शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

शैतानी हो या साजिश…लेकिन ”निष्‍कलंक” नहीं रह पाया ”योगीराज”

योगी जी…क्‍या अब आप कभी यह कह सकेंगे कि मेरे शासनकाल में उत्तर प्रदेश के अंदर कोई सांप्रदायिक उपद्रव नहीं हुआ?
कासगंज में जो कुछ हुआ, वह कैसे हुआ और क्‍या उसके पीछे कोई साजिश थी…यह जांच का विषय है लिहाजा निष्‍कर्ष निकलने तक इस बावत कुछ भी नहीं कहा जा सकता किंतु यह जरूर कहा जा सकता है कि तमाम मुठभेड़ों के बावजूद न तो आपकी ”खाकी” अपराधियों के मन में भय बैठा सकी और न आप ”खाकी” के मन में।
एक सर्वमान्‍य सूक्‍ति है कि बेहतर शासन-प्रशासन चलाने के लिए सरकार का ”इकबाल” बुलंद होना लाजिमी है। जब सरकार का इकबाल बुलंद होता है तो सरकारी नुमाइंदे अपनी पूरी निष्‍ठा, लगन व ईमानदारी से सक्रिय रहते हैं। उनकी सक्रियता ही अपराधियों के लिए भय का वातावरण बनाती है और जनसामान्‍य के अंदर सुरक्षा की भावना पैदा करती है।
नि:संदेह उत्तर प्रदेश की कानून-व्‍यवस्‍था काफी पहले से बदहाल थी और आम लोगों का ”सरकारों” से भरोसा उठ चुका था परन्‍तु अब तो यह भरोसा पैदा होना चाहिए।
देश के इस सबसे बड़े राज्‍य की कमान योगी आदित्‍यनाथ ने 19 मार्च 2017 को संभाली थी। इस हिसाब से उनकी सरकार को आज 10 महीने और 13 दिन पूरे हो चुके हैं लेकिन प्रदेश के कई जिले ऐसे हैं जहां बदमाश पूरी तरह बेखौफ दिखाई देते हैं।
खुद सीएम योगी आदित्‍यनाथ ने इसी महीने की 23 तारीख को सहारनपुर, मथुरा और लखनऊ में लगातार हो रहीं गंभीर आपराधिक वारदातों पर नाराजगी जताई थी। उन्‍होंने प्रदेश के आला पुलिस अधिकारियों को तलब करके पूछा था कि अगर अपराधियों पर प्रभावी अंकुश नहीं लग पा रहा तो जिलों में बैठे पुलिस अधिकारी कर क्‍या रहे हैं। उनसे काम नहीं हो पा रहा तो वह पद छोड़ दें।
23 जनवरी को मुख्‍यमंत्री द्वारा अपनी मंशा स्‍पष्‍ट कर देने के बाद भी तीसरे ही दिन 26 जनवरी पर गणतंत्र दिवस की तिरंगा यात्रा में हुई कासगंज की घटना ने यह साबित कर दिया कि न तो ”योगी राज” से ”खाकी” की कार्यप्रणाली प्रभावित हुई है और न ”खाकी” से बदमाशों में कोई भय उत्‍पन्‍न हुआ है।
गौरतलब है कि प्रदेश के राज्‍यपाल रामनाइक ने भी कासगंज की घटना को उत्तर प्रदेश के लिए ”कलंक” बताया है। राज्‍यपाल इससे पहले भी कानून-व्‍यवस्‍था पर असंतोष जाहिर कर चुके हैं।
रामनाइक के बयान इसलिए ज्‍यादा महत्‍व रखते हैं क्‍योंकि पिछले कुछ वर्षों से राज्‍यपाल का पद भी दलगत राजनीति का शिकार होने लगा था और अमूमन राज्‍यपालों की छवि का आंकलन राजनीतिक नजरिए से किया जा रहा था।
कानून-व्‍यवस्‍था और कासगंज में हुई हिंसा पर राज्‍यपाल के रूप में रामनाइक के बयानों ने निश्‍चित ही इस पद की गरिमा बढ़ाई है किंतु सवाल यह खड़ा होता है कि क्‍या उनके बयानों को शासन-प्रशासन भी गंभीरता से लेगा ?
योगी आदित्‍यनाथ द्वारा उत्तर प्रदेश में 21वें मुख्‍यमंत्री की शपथ लेने के मात्र 15 दिनों के बाद “Legend News” ने सबसे बड़ी चुनौती: क्‍या पुलिस का DNA बदल पाएगी योगी सरकार ?” शीर्षक से लिखा था कि जरूरत से ज्‍यादा राजनीतिक दखल, भ्रष्‍टाचार, जातिवाद और अनुशासनहीनता के चलते पुलिस पूर्णत: निरंकुश हो चुकी है।
प्रदेश के तत्‍कालीन डीजीपी जावीद अहमद ने खुद स्‍वीकारा था कि पुलिस में काफी लोगों की अपराधियों से सांठगांठ है। पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश अर्थात मेरठ, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद, नोएडा, मथुरा, आगरा आदि में उन्‍होंने ऐसे पुलिसकर्मियों की भरमार बताई जो अपराधियों से मिले हुए हैं। जावीद अहमद ने हालांकि ऐसे पुलिसजनों की सूची तैयार कर उनके खिलाफ कठोर कार्यवाही करने की बात कही थी लेकिन यह काम इतना आसान नहीं था, लिहाजा न वो कर पाए और न उनके बाद बने दूसरे डीजीपी।
कासगंज की घटना को समय रहते नियंत्रित न कर पाना और चार-पांच दिनों तक उसका सुलगते रहना, यह साबित करता है कि स्‍थानीय पुलिस पूरी तरह फेल रही। कुछ पूर्व पुलिस अधिकारियों सहित आईजी तथा कमिश्‍नर ने भी यह माना है कि पुलिस की लापरवाही ने कासगंज के हालातों को ज्‍यादा बिगाड़ दिया।
यूं भी नामजद आरोपियों के घर से असलहों का बरामद होना और तिरंगा यात्रा के दौरान माहौल बिगड़ने की भनक तक न लग पाना, यह बताता है कि स्‍थानीय पुलिस-प्रशासन किस तरह काम कर रहा था।
योगी आदित्‍यनाथ से प्रदेश को बड़ी उम्‍मीदें हैं। उनके गेरुआ वस्‍त्र भरोसा दिलाते हैं लेकिन ”भय” के बिना ”प्रीति” नहीं होती, इसे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने भी माना था।
गोस्‍वामी तुलसीदास कृत रामायण की यह चौपाई यहां गौरतलब है-
विनय न मानत जलधि जड़, गए तीन दिन बीत।
बोले राम सकोप तब, भय बिन होय न प्रीत।।
इसके अलावा ”चाणक्‍य नीति” भी कहती है कि ”दंड” प्रक्रिया का सख्‍ती पूर्वक प्रयोग किए बिना समाज में शांति स्‍थापित नहीं हो सकती।
”चाणक्‍य नीति” के इस गूढ़ार्थ को समझा जाए तो ”दंड” प्रक्रिया का सख्‍ती पूर्वक प्रयोग हर उस व्‍यक्‍ति, वर्ग अथवा गुट पर किया जाना चाहिए जो कानून-व्‍यवस्था में बाधा उत्‍पन्‍न करता हो। फिर वह शासन-प्रशासन के अंग ही क्‍यों न हों।
उत्तर प्रदेश जितना बड़ा है, उतनी ही बड़ी हो जाती हैं यहां कानून-व्‍यवस्‍था का राज कायम करने की जिम्‍मेदारियां।
माना कि उत्तर प्रदेश इससे पहले अनेक बार इतने बड़े-बड़े सांप्रदायिक उपद्रवों की आग में झुलसा है कि कासगंज में हुए उपद्रव की उनसे तुलना नहीं की जा सकती, किंतु दाग तो दाग है। योगी आदित्‍यनाथ के नेतृत्‍व वाली भाजपा सरकार पर यह दाग लग चुका है। अब यह छोटा हो या बड़ा, लेकिन दाग तो है।
कासगंज की घटना चाहे शैतानी हो या किसी साजिश का हिस्‍सा, किंतु इसमें दोराय नहीं कि योगी राज ”निष्‍कलंक” नहीं रह पाया।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शनिवार, 27 जनवरी 2018

