। पुलिस तक अब खाकी की तरह नहीं, बाबा की तरह खांटी भाषा का इस्‍तेमाल करने लगी है। खैर… बबुआ की खुशी को ग्रहण क्‍यों लगाया जाए, और क्‍यों उनके सपने में खलल डाला जाए।
बबली की पार्टी के एक महाबली ने तो ब्राह्मणों की सियासत पर ऐसा ‘चौका’ लगाया कि कहने लगे… हमारी तो सीएम कैंडिडेट खुद ही ब्राह्मण है। उनके नाम के साथ दो सरनेम बेशक पहले से जुड़े हों लेकिन ‘छद्म’ सरनेम सदा से वही है जो आज ‘बेचारे’ कश्‍मीरी हिन्‍दुओं के साथ जुड़ गया है। वक्‍त जरूरत उसे उसी तरह कुर्ते के ऊपर धारण कर लिया जाता है जिस तरह ‘जनेऊ’ धारण किया जा सकता है। और इसमें हर्ज ही क्‍या है। राजनीति के लिए मुखौटे हमेशा मुफीद साबित हुए हैं, और यही कारण है कि राजनेता किस्‍म-किस्‍म के मुखौटों का प्रयोग करने में माहिर होते हैं। जो राजनेता मुखौटों का सही इस्‍तेमाल करना नहीं जानता, वो सही मायनों में राजनेता कहलाने का हकदार नहीं होता।
कुल मिलाकर पब्‍लिक माने या ना माने परंतु बबली की पार्टी मानती है कि वो उसी ब्राह्मण कुल की शाखा हैं जो कश्‍मीर से टूटकर ‘संगम’ घाट आ गिरी थी और फिर विभिन्‍न जाति-धर्म संप्रदायों से होकर भी एक ओर जहां ‘सनातनी’ हैं वहीं दूसरी ओर उनका सूक्ष्‍मजीवी ब्राह्मणत्‍व अमरत्‍व को प्राप्‍त है।
शेष रहे बाबा… जो गेरूआ त्‍यागे बिना वाया गोरखनाथ सत्ता पर तो काबिज हुए ही, नए-नए कीर्तिमान भी गढ़े। एक झटके में राजनीति की परिभाषा बदल दी। ‘ठीक’ न होने पर ‘ठोक’ देने के हिमायती बाबा ने ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्‍वास’ पर आगे बढ़ते हुए यह भी ऐलान कर दिया कि इसे मानना या ना मानना ‘उनकी’ मर्जी। जैसी जिसकी सोच।
बाबा ने बता दिया कि वो बिना रुके और बिना थके उस रास्‍ते पर चलते रहेंगे जिस पर चलकर प्रदेश को प्रगति के सोपान पर चढ़ाया जा सकता है।
बाबा बोलते हैं कि अभी बहुत कुछ करना बाकी है इसलिए एक बार की कसरत से प्रदेश की कमान सीधी नहीं की जा सकती। उसके लिए कम से कम दो पंचवर्षीय योजनाओं की और दरकार है। नहीं तो नौ दिन चले अढ़ाई कोस की कहावत चरितार्थ होते देर नहीं लगेगी।
बाबा बोलते हैं कि ये पब्‍लिक है, सब जानती है। सबको पहचानती है। फिर चाहे वह बुआ हो या बबुआ, बबली हो या बाबा। उसे पता है कि गोरखनाथ पीठ व गेरुआ वस्‍त्रधारी चाहे कहीं भी हों, न तो जाति और धर्म की राजनीति करते हैं और न ब्राह्मणों का इतना अपमान करते हैं कि मान-मनौवल के लिए या तो ब्राह्मण सम्‍मेलन करने पड़ जाएं या स्‍वयंभू ब्राह्मण की उपाधि हासिल करने की मजबूरी आ खड़ी हो जाए।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

UP विधानसभा चुनाव 2022: पेश है मनोरंजन से भरपूर ड्रामा… सियासी फील्‍ड की फुटबॉल “ब्राह्मण”

 


अब तक तो यही सुना था कि पब्‍लिक की मेमोरी बहुत वीक होती है। विशेष तौर पर चुनावी राजनीति के मामले में। वह बहुत जल्‍दी नेताओं के सारे ‘कु-कर्म’ भूलकर लोकतंत्र के महापर्व में ‘ढोलकी’ बन जाती है।

