सोमवार, 18 मार्च 2019

लोकसभा चुनाव 2019: पिछले 19 वर्ष में BJP क्‍या मथुरा से एक नेता पैदा नहीं कर सकी?

हो सकता है कि BJP के कुछ लोगों को सांसद हेमा मालिनी का यह दावा सुकून देता हो कि यह लोकसभा चुनाव भी वह मथुरा से ही लड़ेंगी किंतु पार्टी में ऐसे लोगों की संख्‍या अधिक है जो हेमा मालिनी के एकबार फिर यहां से चुनाव मैदान में उतरने को अपने राजनीतिक भविष्‍य से जोड़कर देखते हैं।
ऐसे लोगों में युवा कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग शामिल है। इन लोगों की चिंता न तो नाजायज है और न निरर्थक।
जरा विचार कीजिए कि कोई भी युवा जब किसी राजनीतिक दल से अधिकृत तौर पर जुड़ता है तो किसलिए जुड़ता है ?
इसीलिए न कि उसके भी मन में कुछ अरमान होते हैं, कुछ पाने का सपना होता है। वह भी किसी मुकाम पर पहुंचकर कथित रूप से ही सही, लेकिन समाज की सेवा करना चाहता है। वह चाहता है कि लोग उसे भी पहचानें, उसके गले में मालाएं डालें और उसकी जय-जयकार करें।
शायद ही कोई युवा यह सोचकर किसी राजनीतिक दल को ज्‍वाइन करता हो कि वह अपनी पूरी जवानी अपने नेताओं की आवभगत में गुजार देगा और उनके समर्थकों के लिए फर्श बिछाता रहेगा। जयकारे लगाता रहेगा या माला पहनाता रहेगा।
सोच के धरातल पर यह बात बेमानी होने के बावजूद सही साबित इसलिए हो रही है क्‍योंकि राजनीति के सिरमौर कहलाने वाले श्रीकृष्‍ण की जन्‍मस्‍थली में आज कोई ऐसा BJP नेता दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रहा जो लोकसभा चुनाव लड़ने की बात तो दूर, टिकट पाने का भी प्रबल दावेदार हो।
अब सवाल यह खड़ा होता है कि आखिर ऐसा है क्‍यों, और क्‍या मथुरा जैसे विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक स्‍थल में BJP को एक अदद काबिल नेता देने की क्षमता नहीं है?
कहीं ऐसा तो नहीं कि BJP ही मथुरा में अपने लिए कोई नई पौध तैयार करना नहीं चाहती?
मथुरा के राजनीतिक इतिहास में झांककर देखें तो पता लगेगा कि स्‍वतंत्रता के बाद यहां से पहली बार BJP को 1991 में तब सफलता मिली जब डॉ. सच्‍चिदानंद हरि साक्षी लोकसभा सदस्‍य निर्वाचित हुए।
आश्‍चर्य की बात यह है कि 1991 का लोकसभा चुनाव लड़ने वाले महामंडलेश्‍वर डॉ. सच्‍चिदानंद साक्षी ने इससे मात्र एक साल पहले यानि 1990 में ही अपने राजनीतिक सफर की शुरूआत की थी।
एक साल के राजनीतिक करियर में भाजपा से लोकसभा का टिकट पाने वाले साक्षी महाराज मथुरा के निवासी नहीं थे। लोध समुदाय से ताल्‍लुक रखने वाले साक्षी जी मूल रूप से कासगंज के निवासी हैं लेकिन भाजपा ने उन्‍हें मथुरा से चुनाव लड़वाया।
भाजपा ने मथुरा से पहली और आखिरी बार स्‍थानीय निवासी चौधरी तेजवीर सिंह को 1996 में टिकट दिया। तेजवीर सिंह ने न सिर्फ यह चुनाव जीता बल्‍कि इसके बाद भी भाजपा की टिकट पर ही 12वीं तथा 13वीं लोकसभा के सदस्‍य बने।
2009 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने रालोद के युवराज जयंत चौधरी को समर्थन दे दिया और उसके बाद फिर 2014 में हेमा मालिनी को उतार दिया। हेमा मालिनी आज भले ही यहां से भाजपा की ही सांसद हैं किंतु वह स्‍थानीय नहीं हैं।
कुल मिलाकर देखा जाए तो निष्‍कर्ष यह निकलता है कि मथुरा जनपद में भाजपा को अब तक मात्र चौधरी तेजवीर सिंह ही एक योग्‍य प्रत्‍याशी नजर आए। उसके बाद कोई स्‍थानीय नेता इस लायक नहीं समझा गया कि उसे चुनाव लड़वाया जा सके।
हेमा मालिनी द्वारा दोबारा ताल ठोक देने से साफ जाहिर है कि कृष्‍ण की यह भूमि भाजपा के शीर्ष नेतृत्‍व की नजर में अब भी बंजर ही है। भाजपा नेतृत्व का नजरिया कुछ भी हो किंतु ऐसा है नहीं।
सच तो यह है कि भाजपा में एक दो नहीं, कई नए चेहरे ऐसे हैं जो यहां से सीट निकालने का माद्दा रखते हैं और पार्टी द्वारा बाहरी प्रत्‍याशियों को थोप देने से आहत भी हैं, लेकिन पार्टी उन्‍हें नजरंदाज करती रही है।
