शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2018

Shiel Hyundai में बड़ा घपला: Hyundai मथुरा की एकमात्र डीलरशिप खतरे में

Shiel Hyundai के नाम से मथुरा में Hyundai कारों के एकमात्र डीलर आगरा निवासी राजीव रतन और ऋषि रतन ने कंपनी की आंखों में धूल झोंकते हुए डीलरशिप का सौदा किसी दूसरे को कर दिया है जबकि नियमानुसार ऐसा करना पूरी तरह अवैध बताया जाता है।
यही नहीं, Shiel Hyundai ने अपने स्‍तर से डीलरशिप का सौदा करने की जानकारी उन बैंकों को भी देना जरूरी नहीं समझा जिनमें Shiel Hyundai के एकाउंट हैं और Shiel Hyundai ने वहां से काफी आर्थिक सुविधाएं ले रखी हैं।
बताया जाता है कि इस कारनामे को अंजाम देने के लिए Shiel Hyundai ने अपने कर्मचारियों तक को यह कहकर गुमराह किया है कि उन्‍होंने डीलरशिप का सौदा करने की इजाजत कंपनी से ले ली है।
गौरतलब है कि मूल रूप से दक्षिण कोरिया की कार निर्माता कंपनी Hyundai का भारत के कार बाजार में बड़ा दबदबा है और इसलिए मारुति के बाद Hyundai की ही सर्वाधिक कारें सड़क पर देखी जा सकती हैं।
क्‍या कंपनी ऐसी कोई इजाजत देती है ?
इस बारे में जानकारी की तो पता लगा कि कोई भी मल्‍टीनेशनल कंपनी या बड़ी कंपनी डीलर को ये अधिकार नहीं देती कि वह अपने स्‍तर से डीलरशिप किसी अन्‍य के नाम ट्रांसफर कर दे अथवा उसमें किसी को पार्टनर बना ले।
दिल्‍ली में ऑटोमोबाइल डीलर एसोसिएशन (फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन) के पदाधिकारी जितेन्‍द्र नंदा ने बताया कि डीलर द्वारा किया गया कोई भी ऐसा कृत्‍य कंपनी की शर्तों का उल्‍लंघन है और कंपनी इसके लिए न केवल डीलरशिप टर्मिनेट करती है बल्‍कि आपराधिक केस भी दायर करा सकती है।
उन्‍होंने बताया कि डीलर अगर अपनी डीलरशिप छोड़ना चाहता है तो ज्‍यादा से ज्‍यादा इतना कर सकता है कि इस क्षेत्र के किसी अनुभवी व्‍यक्‍ति का नाम कंपनी को रिकमेंड कर दे किंतु अंतिम निर्णय कंपनी का ही होता है।
कंपनी यदि अपनी सभी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद उस व्‍यक्‍ति को उपयुक्‍त समझती है तो पहले वाली डीलरशिप को समाप्‍त कर नए सिरे से डीलरशिप अलॉट करेगी, न कि पुरानी डीलरशिप के साथ उसका कोई संबंध रखने की इजाजत देगी।
यूं भी Hyundai जैसी विश्‍व प्रसिद्ध कार निर्माता कंपनी की डीलरशिप पाने को हमेशा कई-कई लोग लाइन में लगे रहते हैं और कंपनी भी हर बार डीलरशिप के लिए पहले से उच्‍च मानदंड निर्धारित करती है। ऐसे में इस बात का सवाल ही खड़ा नहीं होता कि Hyundai अपने किसी डीलर को डीलरशिप ट्रांसफर करने अथवा उसमें पार्टनरशिप करने की इजाजत दे।
Shiel Hyundai से इस बारे में उनका पक्ष जानने की काफी कोशिश की गई किंतु उनकी ओर से कोई कुछ बताने को तैयार नहीं हुआ। Shiel Hyundai पर मौजूद स्‍टाफ ने बताया कि राजीव रतन और ऋषि रतन दोनों बाहर हैं। हालांकि उन्‍हें फोन पर सूचित कर दिया गया है।
विश्‍वस्‍त सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार Shiel Hyundai द्वारा किए जा रहे इस कारनामे में ऑटोमोबाइल क्षेत्र से ही जुड़े और दूसरी कार कंपनियों के उन डीलर्स का हाथ है जिनके नीचे फिलहाल किसी कारणवश राजीव रतन और ऋषि रतन दबे हुए हैं।
सूत्रों के मुताबिक मथुरा जैसी बड़ी आबादी वाले विश्‍व विख्‍यात धार्मिक जिले में Hyundai की एकमात्र डीलरशिप का सौदा करने की वजह राजीव रतन और ऋषी रतन के सामने अचानक आर्थिक तंगी खड़ी हो जाना है।
अब सवाल यह उठता है कि अच्‍छी-खासी संख्‍या में हर महीने Hyundai कारों के विक्रेता राजीव रतन और ऋषि रतन के सामने अचानक आर्थिक तंगी आ कैसे गई? 
इसके बारे में उनसे ही जुडे हुए लोग यह बताते हैं कि इसका प्रथम कारण तो पारिवारिक विवाद रहा और दूसरा कारण रहा Shiel Hyundai के पैसे को दूसरे कार्यों में लगा देना। अब ये कार्य कैसे थे और उनमें Shiel Hyundai का पैसा क्‍यों लगाया गया, इस पर भी कोई मुंह खोलने को तैयार नहीं है।
हां, ये लोग दबी जुबान से इतना जरूर बताते हैं कि जिन लोगों ने एक अच्‍छी-खासी डीलरशिप का सौदा कराया है, उनका मकसद राजीव और ऋषि रतन से किसी भी तरह अपना पैसा निकाल लेना है ताकि सांप मर जाए और लाठी भी न टूटे।
रही बात डीलरशिप के सौदे का अधिकार रखने या न रखने की, तो उसके बाद लेने व देने वाले भुगतते रहेंगे। इससे उनके ऊपर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है।
Shiel Hyundai के शोरूम का नक्‍शा भी विवादों में 
दूसरी ओर इस बीच यह जानकारी भी मिल रही है कि नेशनल हाईवे नंबर-2 पर नवादा क्षेत्र में जहां Shiel Hyundai का शोरूम बना है, वह Residential area है। किसी भी Residential area में कानूनन कार के किसी शोरूम का निर्माण नहीं कराया जा सकता।
मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण ने भी इसकी पुष्‍टि करते हुए बताया कि कब और किन परिस्‍थितियों में नवादा के Residential area में कार के शोरूम बना लिए गए, कहना मुश्‍किल है।
विकास प्राधिकरण से इस बारे में एक चौंकाने वाली जानकारी यह मिली कि जिस प्‍लॉट पर Shiel Hyundai का शोरूम आज खड़ा है, उस पर तो रेस्‍टोरेंट के लिए नक्‍शा पास किया गया था।
प्राधिकरण के अधिकारियों ने इस बारे में जांच के उपरांत कार्यवाही करने का भरोसा दिया है।
गौरतलब है कि राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्‍ली से ताजनगरी आगरा को जोड़ने वाले नेशनल हाईवे नंबर दो पर स्‍थानीय डेवलपमेंट अथॉरिटी की सांठगांठ से Residential area में ऐसे और भी कई शोरूम स्‍थापित हो चुके हैं जो नियम विरुद्ध हैं किंतु आजतक उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गई।
सच तो यह है कि अथॉरिटी से पास नक्‍शे के इतर मामूली सा भी फेरबदल दिखाई देने पर पहुंच जाने वाले विप्रा अधिकारी ऐसे शोरूम्‍स को लेकर अब तक आंखें व कान बंद किए बैठे रहे।
यही कारण है कि राजीव और ऋषि रतन ने Hyundai की अपनी डीलरशिप का सौदा शोरूम सहित किया है क्‍योंकि वह उसकी असलियत जानते हैं, और उन्‍हें मालूम है कि रेस्‍टोरेंट में पास शोरूम कभी भी उनके गले की हड्डी बन सकता है।
बहरहाल, करोड़ों रुपए के इस खेल से फिलहाल तो Hyundai कंपनी के साथ-साथ बैंकें और एजेंसी पर कार्यरत स्‍टाफ भी अनभिज्ञ है। कंपनी और बैंकों को तो जब सच्‍चाई पता लगेगी तब वो देख लेंगे किंतु स्‍टाफ को अपना भविष्‍य अंधकारमय दिखाई देने लगा है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

