शुक्रवार, 8 जून 2018

खौफनाक नकाब लगाकर देश को डराने वालों का डर!

हिंदी साहित्य के पुरोधा महावीरप्रसाद द्विवेदी का पत्रकारिता के क्षेत्र में भी बहुत बड़ा योगदान है। हिंदी पत्रकारिता जगत में नींव के पत्थर ‘आज’ व ‘ प्रताप’ जैसे अखबारों के संपादक बाबूराव विष्णु पराड़कर व गणेश शंकर विद्यार्थी ने भी महावीर प्रसाद द्विवेदी से प्रेरणा पाकर पत्रकारिता जगत में प्रवेश किया था।
आचार्य द्विवेदी से गणेश शंकर विद्यार्थी किस कदर प्रभावित थे, इसका अंदाज उनके द्वारा कानपुर में स्‍थापित किए गए अखबार ‘प्रताप’ के प्रथम पृष्‍ठ पर छापी जाने वाली कविता की दो शुरूआती लाइनों से मिलता है।
आचार्य द्विवेदी की यह कविता थी-
‘जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है, 
वह नर नहीं नर पशु निरा है और मृतक समान है।’ 
आचार्य द्विवेदी यदि आज जिंदा होते तो उनके ऊपर दक्षिणपंथी विचारधारा को पोषित करने का आरोप लगाया जा चुका होता। हो सकता है कि आचार्य द्विवेदी को “छद्म राष्‍ट्रवादी” और यहां तक कि “मोदी भक्‍त” की उपमा भी दे दी जाती क्‍योंकि उनकी कविता ”राष्‍ट्रभक्‍ति” के लिए प्रेरित करती है।
2014 में प्रधानमंत्री के पद पर नरेन्‍द्र दामोदरदास मोदी का चुनाव एक वर्ग विशेष के लिए इतना बड़ा सदमा था जिससे वह हर हाल में उबरना चाहते हैं। फिर चाहे उसके लिए किसी भी हद तक गिरना पड़े।
याद कीजिए कांग्रेस के कद्दावर नेता और उस समय घोषित रूप से गांधी परिवार की नाक के बाल मणिशंकर अय्यर का वह वक्‍तव्‍य जिसमें उन्‍होंने एक प्रकार का ऐलान करते हुए कहा था कि एक चाय बेचने वाला कभी भारत का प्रधानमंत्री नहीं बन सकता। हां, चुनाव बाद यदि वह चाहे तो कांग्रेस मुख्‍यालय के बाहर चाय बेच सकता है।
ऐसे में जब एक चाय बेचने वाला प्रधानमंत्री बन गया तो सदमा लगना स्‍वाभाविक था।
यही कारण रहा कि 2014 से पहले पूरे दस साल तक पाकिस्‍तान के साथ बातचीत की ”वकालत” करने वाले कांग्रेसियों ने मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में तमाम देशों के साथ पाकिस्‍तान को भी निमंत्रण देने का विरोध किया।
दरअसल, यह तो शुरूआत थी। इसके बाद लगातार ऐसे-ऐसे मुद्दे उठाए जाते रहे जिनका आम जनता से दूर-दूर तक कोई वास्‍ता नहीं था। यहां तक कि नेशनल हेराल्‍ड केस में कोर्ट के आदेश को भी राजनीतिक विद्वेष बताकर कई दिनों तक संसद की कार्यवाही बाधित की गई।
इसके बाद ललित मोदी प्रकरण, विजय माल्‍या, सर्जीकल स्‍ट्राइक से लेकर आपराधिक घटनाओं तक के लिए मोदी को निशाना बनाया गया।
कभी सम्‍मान वापसी अभियान चलाया गया तो कभी जेएनयू के छुटभैये छात्र नेताओं का सहारा लिया गया। कभी हार्दिक की आड़ लेकर पटेल आंदोलन को हवा दिलाई गई तो कभी जिग्‍नेश मेवाणी और अल्‍पेश ठाकोर को मोहरा बनाया गया।
इस दौरान नोटबंदी और जीएसटी पर हंगामा खड़ा किया गया और देशभर में मोदी को खलनायक साबित करने का अथक प्रयास किया गया।
अब जबकि किसी भी तरह सदमे से उबरने में सफलता नहीं मिली तो पहले कुछ कथित ईसाई धर्मगुरुओं से चिठ्ठियां लिखवा दीं, और फिर एक लंबे अरसे से हाशिए पर पड़ी अरुंधति राय का इंटरव्‍यू ले आए।
अरुंधति राय ने एक सवाल के जवाब में कहा मोदी सरकार में जो चीज़ें घटित हो रही हैं वो डराने वाली हैं। उन्‍होंने यह नहीं बताया कि वह खुद कितनी डरी हुई हैं।
अरुंधति राय से पहले भी उंगलियों पर गिने जाने लायक कुछ लोगों ने कहा कि देश में डर का माहौल है।
अभिनेता आमिर खान ने इस माहौल का बयान करने के लिए अपनी बेगम को बलि का बकरा बनाया। हालांकि बाद में वह अपनी बेगम के डर का कारण बता पाने में असमर्थ रहे और मीडिया के सिर ठीकरा फोड़कर दबी जुबान में ”सॉरी” बोल दिया।
अरुंधति ने कहा, ”अगर भारत में आज के हालात देखें तो मुस्लिम समुदाय को अलग-थलग किया जा रहा है। सड़कों पर लोगों को घेर कर मार दिया जा रहा है। मुसलमानों को आर्थिक गतिविधियों से अलग किया जा रहा है। मांस के कारोबार, चमड़े के काम और हथकरघा उद्योग सब पर हमले किए गए हैं।” अरुंधति के अनुसार ”भारत में हिंसा की वारदातें डराने वाली हैं।
बेहतर होता कि अरुंधति यह सब बोलने से पहले कभी बांगलादेश की निष्‍कासित लेखिका तस्‍लीमा नसरीन से यह पूछ लेतीं कि उन्‍हें मोदीराज में डर क्‍यों नहीं लग रहा। वो तो अरुंधति की हमपेशा होने के साथ-साथ मुस्‍लिम भी हैं, और महिला भी।
आपराधिक वारदातें किसी के प्रति हों और कहीं भी हों, उनकी निंदा की जानी चाहिए किंतु उनका इस्‍तेमाल अपनी घटिया मानसिकता को पोषित करने तथा देश में जबरन भय का वातावरण तैयार करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
अरुंधति जैसी महिला को तो यह सब बोलने का इसलिए भी कोई अधिकार नहीं है क्‍योंकि वह तो कश्‍मीर को भारत से अलग करने की हिमायत कर ही चुकी हैं।
न्‍यायालय द्वारा सबक सिखाए जाने के बाद भी उनका अनर्गल प्रलाप करना यह साबित करता है कि वह आदतन देशद्रोही हैं और देश को किसी न किसी माध्‍यम से बदनाम करना उनकी मुहिम का हिस्‍सा है।
सच तो यह है कि अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता के नाम पर देश की संवैधानिक संस्‍थाओं, लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍थाओं, सेना व सुरक्षाबलों सहित मोदी सरकार और यहां तक कि न्‍यायपालिकाओं के निर्णयों पर सवाल उठाकर देश को बदनाम करने का बाकायदा एजेंडा चलाया जा रहा है।
इसी एजेंडे के तहत कथित डरे हुए लोग मोदी को पानी पी-पीकर कोसते हैं और प्रधानमंत्री के प्रति अभद्र भाषा का इस्‍तेमाल करते हैं।
कैसा है आखिर ये डर, और कैसे हैं ये डरे हुए लोग जो खुद मुस्‍कुराते हुए टीवी चैनलों पर आते हैं, मीडिया को इंटरव्‍यू देते हैं, इंटरव्‍यू में देश के प्रधानमंत्री को नीच बताते हैं और सेना के खून की दलाली करने वाला कहते हैं।
क्‍या कोई डरा हुआ आदमी देश के प्रधानमंत्री को मंच पर चढ़कर खुलेआम गालियां दे सकता है। क्‍या किसी डरी हुई कौम का कोई नुमाइंदा (अकबरुद्दीन औवेसी) 15 मिनट मिलने पर सार्वजनिक रूप से देश के बहुसंख्‍यकों को नेस्‍तनाबूद करने की धमकी दे सकता है।
यह कैसा डर है भाई, जो सबको डराता है सिवाय उनके जो देश में डर का माहौल होने की बात करते हैं और राष्‍ट्रीय टीवी चैनल्‍स पर देश के प्रधानमंत्री को खुलेआम गरियाते हैं।
चेहरे पर नकाब चढ़ाकर जोर-जोर से चीखने-चिल्‍लाने वाले जब कहते हैं कि देश में भय का वातावरण है तो उनका षडयंत्र हर किसी को समझ में आता है।
समझ में आता है कि क्‍यों कुछ दल लामबंद होकर मतपत्रों के जरिए मतदान करने की बात करते हैं। क्‍यों वो उस युग में लौट जाना चाहते हैं जब ”बूथ कैप्‍चरिंग” आम बात हुआ करती थी।
खूब समझ में आता है कि आधी-आधी रात को दोषसिद्ध आतंकवादी के लिए सुप्रीम कोर्ट खुलवाने वाले तत्‍व ही पांच न्‍यायाधीशों की व्‍यक्‍तिगत प्रॉब्‍लम को समूची न्‍यायव्‍यवस्‍था पर खतरा बताने का दुष्‍प्रचार करते हैं।
क्‍यों सेना की सर्जीकल स्‍ट्राइक पर संदेह उत्‍पन्‍न किया जाता है और क्‍यों बार-बार निर्वाचन आयोग पर उंगली उठाई जाती है।
अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता के ये कैसे हिमायती हैं जो एक पूर्व राष्‍ट्रपति द्वारा आरएसएस का निमंत्रण स्‍वीकार कर लेने पर सिर्फ इसलिए छाती पीटने लगते हैं कि कभी वह कांग्रेस के हिस्‍से हुआ करते थे।
क्‍या इनमें से कोई बता सकता है कि पूर्व राष्‍ट्रपति प्रणब मुखर्जी के लिए अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता के मायने उन्‍होंने अलग गढ़ रखे हैं और अपने लिए अलग।
सच तो यह है कि अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता के हक का जितना दुरुपयोग मोदी सरकार के रहते हो रहा है, उतना पहले कभी नहीं हुआ। अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता का हक किसी को खुलेआम गाली देने, निराधार आरोपित करने अथवा देश में एक सुनियोजित साजिश के तहत भय का वातावरण बनाने के लिए नहीं मिला है। अपनी बात शालीनता के साथ कहने के लिए मिला है।
इस सबके बावजूद अरुंधति राय या उनके जैसे दूसरे लोगों को, संस्‍थाओं को अथवा वर्ग विशेष को यह लगता है कि मोदी सरकार में डर का माहौल है तो देशवासी होने के नाते पहले वह यह बताएं कि इस कथित डर को दूर करने के लिए उन्‍होंने क्‍या किया या वो क्‍या कर रहे हैं।
भारत ही क्‍या दुनिया के किसी भी देश में वहां के नागरिकों को कोई अधिकार सिर्फ इसलिए प्राप्‍त नहीं होता कि वह उस अधिकार का निजी हित में तो भरपूर इस्‍तेमाल करे किंतु जनता के बीच उसका जितना संभव हो दुरुपयोग करता रहे। वो भी इसलिए क्‍योंकि कुछ तत्‍व मोदी विरोधी बकवास को भी लपकने के लिए हमेशा तैयार बैठे रहते हैं।
करोड़ों रुपए कमाकर सभी सुख-सुविधाओं से लैस ये डराने वाले लोग जब देश में डर का माहौल होने की बात करते हैं तो ऐसा लगता है जैसे कोई रावण एकबार फिर लक्ष्‍मण रेखा लांघकर देश के सतीत्‍व का हरण करने की कोशिश कर रहा है।
इन रावणों को समय रहते यह समझ लेना चाहिए कि लक्ष्‍मण रेखा लांघना हर युग में आत्‍मघाती साबित हुआ है। फिर वह युग मोदी का ही क्‍यों न हो।
लोकतंत्र में सरकार को कठघरे के अंदर खड़ा करने का हक सबको है किंतु देश को बदनाम करने का हक किसी को नहीं।
महावीरप्रसाद द्विवेदी के अनुसार ऐसा करने वाले नर के रूप में पशु और मुर्दे के समान हैं। शायद अब ऐसे मुर्दों को उनकी उचित जगह दिखाने का समय आ गया है क्‍योंकि उनसे निज गौरव व निज देश पर अभिमान करने की उम्‍मीद लगाना व्‍यर्थ है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