मंत्री महोदय! पुलिस में ”निकम्‍मेपन” की परिभाषा कुछ और है

सुना है कल प्रदेश के ऊर्जा मंत्री तथा योगी सरकार के प्रवक्‍ता श्रीकांत शर्मा ने मथुरा के एसएसपी स्‍वप्‍निल ममगाई और जिलाधिकारी सर्वज्ञराम मिश्र से कहा कि ”निकम्‍मे” थानाध्‍यक्षों एवं दरोगाओं को चिन्‍हित कर उनके खिलाफ कार्यवाही करें।
श्रीकांत शर्मा मथुरा में ही शहरी सीट से विधायक हैं और कस्‍बा गोवर्धन अंतर्गत गांव गांठौली के मूल निवासी हैं।
श्रीकांत शर्मा कल मथुरा पुलिस लाइन में कानून-व्‍यवस्‍था के मुद्दे पर जिलाधिकारी और एसएसपी सहित सभी प्रमुख पुलिस अधिकारियों के साथ बैठक कर रहे थे।
ऊर्जा मंत्री के अनुसार पुलिस विभाग में अब भी ”निचले स्‍तर पर” अवैध वसूली हो रही है और दरोगाओं की नाक के नीचे सिपाही उगाही कर रहे हैं।
पहली नजर में देखने से ऐसा लगता है कि जैसे प्रदेश के ऊर्जा मंत्री को पुलिस महकमे के बावत बहुत-कुछ पता है और नीचे से ऊपर तक व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार तथा निकम्‍मेपन से वह परिचित हैं, किंतु गहराई से देखें तो पता लगेगा कि उन्‍होंने जो भी कहा वह उस रटी-रटाई स्‍क्रिप्‍ट का हिस्‍सा था जिसे सरकार में रहते सब बोलते हैं क्‍योंकि यही सरकारी भाषा है।
श्रीकांत शर्मा शायद नहीं जानते कि पुलिस में जिन ”निकम्‍मे” थानाध्‍यक्षों और दरोगाओं को चिन्‍हित कर उनके खिलाफ कार्यवाही की बात वह कर रहे हैं, उन्‍हें विभाग में ”कमाऊ पूत” अथवा ”दुधारु गाय” कहा जाता है। वह विभागीय अधिकारियों के नजरिए से काबिल हैं तभी तो थाना और चौकियों के प्रभारी बने हुए हैं, अन्‍यथा कृष्‍ण जन्‍मभूमि व शाही मस्‍जिद ईदगाह की सुरक्षा ड्यूटी में लगे होते।
प्रदेश के ऊर्जा मंत्री को संभवत: यह भी नहीं पता कि पुलिस ही नहीं, लगभग समूचे सरकारी महकमों में ”निकम्‍मेपन” की परिभाषा कुछ और है। यहां निकम्‍मे कर्मचारी की पहचान ”कामचोर” या काम न करने वाले के तौर पर नहीं बल्‍कि ऐसे कमाऊ पूत के रूप में होती है जो सूखी मिट्टी से भी तेल निकालना जानता हो।
ऊर्जा मंत्री को कौन समझाए कि जिस तरह के ”निकम्‍मे” थानाध्‍यक्षों, दरोगाओं और रिश्‍वतखोर सिपाहियों को चिन्‍हित कर उनके खिलाफ कार्यवाही करने का फरमान वह सुना रहे हैं, यदि उस पर अक्षरश: अमल हुआ तो प्रदेश सरकार को पुलिस विभाग में तत्‍काल नए सिरे से भर्ती करने की जरूररत पड़ जाएगी।
दरअसल, ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा कल ही इससे पहले मथुरा के थाना हाईवे अंतर्गत ग्राम मोहनपुर अडूकी में उस 8 वर्षीय बच्‍चे माधव के परिजनों से मिलकर आए थे जिसकी 17 जनवरी बुधवार को कथित मुठभेड़ के दौरान पुलिस की गोली लगने से तब मौत हो गई थी, जब वह खेत पर अपनी बहनों के साथ बेर तोड़ने गया हुआ था।
”चेतक” मोबाइल के जिन दो सिपाहियों की गोलीबारी का माधव शिकार हुआ उनकी अमानवीयता का आलम यह रहा कि वह बच्‍चे को खेत में ही तड़पता छोड़कर भाग खड़े हुए नतीजतन अस्‍पताल पहुंचाते-पहुंचाते उसकी मौत हो गई। अगर समय पर उसे पुलिस वाले ही अस्‍पताल ले गए होते तो हो सकता है उसकी जान बच जाती।
योगी सरकार ने हालांकि बच्‍चे के परिजनों को 5 लाख रुपए की आर्थिक सहायता देकर तथा आगरा जोन के आईजी राजा श्रीवास्‍तव द्वारा दो सब इंस्‍पेक्‍टरों सहित चार पुलिसकर्मियों को निलंबित कर पीड़ित परिवार के घाव पर मरहम लगाने की कोशिश की है लेकिन सवाल यह है कि इसमें नया क्‍या है। यह तो हर सरकार में होता है और कुछ दिन बाद फिर कहीं न कहीं पुलिस की ऐसी ही कोई कहानी सामने आती है। भद्रजनों के लिए ”खाकी” एक किस्‍म के ”खौफ” का पर्याय बन चुकी है। ऐसा खौफ जो स्‍वतंत्रता के 70 सालों बाद भी मिटने का नाम नहीं ले रहा।
योगी राज में हो रही मुठभेड़ों से भले ही कई ईनामी बदमाश जान गंवा चुके हों और तमाम पकड़े भी गए हों परंतु ऐसा कहीं नहीं लगता कि पुलिस का इकबाल बुलंद हुआ हो और आपराधिक वारदातों पर प्रभावी अंकुश लग पाया हो। जितने बदमाश मारे नहीं गए, उससे कई गुना अधिक संगीन वारदातें सामने आ चुकी हैं।
ऊर्जा मंत्री को याद होगा कि थाना हाईवे क्षेत्र की ही अमर कॉलोनी में हुए दोहरे हत्‍याकांड को पुलिस आजतक नहीं खोल पाई है जबकि तमाम धरने-प्रदर्शनों के बाद यह मामला न सिर्फ विधानसभा में उठ चुका है बल्‍कि हाईकोर्ट भी जा पहुंचा है और केस का अनावरण न होने की वजह से परिवार की बड़ी पुत्री आत्‍महत्‍या कर चुकी है।
इसी प्रकार बहुचर्चित रौनक हत्‍याकांड का भी पुलिस पर्दाफाश नहीं कर पाई है और इस मामले में आए दिन धरने-प्रदर्शन किए जा रहे हैं।
लूट, डकैती, चोरी और हत्‍याएं तो जैसे इस धार्मिक नगरी की पहचान बन चुके हैं क्‍योंकि शायद ही कोई दिन ऐसा व्‍यतीत होता है जिस दिन बदमाशों द्वारा पुलिस को खुली चुनौती न दी जा रही हो। चेन स्‍नेचिंग, लड़कियों से छेड़छाड़, वाहन चोरी आदि के साथ-साथ बढ़ते साइबर अपराधों की तो कोई गिनती ही नहीं है।
योगी आदित्‍यनाथ के शपथ ग्रहण करते ही मथुरा में दो युवा सर्राफा व्‍यवसाइयों की हत्‍या करके करोड़ों रुपए के आभूषण लूट कर ले जाने की जघन्‍य वारदात को शायद ही कोई अभी भूल पाया हो।
यहां अपराधियों के दुस्‍साहस का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि योगी सरकार के दस महीने बाद भी चंद रोज पहले मात्र एक दिन के अंतराल में बदमाशों ने एक ओर जहां प्रदेश के कबीना मंत्री चौधरी लक्ष्‍मीनारायण की गैस ऐजेंसी का लाखों रुपया लूट लिया वहीं दूसरी ओर उनके समधी की गोली मारकर हत्‍या कर दी। चौधरी लक्ष्‍मीनारायण मथुरा की ही छाता विधानसभा सीट से भाजपा की टिकट पर निर्वाचित हैं।
ऐसा नहीं है ”खाकी” का यह हाल सिर्फ मथुरा तक सीमित हो, प्रदेशभर में उसकी कार्यप्रणाली करीब-करीब एक जैसी है। सरकारें बदलती हैं किंतु ”खाकी” का चरित्र नहीं बदलता।
यही कारण है कि मथुरा हो या मुजफ्फरनगर और शामली हो या सहारनपुर, हर जगह उसका वही चेहरा सामने आता है जो उसकी स्‍थाई पहचान बन चुका है।
इसी गुरूवार रात की बात है। सहारनपुर जिले में बेरी बाग इलाके के मंगलनगर चौक पर एक बाइक अनियंत्रित होकर खंभे से जा टकराई और बाइक सवार दो किशोर गंभीर घायल हो गए। नुमाइश कैंप सेतिया विहार निवासी ये दोनों किशोर अर्पित खुराना और सन्नी तड़पते रहे लेकिन मौके पर पहुंचे पुलिसजनों ने उन्‍हें इसलिए अस्‍पताल ले जाने से मना कर दिया क्‍योंकि घायलों के खून से उनकी सरकारी गाड़ी गंदी हो जाती। बाद में जब इन नाबालिगों को किसी अन्‍य वाहन से अस्‍पताल पहुंचाया गया तो पता लगा कि तब तक वह दम तोड़ चुके थे।
बेशक पुलिस विभाग में भी अच्‍छे लोग हैं और वह हरसंभव जहां मानवता का परिचय देते हैं वहीं आमजनता के बीच बन चुकी पुलिस की अमानवीय छवि को दूर करने का प्रयास भी करते हैं किंतु ऐसे लोगों की संख्‍या इतनी कम है कि उनके सारे प्रयासों पर मथुरा व सहारनपुर जैसी घटनाएं पानी फेर देती हैं।
बेहतर होगा कि योगी आदित्‍यनाथ सरकार ”खाकी” के मूल चरित्र में परिवर्तन करने की कोशिश करे, न कि पूर्ववर्ती सरकारों की तरह हर बड़ी वारदात के बाद रटे-रटाए तरीके अपनाकर लीपापोती करके काम चलाए।
हर कोई जानता है कि पुलिस की चाल व चरित्र में आमूल-चूल परिर्वतन किए बिना उसके विभागीय सूत्र वाक्‍य ” परित्राणाय साधूनाम, विनाशाय च दुष्‍कृताम” को सार्थक कर पाना संभव नहीं होगा, और पुलिस में परिवर्तन तभी हो सकता है जब सरकारें एवं उसके नुमाइंदे रटी-रटाई स्‍क्रिप्‍ट पढ़ने की बजाय समस्‍या की उस जड़ को समाप्‍त करने की कोशिश करें जो परतंत्रता से स्‍वतंत्रता तक का सफर पूरा करने के बावजूद गहराई में समाई हुई है।
स्‍वयं सीएम योगी आदित्‍नाथ हों या उनके नुमाइंदे ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा, उन्‍हें समझना होगा कि ”खाकी” को बंदर घुड़की से बदलना संभव नहीं है।
खाकी के क्रिया-कलापों को बदलना है तो पहले सरकारी कार्यप्रणाली बदलनी होगी और सरकारी कार्यप्रणाली बदलने के लिए उस ”वीआईपी संस्‍कृति” को बदलना होगा जो आमजन का दर्द समझने में असहाय है। जिसके लिए किसी परिवार के ”भविष्‍य” की कीमत मात्र 5 लाख रुपए है। जिसके लिए सड़क पर तड़पते दुर्घटना के शिकार किशोरवय लड़कों की जिंदगी केवल इसलिए बेमानी है क्‍योंकि वो जिस सरकारी गाड़ी को इस्‍तेमाल करते हैं वह उनके खून से गंदी हो जाएगी।
सरकार और सरकारी कर्मचारियों की रग-रग में समा चुकी इस वीआईपी संस्‍कृति से मुक्‍ति पाए बिना न तो अपराध और अपराधियों से मुक्‍ति मिल सकेगी और न कानून का राज स्‍थापित हो पाएगा। फिर चाहे और अगले दस साल ”कोई योगी” सरकार चलाता रहे अथवा पूरे पांच साल कोई सत्‍ता का भोगी काबिज होकर चला जाए।
-www.legendnews.in