बुधवार, 10 अक्टूबर 2018

#MeToo को समर्पित टीवी, फिल्‍म और मीडिया जगत की नवरात्रियां

डिसक्लेमर: इस लेख का संबंध किसी जीवित या मृत स्‍त्री-पुरुष से नहीं है, और न इसका उद्देश्‍य किसी की भाव-नाओं को आ-हत करना है। यह विशुद्ध रूप से जनहित में #MeToo को समर्पित है लिहाजा इसके समर्पण पर जाएं, समानता पर नहीं। 
अचानक दीवाली सेल पर कुछ खास हाथ लगने की लालसा में कल दोपहर घर से निकला ही था कि एक कुषाणकालीन मित्र के हत्‍थे चढ़ गया। पहले तो वह मुझे देखकर पहचानने का प्रयास करते हुए थोड़ा सकुचाया और फिर मेरे होने की पुष्‍टि करके मुस्‍कुराया। उसके बाद दहाड़ मारकर चिल्‍लाते हुए बोला- मैं यहां कोई दीवाली की छूट के लिए नहीं आया, मैं तो तुझे ही तलाशने आया था क्‍योंकि मुझे पूरा यकीन था कि तू यहीं कहीं पाया जाएगा।
भरी जवानी से मैं जानता हूं कि तू दो ही किस्‍म के मेलों में पाया जा सकता है। पहला दीवाली मेला और दूसरा कुंभ का मेला। कुंभ का मेला 2019 में है इसलिए 2018 में तेरी तलाश पूरी हुई।
मुझे एक शब्‍द बोलने का मौका दिए बिना उसने पूछना शुरू किया- चुंगी के कॉन्वेंट स्‍कूल में को-एजुकेशन लेते वक्‍त अपने साथ जो सबसे गोल-मटोल लड़की पढ़ती थी, वह याद है ?
मैंने बमुश्‍किल 40 साल पहले की स्‍मृतियों को संजोने की कोशिश प्रारंभ की ही थी कि वह फिर शुरू हो गया- याद कर 40 साल पहले 60 किलो की वह सहपाठी पैर फिसल जाने के कारण स्‍कूल के पास वाले गंदे नाले में गिर गई थी और तूने अपने धवल वस्‍त्रों की परवाह किए बिना, जान हथेली पर रखकर उस लड़की को नाले से निकाला था। सारे साथी तमाशा देख रहे थे लेकिन तूने उस भारी-भरकम काया को निकालने के लिए नाले में यह सोचे-समझे बिना छलांग लगा दी थी कि उसका वजन तुझे भी साथ लेकर डूब सकता है।
कुषाणकालीन मित्र द्वारा इतना कुछ याद दिलाने के बाद मैं स्‍मृतियों को ठीक से सहेज भी नहीं पाया था कि वह एकबार फिर कंटीन्‍यू हुआ और बोला- 60 किलो से 200 किलों में बदल चुकी वह काया तुझे जल्‍द ही Twitter पर #MeToo के तहत लपेटने वाली है।
उसका कहना है कि नाले में से उसे निकालने का तूने जो उपक्रम किया था, वह दरअसल तेरी बदनीयती का हिस्‍सा था। तूने 40 साल पहले उसका यौन उत्‍पीड़न किया था। तूने तब उसके पूरे बदन को अपने हाथों से छुआ जबकि वह काम किसी क्रेन को बुलाकर भी कराया जा सकता था।
40 साल पहले के कथित पुण्‍यकार्य को यौन उत्‍पीड़न में कन्वर्ट होते देख एकबार तो मेरी सिट्टी-पिट्टी ही गुम हो गई, फिर जैसे-तैसे खुद को संभाला और अपने मित्र से पूछा- भाई, पहले तू मुझे उसका नाम तो बता दे। मोदी सरकार से भी अधिक ग्रोथ रेट को प्राप्‍त उस भारी भरकम काया को मैं Twitter पर भी पहचानूंगा कैसे।
मेरी दशा और दिशा का अनुमान लगाकर मित्र कहने लगा- ज्‍यादा बनने की कोशिश मत कर, उसे अपने साथ हुए यौन अपराध का एक-एक पल याद है और तू कहता है कि तुझे उसका नाम तक याद नहीं। बेटा, राष्‍ट्रीय महिला आयोग का Twitter या whatsapp के थ्रू नोटिस मिलेगा तो सब याद आ जाएगा। उसकी सूरत भी और अपनी सीरत भी।
मित्र से यह शॉकिंग समाचार सुनकर मैं सुन्‍न अवस्‍था में वहीं से उलटे पैर लौट आया। अभी घर की लॉबी में प्रवेश किया ही था कि पत्‍नी चहक कर बोली- सुना, वो अपने टीवी वाले संस्‍कारी बाबूजी भी #MeToo के लपेटे में आ गए हैं। किसी महिला लेखक ने 20 साल पहले उन पर बलात्‍कार करने का आरोप लगाया है। ऐसा लगता है कि संस्‍कारी बाबूजी इस झटके को सह नहीं पाए, क्‍योंकि जवाब में बहकी-बहकी सी बातें कर रहे थे। कुछ-कुछ ऐसे बड़बड़ा रहे थे…हुआ होगा बलात्‍कार, लेकिन मैंने नहीं किया। मैं न इंकार कर सकता हूं और न इकरार कर रहा हूं।
मुझे तो इस उम्र में बाबूजी के इस हाल पर दया आ रही है लेकिन उन्‍हें #MeToo में लपेटने वाली लेखिका का कहना है कि 20 साल बाद तक उसे ‘मदहोशी’ में हुआ दुष्‍कर्म जब ‘पूरी तरह याद’ है तो पूरे होशो हवास में उसके साथ दुष्‍कर्म करने वाले बाबूजी कैसे भूल सकते हैं।