फिर नेता जैसे चाहें, वैसे उसे बजाने लगते हैं। किंतु ये पहली बार पता लग रहा कि नेताओं की मेमोरी तो जनता से भी कमजोर है।
कभी कहते हैं कि अपराधी व आतंकवादी की न कोई जाति होती है और न धर्म। फिर जब कोई ऐसा ‘विशेष श्रेणी का अपराधी’ मारा जाता है जो राजनीति के लिए मुफीद हो तो उसकी जाति-धर्म सब ढूंढ लाते हैं।
पिछले साल 2 जुलाई की रात कानपुर के बिकरू गांव में एक दुर्दांत अपराधी ने हमला करके 8 पुलिसकर्मियों को मार डाला था। एकसाथ 8 पुलिसकर्मियों की शहादत पर चूंकि हल्‍ला मचना ही था, इसलिए मचा। नतीजतन बाबा की पुलिस ने इस अपराधी और उसके गुर्गों को चुन-चुन कर ठिकाने लगाना शुरू कर दिया।
राजनेताओं के सौभाग्‍य और ब्राह्मणों के दुर्भाग्‍य से बिकरू कांड को अंजाम देने वाले गैंग के सरगना का नाम विकास ‘दुबे’ निकला। यानी जाति से वह ब्राह्मण था, कर्म भले ही उसके कितने ही निकृष्‍ट क्‍यों न रहे हों। उसके गुर्गों में भी अधिकांश संख्‍या ऐसे तथाकथित ब्राह्मणों की ही थी लिहाजा नेताओं ने तत्‍काल प्रभाव से एक ‘माइंडसेट’ किया कि बाबा की पुलिस ब्राह्मणों को निशाना बना रही है और कुख्‍यात बदमाश नहीं, ‘ब्राह्मण’ मारे जा रहे हैं।
इस ‘कथानक’ का खूब प्रचार-प्रसार किया गया, बिना यह विचार किए कि विकास दुबे के हाथों मारे गए पुलिसकर्मियों में से भी कई ब्राह्मण थे। पूर्व में भी किसी को ठिकाने लगाने से पहले विकास दुबे ने उसकी जाति नहीं देखी।
बहरहाल, देखते-देखते एक वर्ष बीत गया और लोग समय के साथ विकास दुबे को भूलने लगे। लेकिन अब जबकि विधानसभा चुनावों की दुंदुभि बजने लगी तो मुद्दा विहीन विपक्ष को लगा कि गड़े मुर्दे उखाड़ने का इससे उपयुक्‍त समय फिर कब मिलेगा इसलिए उसने ब्राह्मणों को पत्ते फेंटना शुरू कर दिया।
इसकी पहल की उस पार्टी ने जो कभी ‘तिलक, तराजू और तलवार’ धारण करने वालों को जूते मारने की हिमायती थी। वह घड़े में पड़े अपने ब्राह्मण नेता को निकाल कर लाई और उन्‍हें मोहरा बनाकर ‘ब्राह्मण सम्‍मेलन’ आयोजित करने का बीड़ा उठाया।
इसी क्रम में बिकरू कांड की एक आरोपी के लिए कानूनी मदद मुहैया कराने का ऐलान भी कर दिया। शोर-शराबा हुआ तो ब्राह्मण सम्‍मेलनों का नाम बदलकर प्रबुद्ध वर्ग सम्‍मेलन रख दिया और उसकी शुरूआत की रामजन्‍मभूमि अयोध्‍या से।
बुआ को बाजी मारते देख बबुआ के पेट में मरोड़ उठना स्‍वाभाविक था इसलिए मरोड़ उठी, और ऐसी उठी कि उसने भी न सिर्फ ‘चुनावी’ ब्राह्मण सम्‍मेलन करने का बीड़ा उठाया बल्‍कि सरकार बनने पर यूपी के हर जिले में एक मंदिर नर्माण कराने की भी घोषणा कर डाली।
अब ये मंदिर किसी देवी-देवता के होंगे या समाजवादी नेताओं के, ये तो ”नौ मन तेल होने पर राधा के नाचने” वाली कहावत तय करेगी किंतु इतना तय हो चुका है कि ‘समाजवाद’ की कुंडली के केंद्र में अचानक ‘ब्राह्मण’ आ बैठा है। अन्‍यथा आतंकियों की पैरोकार पार्टी इस तरह ब्राह्मणों की रट कैसे लगाने लगती।
जाहिर है कि इन हालातों में कांग्रेस कहां पीछे रहने वाली थी। उसके ऐंचकताने प्रदेश अध्‍यक्ष की छठी इंद्री जागृत हुई और वो वाया गांधी-वाड्रा बाईपास बोले कि ब्राह्मण-ब्राह्मण खेलने वाली पार्टियां शायद भूल रही हैं कि हमारी तो नेता ही ब्राह्मण हैं। उन्‍हें ब्राह्मणों को रिझाने की क्‍या जरूरत। ब्राह्मण उन पर और उनकी पार्टी पर सत्तर सालों से रीझे हुए हैं। बस एक इशारे की जरूरत है, ब्राह्मण तो उनकी ओर खिंचे चले आएंगे। ब्राह्मण और दलित के जिस ‘कॉकटेल’ से उन्‍होंने कई दशकों तक राज्‍य किया है, उसकी पुनरावृत्ति होगी और बुआ, बबुआ सहित योगी बाबा भी चारों खाने चित्त पड़े दिखाई देंगे।
दो दिन पहले ही जिनकी पुण्‍यतिथि थी, वो भारत रत्‍न एपीजे अब्‍दुल कलाम कहा करते थे कि हर व्‍यक्‍ति को स्‍वप्‍नदृष्‍टा होना चाहिए। स्‍वप्‍नदृष्‍टा ही अपने लक्ष्‍य और मुकाम को हासिल कर सकते हैं। जो स्‍वप्न नहीं देखते, वो लक्ष्‍य प्राप्‍त नहीं कर सकते।
बात भी सही है, लेकिन कलाम साहब ने मुंगेरी लाल अथवा शेखचिल्‍ली वाले वो हसीन सपने देखने की बात कभी नहीं की जिनके जरिए आदमी खुद अपने पैरों पर कुल्‍हाड़ी मार बैठता है और हाथ रह जाता है सिर्फ पछतावा।
कांग्रेस की मूल समस्‍या फिलहाल यही है कि उसके -आदर्श’ पात्र हैं मुंगेरी लाल और शेखचिल्‍ली। ऐसे में उसके सपने पूरे होने की संभावना तो ना के बराबर है, अलबत्ता सपने देखने से उसे भी कोई कैसे रोक सकता है।
शेष रह जाते हैं योगी बाबा। कहते हैं… जाति ने पूछो साधु की, लेकिन साधु अगर राजनेता हो तो करेला और नीम चढ़ा। पार्टी को एक किनारे कर दो तब भी कपड़ों का गेरूआ रंग ही उकसाने के लिए काफी है। ऊपर से तेवर ऐसे कि भाई लोग कहने लगे कि बाबा तो ठाकुर हैं, इसलिए ब्राह्मणों से बैर रखते हैं।
राजनीति में ऐसी ओछी बातें अब ‘आम’ हो गई हैं इसलिए उन्‍हें ‘खासियत’ नहीं मिलती। लेकिन जो भी हो, ब्राह्मण तो ब्राह्मण हैं। बुद्धि के धनी। आचार्य विष्‍णुगुप्‍त चाणक्‍य से लेकर आज तक जब-जब जरूरत महसूस हुई है, ब्राह्मणों ने साबित किया है कि बुद्धि ही उनका सर्वश्रेष्‍ठ धन है।
उन्‍होंने एक ओर जहां बुद्धि के प्रयोग से बड़े-बड़े राज-पाठों का सफल संचालन किया है वहीं दूसरी ओर तमाम सत्ताधीशों को इतिहास बनाकर रख छोड़ा है।
बसपा हो या सपा… अथवा भाजपा ही क्‍यों न हो, बेहतर होगा कि वह ब्राह्मणों से खेलना बंद कर दें। उन्हें औरों की तरह वोट बैंक समझने की भूल की तो उनका भी वही हश्र होगा जो आज कांग्रेस का हो चुका है। देश के करोड़ों मतदाताओं की तरह ब्राह्मण ‘मतदाता’ जरूर है परंतु वह किसी के हाथ की ‘कठपुतली’ नहीं है।
किसी भी नाम अथवा टाइटिल से ब्राह्मण सम्‍मेलन आयोजित करके ब्राह्मणों के मान-सम्‍मान का खेल खेलना महंगा सौदा साबित हो सकता है। उचित होगा कि सभी पार्टियां ब्राह्मणों को दिल से उचित सम्‍मान दें और उनके मत व मताधिकार का इस्‍तेमाल जनहित एवं राष्‍ट्रहित में करें जिससे न केवल संपूर्ण समाज का कल्‍याण हो बल्‍कि खुद को समाज से परे समझने वाले राजनेताओं की भी बुद्धि परिमार्जित हो सके।
ब्राह्मण कभी सत्ता का भूखा नहीं रहा, हां… उसने त्‍याग के बल से अनेक सत्ताधीशों को अपने इशानों पर नाचने को मजबूर अवश्‍य किया है। नए दौर के राजनेताओं और उनके हाई कमानों से भी यही अपेक्षा है कि वह ब्राह्मणों की मूल प्रवृत्ति को विस्‍मृत करने की कोशिश न करें क्‍योंकि यह सोच उनके राजनीतिक ताबूत की आखिरी कील भी साबित हो सकती है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