शनिवार, 13 जनवरी 2018

चौराहे पर न्‍यायपालिका, दोराहे पर लोग

देश के इतिहास में बेशक यह पहली बार हुआ हो…या फिर अंतिम भी हो…किंतु जिन सामान्‍य जनों का वास्‍ता अपने जीवन में कभी भी कोर्ट-कचहरी से पड़ा है वह भली-भांति जानते हैं कि जो कुछ कल सुप्रीम कोर्ट के चार विद्वान न्‍यायाधीशों ने प्रेस कांफ्रेंस करके कहा, उसमें नया कुछ नहीं था।
नया था तो केवल इतना कि सर्वोच्‍च न्‍यायालय के चार सीनियर मोस्‍ट न्‍यायाधीश उन बातों को कहने ”सड़क पर” यानि ”प्रेस के सामने” आ गए जो बातें सामान्‍यत: दबी-ढकी रहती हैं और जिन्‍हें सब जानते-समझते हुए भी सार्वजनिक करने की हिम्‍मत नहीं कर पाते।
न्‍यायाधीशों ने जिन बातों को अपना ”दर्द” बताकर प्रेस के सामने पेश किया, वह एक ऐसी कड़वी सच्‍चाई है जो समूची न्‍यायपालिका में नीचे से लेकर ऊपर तक व्‍याप्‍त है और जिसे हर वो व्‍यक्‍ति प्रतिदिन भोगता है जिसके अंदर कहीं ”ईमानदारी” की लौ लगी हुई है। फिर चाहे वह कोई जज हो, न्‍याय विभाग का कोई कर्मचारी हो अथवा वकील ही क्‍यों न हो। रही बात वादी और प्रतिवादियों की, तो उसकी स्‍थिति ऐसे निरीह व्‍यक्‍ति की तरह होती है जो किसी कोने में जाकर सिसक तो सकता है किंतु उस सिसकी की आवाज़ किसी के कानों तक नहीं पहुंचा सकता क्‍योंकि सवाल देश की न्‍याय व्‍यवस्‍था का है। उस न्‍याय व्‍यवस्‍था का जो लोकतंत्र में आस्‍था रखने वाले हर शख्‍स की आखिरी उम्‍मीद होती है।
आप इसे यूं भी कह सकते हैं कि स्‍वतंत्र भारत में न्‍यायपालिका अपनी बात कहने के लिए भले ही पहली बार ”चौराहे” पर आकर खड़ी हुई हो परंतु लोग तो न्‍याय की आस में कई दशकों से ”दोराहे” पर खड़े हैं। उन्‍हें समझ में नहीं आता कि वह त्‍वरित व उचित न्‍याय के लिए किस दरवाजे पर जाकर खड़े हों। विधायिका के, कार्यपालिका के या न्‍यायपालिका के।
विधायिका अर्थात् ”नेतानगरी” का हाल यहां बताने की जरूरत ही नहीं है और कार्यपालिका में व्‍याप्‍त ”भ्रष्‍टाचार” से त्‍वरित व उचित न्‍याय की उम्‍मीद पालना बेमानी है। बिना पैसे के अधिकांश सरकारी कर्मचारियों के पांव अंगद की तरह एक स्‍थान पर जमे रहते हैं। बिना चाय-पानी के उन्‍हें उठवाना तो दूर, हिला पाना भी संभव नहीं होता।
रही बात न्‍यापालिका की तो उसके बारे में बहुत पहले से कहावत प्रचलित है कि ”कचहरी” की ईंट-ईंट पैसा मांगती है। चार विद्वान न्‍यायाधीश हालांकि सुप्रीम कोर्ट में सब-कुछ ठीक न चलने की शिकायत लेकर 70 साल बाद चौराहे पर आए हों किंतु यह शिकायत न तो मात्र सुप्रीम कोर्ट की है और न सिर्फ उनकी अपनी। ऐसी शिकायतें जिला अदालतों से लेकर उच्‍च न्‍यायालयों तक में कदम-कदम पर बिखरी पड़ी हैं। इतना अवश्‍य है कि इन शिकायतों को न तो कोई एकत्र करता है और न उठाता है क्‍योंकि सवाल न्‍यायपालिका का जो है। वो न्‍यायपालिका जिसकी बात-बात में अवमानना हो जाती है। तब भी जबकि सवाल किसी न्‍यायाधीश के निजी आचरण से जुड़ा हो न कि न्‍याय व्‍यवस्‍था से, क्‍योंकि न्‍यायाधीश के आचरण को भी न्‍यायपालिका से जोड़कर देखा जाने लगा है।
शायद ही किसी अधिवक्‍ता ने कभी इस मुतल्‍लिक कोई याचिका दायर की हो कि न्‍यायपालिका की अवमानना को जनहित में परिभाषित किया जाए और स्‍पष्‍ट किया जाए कि किसी न्‍यायाधीश के निजी आचरण पर टिप्‍पणी करना न्‍यायपालिका की अवमानना कैसे हो सकती है।
आम आदमी जिसके लिए लोकतंत्र का यह स्‍तंभ न्‍याय पाने की आखिरी सीढ़ी होता है, वह इस सीढ़ी से निराश होने के बाद खुद को कितना ठगा महसूस करता है इसका इल्‍म उसे ही होता है किसी न्‍यायाधीश को नहीं।
तारीख पर तारीख…तारीख पर तारीख…किसी जुमले की तरह हिंदी फिल्‍म का हिस्‍सा तो बन गया लेकिन अदालतों से मिलने वाली तारीखों की कोई आखिरी तारीख अब तक मुकर्रर नहीं हो पाई, नतीजतन अनगिनत लोग हर साल न्‍याय की उम्‍मीद पाले लोकतंत्र के ”माई लॉर्ड” से परलोक के ”लॉर्ड” की अदालत में शिफ्ट कर जाते हैं और उसके बाद भी ”माई लॉर्ड” की अदालत से पीड़ित के किसी परिजन को हाजिर होने का फरमान जारी होना बंद नहीं होता।
जस्टिस जे चेलामेश्वरम, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ़ द्वारा लोकतंत्र को खतरे में बताकर उठाई गईं समस्‍याएं हालांकि पहली नजर में व्‍यक्‍तिगत अहम से उपजी समस्‍याएं दिखाई देती हैं और इसलिए बहुत से पूर्व विद्वान न्‍यायाधीश व अधिवक्‍तागण यह कह भी रहे हैं कि उन्‍हें अपने दायरे के अंदर रहकर समस्‍याओं के समाधान का रास्‍ता निकालना चाहिए था परंतु परिस्‍थितियां वैसी नहीं हैं जैसी सतही तौर पर दिखाई देती हैं।
जिला स्‍तरीय अदालतों में भी बहुत से जिला एवं सत्र न्‍यायाधीश अपनी और अपने नजदीकी जजों की ”सुविधा” के हिसाब से केस सुनवाई के लिए भेजते हैं। निचली अदालतों में भी ”पैसा और प्रभाव” अधिकांश जजों के सिर चढ़कर बोलता है। लोअर कोर्ट अपने जजों की कार्यप्रणाली के नियम व कानून विरुद्ध किस्‍से-कहानियों से भरे पड़े रहते हैं। किसी भी जिला अदालत में कार्यरत कुल न्‍यायाधीशों में से ईमानदार न्‍यायाधीशों का पता करने जाएं तो उंगलियों पर गिने जाने लायक न्‍यायाधीश ही उस श्रेणी में आते हैं।
लोअर कोर्ट से लेकर हाई कोर्ट तक और हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक सेटिंग-गेटिंग का खेल बड़े पैमाने पर चलता है, यह किसी से छिपा नहीं है। यह बात अलग है कि खुलकर कहने की हिमाकत हर कोई नहीं कर सकता।
