शनिवार, 28 अक्टूबर 2017

निकाय चुनाव और समाजसेवियों की फौज

हमारे यहां लोगों में समाजसेवा का जज्‍बा इस कदर कूट-कूट कर भरा है कि वह घर फूंक कर भी तमाशा देखने को बेताब रहते हैं। बस जरूरत होती है तो एक अदद चुनाव की।
चुनाव की आहट सुनाई दी कि मोहल्‍ले के हर तीसरे-चौथे आदमी के अंदर से समाजसेवा छलक कर टपकने लगती है।
अभी बहुत दिन नहीं बीते कि विधानसभा चुनावों के दौरान प्रदेशभर के समाजसेवियों ने अपने-अपने जिलों से लखनऊ तक की सड़क एक-एक इंच नाप ली थी।
समाजसेवा के इस जूनून में कुछ को सफलता मिली और कुछ को नहीं मिली, किंतु हिम्‍मत किसी ने नहीं हारी।
जो जीत गए वो आज सिकंदर बने बैठे हैं और हारने वाले समाजसेवा का टोकरा सिर पर उठाए एकबार फिर तैयार हैं।
इस मर्तबा विधानसभा के न सही, नगर निकाय के चुनाव तो हैं लिहाजा समाजसेवा का कुलाचें भरना स्‍वाभाविक है।
सच पूछें तो नगर निकाय के चुनावों में सेवा का मर्म वही जानता है जो उसके छद्म रूप में छिपी मेवा से वाकिफ हो।
निर्वाचन आयोग भी इन समाजसेवियों की भावनाओं का कितना ध्‍यान रखता है कि इस बार उसने निकाय चुनावों में प्रत्‍याशियों के लिए खर्च की सीमा पहले के मुकाबले दोगुनी कर दी है। वो भी तब जबकि इस खर्चे की भरपाई का कोई प्रत्‍यक्ष स्‍त्रोत नहीं होता।
पद नाम भले ही ऊपर-नीचे हो जाता हो किंतु कमाई के नाम पर मेयर और पार्षद उसी तरह समान हैं जिस तरह समाज में स्‍त्रियों को बराबर का दर्जा प्राप्‍त है। न मेयर को धेला मिलता है और न पार्षद को। बुढ़ापे की लाठी रुपी पेंशन भी नहीं है बेचारे माननीयों के लिए लेकिन क्‍या मजाल कि इससे किसी प्रत्‍याशी की समाजसेवा का जज्‍बा रत्तीभर कम हो जाता हो।
सुना है कि एक-एक पार्टी के पास समाजसेवा के हजार-हजार आवेदन आए पड़े हैं। आर्थिक रूप से कमजोर आवेदकों ने तो कर्ज का इंतजाम भी कर लिया है जिससे इधर पार्टी समाजसेवा के लिए अधिकृत करे और उधर वो गुलाबी व हरे नोटों के बंडल लेकर समाजसेवा को कूद पड़ें।
समाजसेवा में हाथ का मैल कहीं आड़े न आए इसलिए उन लोगों ने भी बैंक एकाउंट का ब्‍यौरा लेना शुरू कर दिया है जो कल तक आलू, प्याज और टमाटर की कीमतों पर धरना-प्रदर्शन करने को आमादा थे।
समाजसेवा को लालायित लोगों के विचार इस मामले में कभी नहीं टकराते। बैनर कोई हो, झंडा किसी का भी टंगा हो, हैं तो सभी के नुमाइंदे समाजसेवी। समाजसेवी और समाजसेवियों के बीच कैसा भेद। बस कैसे भी एकबार मौका मिल जाए। बहती गंगा में हाथ धोना किसे सुकून नहीं देता।
सरकार भी कितनी समझदार है। मतदान की तारीखों के साथ यमुना में गिर रहे नाले-नालियों को रोकने के लिए 3 हजार 500 करोड़ की रकम भी घोषित कर दी ताकि मेयर और पार्षद तथा चेयरमैन तथा सदस्‍यों के बीच किसी प्रकार का कन्‍फ्यूजन न रहे। लक्ष्‍य सामने हो तो समाजसेवा करने का आनंद ही कुछ और है। समाजसेवा की यमुना कभी दूषित नहीं होती। जनता के विचार दूषित हो सकते हैं किंतु समाजसेवियों की भावना हमेशा पवित्र रहती है।
वेतन-भत्ता नहीं है नगर निकाय की सेवा में तो न सही। पेंशन या फंड नहीं मिलता तो कोई बात नहीं। सेवा तो नाम ही है मेवा का। सेवा करेंगे तो मेवा भी मिलेगी। मेवा का इंतजाम ”ऊपर वाला” करता रहता है। यूं भी यमुना मैया सबकी सुनती है। चोंच के साथ चुग्‍गे का इंतजाम हो जाता है। मेयर की चोंच को मेयर के लायक और पार्षद की चोंच को पार्षद के लायक। ईश्‍वर हाथी से लेकर चींटीं तक के पेट की व्‍यवस्‍था करता है। किसी को भूखा नहीं रखता।
समाजसेवी लोग ईश्‍वर में पूरी आस्‍था रखते हैं इसलिए चुनाव की खातिर सबकुछ दांव पर लगाने से गुरेज नहीं करते। वो जानते हैं कि व्‍यवस्‍था कभी इतनी निर्मम नहीं हो सकती कि सेवा की मेवा देने में कोताही बरते।
यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने के लिए 3500 करोड़ की घोषणा तो कुछ नहीं, तीर्थस्‍थल के नाम पर बहुत कुछ मिलना बाकी है।
जय यमुना मैया की, जय कृष्‍ण कन्‍हैया की।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