पिछले दिनों पड़ोसी जनपद हाथरस में आयोजित हुए आरएसएस के एक बड़े चिंतन शिविर में यह मुद्दा उठा भी था। वहां कहा गया कि यदि इसी प्रकार मथुरा में कभी किसी को समर्थन देकर तो कभी बाहरी प्रत्‍याशी खड़ा करके चुनाव लड़वाए जाते रहे तो मथुरा के युवा कार्यकर्ताओं का भविष्‍य चौपट होना तय है।
पार्टी से जुड़े प्रतिभावान कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस समय राष्‍ट्रवाद अपने चरम पर है, जनता को भाजपा व उसके नेतृत्‍व पर भरोसा है, इसलिए यदि मथुरा से मथुरा के ही किसी युवा और नए चेहरे को लोकसभा चुनाव लड़वाया जाए तो एक ओर जहां पार्टी को दूसरी पीढ़ी के लिए नेता प्राप्‍त हो सकता है वहीं दूसरी ओर पार्टी के लिए जान खपा देने वालों में भी अपने भविष्‍य के प्रति उम्‍मीद बंधती है।
आज भारतीय जनता पार्टी स्‍वतंत्र भारत के अपने राजनीतिक सफर में शीर्ष स्‍थान हासिल किए हुए है। यही वह समय है जब वह अपने लिए दूसरी पीढ़ी के नेता और तीसरी पीढ़ी की पौध तैयार कर सकती है।
मथुरा जनपद यूं तो हमेशा से राजनीति का एक बड़ा अखाड़ा रहा है किंतु भाजपा ने इस अखाड़े के लिए अब तक बाहरी प्रत्‍याशियों पर ही अधिक भरोसा किया है जो स्‍थानीय भाजपाइयों के राजनीतिक भविष्‍य पर प्रश्‍नचिन्‍ह लगाता है।
1991 से ही यदि आंकलन किया जाए जब भाजपा का राष्‍ट्रीय राजनीति में उदय हुआ तो 1996 में मथुरा के मूल निवासी चौधरी तेजवीर सिंह पर ही भाजपा ने भरोसा जताया लेकिन उसके बाद तेजवीर सिंह द्वारा लगातार तीन बार जीत हासिल करने के बावजूद पार्टी ने फिर किसी स्‍थानीय नेता को अहमियत नहीं दी।
2004 का चुनाव तेजवीर सिंह क्‍या हारे, भाजपा का मथुरा भाजपा पर से विश्‍वास ही उठ गया। 2009 में तो भाजपा ने अपना प्रत्‍याशी तक चुनाव में उतारना जरूरी नहीं समझा और रालोद को समर्थन दे दिया।
उसके बाद 2014 के चुनाव में पार्टी हेमा मालिनी को ले आई और अब 2019 में भी मथुरा के मूल निवासी किसी नेता के नाम का जिक्र तक नहीं हो रहा। हेमा मालिनी के बाद जिनके नाम की थोड़ी-बहुत चर्चा है भी, तो उनकी जो स्‍थापित नेता हैं और महत्‍वपूर्ण पदों को सुशोभित कर रहे हैं। किसी नए चेहरे पर पार्टी फोकस करती दिखाई नहीं दे रही।
निश्‍चित ही यह स्‍थिति मथुरा भाजपा के लिए अफसोसनाक एवं चिंताजनक है। इस तरह तो मथुरा से शायद ही कभी कोई नेता खड़ा हो सके।
मथुरा की इस स्‍थिति और पार्टी नेतृत्‍व से स्‍थानीय नेताओं की उपेक्षा पर अंदरखाने युवकों में आक्रोश भी पनप रहा है किंतु फिलहाल कोई मुंह खोलने को तैयार नहीं।
वह दबी जुबान से इतना अवश्‍य कहते हैं कि 27 सालों में मात्र एक स्‍थानीय भाजपा नेता तेजवीर का संसद में पहुंचना यह साबित करने के लिए काफी है कि राजनीतिक रूप से मथुरा भाजपा कितनी कंगाल है और पार्टी का नेतृत्‍व उस पर कतई विश्‍वास नहीं करता।
युवाओं के मन में अंदर कहीं न कहीं यह डर भी है कि यदि यही हाल रहा तो कृष्‍ण की नगरी से शायद ही कभी किसी बड़े नेता का उदय हो और मथुरा की जनता उसे लेकर गौरव महसूस कर सके।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

धर्मक्षेत्रे-पापक्षेत्रे: मथुरा के कुछ निजी अस्‍पताल भी लिप्‍त हैं मानव अंगों की खरीद-फरोख्‍त में!

कहते हैं किसी भी पापकर्म को करने के लिए धर्म से बड़ी कोई आड़ नहीं हो सकती क्‍योंकि पाप को छिपाने में हमेशा से धर्म बड़ी भूमिका निभाता चला आ रहा है।
यह बात सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होती है और इसीलिए ईसाई मिशनरी से लेकर इस्‍लाम तक तथा हिंदू धर्म से लेकर सिख, जैन एवं बुद्धिस्‍ट तक में पापाचारियों की संख्‍या कम नहीं है।
किसी धार्मिक स्‍थल पर धर्म की आड़ लेना और भी आसान हो जाता है क्‍योंकि भूमि का प्रताप उसमें ‘सोने पर सुहागा’ जैसी कहावत को चरितार्थ करता है।
योगीराज भगवान श्रीकृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली होने की वजह से मथुरा चूंकि देश ही नहीं संपूर्ण विश्‍व में अपनी एक विशिष्‍ट धार्मिक पहचान रखता है इसलिए यहां राक्षसी प्रवृत्ति के लोग भी हमेशा सक्रिय रहे हैं।
