शुक्रवार, 12 अप्रैल 2019

मथुरा के तीनों प्रमुख प्रत्‍याशियों की ”जीत का सर्वे”: अंधे ने गूंगे और बहरे से पूछा, भाई…प्रजातंत्र कैसा है?

आज श्‍याम मिश्र की एक ‘क्षणिका’ पढ़ी, पढ़ी तो पढ़ता ही रह गया क्‍योंकि मिश्र जी ने गागर में सागर भर दिया था।
चूंकि लोकतंत्र का ”दो-मासी महापर्व” शुरू हो चुका है इसलिए वह ‘क्षणिका’ अंदर तक उतर गई। आप भी पढ़िए इसे…आनंद आएगा-
एक था अंधा, दूसरा गूंगा, और तीसरा बहरा 
अंधे ने गूंगे और बहरे से पूछा- भाई…प्रजातंत्र कैसा है ? 
बहरे ने सुना नहीं और गूंगा बोलने में असमर्थ था। क्‍या अब आप आगे भी कुछ सुनना चाहाेगे ? सुनाेगे तो तब, जब सुनाने को कुछ बचा हो।
प्रजातंत्र की इससे अधिक सटीक, सुंदर और काव्‍यात्‍मक परिभाषा मेरे सामने कभी नहीं आई।
खैर, इस परिभाषा से प्रेरित होकर मैंने कृष्‍ण की नगरी मथुरा में लोकसभा चुनावों को लेकर एक सर्वे करना जरूरी समझा।
हमारे समस्‍त मीडिया महारथी तो जनता के बीच जाकर सर्वे करते हैं लेकिन मैंने अंधे, गूंगे तथा बहरे की कहानी के मद्देनजर यह सर्वे प्रत्‍याशियों के बीच जाकर किया।
हवा का रुख और मौसम का मिजाज भांपकर जो नहीं चलता, उसे मुंह की खानी पड़ती है, ऐसा ज्ञानी लोग कहते चले आए हैं।
औरों की वो जानें मैंने इसी ज्ञान पर अमल करके सबसे पहले हे-माजी के चरण पखारे और पूछा- क्‍या आप अपनी जीत के प्रति आश्‍वस्‍त हैं?
जैसे को तैसा की कहावत पूरी करता हुआ जवाब मिला- यदि हमें अपनी जीत पर रत्तीभर भी डाउट होता तो क्‍या हम छ: महीने पहले कहते कि फिर से मथुरा को हम ही धन्‍य करेंगे
जीत के प्रति इस ओवर कॉन्फिडेंस का कारण जानना चाहा तो सवाल के जवाब में सवाल सुनने को मिला- आजतक मथुरा में हमसे अधिक विकास किसी सांसद ने कराया है ?
जाहिर है हमारी बोलती बंद। क्‍या ओढ़ें और क्‍या बिछाएं। मथुरा का विकास तो मथुरा में समा नहीं रहा। इतना फैल गया है जैसे रायता फैल जाता है। कहां तक समेटें इस विकास को। सोचकर आए थे कि ”मोदी है तो मुमकिन है” जैसा कुछ सुनने को मिलेगा लेकिन यहां तो ”हम हैं तो सबकुछ है” सुनकर पूर्ण तृप्‍ति का भाव पैदा हो चुका था।
इसके आगे हमारी हिम्‍मत जवाब दे गई और हमने दबे पांव खिसक लेने में ही अपनी भलाई समझी।
इसके बाद हम कई-कई गांठों से ”आबद्ध” कुंवर साहब के सामने साष्‍टांग करने पहुंचे और पूछा- प्रभु आप तो विधानसभा चुनावों की ”हैट्रिक” का अनुभव प्राप्‍त हैं। राजनीति तो आपके यहां कोठी के पाइपों से पानी की तरह बहती है। आपके यहां बह रही राजनीति से कितने खर-पतवार पनप गए। आप भले ही सांसदी का चुनाव पहली मर्तबा लड़ने उतरे हों किंतु आपके ज्‍येष्‍ठ भ्राता उसी प्रकार लोकसभा चुनावों में जीत की हैट्रिक लगा चुके हैं जिस प्रकार आप विधानसभा चुनावों में हा….. की।
पूरा शब्‍द हमारे गले में अटक चुका था क्‍योंकि हमने सामान्‍य शिष्‍टाचार का ध्‍यान जो नहीं रखा।
हमें पता है चुनावी मौसम नहीं होता तो हमें इस गुस्‍ताखी की अच्‍छी खासी सजा मिलती लेकिन चुनाव में नेतागण विनम्रता की मूरत बन जाते हैं।
कुंवर साहब ने भी हमारी धृष्‍टता पर कान धरे बिना मूल मुद्दे को पकड़ा और बोले- हमारी जीत उतने ही मतों से होगी जितने से 2014 में हमारे युवराज हारे थे। हमें उनकी हार का बदला लेना है। जीत तो हम चुके हैं, बस पहले ”मत पड़ना” और फिर ”मत गणना” होना बाकी है। साइकिल पर सवार हाथी जब हैंडपंप चलाएगा तो वोटों की कीच ही कीच होगी। इस बार हमारी जीत पक्‍की है। कलफ लगे हुए दर्जनों कुर्ते-पायजामे तैयार हैं। शपथ लेना शेष है
कुंवर साहब के चेहरे की लबालब मुस्‍कान और छलकती जीत को छोड़कर हम गली पीरपंच पहुंचे।
यहां हमने तीर्थ पुरोहितों के अंतर्राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष और माथुर चतुर्वेदियों के संरक्षक कांग्रेस प्रत्‍याशी महामहिम पाठक जी के दर्शनों की अनुमति उनके शागिर्दों से मांगी
चुनावी मौसम में चूंकि पत्रकारों की ”पूछ” कुछ लंबी हो जाती है इसलिए दर्शन लाभ शीघ्र प्राप्‍त हो गया।
हमने पाठक जी से जानना चाहा कि हे युग पुरुष..आपकी सीरत और शोहरत से आपकी सूरत भले ही मेल न खाती हो किंतु आपकी सफेदी निरमा के विज्ञापन से शत-प्रतिशत मेल खाती है। आप भी पूर्व में एक लोकसभा चुनाव का अनुभव प्राप्‍त कर चुके हैं। कांग्रेस से आपके संबंध जन्‍मजात हैं। कांग्रेस के बिना आपकी और आपके बिना कांग्रेस की कल्‍पना तक करना मूर्खता है। ये बात अलग है कि बिना गठबंधन के आप हर पार्टी में ”बांधव भाव” के लिए जाने जाते हैं।
ऐसे में आपको क्‍या लगता है कि मथुरा की जनता आपको हराने की हिम्‍मत कर पाएगी ?