सोमवार, 19 जुलाई 2021

मुकुट मुखारविंद मंदिर घोटाला: रिसीवर रमाकांत की याचिका हाईकोर्ट से खारिज़


  गोवर्धन के प्रसिद्ध मंदिर मुकुट मुखारविंद में हुए करोड़ों रुपए के घोटाले की जांच और उसके उपरांत दर्ज हुई FIR पर सवाल उठाने वाली याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज़ कर दी है।

घोटाले के मुख्‍य आरोपी और कोर्ट से नियुक्‍त मंदिर के रिसीवर रमाकांत गोस्‍वामी ने यह याचिका इसी साल फरवरी में दायर की थी।
आरोपी के अनुसार चूंकि उसे कोर्ट से रिसीवर नियुक्‍त किया गया था लिहाजा न तो गोवर्धन के एसडीएम को मंदिर में हुए किसी घोटाले की जांच करने का अधिकार था और न ही उस जांच के आधार पर SIT कोई FIR दर्ज करा सकती थी।
रमाकांत गोस्‍वामी ने अपनी याचिका में उत्तर प्रदेश सरकार के प्रमुख सचिव (गृह) सहित जिलाधिकारी मथुरा तथा उपजिलाधिकारी (एसडीएम) गोवर्धन को पार्टी बनाते हुए 05 फरवरी 2021 को यह याचिका दायर की थी जिसे 10 फरवरी 2021 को कोर्ट ने रजिस्‍टर्ड किया।
उल्‍लेखनीय है कि करीब 3 वर्ष पूर्व इंपीरियल पब्‍लिक फाउंडेशन नामक एनजीओ ने गोवर्धन स्‍थित विश्‍व प्रसिद्ध मंदिर मुकुट मुखारविंद में करोड़ों रुपए का घोटाला किए जाने की शिकायत तहसील दिवस पर प्रार्थना प्रत्र देकर की थी।
इस शिकायत के बाद तत्‍कालीन जिलाधिकारी सर्वज्ञराम मिश्रा द्वारा मामले की जांच गोवर्धन के तत्‍कालीन एसडीएम नागेन्‍द्र कुमार सिंह को सौंप दी गई।
एसडीएम नागेन्‍द्र कुमार सिंह ने अपनी जांच में प्रथम दृष्‍ट्या रिसीवर रमांकत पर लगाए गए सभी आरोपों को सही पाया, बावजूद इसके यूपी SIT ने अपने स्‍तर से फिर इस मामले की जांच की।
जांच पूरी करने के बाद यूपी SIT के निरीक्षक कुंवर ब्रह्मप्रकाश ने अपने यहां क्राइम नंबर 0010/20120 पर यह मामला 11 सितंबर 2020 की शाम 6 बजकर 46 मिनट पर दर्ज करा दिया।
तब से यह मामला पता नहीं किन कारणोंवश लटका रहा लिहाजा इसमें मुख्‍य आरोपी रमाकांत गोस्‍वामी या किसी अन्‍य आरोपी की भी गिरफ्तारी नहीं हुई जबकि SIT ने इसमें करीब डेढ़ दर्जन लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की है।
SIT की इसी ढील का फायदा उठाकर मुख्‍य आरोपी रमाकांत गोस्‍वामी अपने बचाव में कोई न कोई नया हथकंडा इस्‍तेमाल करते रहते हैं।
बहरहाल, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गत 13 जुलाई को रमाकांत गोस्‍वामी की याचिका का निस्‍तारण करते हुए अपने आदेश में लिखा है कि एसडीएम गोवर्धन की जांच और SIT द्वारा दर्ज कराई गई FIR से याचिकाकर्ता के किसी अधिकार का हनन होता प्रतीत नहीं हुआ इसलिए याचिका खारिज़ की जाती है।
इस बारे में मंदिर घोटाले की सर्वप्रथम शिकायत करने वाले एनजीओ इंपीरियल पब्‍लिक फाउंडेशन के अध्‍यक्ष रजत नारायण का कहना है कि रमाकंत गोस्‍वामी को अपर सिविल जज प्रथम मथुरा के आदेश से गोवर्धन स्‍थित मुकुट मुखारविंद मंदिर का रिसीवर नियुक्‍त किया गया था न कि वो स्‍वयं में कोई न्‍यायिक अधिकारी हैं।
हालांकि उनका व्‍यवहार यही दर्शाता है कि वह खुद को सबसे ऊपर समझ रहे हैं और इसलिए न केवल एसडीएम की जांच तथा SIT की FIR पर प्रश्‍नचिन्‍ह लगाने का प्रयास कर रहे हैं बल्‍कि उन्‍हें कानूनन गलत साबित करने की कोशिश में लगे हैं।
अब देखना यह होगा कि एसडीएम की जांच और SIT की FIR को चुनौती देने वाली मुख्‍य आरोपी रमाकांत की याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट से खारिज़ कर दिए जाने के बाद भी SIT हाथ पर हाथ रखे बैठी रहती है या करोड़ों लोगों की आस्‍था एवं विश्‍वास से खिलवाड़ करने वाले घोटालेबाजों की धरपकड़ शुरू कर कानून पर भरोसा कायम रहने का काम करती है।
– सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

बुधवार, 14 जुलाई 2021

बबुआ! ऐसा लगता है कि पुलिस का खून सफेद हो गया है… वो पुराने हुक्‍मरानों से बेवफा हो गई है, समझ लो


 सुनो…सुनो…सुनो। यूपी के वाशिंदो सुनो। बुआ एंड बबुआ पार्टी प्रदेश की पुलिस का कायापलट करने जैसा पावन विचार रखती है, बशर्ते आप उसे एक मौका और दें।