संस्‍कारी बाबूजी की कथित करतूत सुनाते-सुनाते पत्‍नी जी ने तुरंत यू टर्न लिया और मेरी ओर मुखातिब होकर कहने लगीं- मुझे तो लगता है कि करीब-करीब 25 साल पहले आपने जो घुटनों पर आकर मुझे प्रपोज किया था, उसमें भी आपकी नीयत ठीक नहीं थी। अगले 24 घंटों में दिमाग पर जोर डालकर सोचती हूं कि प्रपोज करने के पीछे आपकी कौन सी कुत्‍सित चाल थी। उसके बात #MeToo कैंपेन में भाग लेने पर विचार करूंगी।
अब मेरा ध्‍यान पत्‍नी द्वारा चटखारे ले-लेकर सुनाई जा रही टीवी वाले संस्‍कारी बाबूजी की कथा या व्‍यथा पर न होकर अपने मित्र द्वारा सुनाई गई कालातीत दुर-घटना तथा पत्‍नी द्वारा 25 साल पूर्व की घटना को लेकर दी गई ताजा-ताजा धमकी पर केंद्रित हो गया जिसका बम कभी भी मेरे सिर फूट सकता था।
जैसे-तैसे मैंने मंगलवार का मौनव्रत घोषित कर पूरा दिन तो काट लिया किंतु रात में बिस्‍तर पर #MeToo मेरे सामने पूरी भयावहता के साथ आ खड़ा हुआ। मैंने अपने दिमाग पर बहुत जोर डाला और यह सोचने की कोशिश की कि आखिर इंसानियत के नाते किसी सहपाठी को नाले में से निकालना यौन उत्‍पीड़न कैसे हो सकता है, किंतु मेरी अंतरात्‍मा कुछ बताती कि इससे पहले #MeToo बोल पड़ा। कहने लगा- बरखुरदार, नाले में से निकालना यौन उत्‍पीड़न की वजह नहीं बन सकता यह साबित अब तुम्‍हें करना है। तुम्‍हारी सहपाठी तो कह ही रही है कि नाले में से उसे निकालने में तुम्‍हारी नीयत ठीक नहीं थी। यह बात अलग है कि तब वह तुम्‍हारी बदनीयत को नहीं समझ पायी किंतु अब उसे सबकुछ साफ-साफ समझ में आ चुका है। उसके नाती-पोतों ने भी इस बात की पुष्‍टि कर दी है कि वह सही दिशा में जा रही है।
#MeToo के भय का साया सुबह अपने मन से झटकने की कोशिश में नित्‍य की भांति टहलने निकल पड़ा। थोड़ी दूर ही पहुंचा था कि साइकिलिंग कर रहीं पड़ोसी महिला डॉक्‍टर को जर्मन शेफर्ड डॉग से घिरा देखा। किसी सभ्‍य व सुसंस्‍कृत गृहस्‍वामी का वह इल्‍लिट्रेट कुत्ता अपने पूरे जबड़े खोलकर महिला डॉक्‍टर पर भौंक रहा था।
महिला डॉक्‍टर का चूंकि डर के मारे बुरा हाल था लिहाजा वो चिल्‍ला-चिल्‍लाकर मुझसे मदद मांगने लगीं। एकबार को मैं पिछले चौबीस घंटों से आ रहे #MeToo के भयानक स्‍वप्‍नों को भूलकर महिला डॉक्‍टर की मदद के लिए आगे बढ़ने लगा किंतु तभी दिल ने दिमाग से काम लेने को कहा। कहीं अंदर से आवाज आई, बेटा पहले 40 साल पहले कमाए गए पुण्‍य से तो निपट ले जो किसी भी समय #MeToo बोलने वाला है, उसके बाद और पुण्‍य कमा लेना। इस उम्र में यह नया पुण्‍य कमाने का प्रयास कब्र तक पीछा नहीं छोड़ेगा। बच्‍चों से श्राद्ध करवाने की बजाय यदि गंगा में प्रवाहित की गई अस्‍थियों को ‘सम्‍मन’ का सामना कराना है तो पचड़े में पड़, वरना चुपचाप खिसक ले।
दिमाग ने दिल की दहशत को समझा और यह सोचकर किनारा कर लिया कि डॉक्‍टर साहिबा को दो-चार इंजेक्‍शन ही तो लगेंगे, लेकिन मेरे पीछे जो #MeToo लग गया तो समाज इतने इंजेक्‍शन लगाएगा कि सब सुन्न कर देगा। दिल, दिमाग और शरीर सब। न निगलते बनेगा, और न उगलते।
40 साल पहले वाली क्‍लासमेट की तरह कुछ सालों बाद इन डॉक्‍टर साहिबा को भी कहीं याद आ गया कि उन्‍हें जर्मन शेफर्ड से बचाने में मेरी नीयत ठीक नहीं थी तो लेने के देने पड़ जाएंगे। यहां तो गवाह भी मैडम ही हैं और सबूत भी वही हैं।
देश में राष्‍ट्रीय महिला आयोग है, पुरुष आयोग नहीं। पुरुषों के लिए राष्‍ट्रीय तो क्‍या, कोई क्षेत्रीय आयोग भी नहीं है। पुरुषों की सुनवाई के लिए बाबा साहब ने संविधान में कोई व्‍यवस्‍था नहीं की।
क्‍या पुरुषों के लिए किसी #MeToo की कोई संभावना है, या मी लॉर्ड के सामने खड़े होना ही एकमात्र विकल्‍प है।
जो भी हो, फिलहाल तो पूरे देश में #MeToo का जोर है। टीवी, फिल्‍म और मीडिया से जुड़े लोग जितना जल्‍दी हो सके पुराने पुण्‍यों या यूं कहें कि मन, वचन और कर्म से किए गए पापों का लेखा-जोखा अपने लेखाकार से लगवा लें अन्‍यथा #MeToo तो सारे हिसाब लगवा ही लेगा। खुदा हाफिज़। जय हिंद। जय भारत।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