पाठक जी, गले में पड़ी गुलाबों की माला दिखाते हुए बोले- लगता है आप कभी वरिष्‍ठ पत्रकार बन ही नहीं पाएंगे। कनिष्‍ठ थे, कनिष्‍ठ हैं और कनिष्‍ठ ही रहेंगे। 
इसके बाद पाठक जी को यकायक शायद याद आया कि अभी मतदान तो हुआ नहीं है इसलिए पत्रकारों की शान में इतने कसीदे गढ़ना ज्‍यादा हो जाएगा, लिहाजा बात संभालते हुए कहने लगे- देखिए बंधु, हमारे कहने का आशय यह था कि आप अब तक उसी प्रकार बाल रूप में खेल रहे हैं जिस प्रकार हमारे ”चिर युवा” राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष। 
हम आपकी ‘तरो-ताजा’ अनटच बुद्धि का सम्‍मान करते हैं किंतु आपको हमारे गले में पड़े गुलाबों के ताजे हार को देखकर तो समझ जाना चाहिए कि हम तो चुनाव जीत चुके हैं। बस प्रशासन को मतदान की लकीर पीटनी है। मतगणना हमने कर ली है। हम पूरे 3 लाख 72 हजार वोटों से जीत रहे हैं। कोई शक हो तो बताओ वरना लंबे पड़ो।
पाठक जी की बात में दम देख हम परछाई की तरह लंबे हो लिए और बाहर निकलकर पान की दुकान के बाहर लगे शीशे में खुद को निहारने लगे।
शीशे से साक्षात्‍कार होते ही दिमाग की बत्‍ती जली और ध्‍यान आया कि यार… आखिर है तो तू भी इन जैसों का एक वोटर ही। जीतना तो इन्‍हीं में से किसी एक को है।
वैसे तीनों भी जीत जाएं तो बुराई क्‍या है। एक-एक करके तीन न सही, तीनों एकसाथ सही। सिर तो ओखली में रहेगा ही, मूसलों की चोट कहां तक गिनोगे।
आप भी ज़रा मेरी तरह सोचकर देखिए…और फिर बताइए कि यदि तीन लोक से न्‍यारी मथुरा एकसाथ तीन सांसदों का भार अपने सिर पर ढो ले तो इसमें बुराई क्‍या है। 
ज्‍यादा से ज्‍यादा ”कोढ़ में खाज” की कहावत चरितार्थ होगी, इससे ज्‍यादा कुछ नहीं। ये मेरा दावा है। एक जीते या तीनों जीत जाएं। पतित पावनी मथुरा को अगले चुनावों तक फिर कोई न कोई जीत का दावेदार मिल ही जाएगा। आयातित, निर्यातित या स्‍थापित।
जाते-जाते एक क्षणिका और…समझ सको तो समझ लेना अन्‍यथा अगले चुनाव तक समझ में आ ही जाएगा कि-
देव प्रतिमाओं के परिपूर्ण पुजारी बनके, सब शिकारी चले आए हैं भिखारी बनके
-Legend News

उत्तर प्रदेश की इन 15 सीटों पर दिखाई देगा दिलचस्‍प सियासी संग्राम…

बीजेपी उम्मीदवारों की घोषणा के साथ ही उत्तर प्रदेश में कई हाई प्रोफाइल सीटों पर चुनावी घमासान का मंच सज चुका है।
यहां 15 सीटों पर बीजेपी और एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन तथा कांग्रेस के बीच दिलचस्प सियासी संग्राम देखने को मिल सकता है।
बीजेपी ने लोकसभा चुनाव के लिए अपने प्रत्याशियों की पहली सूची जारी कर दी है। इस लिस्ट में उत्तर प्रदेश से 35 नाम हैं। इस लिस्ट में वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बागपत से सत्यपाल सिंह व मथुरा से हेमा मालिनी सहित कई दिग्‍गजों के नाम शामिल हैं। 8 सीटों पर पहले चरण में 11 अप्रैल को मतदान होना है।
उत्तर प्रदेश की जिन सीटों पर कांटे का मुकाबला होने की संभावना नजर आ रही है उनमें ये सीटें प्रमुख हैं-
1- सहारनपुर 
राघव लखनपाल (बीजेपी)
इमरान मसूद (कांग्रेस)
मतदान- 11 अप्रैल
वेस्ट यूपी की इस सीट पर बीजेपी ने एक बार फिर राघव लखनपाल पर भरोसा जताया है। वहीं, कांग्रेस ने भी पिछली बार दूसरे नंबर पर रहे इमरान मसूद को टिकट दिया है। इमरान मसूद पिछले चुनाव में पीएम मोदी के खिलाफ विवादित बयान देकर सुर्खियों में रहे थे। यहां एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन ने अभी अपने उम्मीदवार का ऐलान नहीं किया है। 2017 में सहारनपुर जातीय संघर्ष को लेकर चर्चा में रहा। इसके साथ ही यहां भीम आर्मी और उसके नेता चंद्रशेखर का उभार भी चुनाव में असर डाल सकता है।
2- मुजफ्फरनगर 
संजीव बालियान (बीजेपी)
चौधरी अजित सिंह (आरएलडी)
मतदान- 11 अप्रैल
सांप्रदायिक हिंसा की पृष्ठभूमि में हुए 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान मुजफ्फरनगर में ध्रुवीकरण के हालात देखने को मिले थे। बीजेपी ने जहां एक बार फिर सिटिंग एमपी और केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान को उम्मीदवार बनाया है, वहीं एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन के तहत इस सीट से चौधरी अजित सिंह लड़ रहे हैं। आरएलडी सुप्रीमो को पिछले चुनाव में बागपत सीट पर शिकस्त झेलनी पड़ी थी। यहां तक कि वह तीसरे नंबर पर जा पहुंचे थे लेकिन इस बार गठबंधन की वजह से मुजफ्फरनगर में दिलचस्प जंग देखने को मिलेगी।
3- बागपत 
सत्यपाल सिंह (बीजेपी)
जयंत चौधरी (आरएलडी)
मतदान- 11 अप्रैल
पहले चौधरी चरण सिंह और फिर उनके बेटे अजित सिंह की वजह से चर्चित सीट पर इस बार परिवार की राजनीतिक विरासत को जयंत चौधरी आगे बढ़ा रहे हैं। गठबंधन के तहत यह सीट आरएलडी के हिस्से में आई है।
बीजेपी ने पिछली बार जयंत के पिता को मात देने वाले सत्यपाल सिंह पर दोबारा दांव खेला है। मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर और वर्तमान में केंद्रीय मंत्री सत्यपाल सिंह पिछले चुनाव के दौरान काफी चर्चित रहे थे। अब देखना दिलचस्प होगा कि जयंत पिता की हार का बदला ले पाते हैं या जाट लैंड में सत्यपाल फिर विजयी होते हैं।