गुरुवार, 26 अक्टूबर 2017

उधार के सिंदूर से सुहाग सहेजने को मजबूर है भारतीय जनता पार्टी

मथुरा। कृष्‍ण की जन्‍मस्‍थली मथुरा और क्रीड़ा स्‍थली वृंदावन को मिलाकर पहली बार नगर निगम बनी मथुरा में भारतीय जनता पार्टी उधार के सिंदूर से सुहाग सहेजने को मजबूर है।
दरअसल, भाजपा के सामने यह स्‍थिति मथुरा-वृंदावन का ”मेयर” पद अनुसूचित जाति के लिए ”आरक्षित” हो जाने के कारण पैदा हुई है क्‍योंकि मथुरा-वृंदावन में भाजपा के पास अनुसूचित जाति का कोई ऐसा उम्‍मीदवार नहीं है जो पूरी तरह भाजपा को समर्पित रहा हो या पार्टी का वफादार सिपाही माना जा सके।
मथुरा में भाजपा के पास उसी प्रकार मेयर पद के लिए अनुसूचित जाति के अपने किसी प्रत्‍याशी का अभाव है जिस प्रकार लोकसभा चुनाव के लिए स्‍थानीय प्रत्‍याशी का अभाव था लिहाजा तब काफी दिमागी कसरत के बाद स्‍वप्‍न सुंदरी का खिताब प्राप्‍त सिने अभिनेत्री हेमा मालिनी को लाया गया।
विधानसभा चुनावों में भी मथुरा-वृंदावन सीट के लिए श्रीकांत शर्मा को दिल्‍ली से लाना पड़ा, हालांकि श्रीकांत शर्मा कस्‍बा गोवर्धन (मथुरा) के ही मूल निवासी हैं किंतु वह करीब दो दशक पहले मथुरा को छोड़ चुके थे इसलिए उन्‍हें बाहरी प्रत्‍याशी माना गया।
निकाय चुनावों में पहली बार मेयर पद (आरक्षित) के लिए चुनाव लड़ रही मथुरा नगरी के अंदर भाजपा के पास जो संभावित प्रत्‍याशी दिखाई दे रहे हैं उनमें पूर्व विधायक श्‍याम सिंह अहेरिया, पूर्व विधायक अजय पोइया और बल्‍देव क्षेत्र से भाजपा के विधायक पूरन प्रकाश के पुत्र पंकज प्रकाश प्रमुख हैं।
श्‍याम सिंह अहेरिया सबसे पहले भाजपा की ही टिकट पर गोवर्धन (आरक्षित) सीट से विधायक चुने गए किंतु बाद के चुनावों में जब भाजपा ने उनका टिकट काट दिया तो वह अपने पुत्र सहित ”समाजवादी” हो लिए। उनके पुत्र को समाजवादी पार्टी ने सत्ता में रहते दर्जाप्राप्‍त राज्‍यमंत्री के पद से भी नवाजा था।
समाजवादी पार्टी के सत्ता से बेदखल होने पर वह फिर भाजपाई हो गए किंतु अब उन्‍हें पार्टी का समर्पित कार्यकर्ता अथवा वफादार सिपाही नहीं माना जा सकता।
इसी प्रकार एडवोकेट अजय कुमार पोइया का राजनीतिक सफर भी भाजपा की टिकट पर गोवर्धन सुरक्षित सीट से निर्वाचित होने के साथ शुरू हुआ। इससे पहले अजय कुमार पोइया मथुरा में ही वकालत की प्रेक्‍टिस करते थे।
बाद के चुनावों में पार्टी से उपेक्षित अनुभव करने के कारण अजय कुमार पोइया ने भी भाजपा का दामन छोड़ दिया और बहुजन समाज पार्टी की गोद में जा बैठे। बहुजन समाज पार्टी में रहते हुए कोई उपलब्‍धि हासिल न होने पर अजय कुमार पोइया एकबार फिर भाजपा की शरण में लौट आए।
गत विधानसभा चुनावों में बल्‍देव सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ने की उम्‍मीद पाले बैठे अजय कुमार पोइया को तब तगड़ा झटका लगा जब पार्टी ने उनकी बजाय राष्‍ट्रीय लोकदल से भाजपा में आए सिटिंग विधायक पूरन प्रकाश को बल्‍देव से चुनाव लड़ाने का फैसला किया।
पार्टी से मिले इस झटके पर अजय पोइया ने पूरन प्रकाश के खिलाफ अपने पुत्र को चुनाव लड़ने के लिए खड़ा कर दिया, और दलील यह दी कि वह तो पार्टी के अनुशासित सिपाही हैं किंतु पुत्र द्वारा चुनाव लड़ना उसका अपना निर्णय था।
यानि अजय पोइया एकबार फिर पार्टी के प्रति बड़ी चालाकी के साथ बेवफाई पर उतर आए ताकि संभव हो तो सांप मर जाए और लाठी भी न टूटे की कहावत को चरितार्थ कर सकें।
यह बात अलग है कि अजय पोइया के पुत्र, पूरन प्रकाश का कुछ नहीं बिगाड़ सके और पूरन प्रकाश लगातार दूसरी बार बल्‍देव सुरक्षित सीट से निर्वाचित होने में सफल रहे।
जहां तक सवाल पूरन प्रकाश के पुत्र पंकज प्रकाश का है तो बेशक उन्‍होंने 2010 के जिला पंचायत चुनावों में सर्वाधिक मतों से चुनाव जीतकर एक रिकॉर्ड कायम किया किंतु बुनियादी रूप से उनके विधायक पिता या दादा का कभी भाजपा की नीतियों में विश्‍वास देखने को नहीं मिला। पंकज प्रकाश के दादा मास्‍टर कन्‍हैया लाल भी विधायक रहे थे लेकिन भाजपा से कभी उनका कोई वास्‍ता नहीं रहा।
इन तीन प्रमुख दावेदारों के अलावा जो अन्‍य दो दावेदार हैं उनमें से एक मुकेश आर्यबंधु के पूरे परिवार की निष्‍ठा हमेशा कांग्रेस से जुड़ी रही है और उनके बड़े भाई ब्रजमोहन बाल्‍मीकि ने कांग्रेस की टिकट पर गोवर्धन सुरक्षित सीट से ही चुनाव भी लड़ा था।
दूसरे दावेदार ब्रजेश खरे ही एकमात्र ऐसे दावेदार हैं जो पूर्व में भाजपा सभासद रह चुके हैं और एक लंबे समय से भाजपा के प्रति समर्पित हैं किंतु ब्रजेश खरे की दो पूर्व विधायकों तथा एक विधायक पुत्र के सामने कितनी दाल गल पाएगी, यह देखने वाली बात होगी।
भाजपा की सबसे बड़ी समस्‍या ही यह है कि विश्‍व विख्‍यात धार्मिक नगरी मथुरा राजनीतिक रूप से उसके लिए चाहे कितनी ही महत्‍वपूर्ण क्‍यों न हो किंतु यहां उसके पास कद्दावर नेताओं का काफी समय से अभाव रहा है।
2009 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को रालोद के युवराज जयंत चौधरी को समर्थन देना पड़ा क्‍योंकि तब भी भाजपा के पास कोई दमदार उम्‍मीदवार नहीं था।
यह स्‍थिति तो तब है जबकि मथुरा से दो बार भाजपा की टिकट पर डॉ. सच्‍चिदानंद हरि साक्षी लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए थे और तीन बार वर्तमान जिलाध्‍यक्ष चौधरी तेजवीर सिंह सांसद चुने गए।
उधार के सिंदूर या बेवफाओं में से किसी को मेयर पद पर चुनाव लड़वाना भाजपा को इसलिए मुसीबत में डाल सकता है क्‍योंकि निवर्तमान पालिका अध्‍यक्ष मनीषा गुप्‍ता भी जनआंकाक्षाओं पर खरी नहीं उतरीं। साथ ही उनके ऊपर पौने दो करोड़ रुपए के भ्रष्‍टाचार का आरोप भी एनजीटी में लंबित है।
मनीषा गुप्‍ता के कार्यकाल में यमुना को प्रदूषण मुक्‍त रखने के लिए किए जाने वाले उपायों से पैसे का तो खूब बंदरबांट हुआ किंतु यमुना हर दिन पहले से अधिक प्रदूषित होती गई।
जाहिर है कि मनीषा गुप्‍ता के कार्यकाल की छाया भी इन नगर निकाय चुनावों में किसी न किसी स्‍तर पर देखने को जरूर मिलेगी क्‍योंकि यमुना प्रदूषण का मुद्दा फिर गर्माने लगा है। संत समाज भी यमुना प्रदूषण के मामले में न सिर्फ मथुरा-वृंदावन की नगर पालिकाओं से नाराज है बल्‍कि केन्‍द्र सरकार के आश्‍वासनों की घुट्टी से भी आजिज आ चुका है और उसने मार्च 2018 से इसके लिए आंदोलन करने का ऐलान कर दिया है।
वैसे भी देखा जाए तो फिलहाल मथुरा-वृंदावन नगर निगम के मेयर पद हेतु जिन दो पूर्व विधायकों के नाम सामने आ रहे हैं उनकी वफादारी के अलावा कार्यक्षमता पर भी पहले से सवालिया निशान लगे हैं। उनकी उम्र भी उनकी कार्यक्षमता को लेकर चुगली करती प्रतीत होती है जबकि नगर निगम बन जाने के बाद जनआकांक्षाएं काफी प्रबल हैं।
बल्‍देव क्षेत्र के विधायक पूरन प्रकाश के पुत्र पंकज प्रकाश ही एकमात्र ऐसे संभावित उम्‍मीदवार हो सकते हैं जो युवा होने के साथ-साथ अच्‍छे-खासे शिक्षित भी हैं लेकिन उनकी उम्‍मीदवारी में भाजपा की नीतियां आड़े आती हैं।
इस सबके बावजूद यदि भाजपा इन्‍हीं चर्चित लोगों में से किसी एक को मथुरा में मेयर पद के लिए खड़ा करती है तो यही माना जाएगा कि वह या तो उधार के सिंदूर से सुहाग सहेजने को मजबूर है या फिर बेवफाओं से वफादारी की उम्‍मीद पालकर मथुरा-वृंदावन की जनता को उसी दलदल में धकेलने जा रही है जिससे निकलने का जनता को वर्षों से इंतजार है।
रहा सवाल अन्‍य राजनीतिक दलों का तो समाजवादी पार्टी मथुरा में कभी किसी स्‍तर पर अपना जनाधार खड़ा नहीं कर सकी और बहुजन समाज पार्टी फिलहाल भाजपा के मुकाबले में दिखाई नहीं देती। कांग्रेस के पास भी अच्‍छे उम्‍मीदवारों का भारी अकाल है और राष्‍ट्रीय लोकदल की स्‍थिति उस बूढ़े सांड़ की तरह है जो खुरों से मिट्टी खोदकर रास्‍ते की धूल तो उड़ा सकता है किंतु किसी से मुकाबला करने की सामर्थ्‍य पूरी तरह खो चुका है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017

कहीं आप भी तो नहीं हैं किसी “वैध” कॉलोनी के “अवैध” मकान मालिक ?

