शुक्रवार, 12 अप्रैल 2019

कान में चुपचाप एक बात बतातौ जा मेरे राजा, मथुरा कौ सबरौ मीडिया “मैनेज” है गयौ का?

कोई दो दशक पुरानी बात है। राजाधिराज बाजार में एक चौबे जी आगे चल रहे व्‍यक्‍ति को संबोधित करके जोर-जोर से आवाज लगा रहे थे। अरे पत्रकार…ओ भइया पत्रकार…नैक रुक। तोते जरूरी काम है।
आगे चल रहे एक प्रख्‍यात अखबार के सुविख्‍यात पत्रकार ने पीछे मुड़कर देखा और अपने कदमों को लगाम लगाई। इतनी देर में चौबे जी उनके नजदीक जा पहुंचे और पूछने लगे- मैंने तोय सही पहचानौ, तू पत्रकार ही है।
पत्रकार ने असीम धैर्य का परिचय देते हुए चौबे जी से पूछा- कहिए क्‍या काम है आपको मुझसे।
अरे यार, आज फिल्‍म देखवे कौ बड़ो मन कर रह्यौ है, ये बता कि मिलन टॉकीज में कौन सी फिल्‍म चल रही है?
अब पत्रकार का मुंह देखने लायक था। उसे बुरा तो बहुत लगा लेकिन चौबे जी का इलाका था इसलिए गुस्‍से को पीकर बोले- मुझे नहीं पता।
तौ तू काहे कौ पत्रकार है, जब तोय ये तक नाय पतौ कि मिलन टॉकीज में कौन सी फिल्‍म चल रही है। बड़ौ पत्रकार बनें।
पत्रकार साहब ने चौबे जी से पिण्‍ड छुड़ाकर चुपचाप निकल लेने में ही अपनी भलाई समझी और द्रुत गति से नौ-दो-ग्‍यारह हो लिए।
दो दशक बाद अब फिर वही बाजार है और वही चौबे जी, लेकिन पत्रकार कोई और। इस बार चौबे जी ने फिर पत्रकार को आवाज लगाई। सुन भइया, तोते कुछ जरूरी बात करनी है।
जैसे ही पत्रकार रुका, चौबे जी ने सवाल दागा- कान में चुपचाप एक बात बतातौ जा मेरे राजा। इन लोकसभा चुनावन के लिएं मथुरा कौ सबरौ मीडिया “मैनेज” है गयौ का, या कछू बचौ है ?
चौबे जी के जहर बुझे सवाल का कोई जवाब न सूझते देख पत्रकार महोदय ने कुछ तल्‍खी के साथ कहा- ये बात आप मुझसे क्‍यों पूछ रहे हैं।
इस पर चौबे जी का जवाब था- लै भइया…तो ते न पूछें तो कौन तो पूछें, पत्रकार तौ तूही है। रस्‍ता चलतौ आदमी बिचारौ का जानें पत्रकारन की माया।
मैंने सुनी कि या बार ‘पेड न्‍यूज़’ पै चुनाव आयोग बहुत बिगड़ गयौ है। बड़ी सख्‍ती बरती है, और या लिएं अब तक अखबारन के पन्‍ना कोरे दीख रहे हैं। न विज्ञापन हैं न समाचार।
अब सुनी है चुनाव लड़वे बारेन ने पत्रकारन ते सांठगांठ करकें कोऊ बीच कौ रास्‍ता निकारौ है। अब टेबिल के ऊपर की जगह टेबिल के नीचे ते काम चल रह्यौ है।
काऊ ने बताई कि तुम्‍हारे यहां कोऊ ”बीट सिस्‍टम” बन गयौ है और बीट के हिसाब ते हिसाब-किताब चल रह्यौ है। चुनाव लड़वे बारे एक तौ बीट एै सैट कर रहे हैं और दूसरी सैटिंग ”पीठ” ते कर रहे हैं। बतावें कि पीठ वाय कहें तुम्‍हारे यहां जो तुम्‍हारे ऊपर बैठौ रहै।
खैर भइया, हमें का। दो पइसा तुम्‍हें मिल जाएं तो हमें का। हमें तौ दुख दो बातन कौ है।
पहली बात तौ ये कि जैसी खबरें इन दिनन अखबारन में पढ़वै कों मिलतीं, वैसी अब नाय मिल रहीं। और दूसरी ये कि तुमने अपने मालिकन के पेट पै लात मार दीनी है। बेचारे चुनावन में लाखन पीट लेते लेकिन अब सूखे संख बजाय रहे हैं। नेतन की हू मौज आय गई है। ”बीट और पीठ” ते सेटिंग करके सस्‍ते में निपट लिए, नहीं तौ लाखन को पैकेज देकेऊं हाय-हत्‍या।
वैसें मेरे राजा, तू बुरौ न मानें तो एक बात कहों। ये बड़े-बड़े अफसर जो बुद्धि के पुतला बने फिरें, तुम्‍हारे सामने कछू नाएं। हर्द लगै न फटकरी, रंग चौखौ। ऐसी सेटिंग करी है नेतन ते कि आंख को काजर चुराय लिए और कानौं-कान काउए पतौ ही नाय लगी।
चुनाव आयोग अखबार में ढूंढतौ रह जायेगौ ”पेड न्‍यूज़”। वाय का पतौ कि या बार ”पेड पत्रकार” कौ खेल चल रह्यौ है। अखबार वारेन कों अखबार जैसौ चढ़ावौ और चैनल वारेन कों चैनल जैसौ। जैसौ देवता, वैसी पूजा।
बड़ी देर में मौका पाकर पत्रकार ने चौबे जी से कहा, आप कहें तो अब मैं निकलूं।
पत्रकार को खिसकते देख चौबे जी बोले- भइया मेरे, एक आखिरी बात और बतायजा।
कोई प्रशासन को टोपी वारौ बताय गयो वा दिन, कि अखबारन में पेड न्‍यूज़ देखवे के लिए कोऊ कमेटीऊ बनाई गयी है। का कहें वाय…अरे हां, मॉनिटिरिंग कमेटी।
वा मै सुनी है कि अफसरन के अलावा पत्रकारू रखे गए हैं। ये का बात बही। मलाई की रखवारी के लिएं कोऊ बिल्‍ली एै रखवारी सौंपै का। ये का खेल चल रहयौ है। या की तौ तोय जरूर पतौ होएगी। अपनी मत बताय, वाकी तो कान में कुर्र कर जा।
देख राजा, मोय तो ते कुछ मतलब थोरैं हैं। तू तौ ये समझ कि घी गिरौ तो भात में ही गयौ।
मोय तो या बात ते मतलब है कि थौरे से दिन रह गए हैं वोट परवे में, और काऊ नै अब तक न तो प्रत्‍याशिन की ‘हिस्‍ट्री’ छापी, न ‘लेनदारी-देनदारी’ छापी, न कर्म-कुकर्म छापे, न आमदनी के स्‍त्रोत बताए। बस लकीर पीट रहे हैं। 10 रुपैया खर्च करकें सबरे अखबार खरीदों, पर बाचौं तो सन्‍नाटौ।