4- गाजियाबाद 
वी के सिंह (बीजेपी)
सुरेंद्र कुमार उर्फ मुन्नी शर्मा (एसपी)
डॉली शर्मा (कांग्रेस)
मतदान- 11 अप्रैल
गाजियाबाद यूपी की वह सीट है, जहां पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी ने राज्य में सबसे ज्यादा मतों के अंतर से जीत हासिल की थी। पूर्व सेनाध्यक्ष वी के सिंह को बीजेपी ने यहां से अपना उम्मीदवार बनाया है। गाजियाबाद सीट राजपूत बहुल है और साठा-चौरासी इलाके के तहत आने वाले 144 गांवों में इस समुदाय का बड़ा वोट बैंक है। बीजेपी ने राजपूत समुदाय से ही आने वाले रिटायर्ड जनरल वी के सिंह को मैदान में उतारा है। गठबंधन की तरफ से सुरेंद्र कुमार उर्फ मुन्नी शर्मा और कांग्रेस की ओर से डॉली शर्मा कैंडिडेट हैं।
5- गौतमबुद्धनगर 
महेश शर्मा (बीजेपी)
अरविंद सिंह चौहान (कांग्रेस)
मतदान- 11 अप्रैल
गौतमबुद्धनगर यानि नोएडा सीट पर अब तक बीजेपी का वर्चस्व रहा है। पार्टी ने यहां से केंद्रीय मंत्री डॉ. महेश शर्मा को फिर से टिकट दिया है। वहीं, कांग्रेस ने अरविंद सिंह चौहान को उतारा है। 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को उस वक्त बड़ा झटका लगा था, जब मतदान से एक हफ्ते पहले पार्टी कैंडिडेट रमेश चंद्र तोमर बीजेपी में शामिल हो गए थे। दूसरी ओर अलवर (राजस्थान) के मूल निवासी डॉ. महेश शर्मा लंबे समय से एनसीआर में सक्रिय हैं।
6- मुरादाबाद 
कुंवर सर्वेश कुमार सिंह (बीजेपी)
राज बब्बर (कांग्रेस)
मतदान- 23 अप्रैल
सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील मुरादाबाद में बीजेपी ने वर्तमान सांसद कुंवर सर्वेश कुमार सिंह पर भरोसा जताया है। इस बार यहां से कांग्रेस ने राज बब्बर को उतारकर मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है। यूपी कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष राज बब्बर ने पिछला चुनाव गाजियाबाद से लड़ा था। पीतल नगरी में अभी गठबंधन ने अपने कैंडिडेट का ऐलान नहीं किया है।
7- अलीगढ़ 
सतीश कुमार गौतम (बीजेपी)
चौधरी बृजेंदर सिंह (कांग्रेस)
मतदान- 18 अप्रैल
अलीगढ़ लोकसभा सीट पर बीजेपी ने वर्तमान सांसद सतीश कुमार गौतम को कैंडिडेट बनाया है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) में जिन्ना की तस्वीर लगाने पर उन्होंने सवाल उठाए थे। इस मामले को लेकर देश की सियासत गरमा गई थी। एएमयू कैंपस में भी कई दिन तनाव देखने को मिला था। कांग्रेस ने यहां से चौधरी बृजेंदर सिंह को टिकट दिया है। 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने इस क्षेत्र के तहत आने वाली सभी पांचों विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी।
8- अमेठी 
स्मृति इरानी (बीजेपी)
राहुल गांधी (कांग्रेस)
मतदान- 6 मई
अमेठी लोकसभा सीट पर एक बार फिर देश की नजरें टिकी रहेंगी। जहां एक ओर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी लगातार चौथी बार इस सीट से सांसद की पारी खेलने की तैयारी में हैं, वहीं बीजेपी ने उनके खिलाफ स्मृति इरानी को फिर उतारा है। 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान हार के बावजूद स्मृति लंबे समय से इलाके में सक्रिय हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी लोकसभा चुनाव के ऐलान से पहले यहां बड़ी रैली की थी। पिछले चुनाव में राहुल ने स्मृति को 1.07 लाख वोटों से हराया था। राहुल की यह जीत 2009 के मुकाबले बेहद छोटी थी। 2009 में राहुल 3.70 लाख वोटों के अंतर से जीते थे।
9- संभल 
परमेश्वर लाल सैनी (बीजेपी)
शफीकुर्रहमान बर्क (एसपी)
मतदान- 23 अप्रैल
संभल सीट पर एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन की ओर से शफीकुर्रहमान बर्क को टिकट मिला है। वहीं, बीजेपी ने यहां से परमेश्वर लाल सैनी को उतारा है। मुस्लिम बहुल इस सीट पर 23 अप्रैल को मतदान होना है। अभी कांग्रेस ने यहां से अपना कैंडिडेट घोषित नहीं किया है। लेकिन इस बार गठबंधन कैंडिडेट बर्क की स्थिति मजबूत मानी जा रही है। वह तीन बार मुरादाबाद और एक बार संभल से सांसद रह चुके हैं। संभल लोकसभा सीट से 2009 में उन्होंने बीएसपी टिकट से लोकसभा का चुनाव जीता था। 2013 में सांसद रहते उन्होंने कहा था, ‘मैं वंदे मातरम् का बहिष्कार करने के लिए सोमवार को संसद से अनुपस्थित रहूंगा।’ बर्क ने 1997 में संसद के 50 साल पूरे होने पर आयोजित स्वर्ण जयंती कार्यक्रम में भी वंदे मातरम् का बहिष्कार किया था।
10- बदायूं 
संघमित्र मौर्य (बीजेपी)
धर्मेंद्र यादव (एसपी)
सलीम इकबाल शेरवानी (कांग्रेस)
मतदान-23 अप्रैल
बदायूं सीट पर एसपी संरक्षक मुलायम सिंह यादव के भतीजे धर्मेंद्र यादव इस बार चक्रव्यूह में घिरे हैं। वर्तमान सांसद धर्मेंद्र के खिलाफ बीजेपी ने संघमित्र मौर्य को टिकट दिया है। चाचा शिवपाल यादव ने प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया बनाकर उन्हें पहले से मुश्किल में डाल रखा है। वहीं, कांग्रेस ने इलाके के कद्दावर नेता सलीम इकबाल शेरवानी को उतारकर धर्मेंद्र के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है।
11- उन्नाव 
साक्षी महाराज (बीजेपी)