बुआ एंड बबुआ, या बुआ अथवा बबुआ में से किसी को भी यदि आप 2022 के विधानसभा चुनावों में सत्ता की कमान सौंप देते हैं तो आपके प्रदेश की पुलिस कम से कम दोरंगी और अधिक से अधिक तिरंगी हो जाएगी।
यदि बुआ एंड बबुआ पार्टी को सत्ता मिलती है तो पुलिस की ‘खाकी को खाक’ में मिलाने का काम प्राथमिकता के आधार पर किया जाएगा और उसकी जगह पुलिस के सिर पर नीली टोपी, लाल कमीज और हरा पैंट सजेगा।
यदि सिर्फ बबुआ को यूपी का भाग्‍य विधाता बनाया जाता है तो पुलिस की कैप लाल, शर्ट हरी और उसके नीचे पैंट फिर लाल कलर का होगा।
ठीक इसी तरह अगर बुआ को ये जिम्‍मेदारी मिलती है तो प्रदेश पुलिस नीली वर्दी में सजी-संवरी नजर आएगा। दोनों ही परिस्‍थितियों में उसके क्रिया-कलाप वैसे नहीं होंगे जैसे आज दिखाई दे रहे हैं।
माना कि बुआ और बबुआ को एक मर्तबा किए गए गठबंधन का अनुभव कुछ अच्‍छा नहीं रहा और इसलिए फिलहाल वह अलग-अलग से दिखाई देते हैं परंतु सत्ता की खातिर चुनाव पूर्व नहीं तो चुनाव बाद पुन: एकसाथ प्रेस वार्ता कर सकते हैं।
हाल ही में ‘दोमुंह’ से एक ही बात निकलना इस बात का स्‍पष्‍ट संकेत है कि बुआ और बबुआ के बीच कभी ‘मतभेद’ बेशक पनपे हों किंतु ‘मनभेद’ नहीं हैं लिहाजा वो समय पड़ने पर रिश्‍ता निभा सकते हैं।
बहरहाल, इतना जान लें कि यदि किसी तरह इनके मंसूबे पूरे हो गए तो पुलिस तब तक किसी आतंकी या आतंकियों के मॉड्यूल पर हाथ नहीं डालेगी जब तक कि उन्‍हें कोर्ट से आतंकी करार नहीं दे दिया जाता। और ये भी जान लें कि ऐसा ये होने नहीं देंगे। आखिर वोट बैंक भी कोई चीज है, उसे ऐसे कैसे सींखचों के अंदर जाने दिया जा सकता है।
किसी अपराध की प्‍लानिंग करना होता होगा कानून की नजर में अपराध, लेकिन बुआ और बबुआ की पुलिस इस तरह की किसी प्‍लानिंग को अपराध नहीं मानेगी। आतंकियों को उनकी योजना सफलता पूर्वक संपन्‍न करने का सुअवर अवश्‍य दिया जाएगा ताकि वो अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता के हनन का आरोप चस्‍पा न कर सकें तथा सभी चुनावों में एकमत व एकजुट होकर मतदान करने निकलें।
ये दोरंगी या तिरंगी पुलिस ऐसे हर प्‍लान को पूरा करने का मौका इसलिए भी देगी जिससे बुआ-बबुआ की सरकार को कोई नया जनसंख्‍या नियंत्रण कानून लाने की जहमत न उठानी पड़े और बिना किसी अतिरिक्‍त प्रयास के बम विस्‍फोटों के जरिए ये कार्य बखूबी होता रहे।
2022 के चुनाव घोषणा पत्र में बुआ-बबुआ दोनों इस बात का स्‍पष्‍ट उल्‍लेख कर सकते हैं कि आतंकवाद बहुत संवेदनशील मामला है इसलिए ”हमारी पुलिस” तब तक किसी संदिग्‍ध आतंकवादी पर हाथ डालने की हिमाकत नहीं करेगी जब तक कि वह अपने मकसद में सफल होकर इस बात को साबित न कर दे कि वह आतंकवादी ही है और उसके जेहन में आतंकवाद के अतिरिक्‍त कुछ नहीं रहता।
खालिस नीली अथवा लाल-नीली-हरी या फिर सिर्फ लाल और हरी वर्दी में सजी यह पुलिस जाति-धर्म-संप्रदाय का पुख्‍ता पता लगाने के बाद ही किसी पर हाथ डालेगी अन्‍यथा पहले पार्टी के डंडे में लगे झंडे को निहारेगी।
दोनों बात की पुष्‍टि होने के बाद ही तय करेगी कि आतंकवाद का कोई धर्म होता है या नहीं। अगर झंडे के रंगों से मेल मिलता है तो आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होगा और यदि नहीं मिलता तो तय जानिए कि धर्म निर्धारित होगा। ठीक उसी तरह जिस तरह आज पुलिस और उसकी वर्दी का रंग निर्धारित किया जा रहा है।
ऐसा लगता है कि पुलिस का खून सफेद हो गया है, वो बेवफा हो गई है और अपने पुराने हुक्‍मरानों की मंशा के विपरीत संदिग्‍ध आतंकियों पर चुनाव से ठीक पहले हाथ डालने का दुस्‍साहस कर रही है।
कहीं ऐसा तो नहीं कि खाकी पर ये असर उस खास पार्टी की वैक्‍सीन कर रही हो जिसे लगवाने से बबुबा ने साफ मना कर दिया था और बुआ चुप्‍पी साधे बैठी हुई है कि कहीं कोई वैक्‍सीनेशन के लिए पकड़ कर न ले जाए।
खतरों का भांपना कोई बुआ और बबुआ से सीखे। कोई पार्टी अपनी “पारदर्शी वैक्‍सीन” के डोज से आतंकवादियों का तथा उनका डीएनए बदलने की कोशिश करे इससे पहले ही भेड़िया आया-भेड़िया आया चिल्‍लाना शुरू कर दो। बाकी जब भेड़िया आएगा, तब देखा जाएगा।
14 करोड़ से अधिक मतदाताओं वाले इस प्रदेश में तमाम ऐसे निकल आएंगे जो बुआ-बबुआ की भेड़िया चाल के शिकार में फंसेंगे। फंसे तो ठीक, और नहीं फंसे तो अगले चुनावों तक फिर ऐसे ही मुद्दे खड़े करते रहेंगे। अभी ये तैयारी 2022 की है।
2022 में किसी तरह एकबार काठ की हड़िया चढ़ जाए फिर देखना…पुलिस की वर्दी ही नहीं, वैक्‍सीन भी रंगीन न बनवा दी तो नाम बदल देना।
रहा सवाल जनसंख्‍या का तो उस पर कैसी रोक, वो तो ऊपर वाले की देन हैं। नीचे वाले कौन होते हैं दखल देने वाले। किसी की विरासत संभालने वाला कोई नहीं होता तो किसी के तीन-तीन हो जाते हैं। और कोई इस बात पर भी रोता है कि जिसे अपने हाथों से कच्‍ची उम्र में प्रदेश का ताज सौंप दिया, आज वही आखिरी मुगल होने पर आमादा है। जैसी जिसकी सोच। ईश्‍वर सबका भला करे।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

बुधवार, 30 जून 2021

UP चुनाव: खुद पैरों पर कुल्‍हाड़ी मार रहे हैं श्रीकांत शर्मा, या बिजली अधिकारियों ने ले ली है उन्‍हें हराने की ‘सुपारी



 

उत्तर प्रदेश के कद्दावर भाजपा नेताओं में शुमार और ऊर्जा जैसे महत्‍वपूर्ण विभाग के मंत्री तथा मथुरा की शहरी सीट के विधायक श्रीकांत शर्मा खुद अपने पैरों पर कुल्‍हाड़ी मार रहे हैं या फिर बिजली अधिकारियों ने उन्‍हें चुनाव हराने की ‘सुपारी’ ले रखी है?