बुधवार, 30 मई 2018

पत्रकारिता दिवस पर विशेष: गाली बन चुके गलीज़ धंधे का सच!

आज हिंदी पत्रकारिता दिवस है। इस वर्ष के पत्रकारिता दिवस का महत्‍व इसलिए और बढ़ जाता है क्‍योंकि इन दिनों राजनीति के साथ-साथ पत्रकारिता भी विभिन्‍न कारणों से विमर्श के केंद्र में है। हाल ही में ”कोबरा पोस्‍ट” द्वारा किए गए एक स्‍टिंग ऑपरेशन ने इस विमर्श को ज्‍वलंत बना दिया है।
कोबरा पोस्‍ट के स्‍टिंग में कितना दम है, यह तो फिलहाल जांच का विषय है किंतु इतना तय है कि सबके ऊपर उंगली उठाने वाले मीडिया की अपनी तीन उंगलियां खुद उसके ऊपर उठी हुई हैं।
यहां बात केवल मीडिया के बिकाऊ होने की नहीं है, बात लोकतंत्र के उस अस्‍तित्‍व की है जिसका एक मजबूत पिलर मीडिया खुद को मानता है। अब इस मजबूत पिलर की बुनियाद हर स्‍तर पर खोखली होती दिखाई दे रही है।
खबरों के नाम पर सारे-सारे दिन बासी व उबाऊ कंटेन्‍ट परोसना और बेतुके विषयों पर बेहूदों लोगों को बैठाकर सातों दिन डिस्‍कशन कराने के अतिरिक्‍त मीडिया के पास जैसे कुछ रह ही नहीं गया।
आश्‍चर्य की बात तो यह है कि डिस्‍कशन का विषय चाहे कुछ भी हो, पैनल में चंद रटे-रटाये चेहरे प्रत्‍येक टीवी चैनल पर देखे जा सकते हैं। बहस का विषय भले ही बदलता रहता हो किंतु चेहरे नहीं बदलते।
क्‍या सवा सौ करोड़ की आबादी वाले इस देश में मात्र कुछ दर्जन लोगों को ही वो ज्ञान प्राप्‍त है जिसके बूते वह खेत से लेकर खलिहान तक और आकाश से लेकर पाताल तक के विषय पर चर्चा कर लेते हैं।
राजनीति, कूटनीति, रणनीति, विदेशनीति व अर्थनीति ही नहीं…धर्म, जाति और संप्रदाय जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी बहस के बीच वही चंद चेहरे बैठे मिलते हैं।
तथाकथित सभ्‍य समाज से ताल्‍लुक रखने वाले ये लोग जब बहस का हिस्‍सा बनते हैं तो यह पता लगते देर नहीं लगती कि कहीं न कहीं उनके डीएनए में खोट जरूर है।
पिछले कुछ समय से टीवी चैनल्‍स पर आने वाली डिबेट्स का स्‍तर देखकर कोई भी अंदाज लगा सकता है कि इन सो-कॉल्‍ड विशेषज्ञों की असलियत क्‍या होगी।
जाहिर है कि बहस कराने वाले एंकर्स इनसे अलग नहीं रह पाते और वह अब एंपायर या रैफरी की जगह अतिरिक्‍त खिलाड़ी बन जाते हैं। ऐसे में एंकर्स के ऊपर आरोप लगाना पैनल के विशेषज्ञों की आदत का हिस्‍सा बन चुका है। तथाकथित विशेषज्ञ उन्‍हें भी अपने साथ हमाम में नंगा देखना चाहते हैं।
रही बात प्रिंट मीडिया की, तो व्‍यावसायिक प्रतिस्‍पर्धा की अंधी दौड़ में वह भी पतन के रास्‍ते पर चल पड़ा है। विज्ञापन के लिए अख़बार न सिर्फ समाचारों से समझौता करने को तत्‍पर रहते हैं बल्‍कि किसी भी हद तक गिरने को तैयार हैं।
बाकी कोई कसर रह जाती है तो उसे सोशल मीडिया पूरी कर देता है। पत्रकारिता की आड़ में सोशल मीडिया पर आवारा साड़ों का ऐसा झुण्‍ड चौबीसों घंटे विचरण करता है जिसकी नाक में नकेल डालना फिलहाल तो किसी के बस में दिखाई नहीं देता।
तिल का ताड़ और रस्‍सी का सांप बनाने में माहिर ये झुण्‍ड इस कदर बेलगाम है कि टीवी चैनल्‍स ने इनका ”वायरल टेस्‍ट” करने की दुकानें अलग से खोल ली हैं। अब लगभग हर टीवी चैनल पर ऐसी खबरों के ”वायरल टेस्‍ट” की भी खबरें आती हैं।
इन हालातों में सिर्फ पत्रकारिता दिवस मनाने और उसके आयोजन में नेताओं को बुलाकर उनके गले पड़ने से कुछ बदलने वाला नहीं है। सही मायनों में पत्रकारिता दिवस मनाना है तो उस सोच को बदलना होगा जिसने पत्रकारों के साथ-साथ पत्रकारिता को भी तेजी से कलंकित किया है और जिसके कारण आज पत्रकारिता तथा नेतागीरी एकसाथ आ खड़े हुए हैं। जिसके कारण समाज का आम आदमी पत्रकारों को भी उतनी ही हेय दृष्‍टि से देखने लगा है जितनी हेय दृष्‍टि से वह नेताओं को देखता है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शनिवार, 5 मई 2018