MY Lord, जनसामान्‍य के लिए भी बनवा दीजिए कोई ‘लेन’, उसकी भी सुन लीजिए हुजूर

बीते बुधवार को मद्रास हाई कोर्ट ने NHAI (नेशनल हाइवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया) को सख्‍त आदेश देते हुए कहा कि वह अपने सभी टोल प्लाजा पर वीआईपी और मौजूदा जजों के लिए एक अलग से एक्सक्लूसिव लेन बनाए या Contempt of court की कार्यवाही के लिए तैयार रहे।
जस्टिस हुलुवाडी जी रमेश और जस्टिस एमवी मुरलीधरन की डिवीजन बेंच ने कहा, ये वीआईपी और जजों के लिए बहुत शर्म की बात है कि वे टोल प्लाजा पर इंतजार करें और अपने आइडेंटिटी कार्ड दिखाएं। बेंच ने केंद्र सरकार और एनएचएआई से कहा कि वे इस मामले में प्रत्‍येक टोल प्‍लाजा के लिए सर्कुलर जारी करें।
कोर्ट ने यह भी कहा: टोल कलेक्टर की जिम्मेदारी होगी कि वह उस लेन से वीआईपी और जज के अलावा किसी और को गुजरने न दे, और जो भी इस नियम का उल्लंघन करे, टोल कलेक्टर उसके खिलाफ सख्त कार्यवाही करे।
कोर्ट ने कहा, ‘अलग लेन न होने से हर टोल प्लाजा पर सिटिंग जज और वीआईपी लोगों को ‘अनावश्यक शर्मिंदगी’ का सामना करना पड़ता है। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। टोल प्लाजा पर सिटिंग जज को 10 से 15 मिनट तक इंतजार करना पड़ता है।
MY Lord, आपका आदेश तो सिर माथे, लेकिन उन लोगों का क्‍या जो पूरा पैसा देकर भी हर टोल पर इंतजार करने को मजबूर हैं। हुजूर, क्‍या उनका समय कोई मायने नहीं रखता।
लगे हाथ उनके लिए भी कोई आदेश-निर्देश NHAI को दे दिया होता। वो तो कई बार घंटों-घंटों फंसे रहते हैं।
वहां से जैसे-तैसे निकल भी आएं तो आपकी अदालतें रहम नहीं करतीं क्‍योंकि आम आदमी के लिए वहां भी कोई लेन नहीं है।
कोई वादी अथवा प्रतिवादी, और यहां तक कि वकील साहिब भी यदि टोल प्‍लाजा पर अटक जाने के कारण अदालत में समय से उपस्‍थित नहीं होते तो उन्‍हें ‘अदम मौजूदगी’ या ‘अदम पैरवी’ का कितना बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ जाता है, इसे कौन नहीं जानता जबकि आपकी देरी पर कहां कौन सवाल खड़ा कर सकता है।
आप अदालत में बैठें या न बैठें, मालिक का मालिक कौन।
Your Honor, आपने अपने इस आदेश में अपने साथ-साथ ‘वीआईपी’ का जिक्र क्‍यों किया यह तो आप जानें, अलबत्ता आम आदमी यह जरूर जानता है कि वीआईपी किसी टोल पर कहां रुकते हैं। वो तो यूं भी लाल-नीली बत्तियों वाली गाड़ियों के बीच बिना टोल दिए ‘हूटर’ बजाते तेजी के साथ निकल लेते हैं। उनके काफिले को किसी टोल पर कोई रोकने या टोकने की हिमाकत कर बैठे तो वहीं के वहीं फैसला करके जाते हैं वो। न तहरीर, न तारीख…सीधे फैसला।
क्‍या आप इस कड़वे सच से वाकई परिचित नहीं हैं MY Lord, अथवा आपने सहारे के लिए वीआईपी को जोड़ दिया अपने आदेश में।
एक विधायिका है MY Lord जो अपने वेतन-भत्ते खुद तय कर लेती है और उसमें कहीं कोई पक्ष-विपक्ष आड़े नहीं आता क्‍योंकि तब सवाल समूची नेता बिरादरी के ‘लाभ’ का होता है। दूसरी न्‍यायपालिका है जो आज तक तो अपनी नियुक्‍ति ही खुद करती रही है लेकिन अब वह अपने लिए ‘टोल नाकों’ पर अलग से लेन बनाने का आदेश भी दे रही है।
लोकतंत्र के तीन प्रमुख स्‍तंभों में से शेष रह जाती है कार्यपालिका, तो उसे टोल नाकों पर किसी के आदेश-निर्देशों की दरकार नहीं है। टोल वालों का उनसे और उनका टोल वालों से रोज वास्‍ता पड़ता है। वो उनकी अहमियत बिना आदेश-निर्देश के समझते हैं इसलिए दूर से ही उनके लिए बैरियर खड़ा कर देते हैं। एक सिपाही भी टोल कर्मियों के लिए कितना विशिष्‍ट है, इसे किसी भी टोल पर देखा जा सकता है।
वैसे लोकतंत्र का एक ‘तथाकथित’ चौथा स्‍तंभ भी है जिसे इस दौर में ‘मीडिया’ कहा जाने लगा है, लेकिन उसकी यहां चर्चा करने का कोई अर्थ नहीं क्‍योंकि उसकी अब कोई अहमियत नहीं रह गई।
टोल प्‍लाजा पर तो मीडियाकर्मियों को कोई दो कौड़ी का नहीं पूछता क्‍योंकि उसे अपने लिए आदेश-निर्देश देने का हक प्राप्‍त नहीं है।
और हां हुजूर, वीआईपी से याद आया कि वीआईपी तो हर जगह वीआईपी ही होते हैं। उनके लिए देश की सर्वोच्‍च अदालत भी आधी रात को खुल जाती है और सुबह होते-होते फैसला सुना देती है किंतु आम आदमी अपनी जिंदगी का आधा हिस्‍सा जाया करके भी फैसला सुनने को तरसता रहता है।
जब यमराज सामने खड़े होते हैं तब उसे याद आता है कि उसने अपने हिस्‍से की काफी उम्र तरह-तरह के टोल नाकों पर लाइन में लगकर गुजार दी।
अब देखिए हुजूर, दो दिन पहले की ही बात है। भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में देश के तथाकथित पांच बुद्धिजीवियों को पुलिस ने क्‍या पकड़ा, कोहराम मच गया। सड़क से लेकर संसद तक और मानवाधिकार आयोग से लेकर अदालत तक सब खड़े हो गए।
अगली सुबह तो आदेश हो गया कि जिन्‍हें पकड़ा है, उन्‍हें उनके घर पर नजरबंद रखें। पुलिस कस्‍टडी में उन्‍हें नहीं रखा जा सकता, तकलीफ होती है। बाकी 06 सितंबर को देखेंगे कि करना क्‍या है।
MY Lord, आम आदमी की मंशा आपके आदेश-निर्देश पर सवालिया निशान लगाने की नहीं है। वह तो सिर्फ इतना जानना चाहता है कि जनसामान्‍य के लिए अदालतें इसी प्रकार सक्रिय क्‍यों नहीं होतीं। क्‍यों उनके प्रति कोई संवेदनशील नहीं होता। मानवाधिकार आयोग उनकी गिरफ्तारी पर संज्ञान क्‍यों नहीं लेता। कोई बुद्धिजीवी गैंग उसकी खातिर सड़क पर उतरकर क्‍यों हंगामा नहीं काटता।
वो पुलिस के डंडे खाता है, अधिकारियों के यहां दुत्‍कारा जाता है, न्‍यायालयों में फटकारा जाता है लेकिन तब कोई नहीं कहता कि लोकतंत्र खतरे में है, या यह कैसा लोकतंत्र है।
हां, अगर एक आतंकवादी पूरी प्रक्रिया के बाद फांसी पर चढ़ाया जाता है अथवा किसी राज्‍य सरकार के गठन में गतिरोध उत्‍पन्‍न होता है और यहां तक कि सवा सौ करोड़ की आबादी में से पांच खास लोग गिरफ्तार कर लिए जाते हैं तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता है। आपातकाल से भी बदतर हालात बताए जाते हैं।
तब तमाम लिस्‍टेड मुकद्दमों को दरकिनार कर उनकी गिरफ्तारी पर सुनवाई होती है और उसी दिन राहत भी दे दी जाती है, ऐसा क्‍यों है हुजूर।
दूसरी ओर जनसामान्‍य के लिए टोल प्‍लाजा का बैरियर और Court का Hammer दोनों बराबर हैं। दोनों उसका रास्‍ता तय करते हैं। दोनों के उठे बिना, उसका निकल पाना मुश्‍किल ही नहीं, नामुमकिन है। लेकिन फिर भी वह लगा है ‘कॉमन लेन’ में, भीड़ के बीच इस उम्‍मीद के साथ कि कभी तो वह भी निकल पाएगा।
हुजूर, नहीं पता कि मॉब लिंचिंग गायों के कारण हो रही है या सांप्रदायिकता के कारण। असहिष्‍णुता इसके पीछे की वजह है अथवा राजनीतिक विद्वेष। लेकिन एक बात पता है, और वह यह कि मॉब लिंचिंग करने वालों में किसी न किसी स्‍तर पर अपने अंदर विशिष्‍टता का भाव अवश्‍य भरा होता है। वह कानून हाथ में लेने की हिमाकत ही तब कर पाते हैं जब वह यह समझने लगते हैं कि पुलिस भी वहीं हैं और अदालत भी वही।
इसलिए हुजूर ये विशिष्‍टता का भाव बहुत खतरनाक है। इसी भाव ने स्‍वतंत्रता के सात दशक बीत जाने के बाद भी ‘लोक’ से ‘तंत्र’ को काट रखा है। अगर यह ‘तंत्र’ ही ‘लोक’ के लिए नहीं है तो कैसा लोकतंत्र। यह तो राजतंत्र हुआ न हुजूर। वही राजे-रजवाड़ों वाला या शासक और शोषित वाला।
बा-अदब…बा-मुलाहिजा…होशियार! महाराज की सवारी पधार रही है।
आखिर में हुजूर याद दिलाना चाहूंगा सर्वोच्‍च न्‍यायालय की ताजा टिप्‍पणी जिसमें कहा गया है कि असहमति जताना लोकतंत्र के लिए ‘सेफ़्टी वॉल्व’ है। अगर आप इस सेफ़्टी वॉल्व को नहीं रहने देंगे तो प्रेशर कुकर फट जाएग।.’
यकीन मानिए MY Lord, आम आदमी भी विशिष्‍ट लोगों द्वारा विशिष्‍ट लोगों के लिए दिए जाने वाले आदेश-निर्देशों से पूरी तरह असहमत है। उसका सेफ़्टी वॉल्व काफी हद तक चोक हो चुका है। यदि वह फट गया तो सच में लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा। लोकतंत्र को बचा लीजिए हुजूर। ये विशिष्‍टता का भाव त्‍याग दीजिए। आम बने रहिए ताकि जनता आपको खास समझती रहे।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