कहीं आप भी तो किसी ”वैध” कॉलोनी के ”अवैध” मकान मालिक नहीं हैं ?

हो सकता है कि यह प्रश्‍न आपको कुछ अजीब लग रहा हो, या आप सोचने लगे हों कि यदि कॉलोनी ”वैध” है तो मकान ”अवैध” कैसे हो सकता है ?

यदि आप यह सोच रहे हैं तो जान लीजिए कि ऐसा हो सकता है। साथ ही यह भी हो सकता है कि बिल्‍डर को लाखों रुपए देकर जिस मकान को आप अपना समझ रहे हैं वह कल किसी कोर्ट के आदेश पर ध्‍वस्‍त कर दिया जाए और आपकी जिंदगी भर की जमा पूंजी सहित वो पैसा भी डूब जाए जिसे आपने इस कथित वैध मकान को खरीदने के लिए बैंक या फिर साहूकार से कर्ज ले रखा हो।
ऐसी स्‍थिति में मकान तो आपका रहेगा नहीं, ऊपर से आप जिंदगीभर उस कर्ज के बोझ तले दबे रहेंगे जिसे लेकर आपने अपने लिए एक अदद आशियाने का सपना संजोया था।
वैसे तो रियल एस्‍टेट कंपनियों ने यह खेल पूरे उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर खेला है किंतु बात करें विश्‍व विख्‍यात धार्मिक जिले मथुरा की तो यहां भी ऐसे बिल्‍डर्स की कोई कमी नहीं है जिन्‍होंने अपने प्रोजेक्‍ट के किसी एक हिस्‍से का नक्‍शा पास कराकर उसमें सैकड़ों अवैध मकान, बंगले और फ्लैट बनाकर बेच दिए हैं।
नेशनल हाई-वे नंबर दो पर बने मल्‍टीस्‍टोरी प्रोजेक्‍ट्स में नियम-कानून की किस कदर धज्जियां उड़ाई गई हैं, इन्‍हें मौके पर जाकर ही समझा जा सकता है। यहां न तो नियम के मुताबिक पार्किंग की जगह छोड़ी गई है और न पार्क बनाए हैं। आग लगने की स्‍थिति में फायर ब्रिगेड की एक गाड़ी इनके अंदर मूव नहीं कर सकती जबकि सैकड़ों फ्लैट खड़े कर दिए गए हैं। भूकंप जैसी किसी प्राकृतिक आपदा के लिए यहां सिर छिपाने की कोई व्‍यवस्‍था नहीं है, और न किसी इमारत में भूकंपरोधी कोई इंतजाम किए गए हैं। हजारों जिंदगियां भगवान भरोसे रह रही हैं क्‍योंकि डेवलपमेंट अथॉरिटी चुप्‍पी साधे बैठी है।
रियल एस्‍टेट कंपनियों के इस खेल में तमाम वो सरकारी विभाग भी शामिल हैं जिनमें ऊपर से नीचे तक भ्रष्‍टाचार व्‍याप्‍त है और वो बैंकें भी लिप्‍त हैं जो बिल्‍डर्स से ऑब्‍लाइज होकर उनके एक इशारे पर कुछ भी करने को तत्‍पर रहती हैं।
दरअसल, रियल एस्‍टेट कंपनियों और बिल्‍डर्स का यह खेल वहीं से शुरू हो जाता है जहां से किसी प्रोजेक्‍ट का नक्‍शा पास कराने की प्रक्रिया शुरू होती है। कोई भी रियल एस्‍टेट कंपनी या बिल्‍डर कभी अपने पूरे प्रोजेक्‍ट का नक्‍शा एकसाथ पास नहीं कराता क्‍योंकि पूरे प्रोजेक्‍ट का एकसाथ नक्‍शा पास कराने के लिए उसे प्रोजेक्‍ट का एकमुश्‍त डेवलपमेंट चार्ज भी जमा कराना होता है। प्रोजेक्‍ट के किसी छोटे से हिस्‍से का नक्‍शा पास कराकर वह उसका प्रचार-प्रसार शुरू कर देता है और उसके नाम पर पैसा इकठ्ठा करने लगता है।
इस प्रक्रिया में नगर पालिका, नगर पंचायत, जिला पंचायत तथा अग्‍निशमन विभाग आदि भी रियल एस्‍टेट कंपनियों तथा बिल्‍डर्स को नियम विरुद्ध एनओसी देकर मदद करते हैं।
विकास प्राधिकरण से एकबार नक्‍शा पास हो जाने पर यह मान लिया जाता है कि सबकुछ जायज है लिहाजा रियल एस्‍टेट कंपनियों और बिल्‍डर्स को मनमानी करने की पूरी छूट मिल जाती है।
बताया जाता है कि मथुरा जनपद में नेशनल हाई-वे नंबर दो से लेकर वृंदावन, और गोवर्धन तक ऐसे प्रोजेक्‍ट्स की भरमार है जिनमें विकास प्राधिकरण से एप्रूव्‍ड नक्‍शे के अलावा सैकड़ों मकान फर्जी तरीके से बनाकर खड़े कर दिए गए।
किसी प्रोजेक्‍ट में चार टावर का अप्रूवल लेकर छ: टावर खड़े कर दिए गए तो किसी में अवैध व्‍यापारिक कॉम्‍पलेक्‍स बना दिए गए। किसी प्रोजेक्‍ट में ”प्रस्‍तावित” नक्‍शे के आधार पर ही पूरा निर्माण करा दिया गया तो किसी में मॉरगेज प्‍लॉट पर भी मकान खड़े कर दिए गए।
भ्रष्‍टाचार की नींव पर खड़े किए गए इन मकान और दुकानों का आलम यह है कि कहीं-कहीं तो ग्राम समाज की जमीन इसके लिए इस्‍तेमाल कर ली गई है और कहीं नहर, नाले व बंबों को पाटकर फ्लैट खड़े कर दिए गए हैं।
आश्‍चर्य की बात यह है कि वैध कॉलोनियों में बने ऐसे अवैध मकानों में आज अनेक लोग रह रहे हैं और दुकानों में कारोबार शुरू हो गया है लेकिन इन रहने वालों तथा कारोबार करने वालों को पता तक नहीं कि उनके ऊपर हर पल एक नंगी तलवार लटक रही है।
जहां तक सवाल विकास प्राधिकरण का है तो उसके अधिकारी और कर्मचारी पूरी मलाई मारकर अब तमाशबीन बने हुए हैं क्‍योंकि 01 मई 2017 से ”रियल एस्‍टेट रेगुलेशन एक्‍ट” अर्थात RERA लागू होने के बाद से उनके लिए भी काले को सफेद करना इतना आसान नहीं रह गया।
यह बात अलग है कि विकास प्राधिकरण, बिल्‍डर्स के अधिकांश काले कारनामों की ओर से अब भी आंखें फेरे बैठा है और कार्यवाही के लिए ऐसी अथॉरिटी के आदेश-निर्देश का इंतजार कर रहा है जिसके बाद वह आराम से यह कह सके कि अब हमारे हाथ में कुछ रहा ही नहीं।
रियल एस्‍टेट रेगुलेशन एक्‍ट के अनुसार अब किसी भी रियल एस्‍टेट कंपनी या बिल्‍डर को प्रोजेक्‍ट के गेट पर प्रोजेक्‍ट का पूरा ”ले-आउट” संबंधित अथॉरिटी से पास नक्‍शे सहित लगाना अनिवार्य है, जिससे खरीदार को पता लग सके कि उसके प्रोजेक्‍ट में कितनी तथा कौन-कौन सी इकाइयां पास हैं और उनका निर्माण कितने समय में पूरा हो जाएगा।