अनु टंडन (कांग्रेस)
मतदान- 29 अप्रैल
टिकट बंटवारे से पहले चिट्ठी लिखने वाले साक्षी महाराज को बीजेपी ने आखिरकार टिकट दे दिया है। लेकिन इस बार साक्षी की राह आसान नहीं मानी जा रही है। कांग्रेस ने यहां से अनु टंडन को उतारा है। 2009 में कांग्रेस से सांसद रह चुकीं अनु इस क्षेत्र में काफी सक्रिय हैं। इसके साथ ही साक्षी महाराज को बाहरी होने का नुकसान उठाना पड़ सकता है। अभी यहां से गठबंधन कैंडिडेट का ऐलान नहीं हुआ है।
12- मथुरा 
हेमा मालिनी (बीजेपी)
नरेंद्र सिंह (आरएलडी)
मतदान- 18 अप्रैल
‘ड्रीम गर्ल’ हेमा मालिनी मथुरा से एकबार फिर चुनाव मैदान में हैं। बीजेपी ने वर्तमान सांसद हेमा मालिनी को ही प्रत्याशी बनाया है। उधर एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन ने कुंवर नरेन्‍द्र सिंह को खड़ा किया है। हेमा पर क्षेत्र को कम समय देने का आरोप लगता रहा है। पिछले बार के चुनाव में हेमा ने आरएलडी के जयंत चौधरी को शिकस्त दी थी। जयंत इस बार वह बागपत से चुनाव लड़ रहे हैं। गठबंधन के तहत यह सीट आरएलडी के खाते में आई है। एसपी ने आरएलडी के लिए अपनी दावेदारी छोड़ दी थी।
13- लखीमपुर खीरी 
पूर्वी वर्मा (एसपी)
अजय कुमार मिश्रा (बीजेपी)
जफर अली नकवी (कांग्रेस)
मतदान-29 अप्रैल
लखीमपुर खीरी सीट पर बीजेपी ने जहां अजय कुमार मिश्रा को टिकट दिया है वहीं कांग्रेस ने यहां से पूर्व सांसद और मंत्री रह चुके जफर अली नकवी को उतारा है। गठबंधन कोटे के तहत यह सीट एसपी के हिस्से में आई है। पार्टी ने यहां से पूर्वी वर्मा को मैदान में उतारा है। 2009 के लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज की थी। 1980 से 1991 तक वह इस सीट से विधानसभा सदस्य भी रहे। राजीव गांधी के करीबी रह चुके नकवी का इलाके में अच्छा जनाधार माना जाता है।
14- हरदोई 
ऊषा वर्मा (एसपी)
जय प्रकाश वर्मा (बीजेपी)
मतदान- 29 अप्रैल
हरदोई सीट पर नरेश अग्रवाल का अच्छा प्रभाव माना जाता है। कई पार्टियों की सवारी कर चुके नरेश इस समय बीजेपी के सदस्य हैं। हरदोई में बीजेपी ने जय प्रकाश वर्मा को टिकट दिया है जबकि गठबंधन के तहत एसपी ने ऊषा वर्मा को सियासी समर में उतारा है। कांग्रेस कैंडिडेट की अभी यहां से घोषणा नहीं हुई है लेकिन नरेश अग्रवाल फैक्टर का बीजेपी को लाभ मिल सकता है।
15- मिर्जापुर 
अनुप्रिया पटेल (अपना दल)
राजेंद्र एस बिंद (एसपी)
ललितेश पति त्रिपाठी (कांग्रेस)
मतदान- 19 मई
मिर्जापुर सीट बीजेपी ने एनडीए के सहयोगी अपना दल के लिए छोड़ दी है। यहां से केंद्रीय मंत्री और वर्तमान सांसद अनुप्रिया पटेल मैदान में हैं। वहीं, गठबंधन के तहत एसपी ने राजेंद्र एस बिंद को टिकट दिया है। कांग्रेस ने यहां से ललितेश पति त्रिपाठी को अपना उम्मीदवार बनाया है। इस बार अनुप्रिया पटेल की राह आसान नहीं मानी जा रही है।
-Legend News

बसपा के “वीटो” से कुंवर नरेंद्र सिंह बने मथुरा में राष्ट्रीय लोकदल के प्रत्‍याशी

लखनऊ/मेरठ। यूपी के महागठबंधन में शामिल राष्ट्रीय लोकदल ने मंगलवार को अपने प्रत्याशियों के नामों का ऐलान कर दिया, आज जारी टिकटों की सूची में पार्टी अध्यक्ष अजीत चौधरी को पश्चिम यूपी की प्रतिष्ठित मुजफ्फरनगर सीट से प्रत्याशी बनाया गया है जबकि जयंत चौधरी को बागपत का। रालोद के तीसरे और अंतिम प्रत्‍याशी के तौर पर मथुरा से कुंवर नरेन्‍द्र सिंह के नाम की घोषणा की गई है। इन तीनों सीटों पर आरएलडी बीएसपी और एसपी के समर्थन के साथ चुनाव लड़ेगी।
पार्टी सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार कुंवर नरेन्‍द्र सिंह को रालोद प्रत्‍याशी घोषित कराने में बसपा सुप्रीमो मायावती ने बड़ी भूमिका अदा की।
मायावती ने जयंत चौधरी को 16 मार्च के दिन तलब किया था, देखिए वीडियो- 
गौरतलब है कि पिछले दिनों मथुरा से प्रत्‍याशी को लेकर दिल्‍ली में रालोद की जो बैठक हुई उसमें पत्रकार विनीत नारायण का नाम तय कर दिए जाने के बाद पार्टी की मथुरा इकाई के अंदर भारी रोष व्‍याप्‍त हो गया। 
पार्टी अभी विनीत नारायण का नाम बाकायदा घोषित कर पाती कि इससे पहले गठबंधन के कुछ लोगों की सहमति से स्‍थानीय नेताओं ने बसपा सुप्रीमो मायावती के समक्ष अपनी आपत्ति दर्ज कराई और बताया कि विनीत नारायण का नाम कुछ खास शर्त पूरी करने के बाद तय किया गया है जबकि उनका पार्टी से कोई लेना-देना नहीं रहा। 
इन नेताओं का कहना था कि यदि विनीत नारायण को प्रत्‍याशी घोषित किया गया तो गठबंधन के साथ-साथ मथुरा रालोद भी कोई सहयोग नहीं कर सकेगा। 
इन लोगों ने बसपा सुप्रीमो को अंदरखाने की गई विशेष कारगुजारी से भी अवगत कराया। 
उल्‍लेखनीय है कि मथुरा रालोद में फिलहाल ऐसे कई नेता हैं जो पूर्व में सपा तथा बसपा में भी रह चुके हैं और उनके मायावती तथा अखिलेश दोनों से सीधे संबंध हैं। 
ऐसे नेताओं ने मायावती के अलावा अखिलेश को भी वस्‍तुस्‍थिति से अवगत कराया। इसके बाद पहले तो मायावती और अखिलेश के बीच मथुरा की सीट को लेकर मंत्रणा हुई और उसके बाद जयंत चौधरी को मायावती ने 16 मार्च के दिन तलब किया। 