मैंने तो सुनी है कि सुप्रीम कोर्ट ने ऑर्डर दे रखौ है कि हर उम्‍मीवार एै एक-दो बार नाय तीन-तीन बार अपनी गुण्‍डई कौ ब्‍यौरा अखबारन में छपवानों पड़ेगौ। और हां, वो का कहें, सोशल मीडिया पै हू देने पड़ैगौ, लेकिन अब तक तौ काऊ अखबार में ऐसौ कछू नाय देखौ। यहां ते चुनाव लड़वे बारे का सबरे राजा बेटा हैं। एक-दो कौ कच्‍चौ चिठ्ठा तौ मौऊएै पतौ है। वैसें मोय अकेले है का, पूरे शहर एै विनके अर्थ और अनर्थ की जानकारी है। बस मीडिया मठा पी कें बैठ गयौ है।
चल भइया, तौय मैंने बेमलब घेर लियौ। ये टेड़ी टांग वारे की जन्‍मभूमि है। यहां के सब खेल निराले हैं। दिल्‍ली यहां ते ज्‍यादा नाय तो डेढ़ सौ किलोमीटर दूर तौ है ही। यहां की लीला जब तक वहां बैठे अफसरन के कानन तक पहुंचैगी, तब तक तौ वोट गिरू जांगे और गिनूं जांगे।
वैसै हूं कहें कि दिल्‍ली नैक ऊंचौ सुनें। तू अपनौ रस्‍ता पकड़ भइया पत्रकार, और मैंऊं चलौं राजाधिराज एै ढोक दैवे।
जाकी चलै वो परपट तानें, या कौ बुरौ नैंक नहीं मानें।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

एक ही समस्‍या से जूझ रहे हैं मथुरा के तीनों प्रमुख प्रत्‍याशी, टेढ़ी खीर बना हुआ है समाधान

अलग-अलग पार्टियों और अलग-अलग जातियों से होने के बावजूद मथुरा के तीनों प्रमुख प्रत्‍याशी फिलहाल एक ही समस्‍या से जूझ रहे हैं। जो प्रत्‍याशी जितनी जल्‍दी इस समस्‍या का समाधान निकाल लेगा, मुख्‍य मुकाबले में उसी के शामिल होने की संभावना उतनी बढ़ जाएगी।
कृष्‍ण की नगरी से भाजपा ने जहां एकबार फिर निवर्तमान सांसद हेमा मालिनी पर दांव लगाया है वहीं सपा-बसपा और रालोद के गठबंधन ने कुंवर नरेन्‍द्र सिंह को बतौर रालोद प्रत्‍याशी मैदान में उतारा गया है। कांग्रेस ने पूर्व में लोकसभा का एक चुनाव लड़ चुके महेश पाठक को टिकट दिया है। इन तीन में से दो प्रत्‍याशियों हेमा मालिनी और कुंवर नरेन्‍द्र सिंह कल ही अपना नामांकन दाखिल कर चुके थे जबकि महेश पाठक ने आज नामांकन दाखिल किया है।
कहने को ये पांच दलों के तीन प्रत्‍याशी हैं किंतु इत्तेफाकन इन तीनों की समस्‍या एक ही है। जीत के लिए मतदाताओं के बीच जाने से पहले इन्‍हें इस समस्‍या का समाधान करना होगा अन्‍यथा सारा गुणा-भाग जाया हो सकता है।
सबसे पहले बात करते हैं भाजपा प्रत्‍याशी और नामचीन अभिनेत्री हेमा मालिनी की। हेमा मालिनी को जब 2014 के लोकसभा चुनावों में मथुरा से उम्‍मीदवार घोषित किया गया था तब भाजपा सत्ता से बाहर थी और हर भाजपायी की प्राथमिकता एक दशक से केंद्र की सत्ता पर काबिज कांग्रेस के नेतृत्‍व वाली यूपीए सरकार को हटाना था।
ऐसे में मथुरा की भाजपा इकाई ने थोड़ी-बहुत हील-हुज्‍जत के बाद हेमा मालिनी को तहेदिल से स्‍वीकार करते हुए उनके लोकसभा में पहुंचने का मार्ग प्रशस्‍त किया।
समस्‍याएं तब पैदा होने लगीं जब स्‍वप्‍न सुंदरी का खिताब प्राप्‍त रुपहले पर्दे की इस अभिनेत्री के दर्शन आमजनता के साथ-साथ पार्टीजनों के लिए भी दुर्लभ हो गए, और वह चंद लोगों की पहुंच तक सिमट गईं। ये खास लोग ही हेमा के आम और खास दोनों बन बैठे लिहाजा वह उन कार्यकताओं से दूर होती चली गईं जिन्‍होंने अपना खून-पसीना एक करके उन्‍हें संसद भिजवाया था।
इसके बाद खबर आई कि हेमा जी ने मथुरा के विकास हेतु ”ब्रजभूमि विकास ट्रस्‍ट” के नाम से स्‍थानीय रजिस्‍ट्रार कार्यालय में एक एनजीओ का रजिस्‍ट्रेशन कराया है। इस एनजीओ में हेमा मालिनी के अलावा उनके दिल्‍ली निवासी समधी, उनके सगे भाई, मथुरा के एक सीए तथा एक मुकुट वाला सहित आधा दर्जन लोगों के नाम जोड़े गए।
हेमा मालिनी के इस ”ब्रजभूमि विकास ट्रस्‍ट” ने मथुरा के विकास में कितनी और कैसी भूमिका अदा की इसका पता आजतक जनता को तो क्‍या, पार्टीजनों को भी शायद ही लगा हो।
यदि फोटोग्राफ्स पर भरोसा करें तो हेमा मालिनी की उपस्‍थिति मथुरा जनपद के खेत व खलिहानों से लेकर पगडंडियों तक पर और बाजार व गलियों से लेकर मंदिरों तक में खूब दिखाई देगी किंतु हकीकत यह है कि अपने पूरे पांच साल के कार्यकाल में उन्‍होंने यहां न तो कभी कोई जनता दरबार लगाया और न जनसमस्‍याओं की सुनवाई की। वो हमेशा अपना डेकोरम मेंटेन करके रहीं और विशिष्‍ट लोगों से मिलती रहीं।
यही कारण रहा कि इस बार फिर जब पार्टी ने उनका नाम लोकसभा प्रत्‍याशी के तौर पर घोषित किया तो मथुरा की जनता सहित भाजपा कार्यकर्ताओं में भी कोई उत्‍साह नजर नहीं आया।
ऐसा नहीं है कि हेमा मालिनी को इस बात का इल्‍म नहीं था। उन्‍हें अच्‍छी तरह भान था कि स्‍वप्‍नसुंदरी से मेल खाती उनकी बॉलीवुडिया कार्यशैली ब्रजवासियों को रास नहीं आई है इसलिए उन्‍होंने पिछले चुनाव की तुलना में नरम रुख अपनाते हुए यह कहना शुरू किया कि वह एक चांस लेकर अपने अधूरे काम पूरे करना चाहती हैं।