बहुत दिन नहीं हुए जब सुप्रीम कोर्ट के मशहूर वकील और देश के पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण ने यह कहकर तहलका मचा दिया था कि स्‍वतंत्र भारत में आजतक जितने भी लोग चीफ जस्‍टिस की कुर्सी पर काबिज रहे हैं, उनमें से अधिकांश ईमानदार नहीं कहे जा सकते। शांति भूषण के कथन पर न्‍यायपालिका को जैसे सांप सूंघ गया। एकबार तो ऐसी बातें उठीं कि शांति भूषण के खिलाफ कोर्ट की अवमानना का केस चलाया जाएगा लेकिन हुआ कुछ नहीं। जाहिर है कि शांति भूषण का कथन अतिशयोक्‍ति नहीं था और इसीलिए उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही करने का साहस नहीं हुआ।
शांति भूषण, इन्‍हीं प्रसिद्ध वकील प्रशांत भूषण के पिता हैं जिन्‍होंने कल जजों की प्रेस कांफ्रेंस के संदर्भ में कहा है कि समस्‍या का समाधान उसे दबाने से नहीं, सार्वजनिक करने के बाद ही निकलता है।
प्रशांत भूषण के अनुसार एकसाथ चार वरिष्‍ठ न्‍यायाधीशों को यदि प्रेस कांफ्रेंस करके अपनी बात कहनी पड़ी तो समस्‍या की गंभीरता का अंदाज लगाया जा सकता है।
हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट के सीनियर अधिवक्‍ता प्रशांत भूषण कुछ निजी कारणोंवश प्रेस कांफ्रेंस करने वाले न्‍यायाधीशों को सही ठहरा रहे हों, हो सकता है कि चारों न्‍यायाधीश भी व्‍यक्‍तिगत कारणों से चीफ जस्‍टिस की कार्यप्रणाली पर उंगली उठा रहे हों लेकिन समस्‍याएं हैं और नीचे से ऊपर तक है, इससे कोई इंकार नहीं कर सकता।
बात चाहे कॉलेजियम सिस्टम की हो अथवा उन निर्णयों की जिन पर उंगली उठी हैं, न्‍यायाधीश के साथ-साथ न्‍यायप्रणाली पर भी आम आदमी के भरोसे को कमजोर करती हैं।
पिछले कुछ वर्षों के अंदर उच्‍च और उच्‍चतम न्‍यायालयों से तमाम ऐसे निर्णय हुए हैं जिन पर न सिर्फ उंगलियां उठी हैं बल्‍कि वो मीडिया तथा जनता के बीच चर्चा का विषय भी बने हैं। बहुत से निर्णय ऐसे आए हैं जिन पर खुद सर्वोच्‍च न्‍यायालय को पुनर्विचार करना पड़ा है और कुछ में तो निर्णय बदले भी गए हैं। हाल ही में ट्रांस जैंडर्स को लेकर आया फैसला उनमें से एक है।
लोअर कोर्ट के आदेश को हाई कोर्ट द्वारा पलट देना और हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूरी तरह गलत ठहरा देना तो अब जैसे आम बात हो गई है। जन सामान्‍य को विद्वान न्‍यायाधीशों के ऐसे निर्णय यह सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि आखिर कौन से न्‍यायाधीश का निर्णय सही माना जाए?
आम आदमी के समझ से परे हैं यह बातें कि जिन सबूतों और गवाहों के आधार पर एक न्‍यायाधीश किसी को सजा सुनाता है या बरी कर देता है, वही सबूत और गवाह दूसरे न्‍यायाधीश के लिए बेमानी कैसे हो जाते हैं?
माना कि लोअर कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक की व्‍यवस्‍था मुकम्‍मल न्‍याय देने के लिए ही की गई है परंतु जब अधिकांश मामलों में रद्दोबदल दिखाई देता है तो सवाल खड़े होना लाजिमी है।
राम जन्‍मभूमि बनाम बाबरी मस्‍जिद से लेकर आरुषी हत्‍याकांड तक और 2जी घोटाले से लेकर आदर्श सोसायटी घोटाले तक के उदाहरण हमारे सामने हैं। इन सभी मामलों में आजतक न्‍याय की दरकार है।
कई-कई दशकों का इंतजार भी इस बात की गारंटी देने में असमर्थ है कि उसके बाद जो न्‍याय मिलेगा, वह निर्विवाद होगा।
यही कारण है कि आज न्‍यायपालिका और न्‍यायाधीश भी बहस का मुद्दा बन गए हैं और उनके प्रति अवमानना का भय समाप्‍त होता जा रहा है।
अब आखिर में यदि बात करें लोकतंत्र के उस चौथे स्‍तंभ की जिसके सामने सर्वोच्‍च न्‍यायालय के चार-चार न्‍यायाधीशों को अपनी बात कहने के लिए आना पड़ा, वह सिर्फ एक ऐसा झुनझुना है जिसे बजाया तो जा सकता है लेकिन नतीजा निकलवाने के काम नहीं लाया जा सकता क्‍योंकि उसे लोकतंत्र के चौथे स्‍तंभ की उपमा मात्र ”जुबानी” प्राप्‍त है। उसे ऐसा कोई संवैधानिक अधिकार हासिल नहीं है जैसा विधायिका, कार्यपालिका और न्‍याय पालिका को प्राप्‍त है।
लोकतंत्र का लोक इस ”दर्जाप्राप्‍त” चौथे स्‍तंभ से उम्‍मीद तो बहुत रखता है लेकिन उसकी उम्‍मीदें पहले तीन संवैधानिक स्‍तंभों की मंशा के बिना पूरी नहीं हो सकतीं।
संभवत: यही कारण है कि प्रेस से मीडिया के रूप में परिवर्तित होने वाला यह चौथा खंभा स्‍वतंत्रता के सात दशक पूरे हो जाने के बावजूद ”भोंपू” से अधिक कुछ बन नहीं पाया। एक ऐसा भोंपू जिसे कोई भी अपनी जरूरत और सुविधा के हिसाब से जब चाहे जब बजा कर तो चला जाता है परंतु उसे सशक्‍त व समर्थ करने की बात तक नहीं करता।
सुप्रीम कोर्ट के चार विद्वान न्‍यायाधीशों ने भी अपनी जरूरत के लिए इस भोंपू का इस्‍तेमाल जरूर किया है लेकिन ये न्‍यायाधीश भली-भांति जानते हैं कि भोंपू रहेगा आखिर भोंपू ही इसीलिए सॉलीसीटर जनरल का बयान गौर करने लायक है।
सॉलीसीटर जनरल के. के. वेणुगोपाल ने कल ही साफ कर दिया था कि बहुत जल्‍द इस समस्‍या का समाधान मिल-बैठकर कर लिया जाएगा। वेणुगोपाल के बयान का निहितार्थ यही निकलता है कि हाल-फिलहाल किसी स्‍तर पर व्‍यवस्‍था में कोई भी परिवर्तन होने नहीं जा रहा। फिर किसी नए ऐसे ऐतिहासिक धमाके तक यथास्‍थिति कायम रहनी है। मीडिया का भोंपू भी मियादी बुखार की तरह ज्‍यादा से ज्‍यादा तीन दिन तक शोर मचाकर चुप हो ही जाएगा।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