बताया जाता है कि मायावती ने जयंत चौधरी से साफ-साफ कह दिया कि विरोध एवं आक्रोश को देखते हुए विनीत नारायण का नाम उन्‍हें भी स्‍वीकार नहीं है लिहाजा किसी अन्‍य नाम पर विचार किया जाए। 
चूंकि मथुरा के लिए सर्वसम्‍मति ठाकुर तेजपाल के नाम पर पहले बन चुकी थी इसलिए उस पर विचार किया जा सकता था किंतु उन्‍हें लड़वाने के पक्ष में जयंत चौधरी कतई नहीं थे। हालांकि आरएलडी सुप्रीमो अजीत सिंह ठाकुर तेजपाल को ही चुनाव लड़ाना चाहते थे। 
बहरहाल, बसपा सुप्रीमो मायावती के वीटो ने विनीत नारायण का बना बनाया खेल बिगाड़ दिया और कुंवर नरेन्‍द्र सिंह की लॉटरी लगवा दी। 
बताया जाता है कि भाजपा कुंवर नरेन्‍द्र सिंह का नाम घोषित होने से काफी खुश है क्‍योंकि कुंवर नरेन्‍द्र सिंह का चुनावी करियर अब तक बहुत पूअर रहा है।
इससे पहले कैराना की सीट पर आरएलडी की प्रत्याशी तबस्सुम हसन को उपचुनाव में जीत मिली थी, जिन्हें इस बार महागठबंधन की ओर से इसी सीट का प्रत्याशी बनाया गया है। हालांकि तबस्सुम हसन कैराना की सीट पर समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ने वाली हैं।
मुजफ्फरनगर में अजीत के सामने असली परीक्षा 
मुजफ्फरनगर सीट पर समाजवादी पार्टी (एसपी), बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) और राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) गठबंधन की तरफ से चौधरी अजित सिंह चुनाव मैदान में हैं। यह चुनाव अजित सिंह की चौधराहट की असली परीक्षा लेगा। मुजफ्फरनगर दंगों के बाद आरएलडी का वोटबैंक पूरी तरफ से बिखर चुका है। वर्ष 2013 में दंगे के बाद ध्रुवीकरण और मोदी लहर में बीजेपी ने साल 2014 के लोकसभा चुनाव में यह सीट 4,01,135 मतों से जीती थी। अभी आरएलडी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। अगर गठबंधन यह सीट निकाल लेता है तो यह चौधरी परिवार की राजनीति के लिए संजीवनी का काम करेगी। इस लिहाज से इस सीट पर पूरे देश की नजर रहेगी।
जाटों के गढ़ बागपत में हारे थे अजीत सिंह
अजीत चौधरी के बेटे जयंत चौधरी इस बार बागपत सीट से प्रत्याशी बनाए गए हैं। जाटों का गढ़ माने जाने वाले बागपत में आरएलडी को बड़ा झटका तब लगा, जब पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी प्रमुख अजित सिंह को यहां से हार का सामना करना पड़ा। बीजेपी के सत्यपाल सिंह ने इस सीट से 2 लाख से अधिक वोटों से जीत दर्ज की। इस बार इस सीट पर पूरे देश की नजर रहेगी। माना जा रहा है कि बीजेपी यहां से एक बार फिर सत्यपाल सिंह को मौका दे सकती है। गठबंधन के लिहाज से देखें तो बीजेपी के सामने इस बार कड़ी चुनौती होगी। जयंत चौधरी के दादा पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह यहां से 1977, 1980 और 1984 में लगातार चुनाव जीते हैं। जयंत के पिता और आरएलडी अध्यक्ष अजित सिंह 6 बार 1989, 1991, 1996, 1999, 2004 और 2009 में बागपत से सांसद रहे।
-Legend News

सोमवार, 18 मार्च 2019

मथुरा से RLD (गठबंधन) का उम्‍मीदवार फाइनल, सिर्फ घोषणा होना बाकी, प्रमुख दावेदारों में आक्रोश

मथुरा। राष्‍ट्रीय लोकदल RLD के अत्‍यंत भरोसेमंद और अंदरूनी सूत्रों की मानें तो पार्टी ने गठबंधन में मिली मथुरा सीट पर अपना उम्‍मीदवार फाइनल कर दिया है।
गौरतलब है कि राष्‍ट्रीय लोकदल RLD को पिछले दिनों ही सपा-बसपा ने अपने साथ गठबंधन का हिस्‍सा घोषित करते हुए उत्तर प्रदेश में 3 सीटें दी थीं। ये सीटें थीं- मुजफ्फरनगर, मथुरा और बागपत।
उल्‍लेखनीय है कि इस बार मुजफ्फरनगर से RLD के मुखिया चौधरी अजीत सिंह खुद मैदान में उतरने जा रहे हैं जबकि युवराज जयंत चौधरी का बागपत से लड़ना तय है।
जयंत चौधरी ने 2009 में अपना पहला लोकसभा चुनाव मथुरा से लड़ा था और भारी मतों से जीत दर्ज की थी। किंतु इस जीत का श्रेय भाजपा को भी मिला क्‍योंकि जाटलेंड होने के बावजूद समर्थन के बगैर पूर्व में चौधरी चरण सिंह की पत्‍नी गायत्री देवी और पुत्री डॉ. ज्ञानवती भी मथुरा से चुनाव नहीं जीत सकी थीं।
2014 के लोकसभा चुनाव में एकबार फिर इस बात की पुष्‍टि तब हो गई जब जयंत चौधरी दूसरी बार मथुरा से लोकसभा का चुनाव लड़ने उतरे किंतु भाजपा की हेमा मालिनी से बुरी तरह हारे क्‍योंकि 2014 में उन्‍हें किसी का समर्थन प्राप्‍त नहीं था।
इस बार हालांकि सपा-बसपा ने अपने गठबंधन का हिस्‍सा घोषित करते हुए राष्‍ट्रीय लोकदल को मथुरा सहित तीन सीटें छोड़ दीं किंतु मथुरा में न तो सपा आज तक अपना कोई ऐसा जनाधार खड़ी कर सकी जिसके बूते निर्णायक भूमिका अदा कर सके और न बसपा लोकसभा के किसी चुनाव में अपना परचम लहरा पायी।
RLD के मुखिया चौधरी अजीत सिंह तथा युवराज जयंत चौधरी ने इस गणित को बखूबी समझते हुए ही इस बार जयंत का चुनाव क्षेत्र बदलकर बागपत कर दिया और मथुरा से परिवार के इतर किसी अन्‍य को लड़ाने का निर्णय लिया है ताकि पूरे परिवार की प्रतिष्‍ठा दांव पर न लग जाए।
दरअसल, माना यह जा रहा था कि मथुरा से चौधरी अजीत सिंह अपनी पुत्रवधू और जयंत की पत्‍नी चारु सिंह को मथुरा से चुनाव मैदान में उतार सकते हैं किंतु उन्‍होंने ऐसा न करके इस बार एक ऐसे व्‍यक्‍ति को लड़ाने का निर्णय लिया है जिसका नाम चंद रोज पहले तब सामने आया था जब जयंत चौधरी उसके एक कार्यक्रम में दिखाई दिए थे।