इस सबके बावजूद पार्टी के अंदर ही हेमा जी की खिलाफत का आलम यह था कि टिकट घोषित होने के बाद बुलाई गई पार्टी की पहली मीटिंग में एक पूर्व जिलाध्‍यक्ष और वर्तमान जिलाध्‍यक्ष के बीच तीखी तकरार हुई।
बताया जाता है कि इस अंदरूनी कलह को समाप्‍त कराने के लिए ही हेमा मालिनी के नामांकन वाले दिन प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ को मथुरा भेजा गया। योगी आदित्‍यनाथ इस मकसद में कितने सफल हुए, इसकी पूरी जानकारी तो चुनाव के नतीजे ही देंगे किंतु यह अंदाज जरूर लग चुका है कि हेमा मालिनी के लिए जीत की डगर इस बार पहले जितनी आसान नहीं रहेगी।
हेमा मालिनी के बाद नंबर आता है गठबंधन के प्रत्‍याशी ठाकुर कुंवर नरेन्‍द्र सिंह का। कुंवर नरेन्‍द्र सिंह राजनीति में कभी अपनी वैसी छवि नहीं बना पाए जैसी उनके भाई पूर्व सांसद कुंवर मानवेन्‍द्र सिंह ने बनाई।
संभवत: इसी कारण कुंवर मानवेन्‍द्र सिंह को मथुरा की जनता ने तीन बार लोकसभा भेजा लेकिन कुंवर नरेन्‍द्र सिंह तीनों बार विधानसभा का मुंह भी नहीं देख पाए। आज भी लोग यह कहते सुने जा सकते हैं कि काश यह टिकट कुंवर मानवेन्‍द्र सिंह को मिला होता।
बहरहाल, व्‍यक्‍तिगत छवि की बात न भी करें तो कुंवर नरेन्‍द्र सिंह को टिकट देकर रालोद ने मथुरा के उन सभी जाट नेताओं को नाराज कर दिया है जो वर्षों से पार्टी को पुनर्जीवित करने की कोशिश में लगे थे। अनिल चौधरी तो इसलिए पार्टी ही छोड़कर चले गए।
बताया जाता है कि जिन जाट मतदाताओं के बल पर आजतक चौधरी अजीत सिंह और उनकी पार्टी का वजूद कायम रहा है, वही जाट इस मर्तबा चौधरी साहब को सबक सिखाने का मन बना चुके हैं। किसी भी कद्दावर जाट नेता का कुंवर नरेन्‍द्र सिंह के साथ खड़े दिखाई न देना इस बात की पुष्‍टि करता है।
कुंवर नरेन्‍द्र सिंह के लिए ठाकुर वोट पाना भी टेढ़ी खीर होगा क्‍योंकि रालोद ने ठाकुर तेजपाल की नाराजगी मोल लेकर कुंवर नरेन्‍द्र सिंह को टिकट दिया है। कुंवर नरेन्‍द्र सिंह और ठाकुर तेजपाल सिंह के बीच पहले से ही छत्तीस का आंकड़ा चल रहा था, इस टिकट ने वह खाई और चौड़ी कर दी।
छाता क्षेत्र में अच्‍छा जनाधार रखने वाले ठाकुर तेजपाल का वोट कुंवर नरेन्‍द्र सिंह को मिल पाएगा, यह कहना बहुत मुश्‍किल है।
रही-सही कसर कल तब पूरी हो गई जब कुंवर नरेन्‍द्र सिंह के अपने सगे भाई पूर्व सांसद कुंवर मानवेन्‍द्र सिंह ने चुनावों के बीच भाजपा ज्‍वाइन कर ली। ऐसे में अब उनका भी कुंवर नरेन्‍द्र सिंह के लिए वोट मांगने आना असंभव हो चुका है।
कुंवर नरेन्‍द्र सिंह की दिक्‍कतें यहीं खत्‍म नहीं होतीं। जिन सपा और बसपा के गठबंधन से उन्‍हें सहारा है, वह भी उनके लिए खुलकर सामने आने को तैयार नहीं है।
बसपा के मथुरा में सर्वाधिक कद्दावर नेता मांट क्षेत्र के विधायक श्‍यामसुंदर शर्मा माने जाते हैं। श्‍यामसुंदर शर्मा और रालोद मुखिया चौधरी अजीत सिंह की वैमनस्‍यता जगजाहिर है। मुलायम सिंह के नेतृत्‍व वाली सरकार में जिस वक्‍त रालोद उत्तर प्रदेश की सरकार का हिस्‍सा हुआ करता था उस वक्‍त चौधरी अजीत सिंह ने श्‍यामसुंदर शर्मा को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
अजीत सिंह ने अपने एक मुंह लगे रैंकर आईपीएस और एसएसपी मथुरा सत्‍येन्‍द्र वीर सिंह से न केवल श्‍यामसुंदर शर्मा बल्‍कि उनके लघुभ्राता कृष्‍णकुमार शर्मा ‘मुन्‍ना’ सहित पूरे परिवार का जिस कदर उत्‍पीड़न कराया था, उसे श्‍याम शायद ही भूले हों।
पूरे ढाई साल अजीत सिंह के उस खास पुलिस अफसर ने श्‍यामसुंदर शर्मा व उनके परिजनों का जो उत्‍पीड़न किया, उसका दूसरा उदाहरण मिलना मुश्‍किल है।
बेशक आज श्‍यामसुंदर शर्मा के दल का दिल चौधरी अजीत सिंह से मिल चुका है परंतु मथुरा में तो मतदाता वही करेगा जो श्‍यामसुंदर शर्मा दिल से करने को कहेंगे। श्‍यामसुंदर शर्मा मांट क्षेत्र की जनता के दिल पर तो राज करते ही हैं, साथ ही ब्राह्मणों के भी बड़े नेता माने जाते हैं।
अजीत और श्‍याम के संबंधों का आंकलन करने वालों को शक है कि मथुरा में बसपा का वोट रालोद के प्रत्‍याशी कुंवर नरेन्‍द्र सिंह के लिए ट्रांसफर हो पाएगा।
कहने को बसपा के एक और ब्राह्मण नेता योगेश द्विवेदी भी हैं। योगेश द्विवेदी 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा के मथुरा से प्रत्‍याशी थे और अच्‍छे-खासे वोट भी लेकर आए थे। सपा-बसपा-रालोद के अप्रत्‍याशित गठबंधन से पहले योगेश द्विवेदी को इस बार भी बसपा का स्‍वभाविक प्रत्‍याशी माना जा रहा था लेकिन गठबंधन ने उनकी उम्‍मीदों पर पानी फेर दिया। जाहिर है कि अब पार्टी यदि उनसे कोई उम्‍मीद रखती है तो वह बेमानी होगी।