इस दौर की बात करें तो भगवान का दर्जा प्राप्‍त इंसानों में शुमार चिकित्‍सकीय कारोबार से जुड़े कई लोग यहां न केवल लोगों की जेब काट रहे हैं बल्‍कि उनके अंगों का भी अवैध धंधा करने में लिप्‍त हैं।
इस बात का खुलासा हाल ही में तब हुआ जब कानपुर के बर्रा क्षेत्र से पकड़े गए कुछ लोगों ने पूछताछ के दौरान पीएसआरआई हॉस्पिटल की कोऑर्डिनेटर सुनीता वर्मा और मिथुन सहित फोर्टिस की कोऑर्डिनेटर सोनिका के नाम उजागर करते हुए बताया कि वो इनके साथ मिलकर मरीजों के परिजनों से किडनी एवं लिवर की सौदेबाजी करते थे।
आरोपियों से यह चौंकाने वाली जानकारी मिलने के बाद मानव अंगों (किडनी-लिवर) की खरीद-फरोख्त में पुलिस ने दिल्ली के पीएसआरआई (पुष्पावति सिंहानिया रिसर्च इंस्टीट्यूट), फोर्टिस एवं गंगाराम हॉस्‍पिटल के साथ-साथ इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल को भी नोटिस भेजा है।
एसआईटी अब इन अस्पतालों के प्रशासनिक अधिकारियों, डॉक्टर्स और कर्मचारियों से पूछताछ करेगी। इसके लिए एसआईटी की टीम दिल्ली पहुंच चुकी है। हालांकि अपोलो अस्‍पताल के प्रबंधतंत्र ने इस बाबत सफाई देते हुए कहा है कि वह ऐसे किसी धंधे में संलिप्‍त नहीं है।
अपोलो अस्‍पताल का प्रबंधतंत्र कुछ भी कहे किंतु हकीकत यह है कि 2016 के किडनी कांड में अपोलो अस्पताल और वहां के एक नामचीन डॉक्टर मानव अंगों की खरीद-फरोख्‍त के आरोपी बनाए गए थे।
डॉक्टर के दो निजी सचिव शैलेश सक्सेना व आदित्य भी उनके साथ सहआरोपी थे। शैलेश इस मामले में जेल भी भेजा गया था इसलिए एसआईटी ने फिर से अपोलो अस्‍पताल के प्रबंधतंत्र को नोटिस भेजा है।
एसपी साउथ रवीना त्यागी के मुताबिक अब फिर से अस्पताल स्टाफ सहित उन लोगों को भी पूछताछ में शामिल किया जाएगा जिनके नाम पहले सामने आ चुके हैं।
फिलहाल मानव अंगों की खरीद-फरोख्‍त के आरोप में कानुपर से पकड़े गए लोगों ने जिस तरह की जानकारी पुलिस को दी है, उससे यह माना जा रहा है कि इन अस्पतालों के अलावा भी कई अस्पताल इस गलीज़ धंधे को लंबे समय से कर रहे हैं।
अगर बात करें धर्मक्षेत्र मथुरा की तो यहां पिछले कुछ वर्षों के अंदर जिस तरह कुछ नामचीन लोगों ने चिकित्‍सा के क्षेत्र में पैसे का निवेश किया, उससे साफ जाहिर था कि उनका मकसद यहां की जनता को स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं देने से कहीं बहुत अधिक निजी आर्थिक लाभ अर्जित करना था।
अब उनके इस मकसद की पुष्‍टि आए दिन मिलने वाले उन समाचारों से भी होती है जिनमें अधिकांश मरीज एवं तीमारदार वहां जाकर खुद को लुटा हुआ महसूस करते हैं।
मथुरा के एक मशहूर हॉस्‍पिटल का आलम तो यह है कि शायद ही कोई व्‍यक्‍ति वहां से संतुष्‍ट होकर बाहर आता हो।
कोई कहता है कि मरीज को नाजायज तरीकों से इसलिए लगभग बंधक बनाकर रखा गया ताकि लाखों रुपए का बिल बनाया जा सके तो कोई बताता है कि जबरन चीर-फाड़ करके लाखों रुपए वसूलने के बाद भी डेड बॉडी थमा दी गई।
बताया जाता है कि मामूली सी मामूली तकलीफ लेकर भी यदि कोई व्‍यक्‍ति इस हॉस्‍पिटल की चारदीवारी के अंदर घुस गया तो तय मानिए कि या तो उसकी अच्‍छी तरह जेब कटेगी या वो खुद कटेगा। पूर्व में लोगों ने ऐसी शिकायतें सार्वजनिक तौर पर की हैं कि वो इलाज कराने गए थे किसी बीमारी का लेकिन किडनी अथवा लिवर संबंधी बीमारी बताकर खेल कर दिया।
लोगों की ऐसी शिकायत में दम इसलिए नजर आता है क्‍योंकि संपूर्ण आधुनिक चिकित्‍सा सुविधाएं उपलब्‍ध होने का दावा करने वाले इस हॉस्‍पिटल में मरीजों की मृत्‍युदर आश्‍चर्यजनक रूप से काफी अधिक है।
इस अत्‍यधिक मृत्‍यु दर को लेकर हॉस्‍पीटल का प्रबंधतंत्र समय-समय पर इस आशय की सफाई देता रहा है कि उनके यहां लोग गंभीर स्‍थिति में ही लाए जाते हैं किंतु उनके इस जवाब से शायद ही कोई संतुष्‍ट हुआ हो।