टीआरपी के लिए हमारा इतना नीचे गिरना तो बनता है

यदि आपने कभी कतई सड़क छाप लोगों को आपस में लड़ते-भिड़ते और गाली-गलौज करते नहीं देखा-सुना तो यह खबर आपके लिए नहीं है।
यदि आपने कभी किसी को नमक से नमक खाते हुए नहीं देखा, तो भी यह खबर आपके मतलब की नहीं है।
और अगर कभी आपने किसी आदतन अपराधी को कोर्ट में यह दलील देते हुए नहीं पाया कि तमाम लोग अपराध करते हैं इसलिए मैं भी अपराध करता हूं, तो फिर यह खबर आपके किसी काम की नहीं क्‍योंकि यह खबर ऐसे ही लोगों के बारे में है।
उन लोगों के बारे में जो टीवी पर बैठकर सड़क छाप लोगों से भी गई-गुजरी भाषा का इस्‍तेमाल करते हैं। उन्‍हीं लोगों की तरह हर वक्‍त अशिष्‍टता करने पर आमादा रहते हैं।
जो नमक से नमक खाने की कोशिश को जायज ठहराने के साथ-साथ ऐसा करने की लगातार कोशिश भी करते हैं।
जो हर सवाल का हमेशा एक ही जवाब देते हैं कि दूसरों ने ऐसा किया इसलिए हम भी कर रहे हैं, अथवा हमने जो किया वही दूसरे भी कर रहे हैं तो फिर गलत क्‍या किया।
दरअसल, इन दिनों ऐसे तत्‍वों को विभिन्‍न टीवी चैनल पैनल डिस्‍कशन के नाम पर अपना मंच प्रदान करा रहे हैं। जिन्‍ना की तस्‍वीर टांगने जैसा कोई घटिया सा मुद्दा हो या फिर संवैधानिक संस्‍थाओं पर उंगली उठाने जैसा गंभीर मामला ही क्‍यों न हो। घटिया से घटिया और गंभीर से गंभीर मुद्दे पर बहस के लिए टीवी चैनल्‍स के पास कुछ रटे-रटाए चेहरे हैं। यही चेहरे आप हर रोज चीखते-चिल्‍लाते और अपनी असलियत बताते देख सकते हैं। बहस का विषय बेशक हर दिन बदलता हो परंतु बहस में शामिल होने वाले चेहरे कभी नहीं बदलते।
टीवी चैनल्‍स पर कराई जाने वाली बहसों का स्‍तर ऐसा हो गया है कि बहुत से लोग तो टीवी से नफरत करने लगे हैं। जहां तक इनकी पत्रकारिता का सवाल है, तो शायद ही अब कोई ऐसा व्‍यक्‍ति मिले जो इन्‍हें देखते ही समूची पत्रकार बिरादरी को कोसने न लगता हो।
सोशल साइट्स गवाह हैं इस सच्‍चाई की कि लिपे-पुते चेहरे वाले मेल व फीमेल टीवी एंकर्स जो पत्रकार होने का मुगालता भी पाले रहते हैं, उनकी आम छवि कैसी बन चुकी है।
आश्‍चर्य तो यह है कि इनमें से कुछ टीवी एंकर्स खुद को सेलेब्रिटी समझने लगे हैं। उनकी मानें तो लोग उन्‍हें इसलिए ट्रोल करते हैं, पीछा करते हैं, फोटो खींचते हैं और गरियाते भी हैं क्‍योंकि वह बहुत प्रसिद्ध हैं।
इन टीवी एंकर्स की नजर में कुख्‍यात और प्रख्‍यात शायद एक ही शब्‍द है, न कि विरोधाभाषी।
बहरहाल, आप किसी भी मुद्दे पर किसी भी टीवी चैनल की बहस का स्‍तर देख लीजिए। आपको आत्‍मसंतुष्‍टि होगी कि जिस प्रकार नेताओं की कोई जाति नहीं होती या यूं कह लीजिए कि हर नेता की एक ही जाति होती है, उसी प्रकार हर टीवी चैनल की बहस का स्‍तर भी समान होता है।
बहस की बदबू दूर-दूर तक मारक हो इसलिए अब तमाम टीवी चैनल अपने कथित पैनल डिस्‍कशन में पाकिस्‍तानियों तथा कश्‍मीर के अलगाववादियों को भी शामिल करने लगे हैं।
भारतीय टीवी चैनल्‍स की कृपा से पाकिस्‍तानी और उनके सरपरस्‍त चंद कश्‍मीरी सफेदपोश न सिर्फ अपना एजेंडा पूरे विश्‍व को बता जाते हैं बल्‍कि यह भी देख लेते हैं कि हमारे नेता भाषा के स्‍तर पर किस कदर कुत्‍तों के भोंकने से भी नीचे जा पहुंचे हैं।
टीवी चैनल्‍स की मानें तो वह पाकिस्‍तानियों एवं सफेदपोश आतंकवादियों को बहस का हिस्‍सा इसलिए बनाते हैं ताकि देश व देशवासियों को उनकी सोच का पता लग सके और अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता पर भी आंच न आए।
हो सकता है कि बहुत जल्‍द टीवी चैनल्‍स अपने इसी एजेंडे को आगे ले जाने के लिए उन सभी कुख्‍यात आतंकवादियों को भी बहस का हिस्‍सा बनाने लगें जो एक लंबे अरसे से भारत को तोड़ने की कोशिश में लगे हैं क्‍योंकि टीवी चैनल्‍स की नीति के अनुसार उनको भी अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता का उतना ही हक है जितना कि सैनिकों पर पत्‍थर बरसाने वाले कश्‍मीरियों का।
आगे आने वाले समय में अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वछंदता के पक्षधर टीवी चैनल्‍स बलात्‍कारियों को भी बहस का हिस्‍सा बनाने लगें तो कोई आश्‍चर्य नहीं क्‍योंकि बलात्‍कारी भी तो दिखता इंसानों की तरह ही है। वह अंदर से भेड़िया हो तो हो।
किसी भी टीवी चैनल की बहस में शामिल पैनल को देख लीजिए। एक पार्टी का नेता कहेगा कि हमारे शासनकाल में इतने बलात्‍कार नहीं होते थे। आंकड़े गवाह हैं कि हमारे पिछले दस साल के कार्यकाल में बलात्‍कारों की संख्‍या इस शासनकाल में हो रहे बलात्‍कारों से काफी कम थी। इनके चार साला कार्यकाल में हुए बलात्‍कारों की संख्‍या से हमारे साठ साल के शासनकाल में हुए बलात्‍कारों की संख्‍या से तुलना करके देख लीजिए कि इनके बलात्‍कार कितने ऊपर जाएंगे और हमारे बलात्‍कार कितने नीचे थे। मुद्दा कोई भी हो, तुलनात्‍मक अध्‍ययन शुरू हो जाता है और फिर बहस, बहस न होकर तू-तू-मैं-मैं से होती हुई तू कुत्‍ता और तेरा बाप कुत्‍ता तक जा पहुंच जाती है।
कुल मिलाकर टीवी चैनल्‍स के सहयोग से सभी पार्टियां और उनके नेता देश की आंखों में धूल झोंक रहे हैं। टीवी चैनल्‍स से हटते ही ये कभी किसी रेस्‍तरां में तो कभी संसद अथवा विधानसभाओं के गलियारों में एक-दूसरे की पीठ खुजाते देखे जा सकते हैं। इसके लिए बहुत प्रयास नहीं करने पड़ते।
कोई टीवी चैनल हर दिन ताल ठोक रहा है तो कोई दंगल करा रहा है। कोई चक्रव्‍यूह में फंसा रहा है तो कोई मास्‍टर स्‍ट्रोक लगा रहा है। सबके अपने धंधे हैं और सबके अपने फंदे। देश तथा देशवासी जाएं भाड़ में। हम तो अपने धंधे और फंदे के लिए पाकिस्‍तानियों को भी मंच देंगे और उन कश्‍मीरियों को भी जो खाते यहां की हैं लेकिन बजाते पाकिस्‍तानियों की हैं।
हजारों बलात्‍कारियों में से सजा किसी एक आसाराम और एक राम रहीम को ही तो होती है, बाकी तो अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता का मजा लूट रहे हैं। टीआरपी के खेल में देश के साथ बलात्‍कार होता हो तो हो, हम तो सबको मंच देंगे क्‍योंकि हम मीडिया हैं। अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता पर पहला हक हमारा है।
हम जानते हैं कि बलात्‍कार सिर्फ एक शरीर पर ही नहीं होता, आत्‍मा पर भी होता है। बलात किया गया हर कार्य बलात्‍कार की परिभाषा का हिस्‍सा है लेकिन यह ज्ञान दूसरों को बांटने के लिए है, खुद के लिए नहीं।
तीतर-बटेर लड़ाना हमारा पेशा है। ठीक उसी तरह जिस तरह वैश्‍यावृत्ति या देह व्‍यापार। शब्‍दों का फेर हो सकता है परंतु मूल में तो धंधा ही निहित है इसलिए कोई कुछ कहे, हम अपना धंधा जारी रखेंगे।
प्रेस से मीडिया और मीडिया से मीडिएटर का सफर ऐसे ही पूरा नहीं किया। उसके लिए बड़े पापड़ बेले हैं।
अब यदि हमारे प्‍लेटफार्म का उपयोग कोई लड़ने-भिड़ने, गाली-गलौज करने, अपने-अपने कुकर्मों का तुलनात्‍मक अध्‍ययन करने और नमक से नमक खाकर दिखाने की कलाकारी के लिए करता है तो हमें क्‍या।
तीतर-बटेर लड़ाकर, कुत्ते-बिल्‍लियों को भिड़ाकर और गुण्‍डे-मवालियों को बरगलाकर यदि अपना काम चलता है तो बुरा क्‍या है। आत्‍मा सुखी तो परमात्‍मा सुखी। चैनल की टीआरपी के लिए हमारा भी इतना नीचे गिरना तो बनता है।
-Legend News

रविवार, 1 अप्रैल 2018

अपनी ही सरकार से पूर्व विधायक की गुहार: अरबों रुपए मूल्‍य की सरकारी जमीन पर काबिज हैं सफेदपोश भूमाफिया, कुछ कीजिए