1984 बनाम 2002: तेरा दंगा मेरे दंगे से सफेद कैसे

आज बीबीसी की वेब साइट पर ‘वरिष्‍ठ पत्रकार’ उर्मिलेश जी का लेख पढ़ा। इस लेख के तहत उन्‍होंने बड़ी सफाई से इंदिरा गांधी की हत्‍या के बाद 1984 में हुए सिखों के कत्‍लेआम की तुलना उसी प्रकार 2002 के गुजरात दंगों से की है जिस प्रकार कांग्रेस के प्रवक्‍ता टीवी चैनल्‍स की डिबेट में करते रहे हैं।
‘नज़रिया’ नाम से प्रकाशित बीबीसी के इस कॉलम में उर्मिलेश जी ने कांग्रेस अध्‍यक्ष राहुल गांधी के कथन पर भारतीय न्‍यूज़ चैनल्‍स के रवैये को सरकारी चमचागीरी बताया है और विदेशी मीडिया की इस बात के लिए तारीफ की है कि उसने राहुल की बातों में वैचारिक ताज़गी देखी।
उर्मिलेश जी ने आगे लिखा है-
शुक्रवार की रात लंदन में वहां के सांसदों और अन्य गणमान्य लोगों की एक संगोष्ठी में राहुल गांधी ने जिस तरह सन् 1984 के सिख विरोधी “दंगे या कत्लेआम” पर टिप्पणी की, उससे उन पर गंभीर सवाल भी उठे हैं. राहुल ने माना कि सन् 1984 एक भीषण त्रासदी थी. अनेक निर्दोष लोगों की जानें गईं. इसके बावजूद उन्होंने अपनी पार्टी का जमकर बचाव किया.
उर्मिलेश जी ने इसी के साथ यह सवाल भी उछाला है-
इस बात पर कौन यक़ीन करेगा कि सन् 84 के दंगे में कांग्रेस या उसके स्थानीय नेताओं की कोई संलिप्तता नहीं थी ?
सवाल के जवाब में भी उर्मिलेश जी ने एक और सवाल किया है- 
ये तो कुछ वैसा ही है जैसे कोई भाजपाई कहे कि गुजरात के दंगे में भाजपाइयों का कोई हाथ ही नहीं था. ऐसे दावों और दलीलों को लोग गंभीरता से नहीं लेते. आख़िर ये दंगे क्या हवा, पानी, पेड़-पौधे या बादलों ने कराए थे?
उर्मिलेश जी अपने ही दोनों सवालों के जवाब में लिखते हैं- हां, ये बात सच है कि उस सिख-विरोधी दंगे में सिर्फ़ कांग्रेसी ही नहीं, स्थानीय स्तर के कथित हिंदुत्ववादी और तरह-तरह के असामाजिक तत्व भी शामिल हो गए थे.
ग़रीब तबके के लंपट युवाओं को दंगे में लूट-पाट के लिए गोलबंद किया गया. मुझे लगता है इसके लिए किसी को ज़्यादा कोशिश भी नहीं करनी पड़ी होगी. संकेत मिलते ही बहुत सारे लंपट तत्व लूटमार के लिए तैयार हो गए.
राहुल गांधी के ‘कथन या कथानक’ पर भारतीय मीडिया के रवैये को ‘सरकारी’ घोषित करने वाले उर्मिलेश जी कत्‍लेआम कराने वाले उन कांग्रेसियों और कथित हिंदुत्‍ववादियों का नाम अपने लेख में लिखना भूल गए जबकि खुद उनके शब्‍दों में-
“सन् 1984 के उस भयानक दौर में मैं दिल्ली में रहता था. हमने अपनी आंखों से न केवल सब-कुछ देखा बल्कि उस पर लिखा भी. उस वक्त मैं किसी अख़बार से जुड़ा नहीं था. लेकिन पत्रकारिता शुरू कर चुका था.
उस वक्त मैं दिल्ली के विकासपुरी मोहल्ले के ए-ब्लाक में किराए के वन-रूम सेट में रहता था.
ये बात तो साफ़ है कि वह भीड़ यूं ही नहीं आ गई थी. उसके पीछे किसी न किसी की योजना ज़रूर रही होगी. वह भीड़ ‘ख़ून का बदला ख़ून से लेंगे’ के नारे लगा रही थी. ये नारे कहां से आए? इस बीच जो भी तांडव होता रहा, उसे रोकने के लिए पुलिस या अर्धसैनिक बल के जवान भी नहीं दिखे.
मेरे कमरे में बैठी सरदार जी की पत्नी की आंखों से टप-टप आंसू गिरते रहे. हम कुछ नहीं कर सकते थे. ठीक वैसे ही जैसे गुजरात के कुख्यात दंगों में असंख्य परिजन या पड़ोस के लोग अपने जाने-पहचाने लोगों का मारा जाना या उनकी संपत्तियों का विध्वंस होता देखते रह गए.
उर्मिलेश ने लिखा है, राहुल गांधी ने जब लंदन में कहा कि सन 84 के दंगों में कांग्रेस की कोई भूमिका नहीं थी तो मुझे गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के वे बयान याद आने लगे जिनमें वह अक्सर कहा करते थे कि दंगों में उनकी सरकार या पार्टी की कोई भूमिका नहीं है.
मैं यहां उर्मिलेश जी से यह पूछना चाहूंगा कि किन्‍हीं भी परिस्‍थितियों में किसी एक दंगे (1984) की तुलना किसी दूसरे ऐसे दंगे (2002) से कैसे की जा सकती है, जो उस समय हुआ ही नहीं था। सिखों के कत्‍लेआम और गुजरात दंगों के बीच पूरे 18 साल का फासला रहा है। इन 18 सालों में कांंग्रेस ने क्‍या किया। क्‍या 18 साल कांग्रेस ने किसी मौके की ताक में गुजार दिए।
यदि एकबार को यह मान भी लिया जाए कि 84 के कत्‍लेआम और 2002 के दंगों की पृष्‍ठभूमि में कोई आंशिक समानता रही भी तो उर्मिलेश जी यह लिखने का साहस क्‍यों नहीं कर पाये कि कांग्रेस को बचाने के लिए अब राहुल गांधी 2002 के गुजरात दंगों का सहारा ले रहे हैं।
उर्मिलेश जी, क्‍या यह बता पायेंगे कि दुनिया की किसी भी अदालत में कोई अपराधी यह कहकर बच सकता है कि बहुत सारे लोगों ने उसके जैसा अपराध किया है इसलिए उसने कर दिया तो क्‍या गलत कर दिया।