खुद को योद्धा पत्रकार बताने वाले यह व्‍यक्‍ति हैं विनीत नारायण। वृंदावन को अपना स्‍थाई निवास बना चुके विनीत नारायण ब्रज फाउंडेशन नामक एक एनजीओ भी चलाते हैं।
विनीत नारायण और उनका एनजीओ यूं तो पिछले कई वर्षों से ब्रज के कुंड एवं सरोवरों का जीर्णोद्धार करने के काम में लगा था लेकिन गत वर्ष जब उस पर उंगलियां उठने लगीं तो जांच भी बैठी और आरोप-प्रत्‍यारोप का दौर भी चला। फिलहाल मामला एनजीटी में लंबित है।
वैसे विनीत नारायण मथुरा जनपद के ही मूल निवासी हैं और राया कस्‍बे के वैश्‍य समुदाय से ताल्‍लुक रखते हैं लिहाजा जाट बाहुल्‍य मथुरा लोकसभा क्षेत्र से राष्‍ट्रीय लोकदल द्वारा उनकी उम्‍मीदवारी पर मुहर लगाना किसी के गले नहीं उतर रहा।
बताया जाता है कि राष्‍ट्रीय लोकदल के स्‍थानीय दिग्‍गज नेता भी विनीत नारायण की उम्‍मीदवारी पर मुहर लगने से हतप्रभ हैं और उन्‍हें समझ में नहीं आ रहा कि पार्टी ने आखिर विनीत नारायण का नाम क्‍या सोचकर फाइनल किया है।
पार्टी सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार बीते कल RLD मुखिया ने सभी प्रमुख दावेदारों को दिल्‍ली स्‍थित अपने आवास पर बुलाया था जहां कुंवर नरेन्‍द्र सिंह, ठाकुर तेजपाल सिंह, योगेश नौहवार, अनूप चौधरी, डॉ. अशोक अग्रवाल, रामवीर भरंगर, राजेन्‍द्र सिकरवार तथा विनीत नारायण आदि के नाम पर चर्चा हुई।
सूत्रों की मानें तो बतौर ठाकुर उम्‍मीदवार मथुरा के लिए चौधरी अजीत सिंह की पहली पसंद ठाकुर तेजपाल थे किंतु उनके और कुंवर नरेन्‍द्र सिंह के बीच में सामंजस्‍य न बैठ पाने के कारण ठाकुर तेजपाल के नाम पर मुहर नहीं लग सकी।
दूसरी ओर ये दोनों ही नेता पार्टी की ओर से रखी गई उस शर्त को भी पूरा करने को तैयार नहीं थे जो हर ‘क्षेत्रीय पार्टी’ अपनी गुप्‍त बैठकों में टिकट के दावेदारों के सामने रखती है। 
इनके अतिरिक्‍त प्रमुख जाट दावेदारों में जो नाम शुमार थे उनमें जाट समुदाय से योगेश नौहवार, अनूप चौधरी, रामवीर भरंगर, राजेन्‍द्र सिकरवार, चेतन मलिक आदि सबसे ऊपर थे तो वैश्‍य समुदाय से सबसे ऊपर नाम मशहूर बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अशोक अग्रवाल का चल रहा था।
पार्टी के सूत्रों ने बताया कि विनीत नारायण के नाम पर वीटो का इस्‍तेमाल जयंत चौधरी ने किया क्‍योंकि विनीत नारायण ”जयंत चौधरी” की ”अपेक्षा” पर पूरी तरह खरे उतर रहे थे। हालांकि उनके नाम पर मुहर लगती देख दूसरे प्रमुख दावेदारों ने यह भी कहा कि यदि किसी वैश्‍य को ही चुनाव लड़वाना है तो डॉ. अशोक अग्रवाल को क्‍यों नहीं लड़वाया जा सकता किंतु इस बात को भी अनसुना कर दिया गया।
पता लगा है कि वर्षों से पार्टी के लिए दिन-रात एक करने एवं तन, मन, धन से साथ देने वाले दावेदारों में अपने नेताओं के इस निर्णय को लेकर भारी आक्रोश है और वो अपनी नाराजगी सार्वजनिक करने का मन बना रहे हैं।
अब देखना यह है पार्टी अपने इन हर तरह से सक्षम दावेदारों की नाराजगी कैसे दूर करती है और कैसे अचानक सामने लाए गए विनीत नारायण के पक्ष में वोट मांगने के लिए उन्‍हें तैयार करती है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

लोकसभा चुनाव 2019: पिछले 19 वर्ष में BJP क्‍या मथुरा से एक नेता पैदा नहीं कर सकी?

हो सकता है कि BJP के कुछ लोगों को सांसद हेमा मालिनी का यह दावा सुकून देता हो कि यह लोकसभा चुनाव भी वह मथुरा से ही लड़ेंगी किंतु पार्टी में ऐसे लोगों की संख्‍या अधिक है जो हेमा मालिनी के एकबार फिर यहां से चुनाव मैदान में उतरने को अपने राजनीतिक भविष्‍य से जोड़कर देखते हैं।
ऐसे लोगों में युवा कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग शामिल है। इन लोगों की चिंता न तो नाजायज है और न निरर्थक।
जरा विचार कीजिए कि कोई भी युवा जब किसी राजनीतिक दल से अधिकृत तौर पर जुड़ता है तो किसलिए जुड़ता है ?
इसीलिए न कि उसके भी मन में कुछ अरमान होते हैं, कुछ पाने का सपना होता है। वह भी किसी मुकाम पर पहुंचकर कथित रूप से ही सही, लेकिन समाज की सेवा करना चाहता है। वह चाहता है कि लोग उसे भी पहचानें, उसके गले में मालाएं डालें और उसकी जय-जयकार करें।
शायद ही कोई युवा यह सोचकर किसी राजनीतिक दल को ज्‍वाइन करता हो कि वह अपनी पूरी जवानी अपने नेताओं की आवभगत में गुजार देगा और उनके समर्थकों के लिए फर्श बिछाता रहेगा। जयकारे लगाता रहेगा या माला पहनाता रहेगा।
सोच के धरातल पर यह बात बेमानी होने के बावजूद सही साबित इसलिए हो रही है क्‍योंकि राजनीति के सिरमौर कहलाने वाले श्रीकृष्‍ण की जन्‍मस्‍थली में आज कोई ऐसा BJP नेता दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रहा जो लोकसभा चुनाव लड़ने की बात तो दूर, टिकट पाने का भी प्रबल दावेदार हो।
अब सवाल यह खड़ा होता है कि आखिर ऐसा है क्‍यों, और क्‍या मथुरा जैसे विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक स्‍थल में BJP को एक अदद काबिल नेता देने की क्षमता नहीं है?
कहीं ऐसा तो नहीं कि BJP ही मथुरा में अपने लिए कोई नई पौध तैयार करना नहीं चाहती?