मथुरा। भाजपा की टिकट पर दो बार विधायक रहे अजय कुमार पोइया अब अपनी ही सरकार से गुहार लगा रहे हैं कि सफेदपोश भूमाफियाओं ने भगवान श्रीकृष्‍ण की नगरी में अरबों रुपए मूल्‍य की सरकारी जमीन पर कब्‍जा कर रखा है, कुछ कीजिए।
भूमाफियाओं ने ग्राम सभा सराय आजमाबाद, तहसील व जिला मथुरा की बेशकीमती जमीन फर्जी पट्टों के जरिए बेच खाई है। सफेदपोश भूमाफियाओं ने वनखण्‍ड और चारागाह तक को नहीं छोड़ा और राजस्‍व विभाग की मिलीभगत से उनके भी बैनामे तथा रजिस्‍ट्री करा दीं।
लगभग 15 साल से एकतरफा कानूनी लड़ाई लड़ रहे पूर्व विधायक अजय कुमार पोइया को वर्ष 2009 में तब उम्‍मीद की किरण दिखाई दी थी जब राजस्‍व परिषद उत्तर प्रदेश के तत्‍कालीन आयुक्‍त व सचिव संजीव दुबे ने तत्‍कालीन प्रमुख सचिव उत्तर प्रदेश शैलेश कृष्‍ण को बाकायदा पत्र लिखकर यह जमीन सफेदपोश भूमाफियाओं के चंगुल से निकालने और अनियमित आवंटन में शामिल दोषी अधिकारियों व कर्मचारियों सहित लाभान्‍वित व्‍यक्‍तियों के खिलाफ वैधानिक कार्यवाही करने की संस्‍तुति की थी, किंतु नजीता कुछ नहीं निकला।
पूर्व विधायक अजय कुमार पोइया द्वारा इसी महीने में 11 मार्च 2018 को मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ के लिए प्रेषित पत्र के अनुसार शासन के निर्देश पर गठित राजस्‍व परिषद के अधिकारियों की एक टीम ने उनकी शिकायत पर मथुरा में अरबों रुपए मूल्‍य की सरकारी जमीन का बंदरबांट करने की जांच की थी।
जांच कमेटी ने अपनी विस्‍तृत आख्‍या में इस बात की पुष्‍टि की कि बहुमूल्‍य सरकारी जमीन को सफेदपोश भूमाफियाओं ने औने-पौने दाम में बेच दिया है अत: सभी दोषी और लाभान्‍वित व्‍यक्‍तियों को चिन्‍हित कराकर उनके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही की जानी चाहिए।
पूर्व विधायक अजय कुमार पोइया ने मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ को पत्र लिखकर अवगत कराया है कि करीब 15 वर्ष पूर्व उन्‍होंने नेशनल हाईवे नंबर 2 पर स्‍थित गोकुल रेस्‍टोरेंट से लेकर मसानी क्षेत्र तक की इस सरकारी जमीन को मुक्‍त कराने के लिए संघर्ष शुरू किया था किंतु शासन स्‍तर से गठित जांच कमेटी की संस्‍तुति एवं सरकारी निर्देशों के बावजूद जिला प्रशासन ने आज तक कोई कार्यवाही नहीं की है लिहाजा मजबूरीवश उन्‍होंने एक ओर जहां धारा 133 के तहत कार्यवाही प्रारंभ की है वहीं दूसरी ओर इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय की शरण भी ली है। इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय में जनहित याचिका संख्‍या 11824/2010 के रूप में यह लंबित है।
पूर्व विधायक ने मुख्‍यमंत्री को अवगत कराया है कि आपकी सरकार द्वारा भी राजस्‍व विभाग की इस जमीन को मुक्‍त कराने के लिए सूचीबद्ध किया गया है किंतु सफेदपोश भूमाफियाओं के प्रभाव में जिला प्रशासन चुप्‍पी साधे बैठा है।
भाजपा नेता और पूर्व विधायक पोइया के अनुसार पहले नगर पालिका और अब नगर निगम क्षेत्र की इस अति मूल्‍यवान जमीन के फर्जी पट्टे बनाकर श्‍याम पुत्र बदले निवासी सराय आजमाबाद ने स्‍वयं अपने परिजनों तथा दूसरे लोगों के नाम बैनामे करा दिए तथा वनखण्‍ड, चारागाह एवं वृक्षारोपण की जमीन पर भूमाफियाओं का कब्‍जा करा दिया, जो एक राष्‍ट्रद्रोही कृत्‍य है।
इस पूरे प्रकरण का एक आश्‍चर्यजनक पहलू यह है कि भाजपा नेता और पूर्व विधायक अजय कुमार पोइया ने अरबों रुपए मूल्‍य की सरकारी जमीन को अवैध रूप से खुर्द-बुर्द करने का मास्‍टर माइंड जिस श्‍याम पुत्र बदले को बताया है, वह भी भाजपा नेता और पूर्व विधायक श्‍याम अहेरिया हैं। हालांकि श्‍याम अहेरिया पूर्व में समाजवादी पार्टी ज्‍वाइन करके अपने पुत्र को दर्जा प्राप्‍त मंत्री का सुख दिलवा चुके हैं।
अजय पोइया की शिकायत और राजस्‍व विभाग की जांच कमेटी के अनुसार विभागीय अधिकारियों एवं कर्मचारियों की मिलीभगत से कौड़ियों के दाम बेची गई इस बहुमूल्‍य सरकारी जमीन पर फिलहाल होटल ड्यूक पैलेस, होटल विंग्‍सटन के साथ-साथ डॉ. शीला शर्मा मैमोरियल चैरिटेबल ट्रस्‍ट द्वारा संचालित कैंसर हॉस्‍पीटल खड़ा है।
इनके अलावा एक टाट फैक्‍ट्री, मकान, दुकानें, प्‍लॉट्स, अन्‍य फैक्‍ट्रियां, मैरिज होम्‍स, गैस्‍ट हाउसेज तथा दूसरे कई ऐसे प्रमुख होटल भी इन जमीनों पर बन चुके हैं जिनकी रजिस्‍ट्रियां विभिन्‍न नामों से कराई गई थीं।
भूमाफियाओं ने स्‍थानीय सरकारी कर्मचारियों को अपने कारनामे में शामिल करने के लिए मथुरा कलेक्‍ट्रेट कर्मचारी सहकारी गृह निर्माण समिति बनाकर उसके नाम से भी जमीन आवंटित कर दी जबकि इस नाम की कोई समिति लिखा-पढ़ी में है ही नहीं।
यूं भी इस सरकारी जमीन के कई हिस्‍से तो कई-कई बार बिक चुके हैं और उन पर अब मूल खरीदारों की जगह दूसरे लोग काबिज हैं तथा उनके द्वारा स्‍थापित उद्योग व व्‍यापार चल रहे हैं।
अजय कुमार पोइया ने मुख्‍यमंत्री को प्रेषित पत्र के तहत लिखा है कि ऐसे में जबकि प्रदेश एवं केंद्र सरकार की तमाम योजनाओं के लिए भूमि की अत्‍यधिक आवश्‍यकता है और भूमि उपलब्‍ध न होने के कारण इन योजनाओं का क्रियान्‍वयन नहीं हो पा रहा, तब शासन अपनी जमीन को सफेदपोश भूमाफियाओं के कब्‍जे से मुक्‍त कराकर जनहितकारी योजनाएं प्रारंभ कर सकता है अन्‍यथा की स्‍थिति में न्‍यायालय का निर्णय ही अंतिम विकल्‍प रह जाएगा किंतु तब इसका श्रेय सरकार नहीं ले सकेगी।
गौरतलब है कि गोकुल रेस्‍टोरेंट से मसानी तक की यह जमीन आज शहर के पॉश इलाकों में शुमार है क्‍योंकि इस क्षेत्र में न केवल कई अच्‍छे होटल, गेटबंद कॉलोनियां, उद्योग व व्‍यापारिक प्रतिष्‍ठान, मैरिज होम्‍स, हॉस्‍पीटल्‍स, गेस्‍ट हाउस बन चुके हैं।
आज यहां जमीन का सर्किल रेट भी इतना अधिक है कि जनसामान्‍य तो खरीदने का स्‍वप्‍न भी नहीं देख सकता।
मजे की बात यह है कि ग्राम सभा सराय आजमाबाद की अवैध रूप से आवंटित अरबों रुपए मूल्‍य की जमीन पर दुकानों से लेकर मकान और होटलों व अस्‍पतालों से लेकर फैक्‍ट्रियों एवं मैरिज होम्‍स तथा कॉलोनियों तक के निर्माण का नक्‍शा मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के अधिकारी आंखें बंद करके पास करते रहे जबकि राजस्‍व विभाग की टीम वर्ष 2008 में ही अपनी जांच आख्‍या प्रस्‍तुत कर दोषियों एवं लाभार्थियों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही कर जमीन को अवैध कब्‍जे से मुक्‍त कराने की संस्‍तुति कर चुकी थी।
अब देखना यह है कि भूमाफियाओं के खिलाफ सख्‍त कदम उठाने का ढिंढोरा पीटने वाली योगी आदित्‍यनाथ के नेतृत्‍व वाली भाजपा सरकार अपनी ही पार्टी के नेता व पूर्व विधायक अजय पोइया की शिकायत के आधार पर और शासन द्वारा गठित जांच कमेटी की संस्‍तुति के मद्देनजर अपनी ही पार्टी के आरोपी नेता व पूर्व विधायक श्‍याम अहेरिया द्वारा किए गए कारनामे को लेकर क्‍या कदम उठाती है ?
देखना यह भी होगा कि ताकतवर से ताकतवर माफियाओं पर कानून सम्‍मत कार्यवाही करने की बात करने वाली योगी सरकार क्‍या उन लाभार्थियों के खिलाफ कार्यवाही कर अरबों रुपए मूल्‍य की सरकारी जमीन को मुक्‍त करा पाती है जो किसी न किसी स्‍तर पर हर सरकार की नाक के बाल बने रहते हैं और जिनके खिलाफ कार्यवाही करने की हिमाकत करने वाले अधिकारियों को या तो तबादला झेलना पड़ता है या अपनी जान गंवाकर ”जवाहरबाग कांड” का हिस्‍सा बनना पड़ता है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शनिवार, 10 मार्च 2018