राहुल के कथन पर भारतीय मीडिया के नज़रिए को सरकारी खुशामद बताने वाले उर्मिलेश क्‍या यह स्‍पष्‍ट करेंगे कि वह बड़ी चालाकी के साथ राहुल गांधी और कांग्रेस के साथ खड़े होने की कोशिश क्‍यों कर रहे हैं।
राहुल गांधी यदि कांग्रेस की विरासत के हकदार हैं तो वह अतीत में किए गए कांग्रेस के पापों से किनारा कैसे कर सकते हैं। कांग्रेस किसी व्‍यक्‍ति विशेष का नाम नहीं है, कांग्रेस एक राजनीतिक संगठन है और उसी राजनीतिक संगठन के लोगों ने अपनी नेता इंदिरा गांधी की हत्‍या के प्रतिशोध में खुलेआम सिखों का कत्‍लेआम किया और करवाया। आज उसी कांग्रेस का उत्तराधिकार राहुल गांधी के पास है। फिर कांग्रेस और राहुल गांधी भी निर्दोष कैसे हुए।
रही बात 84 के सिख दंगों के लिए मनमोहन सिंह द्वारा माफी मांगे जाने की अथवा गुजरात दंगों के लिए मोदी द्वारा माफी न मांगे जाने की, तो हजारों निर्दोष लोगों के कत्‍ल का अपराध किसी माफीनामे के खेल से खत्‍म नहीं हो जाता।
गुजरात दंगों के लिए जिम्‍मेदार गोधरा के नरसंहार में भी और उसके बाद हुए दंगों पर भी कोर्ट ने फैसला सुनाया है लेकिन सिख समुदाय आज भी न्‍याय के लिए दर-दर भटक रहा है जबकि इस बीच माफी मांगने वाले सरदार मनमोहन सिंह पूरे दस साल देश के प्रधानमंत्री रहे।
84 और सन् 2002 के दंगों में अद्भुत साम्य देखने वाले उर्मिलेश अचानक राहुल गांधी के इस व्‍यवहार को बाबरी ध्‍वंस के बाद उपजे भाजपा नेताओं के व्‍यवहार से जोड़ने लगते हैं।
वो लिखते हैं- कहीं ऐसा तो नहीं कि राहुल गांधी, भाजपा नेताओं की तरह अपनी पार्टी की हर ग़लती और हर गुनाह पर पर्दा डालने की भौंडी शैली अख्तियार कर रहे हैं.
उर्मिलेश यह तो लिखते हैं कि दोनों पार्टियां दंगे के लिए दोषी ठहराए जाने पर अक्सर एक-दूसरे को कोसती हैं. गुजरात का मामला उठाए जाने पर भाजपा द्वारा सिख विरोधी दंगे का सवाल उठाकर कांग्रेस का मुंह बंद करने की कोशिश की जाती है.
लेकिन उर्मिलेश यह नहीं लिखते कि 1984 में हुए सिखों के कत्‍लेआम को उसके 18 साल बाद हुए गुजरात दंगों से कैसे तोला जा सकता है।
वह छद्म निरपेक्षता की आड़ लेकर दादरी के अख़लाक का और मॉब लिचिंग का जिक्र करना नहीं भूले परंतु केरल और पश्‍चिम बंगाल में हुई बेरहम हत्‍याओं का जिक्र करना जरूरी नहीं समझा।
दरअसल, कोई भी टीवी डिबेट देख लीजिए। हर डिबेट में बेशर्मों का ऐसा पैनल बैठा मिलेगा जो एक अपराध की तुलना दूसरे अपराध से करके अपनी पार्टी अथवा अपनी विचारधारा वाले नेताओं के कुकर्मों को जायज ठहरा रहा होगा।
रटे-रटाए चेहरों वाले पैनल में शामिल लोग मूल मुद्दे से ध्‍यान भटकाने के लिए बहस को किसी भी तरफ मोड़ने में उसी प्रकार माहिर होते हैं जिस प्रकार कोई पेशेवर शातिर अपराधी माहिर होता है।
उर्मिलेश जी, यहां सवाल यह नहीं है कि राहुल गांधी कितने ज्ञानी हैं या विदेशी मीडिया ने उनके विचारों की ताज़गी को समझा, सवाल सिर्फ इतना सा है कि क्‍या किसी अपराध या अपराधी का अनुसरण करके अपने अपराध को जायज ठहराया जा सकता है।
भारतीय मीडिया अगर खुशामद करने में लगा है तो आप क्‍या कर रहे हैं। आप भी तो वही कर रहे हैं। सरकार को न सही, किसी को खुश करने का प्रयास तो आपके द्वारा भी किया जा रहा है।
आपने खुद लिखा है कि 84 का कत्‍लेआम आपके सामने हुआ, और इसीलिए आप यह चिन्‍हित कर पाए कि सिखों का कत्‍लेआम करने वाले भेड़ियों में कांग्रेसियों के साथ-साथ कथित हिंदुत्‍ववादी तथा असामाजिक तत्‍व भी शामिल थे।
तो प्‍लीज, एक जिम्‍मेदार पत्रकार न सही किंतु एक जिम्‍मेदार नागरिक होने के नाते अदालत के सामने पेश होकर बताइए कि सिखों का कत्‍लेआम आपकी आंखों के सामने हुआ और आप विक्‍टिम न होते हुए न्‍याय के लिए उनका नाम बताना चाहते हैं।
आप बताइए कि कांग्रेसियों के साथ कौन-कौन हिंदुत्‍ववादी और असामाजिक तत्‍व सिखों का कत्‍लेआम करने में शामिल थे।
सिखों के कत्‍लेआम पर राजीव गांधी ने क्‍या कहा, गुजरात दंगों के बाद मोदी जी क्‍या बोले, अटल बिहारी वाजपेयी ने मोदी जी से क्‍या कहा और राहुल गांधी अब किसके नक्‍शे कदम पर चल रहे हैं, इन राजनीतिक पचड़ों में पड़ने की बजाय आप तो अपना धर्म निभा दीजिए। यकीन मानिए 34 वर्षों से न्‍याय की आस में टकटकी लगाकर देख रही आंखों के लिए आप किसी दीपक से कम साबित नहीं होंगे।
तुलना करने का काम भारतीय मीडिया और राजनीतिक प्रवक्‍ताओं पर छोड़ दीजिए और राहुल गांधी के ज्ञान को परिभाषित करने का जिम्‍मा विदेशी मीडिया पर जाने दीजिए। आप अपना काम ही कर लीजिए। यकीन मानिए, बहुत सुकून मिलेगा।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