संभवत: इसीलिए इस हॉस्‍पीटल में आए दिन बखेड़ा खड़ा होना आम बात है। इन बखेड़ों की खबरें प्रकाशित या प्रसारित न हों, इसके लिए हॉस्‍पिटल का प्रबंधतंत्र मीडिया को मैनेज करने में लगा रहता है।
जो मीडिया पर्सन मैनेज नहीं होते, उन्‍हें रास्‍ते पर लाने के लिए दूसरे हथकंडे अपनाए जाते हैं। इन दूसरे उपायों में डराने-धमकाने से लेकर प्रभाव का इस्‍तेमाल करने जैसे सभी क्रिया-कलाप शामिल हैं।
हॉस्‍पिटल के सूत्र बताते हैं कि यदि कानूनी प्रक्रिया के तहत ही इस हॉस्‍पिटल की कार्यप्रणाली एवं यहां होने वाली मौतों के पीछे छिपे कारणों की गहन जांच करा ली जाए तो सबकुछ सामने आ जाएगा।
यह पता लगते देर नहीं लगेगी कि यदि कोई जवान व्‍यक्‍ति फिसल कर गिरने की वजह से हॉस्‍पिटल में एडमिट हुआ हो, तो उसकी मौत लिवर फेल होने से कैसे हो गई। इलाज के दौरान उसके घबराए हुए परिजनों से उन्‍हें अवसर दिए बिना पेपर्स पर दस्‍तखत क्‍यों करा लिए गए।
इसके अलावा जो मामले किसी तरह पुलिस तक पहुंचे, उनमें समझौता क्‍यों कर लिया गया।
कई मामले तो इस हॉस्‍पिटल के ऐसे भी सामने आए हैं जिनमें मरीज खुद चलकर हॉस्‍पिटल तक पहुंचे हैं लेकिन लौट नहीं पाए। लौटे तो डेड बॉडी बनकर, वो भी लाखों रुपए का बिल वसूले जाने के बाद।
किसी नामचीन हॉस्‍पिटल में ऐसी अप्रत्‍याशित मौतें और इन मौतों का आंकड़ा यह शंका पैदा कराने के लिए काफी है कि हर मौत ऊपर वाले की मर्जी से नहीं होती, कुछ मौतें ऐसी भी होती हैं जिनका निर्धारण ‘नियति’ नहीं, हॉस्‍पिटल की ‘नीयत’ से भी होता है।
यही मौतें यह भी संकेत देती हैं कि हो न हो मानव अंगों का अवैध कारोबार करने वाले दिल्‍ली एनसीआर तक सीमित न होकर मथुरा जैसे धार्मिक स्‍थलों पर भी सक्रिय हों क्‍यों कि यहां की भौगोलिक ही नहीं, सामाजिक स्‍थिति भी उनके अनुकूल है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2019

No doubt चौकीदार चोर है, पर…

‘चोर’ के यहां भी ‘चोरी’ हो जाए तो वह सबसे पहले ‘चौकीदार’ की ओर इशारा करता है, यह एक सार्वभौमिक सत्‍य है क्‍योंकि ‘चौकीदार’ पर ‘चोरी’ का ‘इल्‍जाम’ लगाने के अनेक लाभ हैं। सबसे बड़ा लाभ तो यही है कि लोगों के साथ-साथ पुलिस का भी ध्‍यान भटक जाता है।
बहरहाल, बात करें देश के चौकीदार की तो No doubt चौकीदार चोर है।
अरे, जिसने 08 नवंबर 2016 की देर शाम अचानक टीवी पर प्रकट होकर कह दिया कि आज रात 12 बजे से वर्तमान में जारी 1000 और 500 के नोट मात्र एक कागज के टुकड़े बनकर रह जाएंगे, वो चोर नहीं तो और क्‍या है। ये बात अलग है कि उसने वो चोरी इतने कलात्‍मक अंदाज में की कि ‘पेशेवर चोर’ भी हक्‍के-बक्‍के रह गए।
चोर ही क्‍यों, लुटेरे और डकैत तक समझ नहीं पाए कि जिन तिजोरियों को सुबह-शाम धूप-दीप दिखाकर पूजा करते थे और उसमें रखी हजार-पांच सौ की गड्डियों को साक्षात लक्ष्‍मी मानते थे, वो अचानक एक अदद ‘चौकीदार’ के कहने से रद्दी का ढेर कैसे बन सकती हैं।
अब तक किस्‍से-कहानियों में सुना था कि लक्ष्‍मी और सरस्‍वती का बैर होता है, लेकिन यह नहीं सुना था कि सरस्‍वती से प्राप्‍त बुद्धि के बल पर लक्ष्‍मी को रातों-रात किसी ने इतना दीन-हीन बना डाला हो।
चौकीदार न किसी के घर में घुसा, न किसी के यहां छापामारी कराई, न तिजोरियों में भरे नोटों की ओर ताक-झांक की…लेकिन तिजोरी खाली कर दी।
सुना है राजा-महाराजाओं के किसी जमाने में ‘चोरी’ को एक किस्‍म की ‘कला’ का दर्जा हासिल था और चोरों के मुखिया को बाकायदा ‘चौर सम्राट’ कहकर संबोधित किया जाता था।
इस ‘चौकीदार चोर’ ने बिना हाथ लगाए जिस तरह चोरों के बड़े-बड़े गिरोहों को सड़क पर ला खड़ा किया, उसने साबित कर दिया कि चोरी कोई मामूली हुनर नहीं, वाकई एक बड़ी आर्ट है।
परिवार को ही पार्टी समझकर वर्षों से कुनबेभर की तिजोरियां भरने में लगे लोग समझ ही नहीं पाए कि जिससे चौकीदारी कराने के लिए पूर्व की भांति कुछ दिनों के लिए कुर्सी की अदला-बदली की थी, उसकी इतनी हिमाकत कैसे हो गई कि समूचे खजाने में सेंध लगा दी। आंखों से काजल निकाल ले गया और किसी को पता तक नहीं लगा।