क्‍या आप मथुरा के नीरव मोदियों और मेहुल चौकसियों को जानते हैं, नहीं जानते तो जान लें…

बैंक ऑफिशियल्स की सांठगांठ से देश तथा देशवासियों को हजारों करोड़ रुपयों का चूना लगाने वाले नीरव मोदी और मेहुल चौकसी जैसे सफेदपोश फ्रॉड सिर्फ महानगरों में ही नहीं है, ऐसे कई फ्रॉड मथुरा जैसी विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक नगरी में भी हैं।
विश्‍वस्‍त सूत्रों और विभिन्न बैंकों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार मथुरा जनपद में करीब एक दर्जन ऐसे फ्रॉड हैं जिन्‍होंने हजारों करोड़ रुपया लेकर अब तक लौटाने का न तो नाम लिया है और ना ही उनकी इस रकम को लौटाने की कोई मंशा है।
सूत्रों के मुताबिक बैंकों को चूना लगाने वाले स्‍थानीय कारोबारियों में एक ओर जहां रीयल एस्‍टेट से जुड़े कुछ लोग हैं वहीं दूसरी ओर शिक्षा व्‍यवसायी भी शामिल हैं।
इसके अलावा टोंटी कारोबारी, एक नामचीन हॉस्‍पीटल तथा ब्रांडेड आभूषणों के व्‍यापारी ने भी बैंक से लिया हुआ कर्ज नहीं लौटाया है। कई होटल व्‍यवसायी भी बैंकों का पैसा हड़पे बैठे हैं और अब तक संबंधित बैंक ऑफिशियल्स को ऑब्‍लाइज करके काम चलाने में सफल रहे हैं।
बताया जाता है कि मथुरा की एक यूनिवर्सिटी पर ही अकेले सैकड़ों करोड़ का बैंक कर्ज है किंतु उसे कर्ज देने वाली बैंकों के अधिकारी फिलहाल मुंह सिलकर बैठे हैं।
गौरतलब है कि फिलहाल मथुरा जनपद और विशेष तौर पर मथुरा की सीमा में आने वाला नेशनल हाईवे नंबर दो, शिक्षा के क्षेत्र का एक हब बना हुआ है।
इसके अलावा भी मथुरा-भरतपुर रोड, मथुरा-हाथरस-अलीगढ़ रोड, मथुरा-गोवर्धन रोड तथा मथुरा-वृंदावन रोड पर तमाम शिक्षण संस्‍थाएं संचालित हैं।
शिक्षा के व्‍यवसाय में भारी प्रतिस्‍पर्धा के देखते हुए इससे जुड़े लोगों ने अपने संस्‍थानों को आधुनिक बनाने के नाम पर बैंकों से भारी-भरकम कर्ज ले रखा है किंतु उसे लौटाने की कोई नीयत नजर नहीं आती।
सूत्रों की मानें तो इन लोगों ने बैंकों की रकम का भारी दुरुपयोग किया है। यानि जिस काम के लिए कर्ज लिया गया था, वहां न लगाकर मोटा मुनाफा कमाने के लिए रीयल एस्‍टेट में निवेश कर दिया गया क्‍योंकि शिक्षा के क्षेत्र में अवैध वसूली करना आसान नहीं रहा।
रही-सही कसर 2016 में हुई नोटबंदी और फिर 2017 में आए जीएसटी ने पूरी कर दी। इन दोनों बड़े सरकारी कदमों ने काफी हद तक नंबर दो के लेन-देन को प्रभावित किया लिहाजा दोनों ही जगह कर्ज की रकम फंस कर रह गई।
इसी प्रकार रीयल एस्‍टेट के कई बड़े कारोबारियों पर न केवल बैंकों का भारी कर्ज फंसा हुआ है बल्‍कि ये लोग तमाम दूसरे लोगों और निवेशकों का भी मोटा पैसा हड़पे बैठे हैं। पूर्व में एक रीयल एस्‍टेट कारोबारी के यहां तो देनदारों ने काफी हंगामा काटा था और तब जैसे-तैसे इसने कुछ समय की मोहलत देकर अपना पीछा छुड़ाया।
रीयल एस्‍टेट का कारोबार हमेशा से नंबर दो की रकम खपाने में सबसे ऊपर रहा है और इसमें पैसा लगाकर कई लोगों ने बुलंदियों को छुआ भी है, किंतु जब से यह कारोबार सरकार की टेढ़ी नज़र का शिकार हुआ है तब से इसके कारोबारियों की असलियत छन-छन कर सामने आने लगी है।
देश के नामचीन रीयल एस्‍टेट कारोबारियों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा कसा गया शिकंजा यह जानने के लिए पर्याप्‍त है कि किस तरह इन लोगों ने सारी हवा सरकारी पैसों से ही बना रखी थी।
बैंकों से जुड़े सूत्रों के मुताबिक बहुत से #NPA (Non-Performing Asset) मात्र इसलिए खड़े हुए क्‍योंकि कर्ज लेने वालों ने एक बहुत बड़ी रकम कारोबार पर खर्च न करके अपने शौक-मौज पर खर्च की।
यही कारण है कि जिस शहर में कभी कारों की संख्‍या उंगलियों पर गिनी जा सकती थी, आज वहां ऑडी तथा बीएमडब्‍ल्‍यू और मर्सडीज कारों की कोई कमी नहीं है।
बैंकों का पैसा हड़प कर बैठे लोगों की शानो-शौकत का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि ये और इनकी औलादें शॉपिंग के लिए भी अब्रॉड जाती हैं। पारिवारिक काय्रक्रमों में ही नहीं, निजी पार्टियों में भी पानी की तरह पैसा बहाते इन्‍हें आसानी से देखा जा सकता है।
ऋण लेकर घी पीने की मानसिकता वाले ये लोग देश के महानगरों में जाकर तो अय्याशी करते ही हैं, साथ ही अपना उद्देश्‍य पूरा करने के लिए एक-एक लाख रुपए प्रति नाइट वसूलने वाली ‘कॉलगर्ल्‍स’ को भी यहां बुलाते हैं। ये ‘कॉलगर्ल्‍स’ फिर उन लोगों को मुहैया कराई जाती हैं, जिनसे ‘आउट ऑफ द वे’ जाकर काम कराना होता है।
आम आदमी को शायद यह जानकर आश्‍चर्य होगा कि शहर के कुछ सफेदपोश लोग तो सुरा एवं सुंदरी के जरिए मुश्‍किल से मुश्‍किल टास्‍क पूरा करने के विशेषज्ञ बन चुके हैं और ये लोग उस वर्ग की नाक के बाल बने हुए हैं जिसे कथित रूप से शहर की शान माना जाता है। जिनकी तरक्‍की के उदाहरण प्रस्‍तुत किए जाते हैं।
जहां तक सवाल उन बैंकों का है जिनका पैसा ये सफेदपोश फ्रॉड दबाए बैठे हैं तो उनमें स्‍टेट बैंक ऑफ इंडियापंजाब नेशनल बैंकसिंडीकेट बैंक, बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ बड़ोदाइंडियन ओवरसीज बैंकइलाहाबाद बैंकयूनियन बैंकओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स सहित आईसीआईसीआईएचडीएफसी तथा एक्‍सिस बैंक शामिल हैं।
इन बैंक के अधिकारियों की सफेदपोश बेईमानों से सांठगांठ इस कदर है कि बैंक अधिकारी इनके बारे में कोई जानकारी नहीं देते और न यह बताकर देते हैं कि उनका इस जनपद में कुल NPA आखिर है कितना।
अब देखना यह है कि विजय माल्‍या और ललित मोदी के बाद नीरव मोदी, मेहुल चौकसी तथा कोठारी पिता-पुत्रों की कारगुजारियां सामने आने पर भी बैंकें मथुरा के धोखेबाजों पर कब व कितना शिकंजा कसती हैं। कसती भी हैं या उनके भाग जाने का इंतजार करती हैं।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

सोमवार, 26 फ़रवरी 2018

लोकतंत्र के चौथे स्‍तंभ का भ्रष्‍टाचार: कल संपन्‍न हो चुकी बरसाने की ‘लठामार होली’, और आज छप रहा है उसका फुल पेज रंगीन विज्ञापन