चूंकि यह नियम निर्माणाधीन प्रोजेक्‍ट सहित सभी पुराने प्रोजेक्‍ट्स पर भी लागू किया गया है इसलिए पूरे हो चुके प्रोजेक्‍ट भी इस दायरे में आते हैं, लेकिन अब तक किसी ऐसे प्रोजेक्‍ट पर बाहर नक्‍शा चस्‍पा नहीं किया गया और ना ही डेवलपमेंट अथॉरिटी ने किसी प्रोजेक्‍ट पर इसे लेकर कोई कार्यवाही की है।
इसी प्रकार रियल एस्‍टेट के हर कारोबारी, ग्रुप या कंपनी को RERA के तहत अपना रजिस्‍ट्रेशन कराना अनिवार्य है और उस रजिस्‍ट्रेशन की जानकारी के साथ प्रोजेक्‍ट की वेबसाइट पर पैसे का पूरा ब्‍यौरा भी दिया जाना जरूरी है किंतु यहां तो कई नामचीन बिल्‍डर्स ने अब तक न RERA में रजिस्‍ट्रेशन कराया है और ना ही उनकी कोई वेबसाइट है। इन हालातों में उनसे ब्‍यौरा उपलब्‍ध कराने की उम्‍मीद भी कैसे की जा सकती है।
इस पूरे घपले-घोटाले का एक महत्‍वपूर्ण पहलू किसी प्रॉपर्टी की रजिस्‍ट्री कराने में छिपा है क्‍योंकि रजिस्‍ट्री कार्यालय को सिर्फ और सिर्फ मतलब है तो रैवेन्‍यू वसूलने से, बाकी कौन कितना काला-पीला करता है, इससे उसे कोई वास्‍ता नहीं।
उसका सारा फोकस रजिस्‍ट्री के लिए जरूरी स्‍टांप लगवाने तथा उसमें हेर-फेर के लिए सुविधा शुल्‍क वसूलने तक सीमित है, बाकी जिम्‍मेदारी क्रेता तथा विक्रेता की है क्‍योंकि जब भी फंसते हैं तो वही फंसते हैं। रजिस्‍ट्री विभाग अपना पल्‍लू झाड़कर खड़ा हो जाता है।
यही कारण है कि रियल एस्‍टेट के कारोबारी पहले भी खरीदारों को बड़े इत्‍मीनान से लूटते रहे और आज भी लूट रहे हैं क्‍योंकि RERA लागू होने के बावजूद डेवलपमेंट अथॉरिटी ने नए कानून पर अमल करना शुरू नहीं किया है।
अथॉरिटी से शायद ही किसी नामचीन बिल्‍डर को अब तक RERA के तहत रजिस्‍ट्रेशन न कराने, वेबसाइट न बनवाने, नक्‍शा प्रदर्शित न करने तथा खरीदारों से प्राप्‍त रकम का ब्‍यौरा न देने पर नोटिस जारी किया गया हो।
डेवलपमेंट अथॉरिटी की इस ढील का कुछ बिल्‍डर तो भरपूर फायदा उठा रहे हैं और अब भी ऐसी इकाइयों को बेच रहे हैं जिनके नक्‍शे तक पास नहीं कराए गए।
ठीक इसी प्रकार अधिकांश पॉश कॉलोनियों में बिना नक्‍शा पास कराए दो से चार मंजिल तक का निर्माण कार्य अपनी मनमर्जी से करा लिया गया है लेकिन न कोई रोकने वाला है और न टोकने वाला। इस स्‍थिति में सरकार को तो राजस्‍व की बड़ी हानि हो ही रही है, साथ ही कॉलोनियों की वैधता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
विकास प्राधिकरण की भ्रष्‍ट तथा लचर कार्यप्रणाली का ही परिणाम है कि रियल एस्‍टेट के बहुत से करोबारी आम जनता का अरबों रुपया अब भी दबाकर बैठे हैं और उनके नीचे फंसे लोग किसी तरह अपनी जान छुड़ाने के प्रयास में हैं।
कोई कोर्ट कचहरी के चक्‍कर लगा रहा है तो कोई पुलिस से उम्‍मीद पाले बैठा है किंतु समस्‍या यह है कि बिना ठोस लिखा-पढ़ी के उनके लिए बिल्‍डर्स से निपटना आसान नहीं है।
हाल ही में नोएडा विकास प्राधिकरण ने कई नामचीन रियल एस्‍टेट कंपनी के सैकड़ों फ्लैट्स को अवैध घोषित कर दिया है। ये वो फ्लैट्स हैं जिनका पूरा पैसा बिल्‍डर्स की जेब में पहुंच चुका है। शासन-प्रशासन तक इन बिल्‍डर्स के सामने असहाय है क्‍योंकि वह अपने हाथ खड़े करने को तैयार बैठे हैं। कोर्ट में भी उन्‍होंने अपनी आर्थिक बदहाली का रोना रोकर राहत पाने की कोशिश की थी, हालांकि कोर्ट ने उनके घड़ियालू आंसुओं पर तवज्‍जो नहीं दी।
नोएडा डेवलेपमेंट अथॉरिटी इन नामचीन बिल्‍डर्स से कैसे निपटेगी और कैसे उन हजारों लोगों को राहत पहुंचाएगी जो इनके नीचे अपनी तमाम पूंजी फंसा बैठे हैं, यह प्रश्‍न तब गौण हो जाता है जब पता लगता है कि यहां सवाल सिर्फ दिल्‍ली से सटे नोएडा का नहीं है, सवाल मथुरा जैसे छोटे किंतु विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक शहरों का भी है जहां न केवल स्‍थानीय लोग ऐसे बिल्‍डर्स का शिकार बन रहे हैं बल्‍कि बाहरी लोग भी इनके शिकंजे में फंसे हुए हैं। उन्‍हें नहीं पता कि जिस प्रोजेक्‍ट को वैध समझकर उन्‍होंने मुंहमांगे दामों पर मकान या फ्लैट खरीदा है, उस प्रोजेक्‍ट के अंदर ही अवैध निर्माण कराकर उन्‍हें लूटा गया है।
इससे भी अधिक आश्‍चर्य तब होता है जब पता लगता है कि स्‍थानीय डेवलपमेंट अथॉरिटी की मिलीभगत तथा उसकी भ्रष्‍ट कार्यप्रणाली के चलते लूट का यह सिलसिला अब भी जारी है और ”रियल एस्‍टेट रेगुलेशन एक्‍ट” अर्थात RERA जैसा सख्‍त कानून भी फिलहाल तो ताक पर रखा हुआ है।
बताया जाता है कि हाल ही मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की कमान संभालने वाली महिला आईएएस अधिकारी को विभाग की कार्यप्रणाली सुधारने के लिए खासे पापड़ बेलने पड़ रहे हैं किंतु विभागीय कर्मचारी हैं कि सुधरने का नाम नहीं ले रहे क्‍योंकि उन्‍हें पहले से चली आ रही अतिरिक्‍त कमाई पर आंच आना मंजूर नहीं। फिर चाहे बिल्‍डर किसी को लूटें या लुटे हुओं को ठेंगा दिखाकर खुलेआम रियल एस्‍टेट रेगुलेशन एक्‍ट को चुनौती दें।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शनिवार, 16 सितंबर 2017