सोमवार, 1 जनवरी 2018

राज्‍यचिन्‍ह के दुरुपयोग पर Speaker सख्‍त: पूर्व मुख्‍यमंत्रियों सहित ढाई हजार पूर्व विधायकों को जारी किया पत्र, पहली बार लिया गया संज्ञान

Speaker ह्रदय नरायाण दीक्षित ने सभी पूर्व विधायकों को निर्देश दिया कि वे उनके लेटरहेड पर राज्यचिन्ह का प्रयोग बंद करें
लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार के राज्यचिन्ह का बड़े पैमाने पर किया जा रहा दुरुपयोग अब Speaker को अखरने लगा है। इस पर कड़ा रुख दिखाते हुए Speaker ह्रदय नरायाण दीक्षित ने सभी पूर्व विधायकों को निर्देश दिया कि वे उनके लेटरहेड पर राज्यचिन्ह का प्रयोग बंद करें।
 
पूर्व मुख्यमंत्री पर भी आदेश होगा लागू
Speaker ने निर्देश दिया है कि यह आदेश सिर्फ पूर्व विधायकों पर ही नहीं बल्कि पूर्व मुख्यमंत्रियों पर भी लागू होगा। जो उत्तर प्रदेश विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य हैं, सिर्फ वही राज्यचिन्ह का प्रयोग कर सकते हैं।
पहली बार जारी हुआ आदेश
ऐसा पहली बार हुआ है कि इस तरह का आदेश स्पीकर ने जारी किया हो। इससे सदन के पूर्व सदस्यों के राज्यचिन्ह के प्रयोग पर प्रतिबंध लग सकेगा।
प्रमुख सचिव विधानसभा प्रदीप दुबे ने बताया कि इस तरह का पत्र 2,500 पूर्व विधायकों और विधान परिषद के सदस्यों को जारी किया गया है। उन्हें पत्र में कहा गया है कि विधानसभा या उत्तर प्रदेश सरकार के चिन्ह का प्रयोग उनके लेटरहेड पर बंद कर दें।
बड़े पैमाने पर हो रहा यह अवैध काम 
Speaker ह्रदय नारायण दीक्षित ने बताया कि कोई भी पूर्व विधायक या पूर्व विधान परिषद सदस्‍य जिसके पास अब सदन की सदस्यता नहीं है, वह सरकारी चिन्ह का प्रयोग नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्यवश, उनके संज्ञान में यह आया है कि राज्यचिन्ह का प्रयोग लगातार सदन के पूर्व सदस्यों द्वारा बड़े पैमाने पर किया जा रहा है।
राज्यपाल ने की थी शिकायत
उन्होंने कहा कि यह गैरकानूनी है क्योंकि जब कोई सदन का सदस्य नहीं होता तो वह राज्यचिन्ह का प्रयोग नहीं कर सकता है। उन्होंने कहा कि कुछ समय पहले राज्यपाल राम नाईक उनके संज्ञान में यह मामला लाए थे। उन्होंने एक पूर्व विधायक का पत्र दिखाते हुए उन्हें बताया कि किस तरह पूर्व विधायकों द्वारा राज्यचिन्ह वाले लेटरहेड पर पत्राचार किया जा रहा है।
राज्यपाल ने उन्हें कहा कि यह अवैध है और इस पर कार्यवाही की जाए। उसके बाद उन्होंने उनके सचिवालय से इस संबंध में तत्काल एक एडवाइजरी जारी करने को कहा।
सदन में कहा था न पार करें लक्ष्मण रेखा
हाल ही में हुए शीतकालीन सत्र में उन्होंने घोषणा की थी कि विधानसभा के सदस्य उनकी लक्ष्मण रेखा पार न करें। उन्होंने सख्त लहजे में कहा था कि वह सदन अनुशासनहीनता कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे। सदन में निरंतर सीटी बजाई जाए, कागज की गेदें बनाकर राज्यपाल या कुर्सियों पर फेकी जाएं। सदन में बैनर और प्लेकार्ड्स लेकर प्रदर्शन किया जाए यह भी उन्हें बर्दाश्त नहीं है।
-Legend News

रविवार, 12 नवंबर 2017

निकाय चुनाव या पांच साला गिद्धभोज की तैयारी?