अब जबकि UP के विधानसभा चुनाव होने में चंद महीने ही बचे हैं, तो ये सवाल इसलिए प्रासांगिक हो जाता है क्‍योंकि कुछ समय से न सिर्फ ऊर्जा मंत्री का समूचा गृह जनपद बल्‍कि उनका चुनाव क्षेत्र मथुरा-वृंदावन भी बिजली की भारी मार से त्रस्‍त है।
मथुरा को पूरी तरह विद्युत कटौती से मुक्‍त रखे जाने का दावा करने वाले ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा के विभागीय अधिकारियों का बचकाना बयान कहता है कि कोरोना के कारण लाइनें दुरुस्‍त करने का काम देरी से शुरू हुआ इसलिए ये समस्‍या आ रही है। वो ये भी कहते हैं कि शहरी क्षेत्र की विद्युत आपूर्ति में कोई समस्‍या नहीं है क्‍योंकि शहर के अधिकांश इलाकों को अंडरग्राउंड केबिल से जोड़ा जा चुका है। जो थोड़ी-बहुत परेशानी है, वो ग्रामीण क्षेत्रों में हो सकती है। यानी उन्‍हें मालूम ही नहीं है कि परेशानी है या नहीं।
अधीक्षण अभियंता प्रभाकर पांडे तो यहां तक बताते हैं कि अधिकांश लाइनें ठीक हैं, कुछ को ठीक करने का काम चल रहा है इसलिए जल्‍द समूची व्‍यवस्‍था में सुधार हो जाएगा।
अब जानिए ऊर्जा मंत्री के चुनाव क्षेत्र मथुरा-वृंदावन का हाल
पिछले करीब 15 दिनों में कल पांचवीं बार वृंदावन से आने वाली लाइन में फॉल्‍ट के कारण शहर का एक बड़ा हिस्‍सा बिजली से महरूम रहा। रात दस बजे बंद हुई लाइट आधी रात के बाद दो बजे सुचारू हो सकी। इससे पहले एक दिन 8 घंटे, एक दिन 6 घंटे तो दो दिन 5-5 घंटे के लिए लाइट बंद रही।
पूर्व में घंटों लाइट जाने का कारण जहां आंधी या बारिश बताया गया वहीं कल ऐसा बिना वजह तार टूट जाने से हुआ।
ग्राउंड पर काम करने वाले कर्मचारियों से पूछने पर पता लगता है कि राधापुरम, राधापुरम एस्‍टेट सहित छोटी-बड़ी एक दर्जन कॉलोनियों का लोड वृंदावन से आने वाली जिस लाइन पर डाल रखा है वह जर्जर अवस्‍था को प्राप्‍त है।
इस लाइन में जगह-जगह जोड़ हैं इसलिए मामूली सी हवा चलने अथवा आकाश से दो बूदें बरस जाने पर ही वो दिक्‍कत देने लगती है।
चूंकि विभागीय कर्मचारियों को यही पता नहीं होता कि वृंदावन से मथुरा तक दसियों किलोमीटर के बीच फॉल्‍ट कहां आया है इसलिए वो पहले तो घंटों पेट्रोलिंग करके फॉल्‍ट का पता लगाते हैं। उसके बाद कहीं जाकर काम किया जाता है, लेकिन तब तक सब स्‍टेशन पर बैठे लोगों की जान सूखती रहती है।
दरअसल, पेट्रोलिंग करने वाले कर्मचारी फॉल्‍ट न मिल जाने तक कुछ बताने की स्‍थिति में नहीं होते इसलिए वो संबंधित सब स्‍टेशन को ऐसी कोई जानकारी देने में असमर्थ होते हैं कि आपूर्ति सुनिश्‍चित होने में कितना वक्‍त लगेगा।
उधर सब स्‍टेशन पर बैठे एसएसओ से हर उपभोक्‍ता यह जानना चाहता है कि लाइट कब तक आएगी। ऐसे में वह अपने बुद्धि विवेक से जो बता सकता है वो बता तो देता है, किंतु सच्‍चाई नहीं बता पाता इसलिए समय के साथ उपभोक्‍ताओं का आक्रोश बढ़ना स्‍वभाविक है।
भीषण गर्मी के इस दौर में सब स्‍टेशन से ये तक जानकारी न मिल पाना कि बिजली क्‍यों गई है और कब तब आ पाएगी, आग में घी डालने की कहावत को कब सही साबित कर दे कहना मुश्‍किल है। लेकिन आला अधिकारियों का शायद इससे कोई वास्‍ता नहीं है। उन्‍हें वास्‍ता है तो अपनी ऐशो-आराम की नौकरी से, जिसे कैसे बजाना है वो भली प्रकार जानते हैं।
अगर कभी इन कारणों से झगड़ा होता भी है तो वो छोटे कर्मचारियों और उपभोक्‍ताओं को मोहरा बनाकर साफ बच निकलने की कला में माहिर हैं इसलिए उनका कभी कुछ बिगड़ने से रहा।
इसका एक उदाहरण गत 24 जून को तब मिला जब घंटों परेशान होने के बाद एक उपभोक्‍ता ने अधीक्षण अभियंता शहरी के सरकारी मोबाइल नंबर पर कॉल करके बिजली की स्‍थिति के बारे में जानकारी चाही। जाहिर है कि फोन उठा नहीं। फिर उपभोक्‍ता ने उन्‍हें वाट्सएप पर मैसेज भेजा, एसई महोदय ने मैसेज पढ़ भी लिया किंतु जवाब देना जरूरी नहीं समझा।