माना कि इस दौरान गेहूं के साथ कुछ घुन भी पिस गए, और शायद इसीलिए बुजुर्ग बहुत पहले ही यह कह भी गए थे कि गेहूं के साथ घुनों का पिसना लाजिमी है।
कहावतें बनती ही इसलिए हैं ताकि सनद रहें और वक्‍त जरूरत अपनी सार्थकता सिद्ध करने के काम आएं।
तिजोरियों में रखी करेंसी के रद्दी हो जाने का गम भूल भी जाते यदि चौकीदार वहीं थम जाता। चौकीदार ने तो हद कर दी। वह रुकने का नाम नहीं ले रहा। बिना लगाम के घोड़े की तरह व्‍यवहार कर रहा है। पुराने पापों का हिसाब मांग रहा है।
घूम-घूम कर कह रहा है कि गांधी बाबा के सपनों का भारत बनाकर रहूंगा। देश को अलीबाबा और उसके 40 (बचे-खुचे) चोरों से मुक्‍ति दिलाऊंगा। न खाऊंगा न खाने दूंगा।
गांठिया-पापड़ खाकर गुजारा करने और खिचड़ी को ही छप्‍पनभोग मानने वाला चौकीदार, चोर-लुटेरों की भूख को चुनौती दे रहा है। बड़ी समस्‍या यह और है कि डरता भी नहीं है।
संविधान के खतरे में पड़ने की दुहाई दे ली, असहिष्‍णुता का जहर फैला लिया, सेना पर अटैक कर लिया, ईवीएम और चुनाव आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट के माननीयों तक को निशाना बना लिया। यहां तक कि ‘सर्जीकल स्‍ट्राइक’ को ‘फर्जीकल स्‍ट्राइक’ बता डाला लेकिन झुकने का नाम नहीं लेता।
राफेल जैसे अत्‍याधुनिक फाइटर प्‍लेन को उड़ाते-उड़ाते हाथ थक गए, उसमें भ्रष्‍टाचार का ढोल पीटते-पीटते मुंह सूख गया किंतु चौकीदार है कि मानता ही नहीं।
संसद में सैकड़ों सांसदों के सामने जादू की झप्‍पी दे दी, उससे भी बात नहीं बनी तो पांच मिनट आंख में आंख डालकर जवाब देने का चैलेंज दे दिया लेकिन चौकीदार कहता है कि गांधी जी का असली चेला हूं। न बुरा देखूंगा, न बुरा सुनूंगा।
किसी ने पूछा इसका क्‍या मतलब हुआ, तो कहने लगा- जाने दीजिए जी…मुंह भी नहीं खोलूंगा अन्‍यथा अनर्थ हो जाएगा।
सिर्फ इतना पूछूंगा कि ”झपकती आंख” की आंख में आंख डाली जा सकती है क्‍या। जो आंख संसद से लेकर सड़क तक मौके-बेमौके झपकती और फड़कती हो, उससे कोई आंख मिला भी कैसे सकता है। आंख मिलाना तो दूर, उससे तो कोई आंख लड़ा भी नहीं सकता।
समाजिक मान्‍यता है आंख मारने और उसका बेमकसद व बेमतलब इस्‍तेमाल करने वाले छिछोरे होते हैं।
आंख मारने का सही वक्‍त पर और सही जगह इस्‍तेमाल किया होता तो साढ़े चार साल में एक राष्‍ट्रीय पार्टी के कम से कम चार अंतर्राष्‍ट्रीय नेता देश के अंदर खेल रहे होते, साथ ही भविष्‍य के अध्‍यक्षों की चिंता भी नहीं रहती। राग दरबारी गाने वालों की न अब कमी है और न तब होती।
किसी से किसी की शक्‍ल और गुण मिलाने की भी जरूरत नहीं पड़ती। चौकीदार के भय ने भविष्‍य के भय का एक भूत और लाकर सिर पर खड़ा करा दिया।
भय के भूत अपने हों या पराए, वो दिमाग पर अटैक तो करते हैं। यह मानना पड़ेगा। दिमाग के चलायमान होने का इससे बड़ा सबूत दूसरा क्‍या होगा है कि चोर बता रहे हैं चौकीदार की नींद उड़ गई है।
किस गधे ने दी थी चौकीदार के गुण-धर्म की जानकारी।
भइया, वो चौकीदार ही क्‍या जिसे नींद आ जाए। चौकीदार का तो काम ही है जागते रहना और जगाते रहना। तभी तो चौकीदार दिन-रात चीख रहा है जागते रहो…। चोरों का बाजार गर्म है। वह न खुद सो रहा है और न जनता को सोने दे रहा है। उसे मालूम है कि सावधानी हटी और दुर्घटना घटी।
चौकीदार की सख्‍त पहरेदारी का ही परिणाम है कि चोरों की नींद हराम है। वह दिन-रात जागकर, झुंड में एकत्र होकर नजरें गड़ाए हुए हैं कि ये चौकीदार सोता क्‍यों नहीं। आखिर कब सोएगा यह चौकीदार। न सोए तो कम से कम झपकी ही ले ले।
वैसे भी जिसकी खुद की नींद हराम होगी, वही तो बता सकेगा कि कौन क्‍या कर रहा है। देखा जाए तो चोरों ने यह बताकर कि चौकीदार की नींद हराम है, यह साबित कर दिया कि जो भी हो लेकिन इतना जरूर है कि चौकीदार सो नहीं रहा। चौकीदार ने अपनी नींद हराम करके चोरों की नींद उड़ा दी है। बिना ऐसा किए हुए चोरों की नींद उड़ाई भी नहीं जा सकती।