मथुरा। केंद्र की राजग सरकार के मुखिया और प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी तथा उत्तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ भ्रष्‍टाचार को लेकर बेशक ‘जीरो टॉलरेंस’ का दम भरते हों, किंतु सच्‍चाई कुछ और ही है।
सच्‍चाई यह है कि ‘भ्रष्‍टतंत्र’ आज भी एक सांठगांठ के तहत पूरी तरह अपनी मनमानी कर रहा है और यह मनमानी हर क्षेत्र में व्‍याप्‍त है। फिर चाहे यह क्षेत्र सबके ऊपर उंगली उठाने वाले ‘मीडिया’ का क्षेत्र ही क्‍यों न हो।
मीडिया और सरकारी विभागों की सांठगांठ से सरकारी खजाने को चूना लगाने का एक उदाहरण तब सामने आया, जब बीते कल 24 फरवरी को संपन्‍न हो चुकी बरसाना की लठामार होली का एक फुल पेज रंगीन विज्ञापन आगरा से प्रकाशित प्रसिद्ध अखबार अमर उजाला में आज देखा गया।
मतलब कि कल बरसाना की होली संपन्‍न हो जाने के एक दिन बाद 25 फरवरी को ‘बरसाना की होली 24 फरवरी के दिन’ मनाए जाने का यह फुल पेज विज्ञापन ‘अमर उजाला’ में आज 19वेंं पेज पर प्रकाशित हुआ है।
यह विज्ञापन उत्तर प्रदेश के पर्यटन विभाग द्वारा प्रकाशित कराया गया है और इसमें कल संपन्‍न हो चुके सभी कार्यक्रमों की उसी प्रकार सूचना दी गई है जिस प्रकार पूर्व में प्रकाशित इसी प्रकार के दूसरे विज्ञापनों में दी जा चुकी थी।
आगरा परिक्षेत्र में सर्वाधिक प्रसार वाले ‘अमर उजाला’ के इस फुल पेज रंगीन विज्ञापन की कीमत का अंदाज अमर उजाला के विज्ञापन टैरिफ से लगाया जा सकता है।
जाहिर है कि यह विज्ञापन लाखों रुपए का होगा और चूंकि यह ‘डीएवीपी’ की ओर से नहीं दिया गया है लिहाजा इसके पैसे भी कॉमर्शियल एड टैरिफ के मुताबिक ही वसूले गए होंगे।
गौरतलब है कि विज्ञापनों के जरिए मनमाने तरीके से प्रचार प्रसार करने पर राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्‍ली की अरविंद केजरीवाल के नेतृत्‍व वाली आम आदमी पार्टी की सरकार अब तक सवालों के घेरे में है क्‍योंकि सरकारी विज्ञापनों पर आने वाले भारी-भरकम खर्च का भुगतान भी सरकारें जनता की गाढ़ी कमाई के पैसों से करती हैं।
ऐसे में यह सवाल उठना स्‍वाभाविक है कि एक दिन पहले संपन्‍न हो चुकी बरसाना की विश्‍व प्रसिद्ध लठामार होली का फुल पेज रंगीन विज्ञापन आज क्‍या पर्यटन विभाग से ‘सांठगांठ’ के बिना छप पाना संभव है।
वैसे यह तो एक उदाहरण भर है, क्‍योंकि सरकारी मुलाजिमों की मिली भगत से अखबारों के मालिकान सरकारी खजाने को भरपूर चूना पहले भी लगाते रहे हैं।
देखने की बात बस इतनी है कि क्‍या योगी राज में भी अखबार मालिकों और सरकारी विभागों की बड़े-बड़े विज्ञापनों के लिए चल रही सांठगांठ जारी रहेगी और क्‍या सरकारी पैसे का दुरुपयोग होता रहेगा।
कोई भी सामान्‍य व्‍यक्‍ति इस बात से भली-भांति वाकिफ होगा कि सरकारी खजाने से एक रुपया तक निकलवाना कितना दुरूह काम है, फिर चाहे वह पैसा उस व्‍यक्‍ति का अपना ही क्‍यों न हो, लेकिन यदि सांठगांठ कर रखी हो तो लाखों रुपए भी हड़पे जा सकते हैं।
कुल मिलाकर यह कहना मुनासिब होगा कि केवल नीरव मोदी, मेहुल चौकसी, विक्रम कोठारी और राहुल कोठारी जैसे उद्योगपति और व्‍यापारी ही सरकारों को खोखला नहीं कर रहे, उनकी दिन-रात खबरें दिखाने वाले मीडिया समूह भी सरकारी खजाने को चट कर रहे हैं।
आश्‍चर्य की बात यह भी है कि ईमानदार सरकारों को मीडिया में व्‍याप्‍त इस तरह का भ्रष्‍टाचार क्‍यों दिखाई नहीं देता जबकि मीडिया द्वारा किया जाने वाला भ्रष्‍टाचार इसलिए कहीं अधिक गंभीर हो जाता है क्‍योंकि उसके ऊपर सबका ‘छिद्रान्‍वेषण’ करने की जिम्मेदारी है और वह लोकतंत्र का कथित रूप से ही सही, लेकिन चौथा स्‍तंभ तो है ही।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

ब्रज होली रसोत्‍सव: वाह माननीय वाह…यमुना प्रदूषण का ठीकरा ब्रजवासियों के सिर, और नाच-गाने कराकर कथित विकास का श्रेय खुद को