बसपा के मथुरा में तीसरे अहम नेता भी ब्राह्मण समुदाय से ताल्‍लुक रखते हैं। ये नेता हैं पूर्व विधायक राजकुमार रावत। राजकुमार रावत की गोवर्धन और गोकुल व बल्‍देव क्षेत्र के बाह्मण वोटों पर अच्‍छी पकड़ है किंतु उनका वोट बैंक रालोद को ट्रांसफर हो पाएगा, इस पर कोई आसानी से भरोसा करने के लिए तैयार नहीं है।
अब यदि बात करें गठबंधन के तीसरे दल समाजवादी पार्टी की, तो वह आज तक मथुरा में अपना कोई जनाधार खड़ा ही नहीं कर पाया। मथुरा से कभी किसी चुनाव में समाजवादी पार्टी को सफलता नहीं मिली। तब भी नहीं जब अखिलेश ने यूपी की गद्दी संभाली ही थी और मांट क्षेत्र के उपचुनाव में अपने मित्र और निकट सहयोगी संजय लाठर को चुनाव लड़वाया था। सारी सरकारी मशीनरी झोंक देने के बावजूद संजय लाठर ये विधानसभा का उपचुनाव हार गए।
मथुरा से तीसरे प्रमुख प्रत्‍याशी महेश पाठक 1998 में कांग्रेस की ही टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ चुके हैं। तब महेश पाठक के लिए किशोरीरमण डिग्री कॉंलेज के मैदान में सोनिया गांधी ने सभा की थी। सोनिया की सभा में तब भीड़ तो खूब उमड़ी किंतु वह वोटों में तब्‍दील नहीं हुई नतीजतन महेश पाठक बुरी तरह चुनाव हार गए।
दो दशक बाद एकबार फिर कांग्रेस ने महेश पाठक को चुनाव मैदान में उतारा है। महेश पाठक का अपना कोई जनाधार कभी रहा नहीं और पार्टी में भी वो सर्वमान्‍य नहीं हैं।
महेश पाठक को चुनाव मैदान में उतारने से कांग्रेस की गुटबाजी पूरी तरह सामने आ चुकी है।
मथुरा के चतुर्वेदी समुदाय से ताल्‍लुक रखने वाले महेश पाठक यूं तो माथुर चतुर्वेद परिषद के संरक्षक तथा अखिल भारतीय तीर्थ पुरोहित महासभा के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष जैसे पदों को सुशोभित करते हैं परंतु कांग्रेस पार्टी की ही तरह समूचा चतुर्वेदी समुदाय भी उन्‍हें लेकर एकमत नहीं है।
एक असफल उद्योगपति के रूप में पहचान रखने वाले महेश पाठक कांग्रेसी नेता से अधिक दबंग व्‍यक्‍ति के तौर पर मशहूर हैं, और इसके लिए उनका अतीत जिम्‍मेदार है।
महेश पाठक से ऐसी कोई उम्‍मीद नहीं की जा सकती कि वह चुनाव के लिए कांग्रेस में व्‍याप्‍त गुटबाजी को समाप्‍त करा पाएंगे लिहाजा जिस समस्‍या से भाजपा की हेमा मालिनी तथा गठबंधन के कुंवर नरेन्‍द्र सिंह रुबरू हैं, वही महेश पाठक के सामने मुंहबाये खड़ी है।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि तीन लोक से न्‍यारी नगरी की उपमा प्राप्‍त कृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली मथुरा से चुनाव मैदान में उतरे इन तीनों प्रमुख प्रत्‍याशियों का भाग्‍य भितरघातियों की चाल पर निर्भर है। प्रत्‍याशी भले ही तीन हैं लेकिन समस्‍या इन सभी की एक है।
मतदाता भले ही निर्णायक भूमिका अदा करता हो परंतु भितरघातियों की भूमिका भी जीत या हार में कम मायने नहीं रखती।
यकीन न हो तो देश के किसी भी क्षेत्र का चुनावी इतिहास उठाकर देख लो, आंकड़े खुद-ब-खुद बता देंगे कि भितरघाती क्‍या अहमियत रखते हैं। मथुरा लोकसभा का चुनाव इससे अलग नहीं हो सकता।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

मथुरा के तीनों प्रमुख प्रत्‍याशियों की ”जीत का सर्वे”: अंधे ने गूंगे और बहरे से पूछा, भाई…प्रजातंत्र कैसा है?

आज श्‍याम मिश्र की एक ‘क्षणिका’ पढ़ी, पढ़ी तो पढ़ता ही रह गया क्‍योंकि मिश्र जी ने गागर में सागर भर दिया था।
चूंकि लोकतंत्र का ”दो-मासी महापर्व” शुरू हो चुका है इसलिए वह ‘क्षणिका’ अंदर तक उतर गई। आप भी पढ़िए इसे…आनंद आएगा-
एक था अंधा, दूसरा गूंगा, और तीसरा बहरा 
अंधे ने गूंगे और बहरे से पूछा- भाई…प्रजातंत्र कैसा है ? 
बहरे ने सुना नहीं और गूंगा बोलने में असमर्थ था। क्‍या अब आप आगे भी कुछ सुनना चाहाेगे ? सुनाेगे तो तब, जब सुनाने को कुछ बचा हो।
प्रजातंत्र की इससे अधिक सटीक, सुंदर और काव्‍यात्‍मक परिभाषा मेरे सामने कभी नहीं आई।
खैर, इस परिभाषा से प्रेरित होकर मैंने कृष्‍ण की नगरी मथुरा में लोकसभा चुनावों को लेकर एक सर्वे करना जरूरी समझा।
हमारे समस्‍त मीडिया महारथी तो जनता के बीच जाकर सर्वे करते हैं लेकिन मैंने अंधे, गूंगे तथा बहरे की कहानी के मद्देनजर यह सर्वे प्रत्‍याशियों के बीच जाकर किया।
हवा का रुख और मौसम का मिजाज भांपकर जो नहीं चलता, उसे मुंह की खानी पड़ती है, ऐसा ज्ञानी लोग कहते चले आए हैं।
औरों की वो जानें मैंने इसी ज्ञान पर अमल करके सबसे पहले हे-माजी के चरण पखारे और पूछा- क्‍या आप अपनी जीत के प्रति आश्‍वस्‍त हैं?
जैसे को तैसा की कहावत पूरी करता हुआ जवाब मिला- यदि हमें अपनी जीत पर रत्तीभर भी डाउट होता तो क्‍या हम छ: महीने पहले कहते कि फिर से मथुरा को हम ही धन्‍य करेंगे।
जीत के प्रति इस ओवर कॉन्फिडेंस का कारण जानना चाहा तो सवाल के जवाब में सवाल सुनने को मिला- आजतक मथुरा में हमसे अधिक विकास किसी सांसद ने कराया है ?