इसीलिए कहता हूं कि No doubt चौकीदार चोर है। उसने पहले तिजोरियों के अंदर पड़े हजार-पांच सौ के बंडल चुराए, फिर चैन चुराया, चैन चोरी हुआ तो दिमाग पर ग्रहण लगा, और अब दिल की बारी है। कार्डियक अरेस्ट का नाम तो सुना ही होगा। पता नहीं, कब किसको गिरफ्त में ले ले। चौकीदार झपकती आंख का काजल चोरी कर ले जाए और रोने को आंसू भी न छोड़े तो दिल को चोट लगना स्‍वाभाविक है। जिसका सबकुछ छिन जाए और रह जाए सिर्फ झपकने को एक आंख, उसका दुख वही जानता है लेकिन चौकीदार कह रहा है- अभी तो 2019 की कहानी बाकी है मेरे दोस्‍त।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

पूरी संस्‍कृति यूनिवर्सिटी ही घपलों की बुनियाद पर खड़ी है, बात केवल एक अवैध निर्माण की नहीं है

मथुरा। बात केवल संस्‍कृति यूनिवर्सिटी के कैंपस 2 में चल रहे अवैध निर्माण कार्य को मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण द्वारा सील किए जाने की नहीं है, सच तो यह है कि समूची यूनिवर्सिटी ही घपलों की बुनियाद पर खड़ी है लेकिन कोई देखने वाला ही नहीं।
कल क्‍या हुआ
संस्‍कृति यूनिवर्सिटी के रजिस्‍ट्रार को विकास प्राधिकरण द्वारा थमाए गए आदेश की प्रति
विशेष कार्याधिकारी मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण द्वारा कल संस्‍कृति यूनिवर्सिटी के रजिस्‍ट्रार पूरन सिंह को जारी आदेश पत्र के अनुसार राष्‍ट्रीय राजमार्ग के किनारे ग्राम नरी सैमरी, कस्‍बा छाता स्‍थित संस्कृति यूनिवर्सिटी के कैंपस 2 में ‘अस्‍पताल भवन’ का अवैध निर्माण किया जा रहा था।
इस अवैध निर्माण कार्य की जानकारी होने पर विकास प्राधिकरण ने यूनिवर्सिटी के प्रबंधतंत्र को उत्तर प्रदेश नगर नियोजन एवं विकास अधिनियम 1973 की धारा 27(1) 28(1) व 28(2) के अंतर्गत नोटिस जारी किए गए किंतु यूनिवर्सिटी प्रशासन ने उन्‍हें गंभीरता से लेना जरूरी नहीं समझा और अवैध निर्माण कार्य जारी रखा।
इसी संदर्भ में अवर अभियंता विकास प्राधिकरण ने विभाग को अपनी आख्‍या से अवगत कराते हुए बताया कि संस्‍कृति यूनिवर्सिटी के कैंपस 2 का अवैध निर्माण कार्य जारी है।
अवर अभियंता की रिपोर्ट पर कल प्राधिकरण के विशेष कार्यअधिकारी रविशंकर के निर्देश में अभियंता मलखान सिंह ने अवैध निर्माण कार्य रुकवाकर उसे सील कर दिया।
अवैध निर्माण कार्य हो कैसे रहा था?
अब ऐसे में सबसे पहला सवाल तो यही खड़ा होता है कि यूनिवर्सिटी कैंपस में अवैध निर्माण कार्य इतने दिन से चल कैसे रहा था?
इस बावत जानकारी करने पर पता लगा कि प्रथम तो विकास प्राधिकरण के अधिकारियों को सब-कुछ मालूम होने के बावजूद वह ‘संबधित पक्ष’ से सेटिंग की कोशिश करते हैं, और जब उनके मनमुताबिक सेटिंग नहीं हो पाती तब भी नोटिस आदि देकर दबाव बनाने का प्रयास करते हैं। सील करने की कार्यवाही आखिर में तब करते हैं जब सेटिंग का कोई ‘तात्‍कालिक विकल्‍प’ रह नहीं जाता।
इतना सब हो जाने और सील लगने के बाद भी चूंकि विकास प्राधिकरण के पास राहत देने के तमाम रास्‍ते खुले रहते हैं इसलिए सील होते हुए काम शुरू कर दिया जाता है। शहर में ही इसके तमाम उदाहरण सामने हैं।
कैंपस 2 की हकीकत
जिस स्‍थान पर यह अवैध निर्माण कार्य चल रहा था, उस एक ही कैंपस से दरअसल तीन चिकित्‍सा पद्धतियों आयुर्वेद, यूनानी एवं होम्‍योपैथ के कॉलेज संचालित हैं जो कि पूरी तरह नियम विरुद्ध है। एक ही कैंपस में इस तरह तीन पद्धतियों के कॉलेज संचालन की दूसरी कोई नजीर शायद ही सामने आए।
संस्‍कृति यूनिवर्सिटी ने नक्‍शा पास क्‍यों नहीं कराया 