सैकड़ों करोड़ की देनदारी मारकर भागने की तैयारी में है ”मथुरा का एक बड़ा बिल्‍डर”

सैकड़ों करोड़ की देनदारी मारकर मथुरा का एक बड़ा बिल्‍डर बाहर भागने की तैयारी कर रहा है।
बिल्‍डर से जुड़े सूत्रों की मानें तो इस पर करीब दो सौ करोड़ की देनदारी है लेकिन यह उसे अब हड़पना चाहता है।
बताया जाता है कि पिछले काफी समय से देनदार इस बिल्‍डर से अपना पैसा निकालने को दबाव बना रहे हैं किंतु वह उन्‍हें अब तक मीठी गोली देकर टहलाता रहा है।
जमीनी कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि पिछले कुछ महीनों के अंदर इस बिल्‍डर ने अपनी कई संपत्तियों को बेचा है लेकिन देनदारों को फूटी कौड़ी नहीं चुकाई, जिससे उसकी नीयत में खोट का पता लगता है।
देनदारों ने हालांकि कई बार बिल्‍डर के आवास तथा विभिन्‍न कार्यालयों एवं व्‍यावसायिक प्रतिष्‍ठानों पर पहुंचकर भी हंगामा किया है किंतु वह उन्‍हें सिर्फ ब्‍याज देने की बात करता रहा है।
देनदारों का कहना है कि अब उन्‍हें बिल्‍डर पर भरोसा नहीं रहा लिहाजा वह ब्‍याज नहीं, अपना मूलधन निकालना चाहते हैं क्‍योंकि वैसे भी उन्‍होंने उसे बहुत कम ब्‍याज दर पर पैसा दे रखा है।
करोड़ों रुपए इस बिल्‍डर के नीचे फंसाए बैठे एक व्‍यक्‍ति ने बताया कि जब भी वह तथा उसके जैसे दूसरे लेनदार बिल्‍डर से अपना पैसा मांगते हैं तो वह रियल एस्‍टेट कारोबारियों की एसोसिएशन से जुड़े एक पदाधिकारी के साथ बैठकर पंचायत करने की बात करता है जबकि देनदारों का कहना है कि उन्‍होंने एसोसिएशन के पदाधिकारी को नहीं, पैसा उसे दिया है लिहाजा वह किसी दूसरे के बीच बैठकर पंचायत क्‍यों करें।
लेनदारों के मुताबिक इस बिल्‍डर का मुख्‍य उद्देश्‍य औने-पौने दामों पर शहर से दूर खरीदी गई अपनी जमीन तथा उस पर बनाए गए फ्लैट्स को मनमानी कीमत पर देनदारों को जबरन बेचना है जिससे उसके कई हित पूरे होते हैं।
लेनदारों ने स्‍पष्‍ट किया कि मूलधन मांगने पर बिल्‍डर या तो फिलहाल ब्‍याज लेकर काम चलाने की बात कहता है या फिर प्‍लॉट अथवा फ्लैट की रजिस्‍ट्री करा लेने को बाध्‍य करता है।
गौरतलब है कि मोदी सरकार द्वारा की गई नोटबंदी से सर्वाधिक प्रभावित यदि कोई कारोबार हुआ तो वह है रियल एस्‍टेट का कारोबार, क्‍योंकि रियल एस्‍टेट के कारोबार में बड़े पैमाने पर कालेधन का इस्‍तेमाल होता था।
एक ओर नोटबंदी और दूसरी ओर रियल एस्टेट रेगुलेशन एक्ट ”रेरा” बन जाने के कारण रियल एस्‍टेट कारोबारियों की कमर टूट गई। ऐसे में जिनकी नीयत खोटी नहीं थी, वह तमाम दिक्‍कतों के बावजूद अपना कारोबार खड़ा रखने में सफल रहे किंतु खोटी नीयत वालों ने बिना लिखा-पढ़ी के बाजार से लिया हुआ पैसा हड़पने की योजना पर काम करना शुरू कर दिया।
उन्‍होंने एक तीर से कई निशाने साधने की कहावत चरितार्थ करते हुए देनदारों से कहा कि या तो ब्‍याज लेकर काम चलाएं अथवा मुंहमांगी कीमत पर प्‍लॉट और फ्लैट्स लेकर अपने घर बैठें।
कुछ वर्षों पहले तक बहुत मामूली हैसियत वाले इस बिल्‍डर की नीयत में खोट आने का मुख्‍य कारण इसकी आपराधिक पृष्‍ठभूमि बताई जाती है।
बताया जाता है कि कभी छोटे-मोटे काम करके जीविका चलाने और फिर कुछ समय तक ठेकेदारी करने वाले इस बिल्‍डर पर बस लूट जैसे संगीन आरोप भी लगे हैं किंतु पिछले कुछ वर्षों से इसने खुद को शहर के नामचीन बिल्‍डर्स की जमात में शामिल कर लिया था और इसलिए लोग इसके अतीत से अपरिचित होते गए।
इसी बात का लाभ उठाकर इस बिल्‍डर ने कभी अपने किसी स्‍क्रैप व्‍यवसायी मित्र को चूना लगाया तो कभी किसी पूर्व विधायक को। कभी टोंटी के किसी कारोबारी को तो कभी किसी लिखिया को।
बिल्‍डर के नजदीकी सूत्र तो यहां तक बताते हैं कि एक प्रसिद्ध धार्मिक संस्‍था ने भी करोड़ों रुपए का कर्ज बहुत मामूली ब्‍याज दर पर इस बिल्‍डर को दिया हुआ है किंतु इन दिनों वह धार्मिक संस्‍था खुद अवैध कब्‍जों के आरोप झेल रही है इसलिए वह कुछ कहने की स्‍थिति में नहीं है।
इस धार्मिक संस्‍था पर सरकार ने इतना शिकंजा कसा हुआ है कि वह दूसरे झंझटों में फंसने से बच रही है लेकिन निकट भविष्‍य में वह भी बिल्‍डर से अपना पैसा निकालने की कोशिश जरूर करेगी।
प्रदेश सरकार में एक कबीना मंत्री और उनके खास सिपहसालार को अपना संरक्षक बताने वाले इस बिल्‍डर की नीयत में खोट का अंदाज इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इसने अपने सगे भाइयों तक को नहीं बख्‍शा और उनका भी मोटा पैसा अपने नीचे हमेशा दबाकर रखा।
बाजार में अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए इस बिल्‍डर ने अपनी राजनीतिक महत्‍वाकांक्षा को भी परवान चढ़ाने की भरपूर कोशिश की किंतु उसमें वह सफल नहीं हुआ क्‍योंकि इसके राजनैतिक आका इसकी महत्‍वाकांक्षा कभी पूरी नहीं होने देना चाहते थे। हालांकि उन्‍होंने इस पर अपना वरदहस्‍थ हमेशा बनाए रखा।
बाजार से जुड़े सूत्रों का कहना है कि इस बिल्‍डर पर पड़ोसी जनपद हाथरस व अलीगढ़ के लोगों का तो काफी पैसा है ही किंतु मथुरा के लोगों का भी कम पैसा नहीं है। ये लोग अब हर हाल में अपना पैसा इसके नीचे से निकालने की कोशिश कर रहे हैं।
ऐसी भी खबरें देनदारों को मिल रही हैं कि पूर्व में यह बिल्‍डर कई लोगों का पैसा हड़प चुका है। इनमें से कृष्‍णा नगर शंकर विहार निवासी एक व्‍यक्‍ति को तो शहर छोड़कर जाने पर मजबूर होना पड़ा क्‍योंकि इसके नीचे पैसा फंस जाने के कारण वह खुद बड़ा कर्जदार हो गया था। रातों-रात अपना सबकुछ छोड़कर वह ऐसा गया कि आजतक उसका कोई सुराग नहीं है।
जो भी हो, इधर देनदार अब इस बिल्‍डर पर जितना दबाव बना रहे हैं उधर बिल्‍डर इन देनदारों को चूना लगाकर मथुरा से बाहर भाग जाने की तैयारी में बताया जाता है।
सूत्र बताते हैं कि बीमारी का इलाज कराने के बहाने यहां से निकलने की योजना बना रहा यह बिल्‍डर देश से ही बाहर जाने की तैयारी कर रहा है ताकि फिर किसी के हाथ न आ सके।
यही कारण है कि पिछले कई महीनों से यह अपने स्‍वामित्‍व वाली संपत्तियों को बेचने में लगा है और कई संपत्तियां बेच भी चुका है।
बिल्‍डर जानता है कि यदि देनदारों ने एकजुट होकर पुलिस प्रशासन पर दबाव बनाना शुरू कर दिया और एकबार कानूनी प्रक्रिया शुरू हो गई तो फिर उसका भाग निकलना आसान नहीं होगा।
देनदार भी इस सच्‍चाई को समझ रहे हैं और कुछ देनदारों ने अपने स्‍तर से पुलिस प्रशासन की मदद लेने के लिए हाथपैर मारना शुरू भी किया है लेकिन फिलहाल उन्‍हें सफलता मिली नहीं है।
अब देखना यह है कि बिल्‍डर अपने मकसद में सफल होता है या देनदार समय रहते उस पर कानूनी शिकंजा कसवा पाते हैं।
कहीं ऐसा न हो कि यह मामला कल्‍पतरू ग्रुप के मालिक राणा की तरह उलझ कर रह जाए और देनदार आत्‍महत्‍या करने पर मजबूर हों क्‍योंकि प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी के एक मंत्री से राजनीतिक संरक्षण तो इसे भी प्राप्‍त है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