बिना विद्योत्तमा के कोई “कालिदास” कभी “महाकवि” बना है क्‍या, फिर आप कैसे ?

ऐसी तमाम औरतें मिल जाएंगी जिनकी तरक्‍की में किसी भी पुरुष का हाथ नहीं रहा, किंतु कोई पुरुष शायद ही ऐसा मिले जिसने औरत के सहयोग बिना तरक्‍की हासिल की हो। शायद इसीलिए कहा जाता है कि हर पुरुष की तरक्‍की में किसी न किसी महिला का अपरोक्ष या परोक्ष हाथ जरूर होता है।
दुनियाभर को छोड़कर यदि सिर्फ भारतीय महिलाओं की बात करें तो माया, ममता, जया (जयललिता) जैसी देवियां इसकी उदाहरण हैं। पुरुषों में अटल बिहारी वाजपेयी (अब स्‍वर्गीय) का नाम अपवाद स्‍वरूप लिया जा सकता है। हालांंकि उनके खुद के शब्‍दों में वो अविवाहित जरूर थे किंतु कुंवारे नहीं। इसका सीधा-सीधा अर्थ यही निकलता है कि उनकी जिंदगी में भी कोई न कोई औरत रही जरूर थी। मोदी जी ने अपने पिछले नामांकन पत्र से स्‍पष्‍ट कर ही दिया था कि वह विवाहित हैं।
कहने का तात्‍पर्य यह है कि आदिकाल से किसी महिला को कभी कालिदास की आवश्‍यकता महसूस नहीं हुई परंतु हर युग में कालिदासों को विद्योत्तमा की सख्‍त जरूरत रही है। एक भी उदाहरण ऐसा देखने या सुनने में नहीं मिलता कि कोई कालिदास किसी विद्योत्तमा के हड़काए बिना ‘महाकवि कालिदास’ बना हो।
यह अलग बात है कि कोई कालिदास विवाहित जीवन के प्रथम चरण में विद्योत्तमा से ज्ञान प्राप्‍त कर बुद्धिमानों की जमात का हिस्‍सा बन जाता है और किसी-किसी के ज्ञान चक्षु अंतिम चरण में जाकर खुलते हैं। जैसे हमारे मोदी जी ने प्रथम चरण में ज्ञान प्राप्‍त कर लिया लिहाजा आज कितनों के कलेजे पर मूंग दल रहे हैं।
खैर, मुझे तो चिंता हो रही है अपने राहुल ‘बाबा’ की। मेरी समझ में नहीं आ रहा कि आधी सदी बीत गई जीवन की, लेकिन उनके नाम से चिपका हुआ ”बाबा” उनका पीछा नहीं छोड़ रहा।
अभी पिछले दिनों संसद में उन्‍होंने सार्वजनिक रूप से स्‍वीकार किया कि लोग उन्‍हें प्‍यार से ”पप्‍पू” भी कहते हैं। अब ”पप्‍पू” का शाब्‍दिक अर्थ क्‍या है, इसकी जानकारी या तो कहने वालों को होगी या सुनने वालों को। राहुल बाबा भी इस नाम में छिपे रहस्‍य से अवश्‍य वाकिफ होंगे अन्‍यथा इतने गर्व के साथ एक्‍सेप्‍ट नहीं करते। इतने गर्व से तो वह खुद को हिंदू तक नहीं कहते, फिर पप्‍पू क्‍यों कहने लगे। जाहिर है कि वह हिंदू और पप्‍पू दोनों का गूढ़ार्थ समझते हैं। हिंदू होना भी वह यदा-कदा इसी तरह स्‍वीकार कर लेते हैं जैसे पप्‍पू होना।
कुल मिलाकर बात इतनी सी है कि हमारे राहुल बाबा की जिंदगी में अब तक कोई महिला नहीं आई है। दस्‍तावेज तो यही बताते हैं, वैसे राहुल बाबा अपने लिए किसी विद्योत्तमा की तलाश करने को कब के अधिकृत हो चुके हैं। राहुल बाबा की जिंदगी में किसी महिला की कमी अक्‍सर तब खटकती है जब वो सार्वजनिक भाषण देते हैं।
अब देखिए…जर्मनी के हैम्बर्ग में वह कह बैठे कि भारत में मॉब लिंचिंग होने की वजह नोटबंदी, GST तथा बेरोजगारी है, और अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर आईएसआईएस जैसे कुख्‍यात आतंकवादी गिरोह का उदय भी बेरोजगारी के कारण हुआ था।
लोगों का दावा है कि यदि राहुल बाबा के जीवन में लिखा-पढ़ी के तहत कोई विद्योत्तमा होती तो वो ऐसा कतई नहीं बोलते।
उन्‍होंने इस दौरान पुरुषों को भी यह कहकर अच्‍छा-खासा लैक्‍चर पिलाया कि भारतीय पुरुष महिलाओं को लेकर समानता व सम्‍मान का भाव नहीं रखते। पता नहीं राहुल बाबा को यह ज्ञान कहां से प्राप्‍त हुआ।
जहां तक उनकी परवरिश का सवाल है तो उनके यहां महिलाओं को बराबर से ऊपर का दर्जा भी मिला और सम्‍मान भी भरपूर प्राप्‍त हुआ। उनकी दादी इसका प्रमाण हैं। फिर मम्‍मी सोनिया जी सामने हैं। यह बात अलग है कि बहन प्रियंका को वो सम्‍मान अब तक नहीं मिला जिसकी वो हकदार बताई जाती हैं। पता नहीं राहुल बाबा, मम्‍मी जी से बहन प्रियंका के बारे में कब बात करेंगे।
देश के अधिकांश जिम्‍मेदार नागरिकों को ऐसा महसूस होता है कि राहुल बाबा को एक अदद विद्योत्तमा की अत्‍यंत आवश्‍यकता है और यह आवश्‍यकता उन्‍हें 2019 के चुनाव का बिगुल बजने से पहले पूरी कर लेनी चाहिए।
कालिदास के जीवन में जो कुछ घटा, वह बताता है कि बुद्धि की कमी उनमें कभी नहीं रही होगी। होती तो वह किसी भी सूरत में कालिदास से महाकवि कालिदास नहीं बन सकते थे। बुद्धि उनमें भरपूर थी परंतु उसका उदय तब हुआ जब विद्योत्तमा ने उनके जीवन में पदार्पण किया।
गुजरे जमाने में जगद्गुरू शंकराचार्य को भी ऐसी मुसीबत झेलनी पड़ी थी। गए थे मंडन मिश्र नामक विद्वान से शास्त्रार्थ करने, उन्‍हें आसानी से हरा भी दिया लेकिन उनकी पत्‍नी गले पड़ गईं। कहने लगीं कि मैं इनकी आर्धांगनी हूं इसलिए मुझे हराए बिना इनकी हार मुकम्‍मल नहीं मानी जा सकती। बेचारे शंकराचार्य थे अविवाहित। गृहस्‍थाश्रम के ज्ञान से शून्‍य। चुनौती मिली तो लौटना पड़ा उल्‍टे पांव। बाद में किसी जतन से गृहस्‍थाश्रम में प्रवेश किया और मंडन मिश्र की पत्‍नी के सवालों का जवाब खोज पाए। कहने का मतलब यह है कि शंकराचार्य जैसे धर्मधुरंधर को भी मंडन मिश्र की विद्योत्तमा ने दौड़ा लिया।
यूं भी देखा जाए तो किसी भी भाषण का स्‍क्रिप्‍ट राइटर घर का होने के कई फायदे हैं। बात दबी रहती है। पता नहीं चलता कि घर-घर में कालिदास बैठे हैं। हिंदुस्‍तान तो कालिदासों से भरा पड़ा है। बात घर की चारदीवारी से निकली नहीं कि पोल खुल जाती है। फिर जर्मनी तो बहुत दूर है। स्‍क्रिप्‍ट राइटर कहां-कहां साथ जा सकता है। सामने से कब कौन सवाल उछाल दे।
आपको पता होगा कि जर्मनी जैसे ही एक हिंदुस्‍तानी कार्यक्रम में राहुल बाबा पर किसी लड़की ने एनसीसी के बावत सवाल दे मारा। बेचारे बमुश्‍किल यह कहकर पीछा छुड़ा पाए कि मुझे एनसीसी का कोई ज्ञान नहीं है।
राहुल बाबा को समझना चाहिए कि हर जगह पीछा छुड़ाना आसान नहीं होता क्‍योंकि हर जगह एनसीसी से जुड़े सवाल नहीं पूछे जाते।
भारत वापसी पर कोई यह भी पूछ सकता है कि अपने निष्‍कर्ष से आप देश में आईएसआईएस को न्‍योता दे रहे हैं या ये बता रहे हैं कि बेरोजगारी के चलते भारत में आईएसआईएस के लिए बहुत स्‍कोप है।
जो भी हो राहुल बाबा, 2019 का चुनाव सामने हैं। आपके पास तो वैसे ही मणिशंकर जैसी मणि, दिग्‍विजय जैसे दिग्‍गज और संजय निरुपम जैसे निराले व्‍यक्‍तित्‍वों की भरमार है। बेहतर होगा कि आप उनसे खुद को अलग बनाए रखें।
ऐसा न हो सके तो एक अदद विद्योत्तमा समय रहते तलाश लें वरना लेने के देने पड़ जाएंगे। चुनाव बेशक कुंभ का मेला न सही, लेकिन चुनाव तो है। पांच साल बाद मौका मिलता है। और हां, बोल चाहे जहां लें। दुनिया के किसी कोने में भाषण दे आएं परंतु आपके लिए चुनाव भारत में होने हैं।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