संस्‍कृति यूनिवर्सिटी द्वारा कैंपस 2 में अवैध निर्माण कार्य कराए जाने की वजह भी बहुत महत्‍वपूर्ण है। वो वजह यह है कि जिस कैंपस 2 में आज तीन-तीन चिकित्‍सा पद्धतियों के कॉलेज चल रहे हैं, वहां कभी Excel Group का कॉलेज चला करता था। Excel Group से वह संस्‍कृति यूनिवर्सिटी ने ले तो लिया किंतु उसकी रजिस्‍ट्री नहीं कराई क्‍योंकि रजिस्‍ट्री कराने के लिए करोड़ों रुपए स्‍टांप पर खर्च करना पड़ता। अब जबकि कैंपस ही संस्‍कृति यूनिवर्सिटी के नाम नहीं है तो नक्‍शा संस्‍कृति यूनिवर्सिटी पास भी कैसे करा सकती है।
कुल मिलाकर कैंपस 2 में चल रहे निर्माण कार्य का संबंध सिर्फ नक्‍शा पास न कराने तक सीमित नहीं है, उससे करोड़ों रुपए की स्‍टांप चोरी भी जुड़ी है जिससे शासन को मोटा चूना लगा है।
यूनिवर्सिटी प्रशासन परेशान क्‍यों 
अब तक हुई कार्यवाही को लेकर भी यूनिवर्सिटी प्रशासन इसलिए परेशान है कि शीघ्र ही ‘आयुष मंत्रालय’ की टीम कॉलेज कैंपस का वार्षिक मुआयना करने वाली है। नया शिक्षा सत्र प्रारंभ होने से पहले वह कभी भी मुआयना करने आ सकती है। कैंपस के निर्माण कार्य को अवैध पाकर वह यूनिवर्सिटी के खिलाफ कड़ा एक्‍शन ले सकती है और उसकी वजह से छात्रों के एडमिशन पर बड़ा असर पड़ना लाजिमी है इसलिए यूनिवर्सिटी का प्रबंध तंत्र कैसे भी इस मामले को निपटाना चाहता है।
बताया जाता है कि इसके लिए यूनिवर्सिटी प्रशासन एक ओर जहां कल देर रात तक मीडिया को मैनेज करने में लगा रहा वहीं दूसरी ओर विकास प्राधिकरण से भी सेटिंग करने के प्रयास किए। यूनिवर्सिटी का प्रबंधतंत्र मामले को निपटाने के लिए कुछ क्षेत्रीय प्रशासनिक अधिकारियों की भी मदद ले रहा है क्‍योंकि वह उनसे ऑब्‍लाइज रहते हैं।
मीडिया मैनेज हो गया, विकास प्राधिकरण बाकी है 
मीडिया को मैनेज करने में तो यूनिवर्सिटी का प्रबंधतंत्र काफी हद तक सफल रहा और इसीलिए दो प्रमुख अखबारों ने चंद लाइनें लिखकर यूनिवर्सिटी का नाम लिखे बिना अपने कर्तव्‍य की इतिश्री कर ली जबकि एक ने आठ-दस लाइनों में समाचार पूरा कर दिया, हालांकि उसने यूनिवर्सिटी के नाम का उल्‍लेख किया है।
घपले की बुनियाद पर खड़ी है समूची संस्‍कृति यूनिवर्सिटी 
संस्‍कृति यूनिवर्सिटी के सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार अवैध निर्माण का यह मामला सिर्फ कैंपस 2 तक सीमित नहीं है। यूनिवर्सिटी की बुनियाद ही अवैध निर्माण पर टिकी है।
जानकारी के मुताबिक यूनिवर्सिटी की मुख्‍य इमारत बनाने से पहले में भी सिर्फ एक टेंपरेरी नक्‍शा ‘बेसमेंट’ के नाम पर पास कराया गया था और उसी की आड़ लेकर पूरी यूनिवर्सिटी खड़ी कर ली। जिस जगह बेसमेंट दिखाया था, आज वहां क्‍लासेस चल रही हैं।
आश्‍चर्य की बात यह है कि इतनी बड़ी यूनिवर्सिटी में पार्किंग तक के लिए कोई जगह मुकर्रर नहीं हैं लिहाजा पार्किंग यूनिवर्सिटी की सड़कों पर होती है।
यूनिवर्सिटी की मान्‍यता पर भी सवाल 
किसी भी कॉलेज को ‘डीम्‍ड यूनिवर्सिटी’ की मान्‍यता देने के लिए सबसे पहली और जरूरी शर्त यह है कि उसके पास अपनी 40 एकड़ जमीन अधिकतम दो भागों में मौजूद होनी चाहिए।
संस्‍कृति यूनिवर्सिटी के पास अपनी 40 एकड़ जमीन तो है, किंतु वह दो भागों में न होकर चार भागों में है जिससे संस्‍कृति कॉलेज को यूनिवर्सिटी की मान्‍यता दिए जाने पर प्रश्‍नचिन्‍ह लगना स्‍वाभाविक है।
सरकारी जमीन पर भी कब्‍जा
बताया जाता है कि इस 40 एकड़ जमीन में भी काफी हिस्‍सा ‘चकरोड’ का है जो कायदे से ‘सरकारी’ है लेकिन उसका इस्‍तेमाल पूर्व में न होने की वजह से उसे यूनिवर्सिटी ने अपनी जमीन में मिला रखा है जोकि एक गंभीर अपराध है।
इन सभी मामलों पर संस्‍कृति यूनिवर्सिटी का पक्ष जानने की काफी कोशिश की गई किंतु यूनिवर्सिटी प्रशासन कोई जानकारी देने की बजाय सिर्फ इस कोशिश में लगा रहा कि किसी भी तरह समाचार प्रकाशित न किया जाए। वो भी तब जबकि यूनिवर्सिटी के कुलाधिपति सचिन गुप्‍ता कल यहीं थे और विकास प्राधिकरण ने उनके सामने कैंपस 2 के अवैध निर्माण को सील किया।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

गुरुवार, 31 जनवरी 2019

योर ऑनर…मुझे इस देश का नाम “भारत” होने पर आपत्ति है, भावनाएं आहत होती हैं!