मथुरा। घोषणा के साथ ही विवादों में घिरे अपने कार्यक्रम ‘ब्रज होली रसोत्‍सव’ पर सफाई देने के लिए मीडिया के सामने आईं मथुरा की सांसद और सिने अभिनेत्री हेमा मालिनी ने यमुना के प्रदूषण मुक्‍त न हो पाने का ठीकरा भी मथुरा के ही लोगों के सिर फोड़ने की कोशिश तो की परंतु कार्यक्रम को लेकर उठ रहे सवालों का कोई जवाब अंत तक नहीं दिया।
प्रेस कांफ्रेंस की शुरूआत ही हेमा मालिनी ने यह कहते हुए की कि मैं जब से मथुरा की सांसद बनी हूं तब से मैंने बहुत सारे काम तो किए ही हैं, उसके साथ-साथ कल्‍चरल प्रोग्राम को भी बढ़ावा दिया है क्‍योंकि मैं बेसिकली एक आर्टिस्‍ट हूं।
एक कलाकार होने के नाते जब मैं मुंबई जाती हूं तो हमारे कलाकार मित्र हमेशा मुझसे कहते हैं कि आप मथुरा की सांसद हैं, आप हमें भी वहां लेकर चलिए। हम वहां गाना चाहते हैं, नृत्‍य करना चाहते हैं। उनकी हमेशा मांग रही है, और इसीलिए हमने दो साल पहले ‘मथुरा महोत्‍सव’ किया था जो बहुत ही सफल रहा। हमने सारे बॉलीवुड आर्टिस्‍ट को बुलाकर यह कार्यक्रम किया था। ऐसे कार्यक्रमों से मथुरा की शान बढ़ती है क्‍योंकि मैं मथुरा की सांसद हूं। एक साल पहले इसी प्रकार का एक कार्यक्रम मैंने ‘रसोत्‍सव’ के नाम से किया था। उसमें मैंने अपनी विश्‍व विख्‍यात नृत्य नाटिका ‘यशोदा-कृष्‍ण, राधाकृष्‍ण’ पेश किया था।
अब मेरा मन था कि मैं कुछ ऐसा बहुत अच्‍छा करूं जिससे पर्यटन को बढ़ावा मिले और मथुरा की शान भी बढ़े। हम इस कार्यक्रम के तहत यमुना की आरती करते और यमुना में लाखों दीपक प्रवाहित करते लेकिन अचानक किसी को लगा कि हम यमुना को प्रदूषित करने जा रहे हैं जो कि हम नहीं कर रहे थे।
इसके बाद हेमा मालिनी ने कहा कि हम तो चाहते थे कि यमुना को शुद्ध करो, मथुरा के लोगों ने जो नहीं किया उनसे मैं रिक्‍वेस्‍ट करती हूं कि आप लोग यमुना को शुद्ध करो। प्रदूषित है इतना, गंदगी डालकर खराब हो गया है इतना। ये मथुरा वालों की भी जिम्‍मेदारी है कि उन्‍हें यमुना को साफ-सुथरा रखना चाहिए। अचानक उनके मन में आया कि मैं उसको खराब करने वाली हूं, तो वो एनजीटी मैं पहुंच गए और मेरे कार्यक्रम पर रोक लगवा दी। मैं एनजीटी से परमीशन लेकर यमुना किनारे कार्यक्रम कर सकती हूं किंतु उसमें समय लगेगा। हालांकि मैंने दृढ़ संकल्‍प लिया है कि यमुना किनारे जहां अभी कार्यक्रम नहीं हो सका, वहां पर बहुत जल्‍द कार्यक्रम होगा और जिन लोगों ने विरोध किया है उन्‍हें मानना पड़ेगा कि हमारे कल्‍चरल कार्यक्रमों से पर्यटन को कितना बढ़ावा मिलता है।
हेमा मालिनी ने कहा कि समय की कमी को देखते हुए मैंने इस कार्यक्रम को शिफ्ट किया और अब यह कार्यक्रम उसी तरह वेटरिनरी यूनिवर्सिटी के प्रांगण में होगा। मथुरा के मुक्‍ताकाशीय रंगमंच को भी जल्‍द से जल्‍द तैयार कराने का मैंने प्रयास किया ताकि मथुरा में सांस्कृतिक कार्यक्रम चलते रहें।
हेमा मालिनी के अनुसार सांसद का काम केवल रोड बनवाना, बिजली दिलवाना और उद्धाटन करते रहना ही नहीं है। कल्‍चरल प्रोग्राम भी होने चाहिए जिससे ब्रज की कलाओं को बढ़ावा मिले।
अपनी उपलब्‍धियों गिनाने, यमुना प्रदूषण के लिए मथुरा के ही लोगों को जिम्‍मेदार ठहराने और उन्‍हें यमुना किनारे ही अपना कार्यक्रम शीघ्र करने की चुनौती देकर हेमा मालिनी उन सभी सवालों का जवाब दिए बिना उठकर चलती बनीं जिनके कारण उनके कार्यक्रम तथा बतौर सांसद उनकी मंशा पर भी सवाल उठ रहे हैं।
हां, इस दौरान वह यह बताना नही भूलीं कि अगर मथुरा की जनता चाहेगी तो वह अवश्य यहां से दोबारा सांसद बनना चाहेंगी।
हेमा मालिनी को दूसरी मर्तबा मथुरा से संसद पहुंचने का सपना संजाेने से पहले यह भी सोच लेना चाहिए था कि एकबार तो उनके पति अभिनेता धर्मेन्‍द्र भी राजस्‍थान के बीकानेर से लोकसभा चुनाव जीतने में सफल रहे थे। मथुरा से जीत के बाद हेमा मालिनी की कार्यप्रणाली अपने पति धर्मेन्‍द्र से कोई बहुत अलग नहीं रही है।
गौरतलब है कि आज यानि 23 फरवरी को हेमा मालिनी के इसी कार्यक्रम को लेकर एनजीटी में सुनवाई होनी है। पिछली तारीख 15 फरवरी को सुनवाई के बाद एनजीटी ने न सिर्फ कायर्क्रम को यमुना किनारे करने पर रोक लगा दी थी बल्‍कि ‘नमामि गंगे’ तथा ‘प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड’ से जवाब तलब भी किया था।
बताया जाता है कि इन दोनों सरकारी संस्‍थाओं ने यमुना किनारे अब कार्यक्रम न करके वेटरिनरी यूनिवर्सिटी में किए जाने संबंधी साक्ष्‍यों के साथ अपना जवाब एनजीटी के समक्ष पेश कर दिया है लिहाजा आगे कोई आदेश आने की संभावना कम है।
रहा सवाल हेमा मालिनी द्वारा यमुना किनारे ही जल्‍द इसी तरह का कार्यक्रम करने की चुनौती देने का, तो उसकी भी उम्‍मीद काफी कम है क्‍योंकि प्रथम तो एनजीटी यमुना प्रदूषण के मुद्दे पर बेहद गंभीर है और दूसरे दिल्‍ली में यमुना किनारे आध्‍यात्‍मिक गुरू श्री-श्री रविशंकर की संस्‍था ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ द्वारा कराए गए कल्‍चरल प्रोग्राम की नजीर उसके सामने है।
उस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री द्वारा शिरकत किए जाने के बावजूद एनजीटी ने यह माना कि आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा कराए गए कार्यक्रम से यमुना और उसके किनारे के पर्यावरण को काफी नुकसान हुआ। एनजीटी ने आर्ट ऑफ लिविंग के कार्यक्रम से हुए नुकसान की भरपाई के लिए संस्‍था पर 5 करोड़ रुपए का बड़ा जुर्माना भी ठोका।
जहां तक प्रश्‍न हेमा मालिनी द्वारा यमुना के प्रदूषण का ठीकरा मथुरावासियों के ही सिर फोड़ने की कोशिश का है तो हेमा मालिनी को जान लेना चाहिए कि मथुरावासी तो 32 साल से मथुरा को प्रदूषण मुक्‍त कराने की लड़ाई विभिन्‍न स्‍तर पर लड़ रहे हैं।
सबसे पहले यमुना के लिए 16 मार्च 1985 को तत्‍कालीन जिलाधिकारी राजेन्‍द्र सिंह यादव के समक्ष उनके आवास पर गोपेश्‍वर चतुर्वेदी के नेतृत्‍व में आवाज़ बुलंद की गई थी। इस मामले में तब गोपेश्‍वर चतुर्वेदी सहित कई प्रमुख लोगों के खिलाफ संगीन धाराओं में केस भी दर्ज किया गया था।
उसके बाद जनवरी 1998 में प्रमुख पर्यावरणविद् और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता एम. सी. मेहता और गोपाल पीठाधीश्‍वर विठ्ठलेशजी महाराज के नेतृत्‍व में बड़ा धरना प्रदर्शन किया गया।
तब गंगा प्रदूषण की कोर्ट में लड़ाई लड़ रहे एम. सी. मेहता ने जब यहां यमुना की दुर्दशा अपनी आंखों से देखी तो उन्‍होंने यमुना प्रदूषण के मुद्दे को भी कोर्ट में ले जाना ज्‍यादा मुनासिब समझा। उसके बाद गोपेश्‍वर चतुर्वेदी के नाम से इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय में एक जनहित याचिका 1644/98 डाली गई जिसे जनवरी 1998 में ही कोर्ट से स्‍वीकार करते हुए यमुना कार्य योजना के तहत मथुरा-वृंदावन का मामला शामिल किया और तमाम आदेश-निर्दश जारी दिए।
गोपेश्‍वर चतुर्वेदी बनाम स्‍टेट ऑफ यूपी एंड अदर्स के नाम से दाखिल इस याचिका की सुनवाई के बाद दिए गए आदेश-निर्देशों के अनुपालन हेतु कोर्ट ने ही एडीएम स्‍तर के एक अधिकारी को बहुत से अतिरिक्‍त अधिकारों सहित यमुना कार्य योजना का स्‍थानीय नोडल अधिकारी भी बनाया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश-निर्देशों से यमुना में गिरने वाले मथुरा के सभी 19 नाले और वृंदावन के 18 नाले पहली बार टेप किए गए और यमुना जल को शुद्ध बनाए रखने के दूसरे अनेक प्रयास शुरू हुए।
यह बात अलग है कि प्रशासनिक शिथिलता के कारण सन् 2000 के बाद इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय के आदेश-निर्देशों की जो धज्‍जियां उड़नी शुरू हुईं, वह अब तक उड़ाई जा रही हैं।
दरअसल, सन् 2000 के बाद जितने भी नोडल अधिकारी यहां रहे, उनमें से किसी ने न तो अपने अधिकार जानना जरूरी समझा और न कभी यमुना के प्रति अपना कर्तव्‍य निभाया। यह सिलसिला अब भी जारी है। नतीजतन यमुना दिन-प्रतिदिन पहले से कई गुना अधिक प्रदूषित हो रही है।
गोपेश्‍वर चतुर्वेदी आज भी यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने की दोहरी लड़ाई लड़ रहे हैं। एक ओर इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय में तो दूसरी ओर नेशनल ग्रीन ट्रेब्‍यूनल (एनजीटी) में।
गोपेश्‍वर चतुर्वेदी के अलावा मथुरा के ही कांतानाथ चतुर्वेदी और महेन्‍द्र नाथ चतुर्वेदी भी न्‍यायालय के माध्‍यम से यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने की लड़ाई लड़ रहे हैं।
इनके अलावा वृंदावन के प्रमुख पत्रकार रहे और इस समय समाज सेवा से जुड़े मधुमंगल शुक्‍ला ने यमुना प्रदूषण के मुद्दे पर वर्ष 2010 में याचिका दाखिल की थी और वर्ष 2015 में एनजीटी का गठन होने के बाद वहां भी मूव किया।