मथुरा के राजनीतिक इतिहास में झांककर देखें तो पता लगेगा कि स्‍वतंत्रता के बाद यहां से पहली बार BJP को 1991 में तब सफलता मिली जब डॉ. सच्‍चिदानंद हरि साक्षी लोकसभा सदस्‍य निर्वाचित हुए।
आश्‍चर्य की बात यह है कि 1991 का लोकसभा चुनाव लड़ने वाले महामंडलेश्‍वर डॉ. सच्‍चिदानंद साक्षी ने इससे मात्र एक साल पहले यानि 1990 में ही अपने राजनीतिक सफर की शुरूआत की थी।
एक साल के राजनीतिक करियर में भाजपा से लोकसभा का टिकट पाने वाले साक्षी महाराज मथुरा के निवासी नहीं थे। लोध समुदाय से ताल्‍लुक रखने वाले साक्षी जी मूल रूप से कासगंज के निवासी हैं लेकिन भाजपा ने उन्‍हें मथुरा से चुनाव लड़वाया।
भाजपा ने मथुरा से पहली और आखिरी बार स्‍थानीय निवासी चौधरी तेजवीर सिंह को 1996 में टिकट दिया। तेजवीर सिंह ने न सिर्फ यह चुनाव जीता बल्‍कि इसके बाद भी भाजपा की टिकट पर ही 12वीं तथा 13वीं लोकसभा के सदस्‍य बने।
2009 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने रालोद के युवराज जयंत चौधरी को समर्थन दे दिया और उसके बाद फिर 2014 में हेमा मालिनी को उतार दिया। हेमा मालिनी आज भले ही यहां से भाजपा की ही सांसद हैं किंतु वह स्‍थानीय नहीं हैं।
कुल मिलाकर देखा जाए तो निष्‍कर्ष यह निकलता है कि मथुरा जनपद में भाजपा को अब तक मात्र चौधरी तेजवीर सिंह ही एक योग्‍य प्रत्‍याशी नजर आए। उसके बाद कोई स्‍थानीय नेता इस लायक नहीं समझा गया कि उसे चुनाव लड़वाया जा सके।
हेमा मालिनी द्वारा दोबारा ताल ठोक देने से साफ जाहिर है कि कृष्‍ण की यह भूमि भाजपा के शीर्ष नेतृत्‍व की नजर में अब भी बंजर ही है। भाजपा नेतृत्व का नजरिया कुछ भी हो किंतु ऐसा है नहीं।
सच तो यह है कि भाजपा में एक दो नहीं, कई नए चेहरे ऐसे हैं जो यहां से सीट निकालने का माद्दा रखते हैं और पार्टी द्वारा बाहरी प्रत्‍याशियों को थोप देने से आहत भी हैं, लेकिन पार्टी उन्‍हें नजरंदाज करती रही है।
पिछले दिनों पड़ोसी जनपद हाथरस में आयोजित हुए आरएसएस के एक बड़े चिंतन शिविर में यह मुद्दा उठा भी था। वहां कहा गया कि यदि इसी प्रकार मथुरा में कभी किसी को समर्थन देकर तो कभी बाहरी प्रत्‍याशी खड़ा करके चुनाव लड़वाए जाते रहे तो मथुरा के युवा कार्यकर्ताओं का भविष्‍य चौपट होना तय है।
पार्टी से जुड़े प्रतिभावान कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस समय राष्‍ट्रवाद अपने चरम पर है, जनता को भाजपा व उसके नेतृत्‍व पर भरोसा है, इसलिए यदि मथुरा से मथुरा के ही किसी युवा और नए चेहरे को लोकसभा चुनाव लड़वाया जाए तो एक ओर जहां पार्टी को दूसरी पीढ़ी के लिए नेता प्राप्‍त हो सकता है वहीं दूसरी ओर पार्टी के लिए जान खपा देने वालों में भी अपने भविष्‍य के प्रति उम्‍मीद बंधती है।
आज भारतीय जनता पार्टी स्‍वतंत्र भारत के अपने राजनीतिक सफर में शीर्ष स्‍थान हासिल किए हुए है। यही वह समय है जब वह अपने लिए दूसरी पीढ़ी के नेता और तीसरी पीढ़ी की पौध तैयार कर सकती है।
मथुरा जनपद यूं तो हमेशा से राजनीति का एक बड़ा अखाड़ा रहा है किंतु भाजपा ने इस अखाड़े के लिए अब तक बाहरी प्रत्‍याशियों पर ही अधिक भरोसा किया है जो स्‍थानीय भाजपाइयों के राजनीतिक भविष्‍य पर प्रश्‍नचिन्‍ह लगाता है।
1991 से ही यदि आंकलन किया जाए जब भाजपा का राष्‍ट्रीय राजनीति में उदय हुआ तो 1996 में मथुरा के मूल निवासी चौधरी तेजवीर सिंह पर ही भाजपा ने भरोसा जताया लेकिन उसके बाद तेजवीर सिंह द्वारा लगातार तीन बार जीत हासिल करने के बावजूद पार्टी ने फिर किसी स्‍थानीय नेता को अहमियत नहीं दी।
2004 का चुनाव तेजवीर सिंह क्‍या हारे, भाजपा का मथुरा भाजपा पर से विश्‍वास ही उठ गया। 2009 में तो भाजपा ने अपना प्रत्‍याशी तक चुनाव में उतारना जरूरी नहीं समझा और रालोद को समर्थन दे दिया।
उसके बाद 2014 के चुनाव में पार्टी हेमा मालिनी को ले आई और अब 2019 में भी मथुरा के मूल निवासी किसी नेता के नाम का जिक्र तक नहीं हो रहा। हेमा मालिनी के बाद जिनके नाम की थोड़ी-बहुत चर्चा है भी, तो उनकी जो स्‍थापित नेता हैं और महत्‍वपूर्ण पदों को सुशोभित कर रहे हैं। किसी नए चेहरे पर पार्टी फोकस करती दिखाई नहीं दे रही।
निश्‍चित ही यह स्‍थिति मथुरा भाजपा के लिए अफसोसनाक एवं चिंताजनक है। इस तरह तो मथुरा से शायद ही कभी कोई नेता खड़ा हो सके।
मथुरा की इस स्‍थिति और पार्टी नेतृत्‍व से स्‍थानीय नेताओं की उपेक्षा पर अंदरखाने युवकों में आक्रोश भी पनप रहा है किंतु फिलहाल कोई मुंह खोलने को तैयार नहीं।
वह दबी जुबान से इतना अवश्‍य कहते हैं कि 27 सालों में मात्र एक स्‍थानीय भाजपा नेता तेजवीर का संसद में पहुंचना यह साबित करने के लिए काफी है कि राजनीतिक रूप से मथुरा भाजपा कितनी कंगाल है और पार्टी का नेतृत्‍व उस पर कतई विश्‍वास नहीं करता।
युवाओं के मन में अंदर कहीं न कहीं यह डर भी है कि यदि यही हाल रहा तो कृष्‍ण की नगरी से शायद ही कभी किसी बड़े नेता का उदय हो और मथुरा की जनता उसे लेकर गौरव महसूस कर सके।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

धर्मक्षेत्रे-पापक्षेत्रे: मथुरा के कुछ निजी अस्‍पताल भी लिप्‍त हैं मानव अंगों की खरीद-फरोख्‍त में!