जाहिर है हमारी बोलती बंद। क्‍या ओढ़ें और क्‍या बिछाएं। मथुरा का विकास तो मथुरा में समा नहीं रहा। इतना फैल गया है जैसे रायता फैल जाता है। कहां तक समेटें इस विकास को। सोचकर आए थे कि ”मोदी है तो मुमकिन है” जैसा कुछ सुनने को मिलेगा लेकिन यहां तो ”हम हैं तो सबकुछ है” सुनकर पूर्ण तृप्‍ति का भाव पैदा हो चुका था।
इसके आगे हमारी हिम्‍मत जवाब दे गई और हमने दबे पांव खिसक लेने में ही अपनी भलाई समझी।
इसके बाद हम कई-कई गांठों से ”आबद्ध” कुंवर साहब के सामने साष्‍टांग करने पहुंचे और पूछा- प्रभु आप तो विधानसभा चुनावों की ”हैट्रिक” का अनुभव प्राप्‍त हैं। राजनीति तो आपके यहां कोठी के पाइपों से पानी की तरह बहती है। आपके यहां बह रही राजनीति से कितने खर-पतवार पनप गए। आप भले ही सांसदी का चुनाव पहली मर्तबा लड़ने उतरे हों किंतु आपके ज्‍येष्‍ठ भ्राता उसी प्रकार लोकसभा चुनावों में जीत की हैट्रिक लगा चुके हैं जिस प्रकार आप विधानसभा चुनावों में हा….. की।
पूरा शब्‍द हमारे गले में अटक चुका था क्‍योंकि हमने सामान्‍य शिष्‍टाचार का ध्‍यान जो नहीं रखा।
हमें पता है चुनावी मौसम नहीं होता तो हमें इस गुस्‍ताखी की अच्‍छी खासी सजा मिलती लेकिन चुनाव में नेतागण विनम्रता की मूरत बन जाते हैं।
कुंवर साहब ने भी हमारी धृष्‍टता पर कान धरे बिना मूल मुद्दे को पकड़ा और बोले- हमारी जीत उतने ही मतों से होगी जितने से 2014 में हमारे युवराज हारे थे। हमें उनकी हार का बदला लेना है। जीत तो हम चुके हैं, बस पहले ”मत पड़ना” और फिर ”मत गणना” होना बाकी है। साइकिल पर सवार हाथी जब हैंडपंप चलाएगा तो वोटों की कीच ही कीच होगी। इस बार हमारी जीत पक्‍की है। कलफ लगे हुए दर्जनों कुर्ते-पायजामे तैयार हैं। शपथ लेना शेष है।
कुंवर साहब के चेहरे की लबालब मुस्‍कान और छलकती जीत को छोड़कर हम गली पीरपंच पहुंचे।
यहां हमने तीर्थ पुरोहितों के अंतर्राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष और माथुर चतुर्वेदियों के संरक्षक कांग्रेस प्रत्‍याशी महामहिम पाठक जी के दर्शनों की अनुमति उनके शागिर्दों से मांगी।
चुनावी मौसम में चूंकि पत्रकारों की ”पूछ” कुछ लंबी हो जाती है इसलिए दर्शन लाभ शीघ्र प्राप्‍त हो गया।
हमने पाठक जी से जानना चाहा कि हे युग पुरुष..आपकी सीरत और शोहरत से आपकी सूरत भले ही मेल न खाती हो किंतु आपकी सफेदी निरमा के विज्ञापन से शत-प्रतिशत मेल खाती है। आप भी पूर्व में एक लोकसभा चुनाव का अनुभव प्राप्‍त कर चुके हैं। कांग्रेस से आपके संबंध जन्‍मजात हैं। कांग्रेस के बिना आपकी और आपके बिना कांग्रेस की कल्‍पना तक करना मूर्खता है। ये बात अलग है कि बिना गठबंधन के आप हर पार्टी में ”बांधव भाव” के लिए जाने जाते हैं।
ऐसे में आपको क्‍या लगता है कि मथुरा की जनता आपको हराने की हिम्‍मत कर पाएगी ?
पाठक जी, गले में पड़ी गुलाबों की माला दिखाते हुए बोले- लगता है आप कभी वरिष्‍ठ पत्रकार बन ही नहीं पाएंगे। कनिष्‍ठ थे, कनिष्‍ठ हैं और कनिष्‍ठ ही रहेंगे। 
इसके बाद पाठक जी को यकायक शायद याद आया कि अभी मतदान तो हुआ नहीं है इसलिए पत्रकारों की शान में इतने कसीदे गढ़ना ज्‍यादा हो जाएगा, लिहाजा बात संभालते हुए कहने लगे- देखिए बंधु, हमारे कहने का आशय यह था कि आप अब तक उसी प्रकार बाल रूप में खेल रहे हैं जिस प्रकार हमारे ”चिर युवा” राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष। 
हम आपकी ‘तरो-ताजा’ अनटच बुद्धि का सम्‍मान करते हैं किंतु आपको हमारे गले में पड़े गुलाबों के ताजे हार को देखकर तो समझ जाना चाहिए कि हम तो चुनाव जीत चुके हैं। बस प्रशासन को मतदान की लकीर पीटनी है। मतगणना हमने कर ली है। हम पूरे 3 लाख 72 हजार वोटों से जीत रहे हैं। कोई शक हो तो बताओ वरना लंबे पड़ो।
पाठक जी की बात में दम देख हम परछाई की तरह लंबे हो लिए और बाहर निकलकर पान की दुकान के बाहर लगे शीशे में खुद को निहारने लगे।
शीशे से साक्षात्‍कार होते ही दिमाग की बत्‍ती जली और ध्‍यान आया कि यार… आखिर है तो तू भी इन जैसों का एक वोटर ही। जीतना तो इन्‍हीं में से किसी एक को है।
वैसे तीनों भी जीत जाएं तो बुराई क्‍या है। एक-एक करके तीन न सही, तीनों एकसाथ सही। सिर तो ओखली में रहेगा ही, मूसलों की चोट कहां तक गिनोगे।
आप भी ज़रा मेरी तरह सोचकर देखिए…और फिर बताइए कि यदि तीन लोक से न्‍यारी मथुरा एकसाथ तीन सांसदों का भार अपने सिर पर ढो ले तो इसमें बुराई क्‍या है। 
ज्‍यादा से ज्‍यादा ”कोढ़ में खाज” की कहावत चरितार्थ होगी, इससे ज्‍यादा कुछ नहीं। ये मेरा दावा है। एक जीते या तीनों जीत जाएं। पतित पावनी मथुरा को अगले चुनावों तक फिर कोई न कोई जीत का दावेदार मिल ही जाएगा। आयातित, निर्यातित या स्‍थापित।
जाते-जाते एक क्षणिका और…समझ सको तो समझ लेना अन्‍यथा अगले चुनाव तक समझ में आ ही जाएगा कि-
देव प्रतिमाओं के परिपूर्ण पुजारी बनके, सब शिकारी चले आए हैं भिखारी बनके
-Legend News

उत्तर प्रदेश की इन 15 सीटों पर दिखाई देगा दिलचस्‍प सियासी संग्राम…

बीजेपी उम्मीदवारों की घोषणा के साथ ही उत्तर प्रदेश में कई हाई प्रोफाइल सीटों पर चुनावी घमासान का मंच सज चुका है।
यहां 15 सीटों पर बीजेपी और एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन तथा कांग्रेस के बीच दिलचस्प सियासी संग्राम देखने को मिल सकता है।