कड़वा सच यही है कि संबंधित जेई से लेकर एसई तक कोई किसी उपभोक्‍ता के फोन अथवा मैसेज का जवाब नहीं देता क्‍योंकि वो उनके लिए अहमियत रखते ही नहीं।
जिन दर्जनभर पॉश कॉलोनियों को वृंदावन से बिजली की आपूर्ति की जा रही है उन्‍हें विभाग ग्रामीण क्षेत्र मानता है या शहरी, इसका भी पता नहीं जबकि ये सर्वाधिक और समय से रेवेन्‍यू देने वाली कॉलोनियां हैं और यहां शत-प्रतिशत घरों में स्‍मार्ट मीटर लगाए जा चुके हैं इसलिए इन मीटरों की कमांड भी इलाके के एसडीओ संभालते हैं।
किसकी लाइट कब और कितना बिल बकाया होने पर गोल करनी है, ये वही तय करते हैं। इसके लिए अब विभाग के किसी कर्मचारी को उपभोक्‍ता के दरवाजे पर जाने या उसकी केबिल उतारने की जरूरत नहीं रह गई।
अधिकारियों द्वारा उपभोक्‍ताओं को कोई अहमियत न देने और सब स्‍टेशन पर बैठे कर्मचारियों को उनसे जूझने के लिए छोड़ देने का संभवत: एक बड़ा कारण ये भी हो सकता है, हालांकि ये एकमात्र कारण नहीं है।
स्‍थानीय जनप्रतिनिधि के तौर पर ऊर्जा मंत्री कितने जिम्‍मेदार
अगर बात करें स्‍थानीय जनप्रतिनिधि या ऊर्जा मंत्री के तौर पर श्रीकांत शर्मा द्वारा जिम्‍मेदारी निभाने की तो वो अपने किसी मतदाता अथवा आम उपभोक्‍ता के लिए कभी उपलब्‍ध नहीं होते। उनकी जगह ये जिम्‍मेदारी उनके बड़े भाई सूर्यकांत शर्मा पहले दिन से निभा रहे हैं।
अब उनकी बात अधिकारी कितनी सुनते हैं और कितनी मानते हैं, इसका अंदाज लगाने को बिजली की वह व्‍यवस्‍था ही काफी है जिसका जिक्र ऊपर किया गया है। बताया जाता है सूर्यकांत शर्मा ने व्‍यवस्‍था सुधारने के अपने स्‍तर से भरसक प्रयत्‍न किए परंतु फिलहाल नतीजा कुछ नहीं निकला।
अलबत्ता बताते हैं कि ऊर्जा मंत्री अपने कुछ खास लोगों से बंद कमरों में समय-समय पर जरूर मिलते हैं लेकिन उनसे क्‍या गुफ्तगू होती है, वो भी बाहर नहीं आ पाती।
भाजपा में भी ऊर्जा मंत्री के कार्य और व्‍यवहार की चर्चा
शायद यही कारण है कि जैसे-जैसे चुनावों की चर्चा शुरू हो रही है वैसे-वैसे आम लोगों के साथ-साथ भाजपा से जुड़े लोगों में भी श्रीकांत शर्मा के कार्य तथा व्‍यवहार की चर्चा होने लगी है।
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्‍यनाथ के नेतृत्‍व वाली सरकार सत्ता पर दोबारा काबिज होने का ही नहीं, 350 सीटें जीतने का भी लक्ष्‍य लेकर चल रही है।
चार दिन पहले 25 जून को बांके बिहारी मंदिर के दर्शनार्थ वृंदावन आए प्रदेश के कबीना मंत्री सतीश महाना ने कहा था कि जिन मुद्दों पर हम चुनाव में जनता के बीच दोबारा जाएंगे उनमें चौबीसों घंटे बिजली की आपूर्ति भी अहम मुद्दा है। सतीश महाना शायद नहीं जानते कि यहां तो दीया तले अंधेरा है।
ऊर्जा मंत्री का गृह जनपद ही नहीं, उनका चुनाव क्षेत्र भी जब आए दिन चार-चार से लेकर आठ-आठ घंटों तक बिजली के लिए तरसने को अभिशप्‍त है तो फिर प्रदेश में बेहतर बिजली व्‍यवस्‍था के नाम पर चुनाव में उतरना क्‍या गुल खिलाएगा, इसका अंदाज लगाना बहुत मुश्‍किल काम नहीं होगा।
प्रदेश की बात छोड़ भी दें तो प्रश्‍न यह है कि अपना पहला विधानसभा चुनाव बड़े अंतर से जीतने वाले श्रीकांत शर्मा इन हालातों में क्‍या इस बार जीत दर्ज करा सकेंगे।
कहीं ऐसा तो नहीं कि स्‍थानीय बिजली अधिकारियों के खोखले दावों पर भरोसा करके वो खुद अपने पैरों पर कुल्‍हाड़ी चला रहे हैं या फिर अधिकारियों ने ही उन्‍हें गुमराह करके चुनाव हराने की ‘सुपारी’ ले रखी है?
अभी भी वक्‍त है कि श्रीकांत शर्मा और उनके शुभचिंतक यह तय कर लें कि उन्‍हें बिजली की अव्‍यवस्‍था से त्रस्‍त जनता के कथन पर भरोसा करना है अथवा उन अधिकारियों के झूठे दावों पर जो उन्‍हें चुनाव हराने का मुकम्‍मल बंदोबस्‍त कर चुके हैं क्‍योंकि अभी तो गर्मी भी शेष हैं और बारिश भी।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

बुधवार, 23 जून 2021

सेतु निगम का कारनामा: 50 साल की मियाद वाला ‘ओवरब्रिज’ 5 साल बाद ही जर्जर अवस्‍था को प्राप्‍त


 इसे उत्तर प्रदेश राज्य सेतु निगम का कारनामा कहें या इस विभाग में व्‍याप्‍त भारी भ्रष्‍टाचार का उदाहरण कि एक विश्‍व विख्‍यात धार्मिक स्‍थल को जोड़ने वाला ओवरब्रिज मात्र 5 वर्षों बाद ही आज जर्जर अवस्‍था को प्राप्‍त हो चुका है, जबकि इसकी मियाद 50 साल घोषित की गई थी।