दिग्‍गी जैसे राजनीतिक शत्रुओं के रहते मोदी को किसी मित्र की दरकार कहां

आचार्य विष्‍णुगुप्‍त ”चाणक्‍य” ने कहा है कि कामयाब होने के लिए जहां अच्‍छे मित्रों की आवश्‍यकता होती है वहीं ज्‍यादा कामयाब होने के लिए प्रबल शत्रुओं की आवश्‍यकता होती है।
याद करें 2002 के गुजरात दंगे, जिनके बाद नरेन्‍द्र मोदी एक ओर जहां विपक्षी पार्टियों के निशाने पर आ गए थे वहीं दूसरी ओर भाजपा के भी कुछ नेताओं को खटकने लगे थे।
कहते हैं कि तत्‍कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तब नरेन्‍द्र मोदी को राजधर्म निभाने की सीख दी थी और वो उन्‍हें गुजरात के मुख्‍यमंत्री पद से हटाना चाहते थे किंतु आडवाणी ने मोदी का पक्ष लिया।
अटल और आडवाणी की बात छोड़ दें तो तब से लेकर 2014 के लोकसभा चुनावों तक नरेन्‍द्र मोदी का गुजरात दंगों ने पीछा नहीं छोड़ा। न्‍यायालय में कोई आरोप सिद्ध न होने के बावजूद मोदी को उनके प्रबल शत्रु हमेशा कठघरे में खड़ा करते रहे और मोदी यथासंभव अपनी सफाई पेश करते रहे। मीडिया ने भी उन्‍हें आरोपी बनाए रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
बहरहाल…गुजरात की राजनीति करते-करते नरेन्‍द्र दामोदर दास मोदी कैसे अचानक पूरे देश की राजनीति पर छा गए, यह तो पता नहीं किंतु इतना जरूर पता है कि उन्‍हें इस मुकाम तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका उनके शत्रुओं की ही है।
वैसे तो नरेन्‍द्र मोदी के शत्रुओं की कमी न पार्टी के अंदर कभी रही और न बाहर, लेकिन जब से उन्‍होंने प्रधानमंत्री का पद संभाला है तब से शत्रुओं की संख्‍या में भारी इजाफा देखने को मिल रहा है।
आश्‍चर्य की बात यह है कि शत्रुओं की संख्‍या के अनुपात में ही न सिर्फ नरेन्‍द्र मोदी बल्‍कि भाजपा भी तरक्‍की के पायदान चढ़ती जा रही है।
कभी सोनिया गांधी ने मोदी को ”मौत का सौदागर” बताया तो कभी उनके पुत्र राहुल गांधी ने उन पर ”खून की दलाली” करने का इल्‍जाम लगाया। सोनिया और राहुल सहित विपक्ष ने मोदी को जितना ज्‍यादा निशाने पर लिया, मोदी का कद उतना ही बढ़ता गया।
बुधवार से अब कांग्रेसी नेता दिग्‍विजय सिंह द्वारा प्रधानमंत्री के पद पर काबिज नरेन्‍द्र मोदी के बारे में गालियों की हद तक जाकर अमर्यादित भाषा का इस्‍तेमाल किया जाना चर्चा का विषय बना हुआ है।
कांग्रेसियों का इस विषय में तर्क है कि नरेन्‍द्र मोदी अपने टि्वटर अकाउंट पर एसे तमाम लोगों को फॉलो करते हैं जो दिन-रात विपक्ष के लिए अपशब्‍द इस्‍तेमाल करते देखे जा सकते हैं।
कांग्रेसियों का तर्क आसानी से किसी शिक्षित व्‍यक्‍ति के गले नहीं उतर सकता।
क्‍या किसी को इसलिए अभद्र भाषा इस्‍तेमाल करने, गालियां बकने, अपशब्‍दों का प्रयोग करने अथवा अशिष्‍टता करने का अधिकार प्राप्‍त हो जाता है कि दूसरे बहुत से लोग ऐसा करते हैं।
यदि असभ्‍य और अशिष्‍ट लोग ही कांग्रेसी नेताओं के आदर्श हैं तो फिर कुछ भी कहना निरर्थक होगा अन्‍यथा कांग्रेस को दूसरों का उदाहरण न देकर कांग्रेस की संस्‍कृति पर गौर करना चाहिए।
कांग्रेसियों को सोचना चाहिए कि वह किस पार्टी से जुड़े हैं, उस पार्टी का राजनीतिक इतिहास क्‍या है, उसके नेताओं का कद कैसा रहा है, देश में उनकी पहचान क्‍या है?
न कि इस आशय के खोखले तर्क देने चाहिए कि नरेन्‍द्र मोदी के टि्वटर अकाउंट की फॉलोइंग में गाली देने वाले भी शामिल हैं।
नरेन्‍द्र मोदी यदि आज कुछ गलत कर रहे हैं तो तय जानिए कि इसका खामियाजा उन्‍हें भुगतना होगा, किंतु फिलहाल तो वक्‍त यह विचार करने का है कि कांग्रेस ने ऐसा क्‍या किया जिससे वो अपने वजूद को भी कायम रखने की लड़ाई लड़ रही है।
आज स्‍थिति यह है कि कांग्रेस के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष जैसे पद को सुशोभित करने वाली सोनिया गांधी से लेकर उनके पुत्र और कांग्रेस के राष्‍ट्रीय उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी तक तथा दिग्‍विजय सिंह जैसे वरिष्‍ठ कांग्रेसी नेता से लेकर मणिशंकर अय्यर व पी. चिदम्‍बरम तक कहीं कोई अंतर नजर नहीं आता।
सड़क छाप लोगों की भाषा में और देश का भाग्‍य विधाता बनने को आतुर लोगों की भाषा में कहीं तो कोई भेद दिखाई देना चाहिए।
दिग्‍विजय सिंह ने जहां प्रधानमंत्री के प्रति अपशब्‍दों का प्रयोग करके यह साबित किया है कि क्‍वालिफिकेशन से एजुकेशन का दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं होता, वहीं अब दिग्‍विजय सिंह का समर्थन करने वाले यह प्रमाणित कर रहे हैं कि राजनीति कितनी सड़क छाप हो गई है।
इसे यूं भी कह सकते हैं कि राजनीति में किसी तरह ऊंचाइयां छू लेने वाले लोग जरूरी नहीं कि सड़क छाप न हों।
दिग्‍विजय सिंह ने तो अपने निम्‍नस्‍तरीय कृत्‍य से उस कुलीन कुल को भी कलंकित किया है जिसमें वो पैदा हुए थे और जिसके कारण आज तक लोग उन्‍हें ”दिग्‍गी राजा” कहते हैं।
नि: संदेह भारतीय जनता पार्टी में भी ऐसे तत्‍व हैं जो आये दिन अनर्गल प्रलाप करते रहते हैं और भाषा तथा आचरण की मर्यादा एवं पद की गरिमा का भी ध्‍यान नहीं रखते, किंतु इसका मतलब यह नहीं कि दूसरे लोगों को उनसे असभ्‍य आचरण का अधिकार प्राप्‍त हो जाता हो।
प्रधानमंत्री कोई व्‍यक्‍ति नहीं, एक पद है। एक ऐसा पद जिससे देश की मान-मर्यादा बंधी है। उस पद पर हमारे देश में कोई सत्‍ता छीनकर नहीं बैठ जाता, देश की जनता अपने मताधिकार का प्रयोग करके उसे उस पद पर प्रतिष्‍ठापित करती है।
जाहिर है कि यदि कोई उस पद पर बैठे व्‍यक्‍ति के लिए गालियों का प्रयोग कर रहा है तो इसका सीधा मतलब है कि वह देश की जनता के साथ-साथ देश का भी अपमान कर रहा है। राजनीति को लज्‍जित कर रहा है।
दिग्‍विजय सिंह भी एक लंबे समय तक मध्‍यप्रदेश के मुख्‍यमंत्री रहे हैं। राजनीति में अवसान, कोई अनहोनी बात नहीं। राजनीति तो सदा से ही अप्रत्‍याशित नतीजों का खेल रही है। शून्‍य से शिखर तक पहुंचने की अनेक कहानियों से राजनीति का इतिहास भरा पड़ा है। कांग्रेस यदि आज हाशिए पर है तो कभी भाजपा भी हाशिए पर रही है।
प्रतिद्वंदियों के प्रति घृणा की हद तक दुर्भावना रखने वाले राजनीतिज्ञ राजनीति को तो कलंकित करते ही हैं, चाणक्‍य के उस कथन को भी साबित करते हैं कि ज्‍यादा कामयाब होने के लिए प्रबल शत्रुओं की आवश्‍यकता होती है।
और शत्रु यदि दिग्‍विजय सिंह जैसा हो तो निश्‍चित जानिए कि तरक्‍की के लिए किसी मित्र की आवश्‍यकता रह नहीं जाती।
कांग्रेस चाहे तो अब भी समझ सकती है कि आज यदि नरेन्‍द्र मोदी उसे और समूचे विपक्ष को अपराजेय नजर आ रहे हैं तो उसके पीछे मोदी का कोई तिलिस्‍म कम, कांग्रेस और कांग्रेसियों सहित विपक्ष के प्रबल शत्रुओं का बड़ा योगदान है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