बीजेपी ने लोकसभा चुनाव के लिए अपने प्रत्याशियों की पहली सूची जारी कर दी है। इस लिस्ट में उत्तर प्रदेश से 35 नाम हैं। इस लिस्ट में वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बागपत से सत्यपाल सिंह व मथुरा से हेमा मालिनी सहित कई दिग्‍गजों के नाम शामिल हैं। 8 सीटों पर पहले चरण में 11 अप्रैल को मतदान होना है।
उत्तर प्रदेश की जिन सीटों पर कांटे का मुकाबला होने की संभावना नजर आ रही है उनमें ये सीटें प्रमुख हैं-
1- सहारनपुर 
राघव लखनपाल (बीजेपी)
इमरान मसूद (कांग्रेस)
मतदान- 11 अप्रैल
वेस्ट यूपी की इस सीट पर बीजेपी ने एक बार फिर राघव लखनपाल पर भरोसा जताया है। वहीं, कांग्रेस ने भी पिछली बार दूसरे नंबर पर रहे इमरान मसूद को टिकट दिया है। इमरान मसूद पिछले चुनाव में पीएम मोदी के खिलाफ विवादित बयान देकर सुर्खियों में रहे थे। यहां एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन ने अभी अपने उम्मीदवार का ऐलान नहीं किया है। 2017 में सहारनपुर जातीय संघर्ष को लेकर चर्चा में रहा। इसके साथ ही यहां भीम आर्मी और उसके नेता चंद्रशेखर का उभार भी चुनाव में असर डाल सकता है।
2- मुजफ्फरनगर 
संजीव बालियान (बीजेपी)
चौधरी अजित सिंह (आरएलडी)
मतदान- 11 अप्रैल
सांप्रदायिक हिंसा की पृष्ठभूमि में हुए 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान मुजफ्फरनगर में ध्रुवीकरण के हालात देखने को मिले थे। बीजेपी ने जहां एक बार फिर सिटिंग एमपी और केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान को उम्मीदवार बनाया है, वहीं एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन के तहत इस सीट से चौधरी अजित सिंह लड़ रहे हैं। आरएलडी सुप्रीमो को पिछले चुनाव में बागपत सीट पर शिकस्त झेलनी पड़ी थी। यहां तक कि वह तीसरे नंबर पर जा पहुंचे थे लेकिन इस बार गठबंधन की वजह से मुजफ्फरनगर में दिलचस्प जंग देखने को मिलेगी।
3- बागपत 
सत्यपाल सिंह (बीजेपी)
जयंत चौधरी (आरएलडी)
मतदान- 11 अप्रैल
पहले चौधरी चरण सिंह और फिर उनके बेटे अजित सिंह की वजह से चर्चित सीट पर इस बार परिवार की राजनीतिक विरासत को जयंत चौधरी आगे बढ़ा रहे हैं। गठबंधन के तहत यह सीट आरएलडी के हिस्से में आई है।
बीजेपी ने पिछली बार जयंत के पिता को मात देने वाले सत्यपाल सिंह पर दोबारा दांव खेला है। मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर और वर्तमान में केंद्रीय मंत्री सत्यपाल सिंह पिछले चुनाव के दौरान काफी चर्चित रहे थे। अब देखना दिलचस्प होगा कि जयंत पिता की हार का बदला ले पाते हैं या जाट लैंड में सत्यपाल फिर विजयी होते हैं।
4- गाजियाबाद 
वी के सिंह (बीजेपी)
सुरेंद्र कुमार उर्फ मुन्नी शर्मा (एसपी)
डॉली शर्मा (कांग्रेस)
मतदान- 11 अप्रैल
गाजियाबाद यूपी की वह सीट है, जहां पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी ने राज्य में सबसे ज्यादा मतों के अंतर से जीत हासिल की थी। पूर्व सेनाध्यक्ष वी के सिंह को बीजेपी ने यहां से अपना उम्मीदवार बनाया है। गाजियाबाद सीट राजपूत बहुल है और साठा-चौरासी इलाके के तहत आने वाले 144 गांवों में इस समुदाय का बड़ा वोट बैंक है। बीजेपी ने राजपूत समुदाय से ही आने वाले रिटायर्ड जनरल वी के सिंह को मैदान में उतारा है। गठबंधन की तरफ से सुरेंद्र कुमार उर्फ मुन्नी शर्मा और कांग्रेस की ओर से डॉली शर्मा कैंडिडेट हैं।
5- गौतमबुद्धनगर 
महेश शर्मा (बीजेपी)
अरविंद सिंह चौहान (कांग्रेस)
मतदान- 11 अप्रैल
गौतमबुद्धनगर यानि नोएडा सीट पर अब तक बीजेपी का वर्चस्व रहा है। पार्टी ने यहां से केंद्रीय मंत्री डॉ. महेश शर्मा को फिर से टिकट दिया है। वहीं, कांग्रेस ने अरविंद सिंह चौहान को उतारा है। 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को उस वक्त बड़ा झटका लगा था, जब मतदान से एक हफ्ते पहले पार्टी कैंडिडेट रमेश चंद्र तोमर बीजेपी में शामिल हो गए थे। दूसरी ओर अलवर (राजस्थान) के मूल निवासी डॉ. महेश शर्मा लंबे समय से एनसीआर में सक्रिय हैं।
6- मुरादाबाद 
कुंवर सर्वेश कुमार सिंह (बीजेपी)
राज बब्बर (कांग्रेस)
मतदान- 23 अप्रैल
सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील मुरादाबाद में बीजेपी ने वर्तमान सांसद कुंवर सर्वेश कुमार सिंह पर भरोसा जताया है। इस बार यहां से कांग्रेस ने राज बब्बर को उतारकर मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है। यूपी कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष राज बब्बर ने पिछला चुनाव गाजियाबाद से लड़ा था। पीतल नगरी में अभी गठबंधन ने अपने कैंडिडेट का ऐलान नहीं किया है।
7- अलीगढ़ 
सतीश कुमार गौतम (बीजेपी)
चौधरी बृजेंदर सिंह (कांग्रेस)
मतदान- 18 अप्रैल
अलीगढ़ लोकसभा सीट पर बीजेपी ने वर्तमान सांसद सतीश कुमार गौतम को कैंडिडेट बनाया है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) में जिन्ना की तस्वीर लगाने पर उन्होंने सवाल उठाए थे। इस मामले को लेकर देश की सियासत गरमा गई थी। एएमयू कैंपस में भी कई दिन तनाव देखने को मिला था। कांग्रेस ने यहां से चौधरी बृजेंदर सिंह को टिकट दिया है। 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने इस क्षेत्र के तहत आने वाली सभी पांचों विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी।