गौरतलब है दिल्‍ली-मथुरा के बीच मथुरा स्‍थित कृष्‍ण जन्‍मस्‍थान की ओर जाने वाले मार्ग पर रेलवे क्रॉसिंग के ऊपर वर्ष 2015 में जब ओवरब्रिज बनकर तैयार हुआ तो लग रहा था कि अब न केवल लोगों की जान का जोखिम खत्‍म हो जाएगा बल्‍कि आवागमन भी सुगम होगा किंतु सेतु निगम के कारनामे की वजह से यह ओवरब्रिज पहले दिन से लेकर अब तक किसी बड़े हादसे को न्‍योता दे रहा है।
दरअसल, गोविंदनगर रेलवे मार्ग पर बनाए गए इस ओवरब्रिज में उद्घाटन से पहले ही दरारें दिखाई देने लगी थीं।
चूंकि मार्च 2015 में प्रदेश के तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव को इस ओवरब्रिज का उद्घाटन करना था लिहाजा ओवरब्रिज में दरारें देख सेतु निगम के अधिकारी परेशान हो गए और उन्‍होंने आनन-फानन में दरारें भरना शुरू कर दिया ताकि खामियों को ढककर उद्घाटन कराया जा सके।
बहरहाल, सेतु निगम के अधिकारियों का भाग्‍य अच्‍छा रहा कि अखिलेश यादव मथुरा तो आये किंतु वह दूसरे कार्यक्रमों में व्‍यस्‍तता के चलते इस ओवरब्रिज का लोकार्पण नहीं कर सके लिहाजा इसे अनौपचारिक तौर पर आवागमन के लिए खोल दिया गया।
नेशनल हाईवे नंबर- 2 को कृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली से जोड़ने वाले इस मार्ग पर प्रतिदिन हजारों की संख्‍या में देशी-विदेशी लोग यात्री बसों से अथवा निजी वाहनों से आते हैं अत: इस ओवरब्रिज के खुलते ही इस पर वाहनों का आवागमन शुरू हो गया।
ओवरब्रिज पर बेफिक्र होकर दौड़ रहे वाहन चालकों को इस बात का इल्‍म तक नहीं हुआ कि भ्रष्‍टाचार के गारे से बने करीब 50 वर्ष की लाइफ वाले इस ओवरब्रिज ने तो लोकार्पण से पहले ही सेतु निगम की असलियत बता कर रख दी थी।
करोड़ों की लागत से बने करीब 900 मीटर लंबे इस ओवरब्रिज की खामियां तथा अपना भ्रष्‍टाचार छिपाने के लिए सेतु निगम के स्‍थानीय अधिकारियों ने जैसे-तैसे मरम्‍मत कराकर तब तो राहत की सांस ले ली परंतु अब वही भ्रष्‍टाचार एकबार फिर सामने आ खड़ा हुआ है।
तीन-चार दिन पहले ओवरब्रिज का एक बड़ा सा टुकड़ा भरभरा कर गिर पड़ा, जिसके बाद सेतु निगम ने तत्‍काल काम कराने की बजाय ब्रिज के ऊपर और नीचे दोनों ओर ‘सावधान…कार्य प्रगति पर है’ का बोर्ड लगाकर ब्रिज में आरपार बने ‘होल’ को चारों ओर से कवर कर दिया है।
इस दौरान यदि कोई अच्‍छी बात है तो वह यह कि कोरोना के कारण यूपी में लगा लॉकडाउन 21 जून से ही समाप्‍त हुआ है इसलिए कृष्‍ण जन्‍मस्‍थान पर आने वाले देशी-विदेशी श्रद्धालुओं की संख्‍या अभी हजारों में न होकर सैकड़ों में है, बावजूद इसके कोई हादसा होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
आश्‍चर्य की बात यह भी है कि तीन-चार दिन पहले ही ओवरब्रिज का एक हिस्‍सा गिर जाने पर सेतु निगम के अधिकारियों ने अब तक उसकी मरम्‍मत कराना जरूरी नहीं समझा। उन्‍हें शायद बोर्ड लगाकर काम चलाना उचित लगा क्‍योंकि वो जानते हैं कि उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। सरकार चाहे अखिलेश की हो, या योगी आदित्‍यनाथ की। ब्‍यूरोक्रेसी वही थी, और वही रहेगी।
ऐसा न होता तो जिस ओवरब्रिज की ‘मियाद’ वर्ष 2065 में खत्‍म होनी थी, वो न तो यूं लोकार्पण से पहले ही चटकता और न 2021 तक जर्जर अवस्‍था को प्राप्‍त होता।
मथुरा में यमुना पर बने पुल का भी यही हाल
यहां यह बताना भी जरूरी है कि उत्तर प्रदेश में योगी सरकार आ जाने के बाद सेतु निगम ने ही मथुरा में यमुना नदी पर दूसरे नए पुल का निर्माण किया है क्‍योंकि उससे पहले बना पुल अपनी मियाद पूरी कर चुका था।
मार्च 2018 में आम जनता के लिए खोले गए इस पुल की भी दुर्दशा यह बताने के लिए काफी है कि सेतु निगम ने यहां अपना ‘खेल’ करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हालांकि इसके एप्रोच रोड का निर्माण लोक निर्माण विभाग के उस निर्माण खंड ने कराया था जो भ्रष्‍टाचार के मामले में सेतु निगम से भी चार कदम आगे है।
वर्तमान में सेतु निगम उत्तर प्रदेश लोक निर्माण विभाग की एक इकाई है। इन दोनों विभागों के मंत्री उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य हैं।
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्‍व वाली बीजेपी सरकार बनने के बाद 1 अप्रैल 2017 से फरवरी 2021 तक राज्य सेतु निगम नदियों पर सैकड़ों पुल, रेलवे ओवरब्रिज तथा फ्लाईओवर बना चुका है।
ऐसे में यह सवाल उठना स्‍वाभाविक है कि मथुरा जैसे विश्‍वविख्‍यात धार्मिक स्‍थल पर कृष्‍ण जन्‍मभूमि को जोड़ने वाले ओवरब्रिज का जब यह हाल है तो बाकी सैकड़ों का क्‍या होगा?
सवाल तो बहुत हैं लेकिन दुख का विषय यह है कि जवाब देने वाला कोई नहीं। तब भी नहीं जब योगीराज में भ्रष्‍टाचार को लेकर ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाने का दावा सत्ता ग्रहण करने के पहले दिन से लगातार किया जा रहा है।
अब जबकि प्रदेश में चुनाव सिर पर हैं तो हो सकता है कि विभागीय मंत्री और उप मुख्‍यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य सेतु निगम व लोकनिर्माण विभाग के भ्रष्‍टाचार पर संज्ञान लेकर कोई ठोस कार्यवाही करते नजर आएं।
इस पर लोग कहते हैं कि उम्‍मीद ही की जा सकती है, भरोसा जताना मुश्‍किल है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

गुरुवार, 17 जून 2021

एक नजर देखिए: केंद्र और राज्‍य के “अभियान” की किस तरह हवा निकाल रहा है “विकास प्राधिकरण”


लकड़ी से थनों को छूकर अपने क्षेत्र की दुधारू गाएं दुहने में माहिर उत्तर प्रदेश के विकास प्राधिकरण शासन के आदेश-निर्देशों और अभियानों की हवा निकालने में भी कितने दक्ष हैं, इसका एक ताजा उदाहरण तब देखने को मिला जब मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की ओर से आज एक पेंपलेट अखबारों में रखकर लोगों के घर पहुंचाया गया।

बिना किसी प्रोजेक्‍ट के निठल्‍ला चिंतन करने में व्‍यस्‍त इस धार्मिक जनपद के विकास प्राधिकरण की यूं तो अनगिनित कारगुजारियां चर्चा में हैं लेकिन फिलहाल बात केवल ‘वर्षा जल संचयन’ की।


देखिए ये पेंपलेट: 