यूं तो गिद्ध शिकारी पक्षियों के अंतर्गत आने वाले ”मुर्दाखोर” पक्षियों के “कुल” का पक्षी है किंतु इस पक्षी में सात और आश्‍चर्यजनक गुण पाए जाते हैं, और इत्तिफाक से उसके सातों गुण हमारे नेताओं में भी मिलते हैं।
इस तुलनात्‍मक अध्‍ययन से पहले यह जान लें कि गिद्धों में पाए जाने वाले सात आश्‍चर्यजनक गुण आखिर हैं कौन-कौन से:
1- गिद्ध सबसे ऊंची उड़ान भरने वाला पक्षी है. ये ऊंचाई एवरेस्ट (29,029 फीट) से काफ़ी अधिक है और इतनी ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी से ज़्यादातर दूसरे पक्षी मर जाते हैं।
2- जंगली जानवरों और इंसानी शवों को खाने वालों में गिद्ध का नंबर सबसे ऊपर आता है। दूसरे सभी जीव मिलकर कुल मृत पशुओं का सड़ा माँस और कंकाल मात्र 36 प्रतिशत ही खा पाते हैं जबकि गिद्ध अकेले बाकी 64 प्रतिशत को उदरस्‍थ कर जाते हैं।
3- गिद्ध अपने भोजन के लिए काफ़ी अधिक दूरी तय कर सकते हैं। प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी रूपेल्स वेंचर ने हाल में एक गिद्ध को तंजानिया स्थित अपने घोंसले से केन्या के रास्ते सूडान और ईथोपिया तक उड़ान भरते हुए कैमरे में क़ैद किया।
4- गिद्ध अपने पैरों पर पेशाब करते हैं और उनकी ये आदत आपको भले ही अच्छी न लगे, लेकिन वैज्ञानिकों का अनुमान है कि उनकी इस आदत से उन्हें बीमारियों से बचने में मदद मिलती है।
5- गिद्ध एक सीध में करीब 1000 किलोमीटर तक की दूरी तय करने के लिए बिजली के विशाल खंभों का अनुसरण करते हैं।
6- ये सही है कि गिद्धों को सड़ा हुआ मांस और मृत पशुओं को खाने के लिए जाना जाता है, लेकिन गिद्ध केवल सड़ा हुआ मांस नहीं खाते। जैसा कि इनके नाम से ही ज़ाहिर होता है पाम नट वल्चर (गिद्ध) कई तरह के अखरोट, अंजीर, मछली और कभी-कभी दूसरे पक्षियों को भी खाते है. कंकालों के मुक़ाबले इसे कीड़े और ताजा मांस पसंद है।
7- गिद्ध दुनिया का एक मात्र ऐसा जीव है जो अपने भोजन में 70 से 90 प्रतिशत तक हड्डियों को शामिल कर सकता है और उनके पेट का अम्ल उन चीजों से भी पोषक तत्व ले सकता है, जिसे दूसरे जानवर छोड़ देते हैं।
गिद्धों के पेट का अम्ल इतना शक्तिशाली होता है कि वो हैजे और एंथ्रेक्स के जीवाणुओं को भी नष्ट कर सकता है जबकि दूसरी कई प्रजातियां इन जीवाणुओं के प्रहार से मर सकती हैं।
अब इत्तिफाक देखिए कि नेताओं की भी उड़ान असीमित होती है. शिकार के लिए वह किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। उत्तर प्रदेश का नेता, तमिलनाडु जाकर चुनाव लड़ सकता है और महाराष्‍ट्र का नेता पंजाब में आकर ताल ठोक सकता है। बस जरूरत है तो इस बात की कि उसे वहां उसकी पसंद का शिकार यानि वोटर पर्याप्‍त मात्रा में मिल सके। ऑक्‍सीजन की कमी से गिद्ध नहीं मरता, और कोई नेता भी कभी आपने ऑक्‍सीजन की कमी से मरते हुए नहीं सुना होगा।
गिद्ध अकेले सड़े हुए मांस और कंकालों का 64 प्रतिशत हिस्‍सा खा जाते हैं, तो नेता भी देश का 64 प्रतिशत धन हड़प कर जाते हैं। नेताओं पर होने वाले देश के खर्च का हिसाब यदि सही-सही निकाला जाए तो निश्‍चित जानिए कि यह इतना ही बैठेगा। बाकी 36 प्रतिशत में देशभर के विकास कार्य सिमटे रहते हैं।
जहां तक बात है हाजमे की, तो नेताओं का हाजमा गिद्धों से अधिक न सही किंतु उनसे कम दुरुस्‍त नहीं होता। बल्‍कि कुछ मायनों में तो ज्‍यादा ही दुरुस्‍त पाया जाता है। जैसे कि गिद्ध केवल अपना पेट भरने तक ही खाते हैं लेकिन नेतागण खाने से कई गुना अधिक बचाकर भी रखते हैं ताकि उनकी भावी पीढ़ी का इंतजाम हो सके।
गिद्ध अपने पैरों पर पेशाब करके बीमारियों से बच निकलते हैं अर्थात उनके खुद के पास अपनी समस्‍याओं के समाधान का चमत्‍कारिक उपाय होता है, इसी प्रकार नेताओं के पास अपनी हर समस्‍या का अचूक इलाज होता है। कभी मीडिया के सिर तो कभी विरोधी दलों पर हड़िया फोड़कर नेता खुद को पाकसाफ घोषित कर देते हैं।
गिद्ध कई तरह के अखरोट, अंजीर, मछली और कभी-कभी दूसरे पक्षियों को भी खाते है. कहने का मतलब यह है कि सड़ा हुआ मांस और कंकाल उसकी पहली पसंद नहीं है। नेताओं की भी पहली पसंद ”सुस्‍वादु भ्रष्‍टाचार” है।
ऐसा भ्रष्‍टाचार जिसके लिए उन्‍हें बहुत कवायद न करनी पड़े। जोखिम उठाकर भ्रष्‍टाचार तो वह तब करते हैं जब पेट भरने लायक आसान भ्रष्‍टाचार उन्‍हें उपलब्‍ध नहीं होता।
फिलहाल, आसान भ्रष्‍टाचार के लिए हमारे नेतागण नगर निकाय चुनावों में हाथ आजमा रहे हैं। यही वह गिद्ध दृष्‍टि है जो जानती है कि एकबार किसी तरह जीत हासिल हो जाए, फिर पूरे पांच साल इतना खाने को मिलेगा कि पीढ़ियां तर जाएंगी।
यही कारण है कि लिखा-पढ़ी में धेले की आमदनी न होने के बावजूद लाखों रुपए खर्च करके वह घर-घर दस्‍तक दे रहे हैं।
आज अगर पूछा जाए तो उनसे बड़ा विकास पुरुष सारी दुनिया में कोई दूसरा चिराग लेकर ढूंढने से नहीं मिलेगा, किंतु जीतने के बाद विकास सिर्फ उनके घर तक सिमट कर रह जाएगा।
सच पूछा जाए तो वह बात भी अपने विकास की ही करते हैं, लेकिन जनता समझती है कि वह क्षेत्र के विकास की बात कर रहे हैं।
नेतागण ”आत्‍मा सुखी तो परमात्‍मा सुखी” जैसी कहावत में पूरा यकीन रखते हैं इसलिए वह पहले स्‍वयं को सुखी बनाने के उपाय करते हैं। इसके बाद किसी और की सोचते हैं। अब यदि इतने में पांच साल बीत जाएं तो इसमें नेताओं का क्‍या दोष ?
चुनाव लड़ने पर लाखों रुपए खर्च इसलिए नहीं किए जाते कि घर फूंककर तमाशा देखते रहें। उस खर्च की चक्रवर्ती ब्‍याज सहित भरपाई भी करनी होती है जिससे अगला चुनाव तिजोरी पर बोझ डाले बिना लड़ा जा सके।
जनता को सर्वाधिक बुद्धिमान और भाग्‍य विधाता घोषित करके पुदीने के पेड़ पर चढ़ा देने भर से यदि 64 प्रतिशत के गिद्धभोज में शामिल हुआ जा सकता है तो इसमें जाता क्‍या है।
इधर चुनाव संपन्‍न हुए नहीं कि उधर गिद्धभोज की तैयारियां शुरू हो जाएंगी। हर जिले में अलग-अलग मदों से गिद्धभोज के आयोजन होंगे किंतु मकसद सब जगह एक ही होगा।
बमुश्‍किल महीनेभर की मेहनत और फिर पांच साल तक हर तरह का बेरोकटोक गिद्धभोज। जिसके हिस्‍से में जो आ जाए। हाजमा इतना दुरुस्‍त है कि बोटी तो बोटी, हड्डियों को भी हजम करने में कोई दिक्‍कत नहीं आती।
सच पूछा जाए तो नेताओं में गिद्धों से भी ज्‍यादा गुण होते हैं। उनमें गीध दृष्‍टि के साथ-साथ बगुला की तरह ध्‍यानस्‍थ होने का अतिरिक्‍त गुण और होता है। वह पूरी एकाग्रता से शिकार का अंत तक इंतजार करते हैं।
संभवत: इसीलिए वोटर रूपी शिकार उनसे बच नहीं पता। कभी लोकसभा चुनाव हैं तो कभी विधानसभा। कभी नगर निकाय के चुनाव हैं तो कभी नगर पंचायत के। कभी जिला पंचायत है तो कभी प्रधानी के। हर समय कुछ न कुछ है। किसी में सीधे जनता को शिकार बनाया जाता है और किसी में उसके नाम पर शिकार किया जाता है।
गिद्ध की तरह गली-गली और मोहल्‍ले-मोहल्‍ले नेतागण बैठे हैं अपनी-अपनी पार्टियों की टोपी लगाए किसी ऐसे ऊंचे दरख्‍त की साख पर जहां से ”मृतप्राय: मतदाता” और उनकी मेहनत की कमाई को हजम किया जा सके।
इंतजार रहता है तो बस एक अदद चुनाव का, ताकि उसकी आड़ लेकर समाजसेवा का ढिंढोरा पीटा जा सके और उसके बाद ”आत्‍मा सुखी तो परमात्‍मा सुखी” जैसी कहावत पर पूरी तरह अमल किया जा सके।
फिलहाल निकाय चुनाव सामने हैं। साढ़े तीन साल बीत गए, बस डेढ़ बाकी हैं कि लोकसभा चुनावों की दुंदुभी बज उठेगी। गीधराज टोपी लगाए अब भी तैयार हैं और तब भी तैयार मिलेंगे। कहां तक बचोगे, वोट तो देना ही है।
गिद्धों का कोई विकल्‍प हो नहीं सकता। और किसी भी किस्‍म का गिद्ध हो, उसकी दृष्‍टि आपके मांस पर होगी ही।
तो जश्‍न मनाइए इस विकल्‍पहीनता का, और एकबार फिर वोट डालने जाइए 26 नवंबर को ताकि कल की नगरपालिका या आज के नगर निगम में गिद्धों के सामूहिक भोज को इस जुमले के साथ पूरे तटस्‍थभाव से निहारा जा सके कि ”कोऊ नृप होए, हमें का हानि”।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शनिवार, 28 अक्टूबर 2017