8- अमेठी 
स्मृति इरानी (बीजेपी)
राहुल गांधी (कांग्रेस)
मतदान- 6 मई
अमेठी लोकसभा सीट पर एक बार फिर देश की नजरें टिकी रहेंगी। जहां एक ओर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी लगातार चौथी बार इस सीट से सांसद की पारी खेलने की तैयारी में हैं, वहीं बीजेपी ने उनके खिलाफ स्मृति इरानी को फिर उतारा है। 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान हार के बावजूद स्मृति लंबे समय से इलाके में सक्रिय हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी लोकसभा चुनाव के ऐलान से पहले यहां बड़ी रैली की थी। पिछले चुनाव में राहुल ने स्मृति को 1.07 लाख वोटों से हराया था। राहुल की यह जीत 2009 के मुकाबले बेहद छोटी थी। 2009 में राहुल 3.70 लाख वोटों के अंतर से जीते थे।
9- संभल 
परमेश्वर लाल सैनी (बीजेपी)
शफीकुर्रहमान बर्क (एसपी)
मतदान- 23 अप्रैल
संभल सीट पर एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन की ओर से शफीकुर्रहमान बर्क को टिकट मिला है। वहीं, बीजेपी ने यहां से परमेश्वर लाल सैनी को उतारा है। मुस्लिम बहुल इस सीट पर 23 अप्रैल को मतदान होना है। अभी कांग्रेस ने यहां से अपना कैंडिडेट घोषित नहीं किया है। लेकिन इस बार गठबंधन कैंडिडेट बर्क की स्थिति मजबूत मानी जा रही है। वह तीन बार मुरादाबाद और एक बार संभल से सांसद रह चुके हैं। संभल लोकसभा सीट से 2009 में उन्होंने बीएसपी टिकट से लोकसभा का चुनाव जीता था। 2013 में सांसद रहते उन्होंने कहा था, ‘मैं वंदे मातरम् का बहिष्कार करने के लिए सोमवार को संसद से अनुपस्थित रहूंगा।’ बर्क ने 1997 में संसद के 50 साल पूरे होने पर आयोजित स्वर्ण जयंती कार्यक्रम में भी वंदे मातरम् का बहिष्कार किया था।
10- बदायूं 
संघमित्र मौर्य (बीजेपी)
धर्मेंद्र यादव (एसपी)
सलीम इकबाल शेरवानी (कांग्रेस)
मतदान-23 अप्रैल
बदायूं सीट पर एसपी संरक्षक मुलायम सिंह यादव के भतीजे धर्मेंद्र यादव इस बार चक्रव्यूह में घिरे हैं। वर्तमान सांसद धर्मेंद्र के खिलाफ बीजेपी ने संघमित्र मौर्य को टिकट दिया है। चाचा शिवपाल यादव ने प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया बनाकर उन्हें पहले से मुश्किल में डाल रखा है। वहीं, कांग्रेस ने इलाके के कद्दावर नेता सलीम इकबाल शेरवानी को उतारकर धर्मेंद्र के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है।
11- उन्नाव 
साक्षी महाराज (बीजेपी)
अनु टंडन (कांग्रेस)
मतदान- 29 अप्रैल
टिकट बंटवारे से पहले चिट्ठी लिखने वाले साक्षी महाराज को बीजेपी ने आखिरकार टिकट दे दिया है। लेकिन इस बार साक्षी की राह आसान नहीं मानी जा रही है। कांग्रेस ने यहां से अनु टंडन को उतारा है। 2009 में कांग्रेस से सांसद रह चुकीं अनु इस क्षेत्र में काफी सक्रिय हैं। इसके साथ ही साक्षी महाराज को बाहरी होने का नुकसान उठाना पड़ सकता है। अभी यहां से गठबंधन कैंडिडेट का ऐलान नहीं हुआ है।
12- मथुरा 
हेमा मालिनी (बीजेपी)
नरेंद्र सिंह (आरएलडी)
मतदान- 18 अप्रैल
‘ड्रीम गर्ल’ हेमा मालिनी मथुरा से एकबार फिर चुनाव मैदान में हैं। बीजेपी ने वर्तमान सांसद हेमा मालिनी को ही प्रत्याशी बनाया है। उधर एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन ने कुंवर नरेन्‍द्र सिंह को खड़ा किया है। हेमा पर क्षेत्र को कम समय देने का आरोप लगता रहा है। पिछले बार के चुनाव में हेमा ने आरएलडी के जयंत चौधरी को शिकस्त दी थी। जयंत इस बार वह बागपत से चुनाव लड़ रहे हैं। गठबंधन के तहत यह सीट आरएलडी के खाते में आई है। एसपी ने आरएलडी के लिए अपनी दावेदारी छोड़ दी थी।
13- लखीमपुर खीरी 
पूर्वी वर्मा (एसपी)
अजय कुमार मिश्रा (बीजेपी)
जफर अली नकवी (कांग्रेस)
मतदान-29 अप्रैल
लखीमपुर खीरी सीट पर बीजेपी ने जहां अजय कुमार मिश्रा को टिकट दिया है वहीं कांग्रेस ने यहां से पूर्व सांसद और मंत्री रह चुके जफर अली नकवी को उतारा है। गठबंधन कोटे के तहत यह सीट एसपी के हिस्से में आई है। पार्टी ने यहां से पूर्वी वर्मा को मैदान में उतारा है। 2009 के लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज की थी। 1980 से 1991 तक वह इस सीट से विधानसभा सदस्य भी रहे। राजीव गांधी के करीबी रह चुके नकवी का इलाके में अच्छा जनाधार माना जाता है।
14- हरदोई 
ऊषा वर्मा (एसपी)
जय प्रकाश वर्मा (बीजेपी)
मतदान- 29 अप्रैल
हरदोई सीट पर नरेश अग्रवाल का अच्छा प्रभाव माना जाता है। कई पार्टियों की सवारी कर चुके नरेश इस समय बीजेपी के सदस्य हैं। हरदोई में बीजेपी ने जय प्रकाश वर्मा को टिकट दिया है जबकि गठबंधन के तहत एसपी ने ऊषा वर्मा को सियासी समर में उतारा है। कांग्रेस कैंडिडेट की अभी यहां से घोषणा नहीं हुई है लेकिन नरेश अग्रवाल फैक्टर का बीजेपी को लाभ मिल सकता है।
15- मिर्जापुर 
अनुप्रिया पटेल (अपना दल)
राजेंद्र एस बिंद (एसपी)
ललितेश पति त्रिपाठी (कांग्रेस)
मतदान- 19 मई
मिर्जापुर सीट बीजेपी ने एनडीए के सहयोगी अपना दल के लिए छोड़ दी है। यहां से केंद्रीय मंत्री और वर्तमान सांसद अनुप्रिया पटेल मैदान में हैं। वहीं, गठबंधन के तहत एसपी ने राजेंद्र एस बिंद को टिकट दिया है। कांग्रेस ने यहां से ललितेश पति त्रिपाठी को अपना उम्मीदवार बनाया है। इस बार अनुप्रिया पटेल की राह आसान नहीं मानी जा रही है।