राजनीति के अजातशत्रु अटल बिहारी वाजपेयी का मथुरा से रहा हमेशा गहरा नाता

राजनीति में ‘अजातशत्रु’ कहे जाने वाले पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का महाभारत नायक योगीराज भगवान श्रीकृष्‍ण की जन्‍मस्‍थली मथुरा से भी गहरा नाता रहा है।
दरअसल, मथुरा जनपद में राष्‍ट्रीय राजमार्ग नंबर दो पर स्‍थित फरह क्षेत्र का गांव नगला चंद्रभान पंडित दीनदयाल उपाध्याय की मातृभूमि है।
चूंकि अटल बिहारी वाजपेयी ने एकात्म मानववाद के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय के सानिध्य में ही ‘जनसंघ’ से अपनी राजनीति का सफर शुरू किया था इसलिए उनका पंडित दीनदयाल एवं उनकी मातृभूमि नगला चंद्रभान से हमेशा आत्‍मीय लगाव रहा।
अटल जी नगला चंद्रभान में बने दीनदयाल उपाध्याय धाम ट्रस्ट के अध्यक्ष रहे। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी अटल जी पंडित दीनदयाल उपाध्‍याय को नमन करने नगला चंद्रभान (मथुरा) आए।
मथुरा की कचौड़ी-जलेबी और ठंडाई के शौकीन अटल बिहारी वाजपेयी ने यहां अपना संबंध और प्रगाढ़ बनाने के लिए 1957 में मथुरा लोकसभा सीट से चुनाव भी लड़ा, किंतु हार गए। यहां उन्‍हें अपनी जमानत तक गंवानी पड़ी। इस चुनाव में प्रसिद्ध क्रांतिकारी राजा महेन्‍द्र प्रताप निर्दलीय प्रत्‍याशी की हैसियत से चुनाव जीते थे।
अटल जी ने तब एकसाथ तीन लोकसभा सीटों लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से चुनाव लड़ा था। लखनऊ में वो चुनाव हार गए, मथुरा में उनकी ज़मानत ज़ब्त हो गई लेकिन बलरामपुर से चुनाव जीतकर वो दूसरी लोकसभा में पहुंचे। अगले पाँच दशकों के उनके संसदीय करियर की यह शुरुआत थी।
अटल बिहारी-बांके बिहारी-छैल बिहारी
राजनीति में मथुरा की हमेशा अपनी एक विशिष्ट पहचान रही। जनसंघ के जमाने में भी मथुरा की राजनीति हमेशा चर्चा का केन्‍द्र रहती थी, और इसका एक कारण शायद यह भी था कि अटल बिहारी वाजपेयी के दो अभिन्‍न मित्र मथुरा से ताल्‍लुक रखते थे।
अटल बिहारी, बांके बिहारी और छैलबिहारी के रूप में प्रसिद्ध मित्रों की इस तिकड़ी में अटल जी के अलावा स्‍वामीघाट के बांके बिहारी माहेश्‍वरी तथा राया (मथुरा) कस्‍बे के निवासी छैल बिहारी अग्रवाल शामिल थे।
बांके बिहारी माहेश्‍वरी हालांकि अपनी योग्‍यता के अनुरूप राजनीति में कोई बड़ा मुकाम हासिल नहीं कर सके किंतु अटल जी से उनके रिश्‍तों की गरमाहट में कभी कोई कमी नहीं आई।
यही हाल राया निवासी छैलबिहारी का भी था। छैलबिहारी से अटल जी जब भी मिले, तब उतनी ही आत्‍मीयता से मिले जितने राजनीति के सफर की शुरूआत में मिला करते थे।
यही कारण है कि जनसंघ में यह कहा जाता था कि दिल्ली में अटल बिहारी, मथुरा में बांके बिहारी और राया में छैल बिहारी।
25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर (मध्‍यप्रदेश) में जन्‍मे अटल बिहारी वाजपेयी चुनाव प्रचार करते हुए भी नमकीन में चाट-पकौड़ी और मूंग की दाल के मगोड़े तथा मिठाई में पेड़े व रबड़ी का स्‍वाद लिए बिना नहीं रहते थे।
बताया जाता है कि आपातकाल के चलते मीसा में बंद होने के बाद जब उन्‍हें पैरोल मिली तो वह सीधे मथुरा आए।
यह सारी घटनाएं बताती हैं कि चुनाव में हार मिलने के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी न तो कभी मथुरा और मथुरा के अपने मित्रों को भूल पाए और न मथुरा कभी उन्‍हें विस्‍मृत कर सकी।
-Legend News

बूढ़ी होती स्‍वतंत्रता की जवान पीढ़ी का सच: सिर्फ अधिकारों की बात…कर्तव्‍यों का क्‍या ?

देश को स्‍वतंत्र हुए आज पूरे 71 साल हो गए। यानी जिस पीढ़ी ने आजाद भारत में आंखें खोलीं, वह आज बूढ़ों की जमात में शामिल हो चुकी है। इस पीढ़ी ने आजादी की लड़ाई को सिर्फ किस्‍से-कहानियों की तरह सुना है, या चलचित्रों में देखा है।
परतंत्र भारत की पीड़ा के साक्षी मुठ्ठीभर लोग ही बचे होंगे, और जो बचे होंगे उनमें बहुत से तो उस पीड़ा को बयां करने की स्‍थिति में नहीं होंगे।
गुलामी, परतंत्रता, अधीनता आदि कहने को तो मात्र शब्‍दभर हैं किंतु इनका दर्द वही समझ सकता है जिसने इन्‍हें भोगा है।

https://youtu.be/XK6566eXM4U


स्‍वतंत्र भारत ने 71 सालों के इस सफर में निश्‍चित ही एक मुकाम हासिल किया है और दुनिया को लोकतंत्र की ताकत समझाने में सफल भी रहा है परंतु टीस इस बात की है कि सत्तासुख भोगने वाले लोग जवान होती पीढ़ी को यह समझाने में असफल रहे कि देश ने स्‍वतंत्रता की कितनी बड़ी कीमत चुकाई है।
एक तरह से देखा जाए तो स्‍वतंत्रता की लड़ाई में अपने प्राणों की आहुति देने वालों और उसके लिए जीवन लगा देने वालों के बलिदान को चंद लोगों ने भुनाया तो खूब, परंतु श्रेय देने से मुंह मोड़ते रहे।
यही कारण है कि आज की पीढ़ी उंगलियों पर गिने जाने लायक स्‍वतंत्रता संग्राम सेनानियों से ही परिचित है।
स्‍वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे राष्‍ट्रीय पर्वों की भव्‍यता में नि:संदेह काफी इजाफा हुआ है किंतु भावनात्‍मक दृष्‍टि से ये वर्ष-दर-वर्ष फीके होते जा रहे हैं क्‍योंकि इस बीच राष्‍ट्रवाद को भी राजनीति का विषय बना दिया गया।
सत्ता मात्र सुख का साधन बन गई और उसकी प्राप्‍ति के एकमात्र ध्‍येय में लिप्‍त राजनेताओं के लिए स्‍वतंत्रता का मकसद पीछे छूटता चला गया।
स्‍वतंत्रता सेनानियों को भी निजी स्‍वार्थपूर्ति के लिए खांचों में बांट देने वाली दलगत राजनीति ने कभी यह सोचा ही नहीं कि नई पीढ़ी को बिना तोड़े-मरोड़े उस दौर के इतिहास से परिचित कराना बहुत जरूरी है। आज वीर सावरकर एक दल के लिए महान क्रांतिकारी हैं तो दूसरा दल उन्‍हें फिरंगियों का मोहरा साबित करने से नहीं चूकता।
भगत सिंह पर वामपंथी अपना ठप्‍पा लगाते हैं तो अंबेडकर को दूसरे दलों ने अपना प्रतीक चिन्‍ह घोषित कर दिया है।
कहते हैं कि आधा ज्ञान और आधी जानकारी हमेशा अंधे कुएं की तरह हैं। नई पीढ़ी इसी अंधे कुएं में भटकने को अभिशप्‍त है। उसके सामने है तो ऐसी ही आधी-अधूरी जानकारियों से भरा गूगल बाबा का वो पिटारा जो विदेशी सोच से संचालित होता है।
आज यदि सबसे ज्‍यादा जरूरत है तो इस बात की कि स्‍वतंत्र भारत के युवा को गूगल के ज्ञान से इतर ले जाया जाए। उसकी गूगल पर बढ़ती निर्भरता को कम करके धरातल पर मौजूद सच्‍चाई का साक्षात्‍कार कराया जाए। जंगे आजादी में भूमिका निभाने वाले बचे-खुचे सेनानियों को सामने लाया जाए। उन्‍हें मात्र पेंशन देकर अपने कर्तव्‍य की इतिश्री कर लेने की बजाय उनके संघर्ष की गाथाएं सुनाई जाएं।
सिर्फ अधिकारों की बात करने वाली नई पीढ़ी को देश के प्रति अपने कर्तव्‍य का भान कराना भी उतना ही जरूरी है जितना कि नई तकनीक से परिचित कराना। कर्तव्‍यों से विमुख नई पीढ़ी तकनीकी रूप से चाहे कितनी भी समृद्ध क्‍यों न हो जाए, वह न तो कभी देश के काम आ सकती है और न देशवासियों के।
नई पीढ़ी में कर्तव्‍यों के प्रति बोध पैदा करने के लिए बिना भेद-भाव स्‍वतंत्रता संग्राम का इतिहास सामने लाना अत्‍यंत आवश्‍यक है क्‍योंकि इतिहास से सबक़ न लेने वाले लोग नष्‍ट होने को अभिशप्त होते हैं।
क्‍यों न इस स्‍वतंत्रता दिवस पर ऐसा कोई संकल्‍प लिया जाए जिससे नई पीढ़ी अपने राष्‍ट्रीय पर्वों को मात्र छुट्टी का एक दिन न समझकर देश के प्रति कर्तव्‍य का अहसास करे तथा उससे लेने ही लेने की बजाय, उसे कुछ देने अथवा उसके लिए कुछ करने का जज्‍बा भी पाल सके।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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