निकाय चुनाव और समाजसेवियों की फौज

हमारे यहां लोगों में समाजसेवा का जज्‍बा इस कदर कूट-कूट कर भरा है कि वह घर फूंक कर भी तमाशा देखने को बेताब रहते हैं। बस जरूरत होती है तो एक अदद चुनाव की।
चुनाव की आहट सुनाई दी कि मोहल्‍ले के हर तीसरे-चौथे आदमी के अंदर से समाजसेवा छलक कर टपकने लगती है।
अभी बहुत दिन नहीं बीते कि विधानसभा चुनावों के दौरान प्रदेशभर के समाजसेवियों ने अपने-अपने जिलों से लखनऊ तक की सड़क एक-एक इंच नाप ली थी।
समाजसेवा के इस जूनून में कुछ को सफलता मिली और कुछ को नहीं मिली, किंतु हिम्‍मत किसी ने नहीं हारी।
जो जीत गए वो आज सिकंदर बने बैठे हैं और हारने वाले समाजसेवा का टोकरा सिर पर उठाए एकबार फिर तैयार हैं।
इस मर्तबा विधानसभा के न सही, नगर निकाय के चुनाव तो हैं लिहाजा समाजसेवा का कुलाचें भरना स्‍वाभाविक है।
सच पूछें तो नगर निकाय के चुनावों में सेवा का मर्म वही जानता है जो उसके छद्म रूप में छिपी मेवा से वाकिफ हो।
निर्वाचन आयोग भी इन समाजसेवियों की भावनाओं का कितना ध्‍यान रखता है कि इस बार उसने निकाय चुनावों में प्रत्‍याशियों के लिए खर्च की सीमा पहले के मुकाबले दोगुनी कर दी है। वो भी तब जबकि इस खर्चे की भरपाई का कोई प्रत्‍यक्ष स्‍त्रोत नहीं होता।
पद नाम भले ही ऊपर-नीचे हो जाता हो किंतु कमाई के नाम पर मेयर और पार्षद उसी तरह समान हैं जिस तरह समाज में स्‍त्रियों को बराबर का दर्जा प्राप्‍त है। न मेयर को धेला मिलता है और न पार्षद को। बुढ़ापे की लाठी रुपी पेंशन भी नहीं है बेचारे माननीयों के लिए लेकिन क्‍या मजाल कि इससे किसी प्रत्‍याशी की समाजसेवा का जज्‍बा रत्तीभर कम हो जाता हो।
सुना है कि एक-एक पार्टी के पास समाजसेवा के हजार-हजार आवेदन आए पड़े हैं। आर्थिक रूप से कमजोर आवेदकों ने तो कर्ज का इंतजाम भी कर लिया है जिससे इधर पार्टी समाजसेवा के लिए अधिकृत करे और उधर वो गुलाबी व हरे नोटों के बंडल लेकर समाजसेवा को कूद पड़ें।
समाजसेवा में हाथ का मैल कहीं आड़े न आए इसलिए उन लोगों ने भी बैंक एकाउंट का ब्‍यौरा लेना शुरू कर दिया है जो कल तक आलू, प्याज और टमाटर की कीमतों पर धरना-प्रदर्शन करने को आमादा थे।
समाजसेवा को लालायित लोगों के विचार इस मामले में कभी नहीं टकराते। बैनर कोई हो, झंडा किसी का भी टंगा हो, हैं तो सभी के नुमाइंदे समाजसेवी। समाजसेवी और समाजसेवियों के बीच कैसा भेद। बस कैसे भी एकबार मौका मिल जाए। बहती गंगा में हाथ धोना किसे सुकून नहीं देता।
सरकार भी कितनी समझदार है। मतदान की तारीखों के साथ यमुना में गिर रहे नाले-नालियों को रोकने के लिए 3 हजार 500 करोड़ की रकम भी घोषित कर दी ताकि मेयर और पार्षद तथा चेयरमैन तथा सदस्‍यों के बीच किसी प्रकार का कन्‍फ्यूजन न रहे। लक्ष्‍य सामने हो तो समाजसेवा करने का आनंद ही कुछ और है। समाजसेवा की यमुना कभी दूषित नहीं होती। जनता के विचार दूषित हो सकते हैं किंतु समाजसेवियों की भावना हमेशा पवित्र रहती है।
वेतन-भत्ता नहीं है नगर निकाय की सेवा में तो न सही। पेंशन या फंड नहीं मिलता तो कोई बात नहीं। सेवा तो नाम ही है मेवा का। सेवा करेंगे तो मेवा भी मिलेगी। मेवा का इंतजाम ”ऊपर वाला” करता रहता है। यूं भी यमुना मैया सबकी सुनती है। चोंच के साथ चुग्‍गे का इंतजाम हो जाता है। मेयर की चोंच को मेयर के लायक और पार्षद की चोंच को पार्षद के लायक। ईश्‍वर हाथी से लेकर चींटीं तक के पेट की व्‍यवस्‍था करता है। किसी को भूखा नहीं रखता।
समाजसेवी लोग ईश्‍वर में पूरी आस्‍था रखते हैं इसलिए चुनाव की खातिर सबकुछ दांव पर लगाने से गुरेज नहीं करते। वो जानते हैं कि व्‍यवस्‍था कभी इतनी निर्मम नहीं हो सकती कि सेवा की मेवा देने में कोताही बरते।
यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने के लिए 3500 करोड़ की घोषणा तो कुछ नहीं, तीर्थस्‍थल के नाम पर बहुत कुछ मिलना बाकी है।
जय यमुना मैया की, जय कृष्‍ण कन्‍हैया की।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