यूपी: राज्य वित्त आयोग से मिली धनराशि में बड़ा घोटाला सामने आया

कानपुर। ग्रामीण विकास के लिए राज्य वित्त आयोग से मिली धनराशि में बड़ा घोटाला सामने आया है। घाटमपुर, पतारा, चौबेपुर, शिवराजपुर, बिधनू और भीतरगांव ब्लाक के 200 से अधिक गांवों में 64,65,01, 967 रुपये घोटाले की भेंट चढ़ गए। यह खुलासा सहकारी समितियां एवं पंचायतें विभाग के ऑडिटर्स ने किया। ऑडिट के दौरान प्रधान और पंचायत सचिव कोई हिसाब नहीं दे सके। मांगने के बाद भी उन्होंने बिल, बाउचर और कैशमेमो नहीं दिया। अब डीपीआरओ को रिपोर्ट भेजी गई है और उनसे 60 दिन में जवाब उपलब्ध कराने को कहा गया है।
गांवों के विकास को आने वाले धन में खूब बंदरबांट होती है। वजह, जिला पंचायत राज अधिकारी, खंड विकास अधिकारी व अन्य अफसरों की अनदेखी है। इसका फायदा उठाते हुए प्रधान, ग्राम पंचायत अधिकारी एवं ग्राम्य विकास अधिकारी (सचिव) घोटाले कर रहे हैं। ऑडिटर्स ने अलग-अलग वित्तीय वर्ष में हुए कार्यों का ऑडिट किया। पत्रावलियों में तो खूब विकास हुआ लेकिन विकास कार्य के लिए ईंट व अन्य सामग्री कहां से खरीदी गई इसका कोई लेखा-जोखा नहीं है। ऑडिटरों ने बैंकों से प्रधानों के खाते का विवरण लिया तो पता चला कि किसने कब और कितनी धनराशि खर्च की।
ज्येष्ठ लेखा परीक्षा अधिकारी सुनील कुमार ने भीतरगांव ब्लाक के धमना बुजुर्ग, सूलपुर, हसपुर, भीतरगांव, गूंजा, बैजूपुर, बरीगांव, बेहटा गंभीरपुर समेत 56 गांवों का ऑडिट किया है। वहीं, सहायक लेखा परीक्षा अधिकारी प्रमोद कुमार ने पतारा ब्लाक के छाजा, हथेई, भदेवना, बम्बुराहा, सहलुरती, गिरसी समेत 24 गांवों का ऑडिट किया। इसी तरह घाटमपुर, चौबेपुर, शिवराजपुर, बिधनू आदि ब्लाकों के 200 से अधिक गांवों में हुए कार्यों का ऑडिट किया गया। पतारा में वित्तीय वर्ष 2004-05 से 2013-14 के बीच हुए कार्यों का ऑडिट हुआ। इसी तरह अन्य गांवों में भी अलग-अलग वित्तीय वर्ष के कार्यों का ऑडिट किया गया।
क्या कहते हैं अधिकारी
”अगर अनियमितता है तो जो भी दोषी हैं उन पर कार्यवाही होगी। डीपीआरओ से रिपोर्ट मंगाकर देखेंगे।
– अरुण कुमार, सीडीओ
”ऑडिट में गबन पकड़ा गया है। डीपीआरओ को रिपोर्ट भेजी गई है। 64 करोड़ रुपये से अधिक का गबन है।
– शिवपाल हंस, प्रभारी सहायक लेखा परीक्षा अधिकारी