दर

असल, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विश्व जल दिवस के अवसर पर 22 मार्च 2021 को नई दिल्ली में वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से ‘जल शक्ति अभियान: वर्षा जल संचयन (Catch the Rain)’ अभियान की शुरूआत की थी। इस अभियान का उद्देश्‍य भारत के विकास में सामने आ रही जल संकट की चुनौती से निपटना है।
प्रधानमंत्री ने मानसून तक जल संरक्षण के प्रयासों को आगे बढ़ाने का आह्वान किया और सरपंचों से लेकर जिलाधिकारियों तथा उपायुक्तों से जोर देते हुए कहा कि जल शपथ’ जो पूरे देश में आयोजित की जा रही है, हर किसी की प्रतिज्ञा के साथ-साथ अब स्‍वभाव बननी चाहिए। उन्होंने कहा कि जब पानी को लेकर हमारा स्वभाव बदलेगा, तो प्रकृति भी हमारा साथ देगी।
30 नवंबर 2021 तक प्री-मानसून और मानसून अवधि के दौरान देशभर में चलने वाले इस जल संरक्षण अभियान को जमीनी स्तर पर लाने के लिए प्रधानमंत्री ने इसे बाकायदा एक आंदोलन के रूप में लॉन्‍च करने की बात कही है।
प्रधानमंत्री के आह्वान पर उत्तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यानाथ ने भी वर्षा जल संचयन के लिए विशेष अभियान चलाने का फैसला किया।
इसके लिए उन्‍होंने 10 एकड़ से अधिक क्षेत्रफल वाली टाउनशिप के एक फीसदी क्षेत्र में जलाशय का निर्माण कराना अनिवार्य कर दिया।
इस संदर्भ में प्रमुख सचिव आवास दीपक कुमार ने एक शासनादेश जारी करते हुए कहा कि 10 एकड़ से अधिक क्षेत्रफल की योजनाओं के ले-आउट प्लान्स में पार्क और खुले क्षेत्र के लिए प्रस्तावित भूमि के अंतर्गत जलाशय या जलाशयों का निर्माण अनिवार्य रूप से किया जाएगा।
जलाशय निर्माण से पूर्व संबंधित योजना के अंतर्गत वर्षा जल के प्राकृतिक कैचमेंट एरिया को चिह्नित करते हुए पानी के ठहराव की व्यवस्था की जाएगी।
पार्क व खुले क्षेत्र के अंतर्गत निर्धारित मानकों के अनुसार एक कोने में रिचार्ज पिट, रिचार्ज शैफ्ट बनाए जाएंगे। ऐसे में रिचार्ज पिट, रिचार्ज शैफ्ट और जलाशय का निर्माण मानक के अनुसार किया जाएगा।
पार्कों में पक्का निर्माण पांच प्रतिशत से अधिक नहीं किया जाएगा। फुटपाथ व ट्रैक्स यथासंभव परमीएबिल या सेमी परिमीएबिल ब्लॉक्स के प्रयोग से ही बनाए जाएंगे। वर्षा जल के अधिकतम भूमिगत रिसाव को पार्क एवं खुले क्षेत्रों में प्रोत्साहित किया जाएगा। सड़कों, पार्कों और खुले स्थान में ऐसे पेड़-पौधों का वृक्षारोपण किया जाएगा, जिनको जल की न्यूनतम जरूरत होगी। शासकीय भवनों, निजी सोसायटियों, सहकारी आवास समितियों द्वारा प्रस्तावित नई योजनाओं के ले-आउट प्लान में दुर्बल व अल्प आय वर्ग को छोड़कर अवस्थापना सुविधाओं जैसे जलापूर्ति, ड्रेनेज व सीवरेज के नेटवर्क के साथ-साथ रूफ टॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग के माध्यम से भू-जल सामूहिक रिचार्जिंग के लिए अन्य नेटवर्क का प्रावधान किया जाएगा।
इसके अलावा 300 वर्ग मीटर या उससे अधिक क्षेत्रफल के भूखंडों में यदि सामूहिक रिचार्ज नेटवर्क नहीं है तो भवन स्वामी को स्वयं ही वर्षा जल संचयन के लिए व्यवस्था करनी होगी।
विकास प्राधिकरण वर्षा जल संचयन के संबंध में की गई कार्यवाही की रिपोर्ट हर माह की 15 तारीख को आवास बंधु के निदेशक को उपलब्ध कराएंगे।
अब देखिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की उपलब्‍धि
एक ऐसे गंभीर संकट पर जिसे लेकर केंद्र ही नहीं राज्‍य सरकार भी चिंता जता रही है और तमाम आदेश-निर्देश जारी कर चुकी है, उसके लिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के जिम्मेदार अधिकारियों ने आज अखबारों में पेंपलेट डलवाने से पहले शायद ही कुछ किया हो।
इसके उलट हो ये रहा है कि प्राधिकरण से अप्रूव्‍ड पचासों एकड़ में फैली उन पॉश कॉलोनियों के अंदर भी मकान मालिक बिना किसी अनुमति के बेखौफ होकर अनावश्‍यक रूप से सबमर्सिबल लगवा रहे हैं, जबकि इन कॉलोनियों में नियमित सुबह-शाम कई-कई घंटे पेयजल की सप्‍लाई की जाती है।
ये सब हो इसलिए रहा है कि नक्‍शा पास करने की औपचारिकता पूरी करने के बाद विकास प्राधिकरण का कोई जिम्‍मेदार अधिकारी कभी पलटकर इन कॉलोनियों की ओर झांकने भी नहीं जाता।
बात बिजली-पानी या सड़क की हो अथवा पार्कों के रख-रखाव एवं अवैध निर्माण की, विकास प्राधिकरण के अधिकारियों को किसी बात से कोई मतलब नहीं जबकि ये सब देखना उनकी जिम्‍मेदारी है।
जाहिर है कि इस मानसिकता के चलते वो न तो किसी कॉलोनी में रेजिडेंट वेलफेयर सोसायटी यानी RWA के सहयोग से जल संचयन का कोई कार्य करवा सकेंगे और ना ही 300 वर्गमीटर से अधिक क्षेत्रफल वाले भूखंडों में रूफटॉप रेनवाटर हार्वेस्‍टिंग का प्रावधान सुनिश्‍चित करवा पाएंगे।
विकास प्राधिकरण के अधिकारियों की ऐसी मानसिकता किसी एक जिले तक सीमित नहीं है। सच तो यह है कि समूचे प्रदेश में अधिकांश अधिकारियों का यही हाल है इसलिए ज्‍यादातर विकास प्राधिकरण एक ढर्रे पर चलते दिखाई देते हैं।
हो सकता है कि ‘जल शक्ति अभियान: वर्षा जल संचयन (कैच द रेन)’ जैसा अभियान भी इन अधिकारियों के लिए ‘आपदा में अवसर’ साबित हो और समस्‍त सरकारी आदेश-निर्देश इसी तरह पेंपलेट बांटकर निपटा लिए जाएं क्‍योंकि उत्तर प्रदेश नगर योजना एवं विकास अधिनियम-1973 इन्‍हें किसी के भी खिलाफ ‘सुसंगत’ धाराओं में कार्यवाही करने का अधिकार जो देता है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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