गुरुवार, 26 अक्टूबर 2017

उधार के सिंदूर से सुहाग सहेजने को मजबूर है भारतीय जनता पार्टी

मथुरा। कृष्‍ण की जन्‍मस्‍थली मथुरा और क्रीड़ा स्‍थली वृंदावन को मिलाकर पहली बार नगर निगम बनी मथुरा में भारतीय जनता पार्टी उधार के सिंदूर से सुहाग सहेजने को मजबूर है।
दरअसल, भाजपा के सामने यह स्‍थिति मथुरा-वृंदावन का ”मेयर” पद अनुसूचित जाति के लिए ”आरक्षित” हो जाने के कारण पैदा हुई है क्‍योंकि मथुरा-वृंदावन में भाजपा के पास अनुसूचित जाति का कोई ऐसा उम्‍मीदवार नहीं है जो पूरी तरह भाजपा को समर्पित रहा हो या पार्टी का वफादार सिपाही माना जा सके।
मथुरा में भाजपा के पास उसी प्रकार मेयर पद के लिए अनुसूचित जाति के अपने किसी प्रत्‍याशी का अभाव है जिस प्रकार लोकसभा चुनाव के लिए स्‍थानीय प्रत्‍याशी का अभाव था लिहाजा तब काफी दिमागी कसरत के बाद स्‍वप्‍न सुंदरी का खिताब प्राप्‍त सिने अभिनेत्री हेमा मालिनी को लाया गया।
विधानसभा चुनावों में भी मथुरा-वृंदावन सीट के लिए श्रीकांत शर्मा को दिल्‍ली से लाना पड़ा, हालांकि श्रीकांत शर्मा कस्‍बा गोवर्धन (मथुरा) के ही मूल निवासी हैं किंतु वह करीब दो दशक पहले मथुरा को छोड़ चुके थे इसलिए उन्‍हें बाहरी प्रत्‍याशी माना गया।
निकाय चुनावों में पहली बार मेयर पद (आरक्षित) के लिए चुनाव लड़ रही मथुरा नगरी के अंदर भाजपा के पास जो संभावित प्रत्‍याशी दिखाई दे रहे हैं उनमें पूर्व विधायक श्‍याम सिंह अहेरिया, पूर्व विधायक अजय पोइया और बल्‍देव क्षेत्र से भाजपा के विधायक पूरन प्रकाश के पुत्र पंकज प्रकाश प्रमुख हैं।
श्‍याम सिंह अहेरिया सबसे पहले भाजपा की ही टिकट पर गोवर्धन (आरक्षित) सीट से विधायक चुने गए किंतु बाद के चुनावों में जब भाजपा ने उनका टिकट काट दिया तो वह अपने पुत्र सहित ”समाजवादी” हो लिए। उनके पुत्र को समाजवादी पार्टी ने सत्ता में रहते दर्जाप्राप्‍त राज्‍यमंत्री के पद से भी नवाजा था।
समाजवादी पार्टी के सत्ता से बेदखल होने पर वह फिर भाजपाई हो गए किंतु अब उन्‍हें पार्टी का समर्पित कार्यकर्ता अथवा वफादार सिपाही नहीं माना जा सकता।
इसी प्रकार एडवोकेट अजय कुमार पोइया का राजनीतिक सफर भी भाजपा की टिकट पर गोवर्धन सुरक्षित सीट से निर्वाचित होने के साथ शुरू हुआ। इससे पहले अजय कुमार पोइया मथुरा में ही वकालत की प्रेक्‍टिस करते थे।
बाद के चुनावों में पार्टी से उपेक्षित अनुभव करने के कारण अजय कुमार पोइया ने भी भाजपा का दामन छोड़ दिया और बहुजन समाज पार्टी की गोद में जा बैठे। बहुजन समाज पार्टी में रहते हुए कोई उपलब्‍धि हासिल न होने पर अजय कुमार पोइया एकबार फिर भाजपा की शरण में लौट आए।
गत विधानसभा चुनावों में बल्‍देव सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ने की उम्‍मीद पाले बैठे अजय कुमार पोइया को तब तगड़ा झटका लगा जब पार्टी ने उनकी बजाय राष्‍ट्रीय लोकदल से भाजपा में आए सिटिंग विधायक पूरन प्रकाश को बल्‍देव से चुनाव लड़ाने का फैसला किया।
पार्टी से मिले इस झटके पर अजय पोइया ने पूरन प्रकाश के खिलाफ अपने पुत्र को चुनाव लड़ने के लिए खड़ा कर दिया, और दलील यह दी कि वह तो पार्टी के अनुशासित सिपाही हैं किंतु पुत्र द्वारा चुनाव लड़ना उसका अपना निर्णय था।
यानि अजय पोइया एकबार फिर पार्टी के प्रति बड़ी चालाकी के साथ बेवफाई पर उतर आए ताकि संभव हो तो सांप मर जाए और लाठी भी न टूटे की कहावत को चरितार्थ कर सकें।
यह बात अलग है कि अजय पोइया के पुत्र, पूरन प्रकाश का कुछ नहीं बिगाड़ सके और पूरन प्रकाश लगातार दूसरी बार बल्‍देव सुरक्षित सीट से निर्वाचित होने में सफल रहे।
जहां तक सवाल पूरन प्रकाश के पुत्र पंकज प्रकाश का है तो बेशक उन्‍होंने 2010 के जिला पंचायत चुनावों में सर्वाधिक मतों से चुनाव जीतकर एक रिकॉर्ड कायम किया किंतु बुनियादी रूप से उनके विधायक पिता या दादा का कभी भाजपा की नीतियों में विश्‍वास देखने को नहीं मिला। पंकज प्रकाश के दादा मास्‍टर कन्‍हैया लाल भी विधायक रहे थे लेकिन भाजपा से कभी उनका कोई वास्‍ता नहीं रहा।
इन तीन प्रमुख दावेदारों के अलावा जो अन्‍य दो दावेदार हैं उनमें से एक मुकेश आर्यबंधु के पूरे परिवार की निष्‍ठा हमेशा कांग्रेस से जुड़ी रही है और उनके बड़े भाई ब्रजमोहन बाल्‍मीकि ने कांग्रेस की टिकट पर गोवर्धन सुरक्षित सीट से ही चुनाव भी लड़ा था।
दूसरे दावेदार ब्रजेश खरे ही एकमात्र ऐसे दावेदार हैं जो पूर्व में भाजपा सभासद रह चुके हैं और एक लंबे समय से भाजपा के प्रति समर्पित हैं किंतु ब्रजेश खरे की दो पूर्व विधायकों तथा एक विधायक पुत्र के सामने कितनी दाल गल पाएगी, यह देखने वाली बात होगी।
भाजपा की सबसे बड़ी समस्‍या ही यह है कि विश्‍व विख्‍यात धार्मिक नगरी मथुरा राजनीतिक रूप से उसके लिए चाहे कितनी ही महत्‍वपूर्ण क्‍यों न हो किंतु यहां उसके पास कद्दावर नेताओं का काफी समय से अभाव रहा है।
2009 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को रालोद के युवराज जयंत चौधरी को समर्थन देना पड़ा क्‍योंकि तब भी भाजपा के पास कोई दमदार उम्‍मीदवार नहीं था।
यह स्‍थिति तो तब है जबकि मथुरा से दो बार भाजपा की टिकट पर डॉ. सच्‍चिदानंद हरि साक्षी लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए थे और तीन बार वर्तमान जिलाध्‍यक्ष चौधरी तेजवीर सिंह सांसद चुने गए।
उधार के सिंदूर या बेवफाओं में से किसी को मेयर पद पर चुनाव लड़वाना भाजपा को इसलिए मुसीबत में डाल सकता है क्‍योंकि निवर्तमान पालिका अध्‍यक्ष मनीषा गुप्‍ता भी जनआंकाक्षाओं पर खरी नहीं उतरीं। साथ ही उनके ऊपर पौने दो करोड़ रुपए के भ्रष्‍टाचार का आरोप भी एनजीटी में लंबित है।
मनीषा गुप्‍ता के कार्यकाल में यमुना को प्रदूषण मुक्‍त रखने के लिए किए जाने वाले उपायों से पैसे का तो खूब बंदरबांट हुआ किंतु यमुना हर दिन पहले से अधिक प्रदूषित होती गई।
जाहिर है कि मनीषा गुप्‍ता के कार्यकाल की छाया भी इन नगर निकाय चुनावों में किसी न किसी स्‍तर पर देखने को जरूर मिलेगी क्‍योंकि यमुना प्रदूषण का मुद्दा फिर गर्माने लगा है। संत समाज भी यमुना प्रदूषण के मामले में न सिर्फ मथुरा-वृंदावन की नगर पालिकाओं से नाराज है बल्‍कि केन्‍द्र सरकार के आश्‍वासनों की घुट्टी से भी आजिज आ चुका है और उसने मार्च 2018 से इसके लिए आंदोलन करने का ऐलान कर दिया है।
वैसे भी देखा जाए तो फिलहाल मथुरा-वृंदावन नगर निगम के मेयर पद हेतु जिन दो पूर्व विधायकों के नाम सामने आ रहे हैं उनकी वफादारी के अलावा कार्यक्षमता पर भी पहले से सवालिया निशान लगे हैं। उनकी उम्र भी उनकी कार्यक्षमता को लेकर चुगली करती प्रतीत होती है जबकि नगर निगम बन जाने के बाद जनआकांक्षाएं काफी प्रबल हैं।
बल्‍देव क्षेत्र के विधायक पूरन प्रकाश के पुत्र पंकज प्रकाश ही एकमात्र ऐसे संभावित उम्‍मीदवार हो सकते हैं जो युवा होने के साथ-साथ अच्‍छे-खासे शिक्षित भी हैं लेकिन उनकी उम्‍मीदवारी में भाजपा की नीतियां आड़े आती हैं।
इस सबके बावजूद यदि भाजपा इन्‍हीं चर्चित लोगों में से किसी एक को मथुरा में मेयर पद के लिए खड़ा करती है तो यही माना जाएगा कि वह या तो उधार के सिंदूर से सुहाग सहेजने को मजबूर है या फिर बेवफाओं से वफादारी की उम्‍मीद पालकर मथुरा-वृंदावन की जनता को उसी दलदल में धकेलने जा रही है जिससे निकलने का जनता को वर्षों से इंतजार है।
रहा सवाल अन्‍य राजनीतिक दलों का तो समाजवादी पार्टी मथुरा में कभी किसी स्‍तर पर अपना जनाधार खड़ा नहीं कर सकी और बहुजन समाज पार्टी फिलहाल भाजपा के मुकाबले में दिखाई नहीं देती। कांग्रेस के पास भी अच्‍छे उम्‍मीदवारों का भारी अकाल है और राष्‍ट्रीय लोकदल की स्‍थिति उस बूढ़े सांड़ की तरह है जो खुरों से मिट्टी खोदकर रास्‍ते की धूल तो उड़ा सकता है किंतु किसी से मुकाबला करने की सामर्थ्‍य पूरी तरह खो चुका है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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