मधुमंगल शुक्‍ला के प्रयासों का ही नतीजा है कि आज यमुना की खादरों में किया गया बेहिसाब अवैध निर्माण गिराया जाने लगा है और यमुना रिवर फ्रंट के कार्य पर एनजीटी ने पूरी नजर बना रखी है।
यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने की एक लड़ाई अपने स्‍तर से बरसाना (मथुरा) स्‍थित मान मंदिर के महंत रमेश बाबा भी लड़ रहे हैं। रमेश बाबा के सानिध्‍य में उनके शिष्‍य रहे बाबा जयकृष्‍ण दास ने यमुना रक्षक दल के बैनर तले करीब 50 हजार लोगों के साथ मार्च 2013 में मथुरा से दिल्‍ली के लिए कूच किया था।
जयकृष्‍ण दास के काफिले को देखकर घबराई तत्‍कालीन यूपीए सरकार के केंद्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत ने बाबा से मुलाकात कर यमुना को प्रदूषण मुक्‍त करने की एक रूपरेखा उनके सामने प्रस्‍तुत की, जिसके बाद जयकृष्‍ण दास फरीदाबाद से वापस लौट आए। बाद में हरीश रावत के सरकारी आश्‍वासन का भी वही हश्र हुआ जैसा सभी सरकारों के आश्‍वासन का होता आया है।
यमुना प्रदूषण के मुद्दे पर बाबा जयकृष्‍ण दास का साथ स्‍थानीय अन्‍य लोगों ने भी दलगत राजनीति से ऊपर उठकर दिया। इनमें भारतीय किसान यूनियन (भानु गुट), कांग्रेसी नेता राकेश यादव व अब्‍दुल जब्‍बार, समाजवादी पार्टी के तत्‍कालीन महानगर अध्‍यक्ष डॉ. अशोक अग्रवाल, वृंदावन के जुझारु नेता उदयन शर्मा आदि प्रमुख रूप से शामिल रहे। पंकज बाबा ने भी यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने के इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्‍सा लिया। ये सभी लोग आज भी अपने-अपने स्‍तर से यमुना को बचाने की जद्दोजहद में लगे हैं। रमेश बाबा ने तो एकबार फिर मार्च में दिल्‍ली कूच करने का एलान कर रखा है।
आश्‍चर्य की बात यह है कि कल की अपनी प्रेस कांफ्रेंस में यमुना प्रदूषण का ठीकरा ब्रजवासियों के सिर ही फोड़ने की हेमा मालिनी की कोशिश का जिक्र तक स्‍थानीय मीडिया ने अपने समाचारों में नहीं किया और सिर्फ उनके कार्यक्रम का ब्‍यौरा देकर अपने कर्तव्‍य की इतिश्री कर ली जबकि हेमा मालिनी का यह प्रयास मथुरावासियों के प्रति पूर्वाग्रह तथा आत्मप्रशंसा से भरा था।
होली रसोत्‍सव संबंधी विज्ञापनों के बोझ तले दबे और कार्यक्रम के पास पाने की अभिलाषा में हेमा मालिनी से स्‍थानीय पत्रकारों ने यह पूछना भी जरूरी नहीं समझा कि दो साल पहले उनके द्वारा किए गए ‘मथुरा महोत्‍सव’ तथा एक साल पहले किए गए ‘रसोत्‍सव’ से मथुरा के पर्यटन में कितनी वृद्धि हुई। उन्‍होंने अपने कार्यक्रमों में यहां की संस्‍कृति और उससे जुड़े यहां के लोगों को कितना बढ़ावा दिया और मुक्‍ताकाशीय रंगमंच का निर्माण कराने में वह क्‍यों सफल नहीं हुईं।
यमुना के लिए मथुरावासियों को उनका कर्तव्‍य याद दिलाने वाली हेमा मालिनी से किसी ने यह भी पूछना मुनासिब नहीं समझा कि उन्‍होंने अपने करीब चार साल के संसदीय कार्यकाल में यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने का क्‍या प्रयास किया।
हेमा मालिनी से यह प्रश्‍न भी नहीं किया गया कि अब उनके द्वारा कराए जा रहे इस कार्यक्रम में कितने स्‍थानीय कलाकारों को तरजीह दी गई है क्‍योंकि जिन सुनामधन्‍य कलाकारों का जिक्र हेमा मालिनी ने किया वह किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। पंडित जसराज और हरिप्रसाद चौरसिया अपने-अपने फन के वो माहिर उस्‍ताद हैं कि हेमा मालिनी उनके सामने कहीं नहीं टिकतीं।
बेशक ये दिग्‍गज कलाकार देश की शान और पहचान हैं किंतु मथुरा में इनके कार्यक्रम मथुरा की कला व संस्‍कृति को कैसे समृद्ध करेंगे, यह बात समझ से परे है।
यूं भी देखा जाए तो महाभारत नायक योगीराज श्रीकृष्‍ण की जन्‍मस्‍थली को नामचीन कलाकारों के कार्यक्रमों से अधिक नेकनीयत रखने वाले नेताओं की दरकार है क्‍योंकि बाहरी नेताओं से मथुरावासी पहले भी धोखा खाते रहे हैं।
हरियाणा से आए मनीराम बागड़ी से लेकर स्‍वामी सच्‍चिदानंद साक्षी तक और जयंत चौधरी से लेकर हेमा मालिनी तक, जितने भी नेताओं ने मथुरा से अपनी संसदीय पारी शुरू की, उन सभी ने मथुरा की जनता को निराश किया।
एकबार और मथुरा से संसद पहुंचने का ख्‍वाब देखने वालीं सिने तारिका कम से कम स्‍थानीय जनता की नब्‍ज टटोल लें, साथ ही पार्टी स्‍तर पर भी पता कर लें कि वह उन्‍हें फिर चुनाव में उतारने का जोखिम उठाने को तैयार है भी या नहीं, तो उनके लिए बेहतर होगा।
आत्ममुग्‍ध सांसद हेमा मालिनी ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि केवल सड़क बनवाना और बिजली मुहैया कराना ही उनका काम नहीं है। कल्‍चरल प्रोग्राम भी करते रहना चाहिए जिससे ब्रज की कलाओं को बढ़ावा मिले।
अच्‍छा होता यदि सांसद यह भी बता देतीं कि उन्‍होंने मथुरा जनपद में अपने प्रयासों से कितनी सड़क बनवाई हैं और बिजली की सुचारु आपूर्ति के लिए कितने प्रयास किए हैं।
हां, उद्घाटन करने वह समय-समय पर जरूर आती रही हैं किंतु उनका ब्‍यौरा जनता ने रखना जरूरी नहीं समझा होगा।
कौन नहीं जानता कि 2017 में उत्तर प्रदेश की सत्ता पर योगी आदित्‍यनाथ के नेतृत्‍व वाली सरकार के काबिज होने तथा मथुरा-वृंदावन क्षेत्र के विधायक श्रीकांत शर्मा को ऊर्जा मंत्रालय मिलने के बाद ही मथुरा जनपद की विद्युत समस्‍या का समाधान हुआ है अन्‍यथा इससे पहले शहर को भी बमुश्‍किल 12-14 घंटे ही बिजली मिल पाती थी परंतु सांसद ने कभी कोई प्रयास नहीं किए।
अपनी प्रेस कांफ्रेंस में कथित उपलब्‍धियों और आगामी सांस्कृतिक कार्यक्रमों का ऐलानी खाका खींचने वाली हेमा मालिनी ने अंत तक यह नहीं बताया कि यह ब्रजभूमि विकास ट्रस्‍ट क्‍या है और इसके पदाधिकारी कौन-कौन हैं।
हेमा मालिनी समय-समय पर यह तो कहती रही हैं कि वह ब्रज के विकास के लिए एक ट्रस्‍ट का गठन करके देश-विदेश से पैसा इकठ्ठा करेंगी परंतु वह ट्रस्‍ट कौन सा है, इसकी जानकारी कभी नहीं दी।
गौरतलब है कि होली रसोत्‍सव के नाम से बड़ी रकम एकत्र किए जाने की खासी चर्चा है और माथुर चतुर्वेद परिषद ने भी अपनी प्रेस कांफ्रेंस में इसका उल्लेख यह कहते हुए किया था कि फिल्‍म तो दिखानी ही पड़ेगी क्‍योंकि टिकट जो बिक चुकी हैं
माथुर चतुर्वेद परिषद ने यह बात उस समय कही जब उन्‍हें बताया गया कि हेमा मालिनी का कार्यक्रम तो अब भी होने जा रहा है। फर्क केवल इतना है कि अब वह यमुना पार न होकर वेटरिनरी के प्रांगण में होगा।
हेमा मालिनी ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में माथुर चतुर्वेद परिषद के एनजीटी पहुंच जाने तथा एनजीटी से यमुना किनारे प्रस्‍तावित कार्यक्रम पर रोक लगा देने की बात तो बताई परंतु परिषद के इस आरोप का कोई उत्तर नहीं दिया कि जब टिकट बिक गए तो फिल्‍म दिखानी पड़ेगी।
इसी प्रकार होली रसोत्‍सव के सहआयोजकों में ब्रजभूमि विकास ट्रस्‍ट का उल्‍लेख अवश्‍य किया गया है किंतु उसका कोई पदाधिकारी, कार्यक्रम की किसी प्रेस कांफ्रेंस का हिस्‍सा नहीं बना जबकि पहली प्रेस कांफ्रेंस समन्‍वयक बताए गए अनूप शर्मा ने तथा दूसरी खुद हेमा मालिनी ने की।
दोनों ही प्रेस कांफ्रेंस के वक्‍त उत्तर प्रदेश के पर्यटन विभाग और तीर्थ विकास ट्रस्‍ट की ओर से भी किसी की नुमाइंदगी न होना शंका तो प्रकट करता है क्‍योंकि इन्‍हें मात्र विज्ञापन का हिस्‍सा बनाकर छोड़ दिया गया।
ऐसा नहीं है कि होली रसोत्‍सव करने के तौर-तरीकों से माथुर चतुर्वेद परिषद को ही शिकायत हुई हो, भाजपा का एक बड़ा वर्ग भी आयोजन के मकसद को न तो समझ पा रहा है और न पचा पा रहा है क्‍योंकि इसका औचित्‍य उनकी समझ से परे है।
यही कारण है कि कार्यक्रम की घोषणा से लेकर आज तक हेमा मालिनी के इर्द-गिर्द सिर्फ ऐसे लोगों का जमावड़ा रहा है जिनकी पार्टी में भी कोई पूछ नहीं रह गई और जो हर वक्‍त किसी न किसी की आड़ में अपना चेहरा चमकाने का प्रयास करते रहते हैं।
जाहिर है कि इतने सारे प्रश्‍नों और आरोपों के बीच आज से शुरू होने जा रहे होली रासोत्‍सव का कल समापन तो हो जाएगा लेकिन जो प्रश्‍न इसके आयोजकों पर उठे हैं, वह 2019 के लोकसभा चुनावों तक भाजपा और हेमा मालिनी का पीछा नहीं छोड़ने वाले।
ऐसे में हेमा मालिनी खुद सोच लें कि पार्टी द्वारा उतारे जाने के बाद भी क्‍या 2019 का लोकसभा चुनाव जीतना उनके लिए आसान होगा, और क्‍या वह तब भी इसी प्रकार किसी प्रश्‍न का जवाब दिए बिना सिर्फ अपनी बात कहकर प्रेस कांफ्रेंस से उठ पाएंगी।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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