कहते हैं किसी भी पापकर्म को करने के लिए धर्म से बड़ी कोई आड़ नहीं हो सकती क्‍योंकि पाप को छिपाने में हमेशा से धर्म बड़ी भूमिका निभाता चला आ रहा है।
यह बात सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होती है और इसीलिए ईसाई मिशनरी से लेकर इस्‍लाम तक तथा हिंदू धर्म से लेकर सिख, जैन एवं बुद्धिस्‍ट तक में पापाचारियों की संख्‍या कम नहीं है।
किसी धार्मिक स्‍थल पर धर्म की आड़ लेना और भी आसान हो जाता है क्‍योंकि भूमि का प्रताप उसमें ‘सोने पर सुहागा’ जैसी कहावत को चरितार्थ करता है।
योगीराज भगवान श्रीकृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली होने की वजह से मथुरा चूंकि देश ही नहीं संपूर्ण विश्‍व में अपनी एक विशिष्‍ट धार्मिक पहचान रखता है इसलिए यहां राक्षसी प्रवृत्ति के लोग भी हमेशा सक्रिय रहे हैं।
इस दौर की बात करें तो भगवान का दर्जा प्राप्‍त इंसानों में शुमार चिकित्‍सकीय कारोबार से जुड़े कई लोग यहां न केवल लोगों की जेब काट रहे हैं बल्‍कि उनके अंगों का भी अवैध धंधा करने में लिप्‍त हैं।
इस बात का खुलासा हाल ही में तब हुआ जब कानपुर के बर्रा क्षेत्र से पकड़े गए कुछ लोगों ने पूछताछ के दौरान पीएसआरआई हॉस्पिटल की कोऑर्डिनेटर सुनीता वर्मा और मिथुन सहित फोर्टिस की कोऑर्डिनेटर सोनिका के नाम उजागर करते हुए बताया कि वो इनके साथ मिलकर मरीजों के परिजनों से किडनी एवं लिवर की सौदेबाजी करते थे।
आरोपियों से यह चौंकाने वाली जानकारी मिलने के बाद मानव अंगों (किडनी-लिवर) की खरीद-फरोख्त में पुलिस ने दिल्ली के पीएसआरआई (पुष्पावति सिंहानिया रिसर्च इंस्टीट्यूट), फोर्टिस एवं गंगाराम हॉस्‍पिटल के साथ-साथ इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल को भी नोटिस भेजा है।
एसआईटी अब इन अस्पतालों के प्रशासनिक अधिकारियों, डॉक्टर्स और कर्मचारियों से पूछताछ करेगी। इसके लिए एसआईटी की टीम दिल्ली पहुंच चुकी है। हालांकि अपोलो अस्‍पताल के प्रबंधतंत्र ने इस बाबत सफाई देते हुए कहा है कि वह ऐसे किसी धंधे में संलिप्‍त नहीं है।
अपोलो अस्‍पताल का प्रबंधतंत्र कुछ भी कहे किंतु हकीकत यह है कि 2016 के किडनी कांड में अपोलो अस्पताल और वहां के एक नामचीन डॉक्टर मानव अंगों की खरीद-फरोख्‍त के आरोपी बनाए गए थे।
डॉक्टर के दो निजी सचिव शैलेश सक्सेना व आदित्य भी उनके साथ सहआरोपी थे। शैलेश इस मामले में जेल भी भेजा गया था इसलिए एसआईटी ने फिर से अपोलो अस्‍पताल के प्रबंधतंत्र को नोटिस भेजा है।
एसपी साउथ रवीना त्यागी के मुताबिक अब फिर से अस्पताल स्टाफ सहित उन लोगों को भी पूछताछ में शामिल किया जाएगा जिनके नाम पहले सामने आ चुके हैं।
फिलहाल मानव अंगों की खरीद-फरोख्‍त के आरोप में कानुपर से पकड़े गए लोगों ने जिस तरह की जानकारी पुलिस को दी है, उससे यह माना जा रहा है कि इन अस्पतालों के अलावा भी कई अस्पताल इस गलीज़ धंधे को लंबे समय से कर रहे हैं।
अगर बात करें धर्मक्षेत्र मथुरा की तो यहां पिछले कुछ वर्षों के अंदर जिस तरह कुछ नामचीन लोगों ने चिकित्‍सा के क्षेत्र में पैसे का निवेश किया, उससे साफ जाहिर था कि उनका मकसद यहां की जनता को स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं देने से कहीं बहुत अधिक निजी आर्थिक लाभ अर्जित करना था।
अब उनके इस मकसद की पुष्‍टि आए दिन मिलने वाले उन समाचारों से भी होती है जिनमें अधिकांश मरीज एवं तीमारदार वहां जाकर खुद को लुटा हुआ महसूस करते हैं।
मथुरा के एक मशहूर हॉस्‍पिटल का आलम तो यह है कि शायद ही कोई व्‍यक्‍ति वहां से संतुष्‍ट होकर बाहर आता हो।
कोई कहता है कि मरीज को नाजायज तरीकों से इसलिए लगभग बंधक बनाकर रखा गया ताकि लाखों रुपए का बिल बनाया जा सके तो कोई बताता है कि जबरन चीर-फाड़ करके लाखों रुपए वसूलने के बाद भी डेड बॉडी थमा दी गई।
बताया जाता है कि मामूली सी मामूली तकलीफ लेकर भी यदि कोई व्‍यक्‍ति इस हॉस्‍पिटल की चारदीवारी के अंदर घुस गया तो तय मानिए कि या तो उसकी अच्‍छी तरह जेब कटेगी या वो खुद कटेगा। पूर्व में लोगों ने ऐसी शिकायतें सार्वजनिक तौर पर की हैं कि वो इलाज कराने गए थे किसी बीमारी का लेकिन किडनी अथवा लिवर संबंधी बीमारी बताकर खेल कर दिया।
लोगों की ऐसी शिकायत में दम इसलिए नजर आता है क्‍योंकि संपूर्ण आधुनिक चिकित्‍सा सुविधाएं उपलब्‍ध होने का दावा करने वाले इस हॉस्‍पिटल में मरीजों की मृत्‍युदर आश्‍चर्यजनक रूप से काफी अधिक है।
इस अत्‍यधिक मृत्‍यु दर को लेकर हॉस्‍पीटल का प्रबंधतंत्र समय-समय पर इस आशय की सफाई देता रहा है कि उनके यहां लोग गंभीर स्‍थिति में ही लाए जाते हैं किंतु उनके इस जवाब से शायद ही कोई संतुष्‍ट हुआ हो।
संभवत: इसीलिए इस हॉस्‍पीटल में आए दिन बखेड़ा खड़ा होना आम बात है। इन बखेड़ों की खबरें प्रकाशित या प्रसारित न हों, इसके लिए हॉस्‍पिटल का प्रबंधतंत्र मीडिया को मैनेज करने में लगा रहता है।
जो मीडिया पर्सन मैनेज नहीं होते, उन्‍हें रास्‍ते पर लाने के लिए दूसरे हथकंडे अपनाए जाते हैं। इन दूसरे उपायों में डराने-धमकाने से लेकर प्रभाव का इस्‍तेमाल करने जैसे सभी क्रिया-कलाप शामिल हैं।
हॉस्‍पिटल के सूत्र बताते हैं कि यदि कानूनी प्रक्रिया के तहत ही इस हॉस्‍पिटल की कार्यप्रणाली एवं यहां होने वाली मौतों के पीछे छिपे कारणों की गहन जांच करा ली जाए तो सबकुछ सामने आ जाएगा।
यह पता लगते देर नहीं लगेगी कि यदि कोई जवान व्‍यक्‍ति फिसल कर गिरने की वजह से हॉस्‍पिटल में एडमिट हुआ हो, तो उसकी मौत लिवर फेल होने से कैसे हो गई। इलाज के दौरान उसके घबराए हुए परिजनों से उन्‍हें अवसर दिए बिना पेपर्स पर दस्‍तखत क्‍यों करा लिए गए।
इसके अलावा जो मामले किसी तरह पुलिस तक पहुंचे, उनमें समझौता क्‍यों कर लिया गया।
कई मामले तो इस हॉस्‍पिटल के ऐसे भी सामने आए हैं जिनमें मरीज खुद चलकर हॉस्‍पिटल तक पहुंचे हैं लेकिन लौट नहीं पाए। लौटे तो डेड बॉडी बनकर, वो भी लाखों रुपए का बिल वसूले जाने के बाद।
किसी नामचीन हॉस्‍पिटल में ऐसी अप्रत्‍याशित मौतें और इन मौतों का आंकड़ा यह शंका पैदा कराने के लिए काफी है कि हर मौत ऊपर वाले की मर्जी से नहीं होती, कुछ मौतें ऐसी भी होती हैं जिनका निर्धारण ‘नियति’ नहीं, हॉस्‍पिटल की ‘नीयत’ से भी होता है।
यही मौतें यह भी संकेत देती हैं कि हो न हो मानव अंगों का अवैध कारोबार करने वाले दिल्‍ली एनसीआर तक सीमित न होकर मथुरा जैसे धार्मिक स्‍थलों पर भी सक्रिय हों क्‍यों कि यहां की भौगोलिक ही नहीं, सामाजिक स्‍थिति भी उनके अनुकूल है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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