धर्म के धंधे में मीडिया भी है पूरी तरह सहभागी

धर्म के धंधे में नेताओं के साथ-साथ मीडिया भी पूरी तरह सहभागी था, सहभागी है और आगे भी पता नहीं कब तक सहभागी रहेगा क्‍योंकि मीडिया ने अपने गिरेबान में झांकने की जरूरत अब भी महसूस नहीं की है। हालांकि हरियाणा के बवाल में मीडिया डेरा समर्थकों के निशाने पर रहा लेकिन लगता नहीं कि उससे मीडिया ने कोई सबक सीखा हो।
डेरा सच्‍चा सौदा प्रमुख बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह इंसा को दो साध्‍वियों के साथ दुराचार के मामले में 20 साल की सजा हो गई। दुराचार के ही मामले में आसाराम बापू सलाखों के पीछे है। हरियाणा का ही एक अन्‍य कथित संत रामपाल भी जेल में बंद है। नित्‍यानंद तथा भीमानंद जैसे दुष्‍कर्मियों के केस फिलहाल अदालतों में लंबित हैं।
दुराचार के आरोपी रहे कृपालु महाराज अब इस दुनिया में नहीं हैं। देश ही नहीं, देश के बाहर तक महिला यौन उत्‍पीड़न के आरोपी रहे कृपालु महाराज की त्रिनिदाद एण्‍ड टोबेगो में गिरफ्तारी भी हुई थी।
कृपालु महाराज के शिष्‍य प्रकाशानंद को यौन उत्‍पीड़न के केसों में दोषी ठहराए जाने के बाद अमरीकी पुलिस आज तक तलाश रही है।
”कृपालु महाराज” का यह शिष्‍य दरअसल दो युवा लड़कियों का यौन उत्‍पीड़न करने के मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद अमरीकी अदालत को चकमा देकर भाग खड़ा हुआ। प्रकाशानंद को टेक्सास की हेज काउन्टी ज्यूरी द्वारा 14 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई थी।
इस्लामिक उपदेशक जाकिर नाइक धर्म की आड़ में किस तरह लोगों को आतंकवाद के लिए प्रेरित करता था और किस तरह उसने धर्म को धंधा बनाकर बेहिसाब संपत्ति अर्जित कर ली, इसका भी खुलासा हो चुका है और अब वह कानून की गिरफ्त में है।
इस्‍लामिक रिसर्च फांउडेशन की आड़ में वह क्‍या रिसर्च कर रहा था, इसकी पोल तब खुली जब बांग्‍लादेश में पकड़े गए आतंकियों ने बताया कि वह जाकिर नाइक के उपदेशों से प्रेरित थे।
ईसाई धर्म में भी अंधश्रद्धा और पाखंड की भरमार है। विभिन्‍न ईसाई धर्मगुरुओं पर उनके क्रिया-कलापों को लेकर उंगलियां उठती रही हैं। भारत को अपना कार्यक्षेत्र बनाने वाली नन मदर टेरेसा भी पूरी तरह निर्विवाद नहीं रहीं।
स्‍वर्ण मंदिर पर हुए ऑपरेशन ब्‍ल्यू स्‍टार में मारा गया आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाला भी खुद को ताजिंदगी बतौर सिख धर्मगुरू पेश करता रहा। मंदिर को वह अपना अड्डा भी सिख धर्म की आड़ लेकर बना पाया।
दिव्‍य पाठ और अपने बीज मंत्रों से लोगों की असाध्‍य बीमारियों को ठीक करने तथा जीवन के हर क्षेत्र में असफल रहने वाले लोगों को सफलता दिलाने का दावा करने वाला ”कुमार स्‍वामी” भी भले ही अभी कानून की पकड़ से दूर हो लेकिन गतिविधियां उसकी भी पूरी तरह संदिग्‍ध हैं।
बाबा जयगुरुदेव भी धर्मगुरुओं की ऐसी ही फेहरिस्‍त का हिस्‍सा था जिसने अपने अंधभक्‍तों को सतयुग आने का सपना दिखाकर अरबों की संपत्‍ति इकठ्ठी की। यह बात अलग है कि न सिर्फ बाबा जयगुरुदेव की संदिग्‍ध मौत हुई बल्‍कि उसके अनुयाई आज उसकी विरासत के लिए एक-दूसरे की जान के दुश्‍मन बने हुए हैं।
बाबा जयगुरुदेव द्वारा हड़पी गई सरकारी और गैर सरकारी जमीन से बाबा के अनुयायियों को बेदखल करने के लिए अब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़े आदेश जारी किए हैं।
280 एकड़ में फैले सरकारी उद्यान विभाग को हड़पने की कोशिश में जयगुरुदेव के ही कथित शिष्‍य रामवृक्ष यादव ने किस तरह यहां खूनी खेल खेला और किस तरह दो पुलिस अधिकारियों की निर्मम हत्‍या कर दी, यह सर्वविदित है।
ये पुलिस अधिकारी भी कोर्ट के आदेश पर उद्यान विभाग से रामवृक्ष और उसके गुर्गों को बेदखल करने पहुंचे थे।
ऐसे सभी मामलों में इस बात की पुष्‍टि कदम-कदम पर हुई कि इनके सरगनाओं को राजनीतिक संरक्षण प्राप्‍त था और राजनीतिक संरक्षण के चलते प्रशासन इनके सामने हाथ बांधे खड़ा रहा। वोट बैंक की राजनीति ने नेताओं को इनके सामने नतमस्‍तक रखने पर मजबूर किया।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि राजनीति के संरक्षण से धर्म को धंधा बनाने वालों का एक लंबा इतिहास है और हर दौर में धर्म के धंधेबाज सक्रिय रहे हैं। इनके तौर-तरीके अलग-अलग हो सकते हैं किंतु मकसद सबका अधिक से अधिक दौलत एवं शौहरत बटोरना रहा।
लेकिन ऐसे सभी मामलों में एक सवाल हमेशा अनुत्तरित रह जाता है, और वह सवाल यह है कि धर्म के धंधेबाजों की हवस को परवान चढ़ाने में क्‍या मीडिया की कोई भूमिका नहीं है ?
क्‍या मीडिया उतना ही निष्‍पक्ष है जितना कि वह खुद को तब दिखाने की कोशिश करता है जब किसी कथित धार्मिक गुरू का काला चिठ्ठा सार्वजनिक होता है अथवा वो कानून के शिकंजे में फंसकर सलाखों के पीछे जाता है ?
सच तो यह है कि मीडिया सिर्फ सुर्खियां बटोरता है, अन्‍यथा वह धर्म के हर धंधेबाज को बुलंदियों तक पहुंचाने में पूरा सहयोग करता रहा है और अब भी कर रहा है।
इस दौर के मीडिया पर पूरी तरह बिकाऊ होने का ठप्पा आमजन यूं ही नहीं लगाने लगा। उसके पीछे ठोस वजह है।
किसी भी किस्‍म के मीडिया को देख लें। विज्ञापन के जरिए पैसा उगाहने की खातिर मीडिया जगत हर स्‍तर तक गिरने को बेताब रहता है। एक ओर वह सबकुछ जानते व समझते हुए भी विभिन्‍न उत्‍पादों के फर्जी दावों वाले विज्ञापन प्रकाशित व प्रसारित करता है तो वहीं दूसरी ओर धर्म को ”धंधे की तरह” ग्‍लैमराइज करके परोसने से भी कोई परहेज नहीं करता। मीडिया भली-भांति जानता है कि अंडरगारमेंट्स से लेकर परफ्यूम तक और तेल व साबुन से लेकर मिर्च-मसालों तक के विज्ञापनों में उनके दावों का सच्‍चाई से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है परंतु वह फिर भी दिन-रात उनका प्रसारण कर रहा है क्‍योंकि उसे विज्ञापनों के भ्रमजाल से नहीं, अपनी कमाई से मतलब है। यही कारण है कि जिस किसी उत्‍पाद को जब कभी परखा गया है, तब उसके बारे में किया गया हर दावा फर्जी साबित हुआ है।
रियल एस्‍टेट के कारोबार में आज बड़ी-बड़ी नामचीन कंपनियों का सामने आ रहा फर्जीवाड़ा क्‍या मीडिया की सहभागिता के बिना हो गया। मीडिया ने बिना किसी छानबीन के उनके विज्ञापन प्रकाशित व प्रसारित नहीं किए होते तो निश्‍चित ही इतनी बड़ी संख्‍या में लोग रियल एस्‍टेट कंपनियों के फ्रॉड का शिकार नहीं बनते। आज जिन बातों को लेकर कोर्ट उनके खिलाफ आदेश-निर्देश दे रहा है, यदि उनकी असलियत विज्ञापन निकालने से पहले पता कर ली होती तो अनेक लोग धोखाधड़ी का शिकार होने से बच सकते थे।
बात चाहे तंत्र-मंत्र के माध्‍यम से किसी महिला का प्‍यार दिलाने के दावेदार सड़क छाप बाबा बंगाली के विज्ञापन की हो अथवा मसाज पॉर्लर से हजारों रुपए रोज की कमाई कराने वाले विज्ञापन की, मोबाइल टावर लगवाने जैसी धोखाधड़ी के लिए विज्ञापन कराने की हो या फिर रंगीन मिजाज लोगों के लिए अश्‍लील बातें कराने के प्रचार-प्रसार की, मीडिया को किसी से गुरेज नहीं है। उसे गुरेज है तो इस बात से कि उसका धंधा न छिन जाए। बाकी तो पैसा देकर कोई कुछ भी प्रकाशित व प्रसारित कराने के लिए स्‍वतंत्र है।
कुमार स्‍वामी के शत-प्रतिशत झूठे दावों को लाखों रुपए लेकर जैकेट पेज विज्ञावन के रूप में प्रकाशित करने का काम भी मीडिया करता है और निर्मल बाबा द्वारा समौसे व चटनी से कैसी भी समस्‍या का समाधान कराने जैसे सोकॉल्‍ड सत्संगों को टीवी पर मीडिया ही दिखाता है।
आसाराम बापू की सारी सच्‍चाई सामने आ जाने के बावजूद उसके प्रवचनों को विज्ञापन बनाकर अब भी मीडिया लाखों रुपए की कमाई कर रहा है और विभिन्‍न तरीकों से तंत्र-मंत्र की दुकानें भी टीवी पर मीडिया ही चलवा रहा है।
शायद ही ऐसा कोई ‘फ्रॉड’ हो जिसमें विज्ञापन के माध्‍यम से मीडिया सहभागी न रहता हो लेकिन जब बात आती है उसे जिम्‍मेदार ठहराने की तो कहीं किसी कॉर्नर में एक छोटा सा डिस्‍क्‍लेमर देकर वह अपनी जिम्‍मेदारी पूरी कर लेता है।
पंचकूला की विशेष सीबीआई कोर्ट से गुरमीत राम-रहीम के खिलाफ आए निर्णय को मीडिया भले ही आज सुर्खियां बना रहा है और बोर करने की हद तक दिन-रात परोस रहा है किंतु कल यदि उसके कथित चमत्‍कारों का विज्ञापन मिलने लगेगा तो यही मीडिया उसे दिखाने में कोई परहेज, कोई शर्मिंदगी महसूस नहीं करेगा। कहीं किसी कोने में ”विज्ञापन” लिखकर वह डेरा सच्‍चा सौदा से लाखों रुपए कमाता रहेगा और अपनी दुकान उसी तरह पूरी बेशर्मी के साथ चलाऐगा जैसे कि कल तक राम-रहीम या आसाराम चलाता था। जिस तरह कृपालु की संस्‍था आज भी चला रही है और जिस तरह कुमार स्‍वामी भी अब तक चला रहा है।
सच पूछें तो कोई फर्क नहीं है ऐसे धर्म गुरुओं, व्‍यापारियों, कारोबारियों, नेताओं या मीडिया घरानों में। सबकी दुकानें एक-दूसरे के सहयोग से चलती हैं और शायद आगे भी चलती रहेंगी। कभी किसी कोर्ट का आदेश ज्‍वार-भाटा की तरह मीडिया की टीआरपी बढ़ाने के काम जरूर आ जाता है लेकिन जैसे ही उसका गुबार ठंडा होता है सब अपने-अपने धंधे में लग जाते हैं।
चार दिन ठहर जाइए, गुरमीत राम-रहीम की खबरें भी सिकुड़ कर सिर्फ सिंगल कॉलम और टिकर व फुटर पर चलने वाली पट्टियों तक सीमित रह जाएंगी।
ये बात अलग है कि निर्मल बाबा के समौसे, आसाराम के प्रवचन, कृपालु की कथाएं तथा राधे मां का ग्‍लैमरस धर्म, विज्ञापन के रूप में हमेशा मीडिया का हिस्‍सा बना रहेगा क्‍योंकि यहां भी सवाल धंधे का जो है। फिर धंधा चाहे धर्म का हो या अधर्म का, धंधा तो धंधा है। कीचड़ में पूरी तरह लिप्‍त रहकर कमल खिलाने की कला सिर्फ राजनीतिक पार्टियां ही नहीं जानतीं, मीडिया भी जानता है, और वह उसी कला का बखूबी इस्‍तेमाल कर रहा है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...