-Legend News

बसपा के “वीटो” से कुंवर नरेंद्र सिंह बने मथुरा में राष्ट्रीय लोकदल के प्रत्‍याशी

लखनऊ/मेरठ। यूपी के महागठबंधन में शामिल राष्ट्रीय लोकदल ने मंगलवार को अपने प्रत्याशियों के नामों का ऐलान कर दिया, आज जारी टिकटों की सूची में पार्टी अध्यक्ष अजीत चौधरी को पश्चिम यूपी की प्रतिष्ठित मुजफ्फरनगर सीट से प्रत्याशी बनाया गया है जबकि जयंत चौधरी को बागपत का। रालोद के तीसरे और अंतिम प्रत्‍याशी के तौर पर मथुरा से कुंवर नरेन्‍द्र सिंह के नाम की घोषणा की गई है। इन तीनों सीटों पर आरएलडी बीएसपी और एसपी के समर्थन के साथ चुनाव लड़ेगी।
पार्टी सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार कुंवर नरेन्‍द्र सिंह को रालोद प्रत्‍याशी घोषित कराने में बसपा सुप्रीमो मायावती ने बड़ी भूमिका अदा की।
मायावती ने जयंत चौधरी को 16 मार्च के दिन तलब किया था, देखिए वीडियो- 
गौरतलब है कि पिछले दिनों मथुरा से प्रत्‍याशी को लेकर दिल्‍ली में रालोद की जो बैठक हुई उसमें पत्रकार विनीत नारायण का नाम तय कर दिए जाने के बाद पार्टी की मथुरा इकाई के अंदर भारी रोष व्‍याप्‍त हो गया। 
पार्टी अभी विनीत नारायण का नाम बाकायदा घोषित कर पाती कि इससे पहले गठबंधन के कुछ लोगों की सहमति से स्‍थानीय नेताओं ने बसपा सुप्रीमो मायावती के समक्ष अपनी आपत्ति दर्ज कराई और बताया कि विनीत नारायण का नाम कुछ खास शर्त पूरी करने के बाद तय किया गया है जबकि उनका पार्टी से कोई लेना-देना नहीं रहा। 
इन नेताओं का कहना था कि यदि विनीत नारायण को प्रत्‍याशी घोषित किया गया तो गठबंधन के साथ-साथ मथुरा रालोद भी कोई सहयोग नहीं कर सकेगा। 
इन लोगों ने बसपा सुप्रीमो को अंदरखाने की गई विशेष कारगुजारी से भी अवगत कराया। 
उल्‍लेखनीय है कि मथुरा रालोद में फिलहाल ऐसे कई नेता हैं जो पूर्व में सपा तथा बसपा में भी रह चुके हैं और उनके मायावती तथा अखिलेश दोनों से सीधे संबंध हैं। 
ऐसे नेताओं ने मायावती के अलावा अखिलेश को भी वस्‍तुस्‍थिति से अवगत कराया। इसके बाद पहले तो मायावती और अखिलेश के बीच मथुरा की सीट को लेकर मंत्रणा हुई और उसके बाद जयंत चौधरी को मायावती ने 16 मार्च के दिन तलब किया। 
बताया जाता है कि मायावती ने जयंत चौधरी से साफ-साफ कह दिया कि विरोध एवं आक्रोश को देखते हुए विनीत नारायण का नाम उन्‍हें भी स्‍वीकार नहीं है लिहाजा किसी अन्‍य नाम पर विचार किया जाए। 
चूंकि मथुरा के लिए सर्वसम्‍मति ठाकुर तेजपाल के नाम पर पहले बन चुकी थी इसलिए उस पर विचार किया जा सकता था किंतु उन्‍हें लड़वाने के पक्ष में जयंत चौधरी कतई नहीं थे। हालांकि आरएलडी सुप्रीमो अजीत सिंह ठाकुर तेजपाल को ही चुनाव लड़ाना चाहते थे। 
बहरहाल, बसपा सुप्रीमो मायावती के वीटो ने विनीत नारायण का बना बनाया खेल बिगाड़ दिया और कुंवर नरेन्‍द्र सिंह की लॉटरी लगवा दी। 
बताया जाता है कि भाजपा कुंवर नरेन्‍द्र सिंह का नाम घोषित होने से काफी खुश है क्‍योंकि कुंवर नरेन्‍द्र सिंह का चुनावी करियर अब तक बहुत पूअर रहा है।
इससे पहले कैराना की सीट पर आरएलडी की प्रत्याशी तबस्सुम हसन को उपचुनाव में जीत मिली थी, जिन्हें इस बार महागठबंधन की ओर से इसी सीट का प्रत्याशी बनाया गया है। हालांकि तबस्सुम हसन कैराना की सीट पर समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ने वाली हैं।
मुजफ्फरनगर में अजीत के सामने असली परीक्षा 
मुजफ्फरनगर सीट पर समाजवादी पार्टी (एसपी), बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) और राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) गठबंधन की तरफ से चौधरी अजित सिंह चुनाव मैदान में हैं। यह चुनाव अजित सिंह की चौधराहट की असली परीक्षा लेगा। मुजफ्फरनगर दंगों के बाद आरएलडी का वोटबैंक पूरी तरफ से बिखर चुका है। वर्ष 2013 में दंगे के बाद ध्रुवीकरण और मोदी लहर में बीजेपी ने साल 2014 के लोकसभा चुनाव में यह सीट 4,01,135 मतों से जीती थी। अभी आरएलडी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। अगर गठबंधन यह सीट निकाल लेता है तो यह चौधरी परिवार की राजनीति के लिए संजीवनी का काम करेगी। इस लिहाज से इस सीट पर पूरे देश की नजर रहेगी।
जाटों के गढ़ बागपत में हारे थे अजीत सिंह
अजीत चौधरी के बेटे जयंत चौधरी इस बार बागपत सीट से प्रत्याशी बनाए गए हैं। जाटों का गढ़ माने जाने वाले बागपत में आरएलडी को बड़ा झटका तब लगा, जब पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी प्रमुख अजित सिंह को यहां से हार का सामना करना पड़ा। बीजेपी के सत्यपाल सिंह ने इस सीट से 2 लाख से अधिक वोटों से जीत दर्ज की। इस बार इस सीट पर पूरे देश की नजर रहेगी। माना जा रहा है कि बीजेपी यहां से एक बार फिर सत्यपाल सिंह को मौका दे सकती है। गठबंधन के लिहाज से देखें तो बीजेपी के सामने इस बार कड़ी चुनौती होगी। जयंत चौधरी के दादा पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह यहां से 1977, 1980 और 1984 में लगातार चुनाव जीते हैं। जयंत के पिता और आरएलडी अध्यक्ष अजित सिंह 6 बार 1989, 1991, 1996, 1999, 2004 और 2009 में बागपत से सांसद रहे।
-Legend News
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