योर ऑनर…मुझे इस देश का नाम “भारत” होने पर आपत्ति है, भावनाएं आहत होती हैं! कल को कोई ‘सिरफिरा’ इस दलील के साथ अपनी याचिका लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा दे और सुप्रीम कोर्ट उस याचिका को स्‍वीकार भी कर ले तो कोई आश्‍चर्य नहीं, क्‍योंकि ‘सेक्युलर’ शब्‍द तभी मुकम्‍मल होता है अन्‍यथा न्‍यायपालिका भी ‘सांप्रदायिक’ हो सकती है।
न्‍यायपालिका सांप्रदायिक न हो इसके लिए जरूरी है हर उस याचिका को स्‍वीकार कर लेना जिससे ”कुछ तत्‍वों” की भावनाएं आहत होने का दावा किया गया हो।
देश का नाम भारत रहे या न रहे लेकिन Secularism रहना चाहिए अन्‍यथा लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा, संभवत: इसी धारणा के तहत सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के 1125 केंद्रीय विद्यालयों में की जाने वाली इस प्रार्थना- “असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय” पर आपत्ति संबंधी याचिका न सिर्फ स्‍वीकार कर ली बल्‍कि केंद्र सरकार को नोटिस भेजकर जवाब भी तलब कर लिया।
दरअसल, केंद्रीय विद्यालय से ही शिक्षा प्राप्‍त जबलपुर के एक वकील विनायक शाह ने सुप्रीम कोर्ट में इस आशय की याचिका दाखिल की थी कि केंद्रीय विद्यालयों में 1964 से “असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय” नामक सुबह की जो प्रार्थना कराई जाती है वो पूरी तरह असंवैधानिक है। याचिकाकर्ता ने इसे संविधान के अनुच्छेद 25 और 28 के खिलाफ बताते हुए कहा है कि इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती।
वकील विनायक शाह के अनुसार चूंकि इन स्कूलों को सरकार से सहायता दी जाती है ऐसे में उन्हें धार्मिक मान्यताओं और एक संप्रदाय विशेष को बढ़ावा नहीं देना चाहिए। उनके अनुसार इस तरह की प्रार्थनाएं वैज्ञानिक चेतना के विकास में बाधा खड़ी करती हैं।
कोर्ट ने इस पर नोटिस जारी करते हुए केंद्र सरकार और केंद्रीय विद्यालय संगठन से पूछा कि क्या हिंदी और संस्कृत में होने वाली प्रार्थना से किसी धार्मिक मान्यता को बढ़ावा मिल रहा है। जस्टिस आरएफ नरीमन और जस्टिस नवीन सिन्हा की बेंच ने इसे गंभीर संवैधानिक मुद्दा भी बताया।
केंद्र सरकार की ओर से सोमवार को सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट में कहा कि केंद्रीय विद्यालयों की प्रार्थना संस्कृत में होने मात्र से किसी धर्म से नहीं जुड़ जाती है। “असतो मा सद्गमय’ धर्मनिरपेक्ष है। यह सार्वभौमिक सत्य के बोल हैं।
इस पर जस्टिस आरएफ नरीमन ने कहा कि संस्कृत का यह श्लोक उपनिषद से लिया गया है। जवाब में मेहता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के हर कोर्टरूम में लगे चिह्न पर भी संस्कृत में लिखा है- “यतो धर्मस्ततो जय:’’। यह महाभारत से लिया गया है। इसका मतलब यह तो नहीं हुआ कि सुप्रीम कोर्ट धार्मिक है। संस्कृत को किसी धर्म से जोड़कर नहीं देखना चाहिए।
इसके बाद जस्टिस नरीमन ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े इस मुद्दे पर संविधान पीठ को सुनवाई करनी चाहिए।
जमीयत-उलेमा-ए-हिंद ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर केंद्रीय विद्यालय संगठन के संशोधित एजुकेशन कोड को चुनौती दी है। याचिका में कहा गया है कि केंद्रीय विद्यालयों में प्रार्थना लागू है। इस सिस्टम को नहीं मानने वाले अल्पसंख्यक छात्रों को भी इसे मानना पड़ता है। मुस्लिम बच्चों को हाथ जोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। 
ऐसे में सबसे अहम सवाल तो यह उठ खड़ा होता है कि जिस संविधान का हवाला देकर वकील विनायक शाह ने सर्वोच्‍च न्‍यायालय में याचिका दायर की और जिसे प्रथम दृष्‍टया असंवैधानिक मानते हुए जस्टिस आरएफ नरीमन और जस्टिस नवीन सिन्हा की बेंच ने गंभीर संवैधानिक मुद्दा मानकर केंद्र सरकार से जवाब तलब किया, उसकी तो प्रस्‍तावना ही “हम भारत के लोग…से शुरू होती है।
“असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय” पर आपत्ति दर्ज कराने और इसे असंवैधानिक बताने वाले पूछ सकते हैं कि इस मुद्दे को देश के नाम “भारत” से क्‍यों जोड़ा जा रहा है और इसका धर्म से क्‍या वास्‍ता है ?
वास्‍ता है और बहुत गहरा वास्‍ता है
भारतवर्ष का नामकरण कैसे हुआ इस संबंध में मतभेद हैं क्‍योंकि भारतवर्ष में तीन भरत हुए। एक भगवान ऋषभदेव के पुत्र, दूसरे राजा दशरथ के और तीसरे दुश्यंत- शकुंतला के पुत्र भरत।
भारत-1 : भारत नाम की उत्पति का संबंध प्राचीन भारत के चक्रवर्ती सम्राट राजा मनु के वंशज भगवान ऋषभदेव के पुत्र भरत से है। श्रीमद् भागवत एवं जैन ग्रंथों में उनके जीवन एवं अन्य जन्मों का वर्णन आता है।
ऋषभदेव स्वयंभू मनु से पांचवीं पीढ़ी में इस क्रम में हुए- स्वयंभू मनु, प्रियव्रत, अग्नीघ्र, नाभि और फिर ऋषभ। राजा और ऋषि ऋषभनाथ के दो पुत्र थे- भरत और बाहुबली।
बाहुबली को वैराग्य प्राप्त हुआ तो ऋषभ ने भरत को चक्रवर्ती सम्राट बनाया। भरत को वैराग्य हुआ तो वो अपने बड़े पुत्र को राजपाट सौंपकर जंगल चले गए।
भारत-2 : राम के छोटे भाई भरत राजा दशरथ के दूसरे पुत्र थे। उनकी माता कैकयी थीं। उनके अन्य भाई थे लक्ष्मण और शत्रुघ्न। परंपरा के अनुसार राम को गद्दी पर विराजमान होना था लेकिन उन्हें 14 वर्ष का वनवास मिला। इस दौरान भरत ने राजगद्दी संभाली और उन्होंने राज्य का विस्तार किया। कहते हैं उन्हीं के कारण इस देश का नाम भारत पड़ा।
भरत-3 : पुरुवंश के राजा दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र भरत की गणना ‘महाभारत’ में वर्णित सोलह सर्वश्रेष्ठ राजाओं में होती है। कालिदास कृत महान संस्कृत ग्रंथ ‘अभिज्ञान शाकुंतलम’ के एक वृत्तांत अनुसार राजा दुष्यंत और उनकी पत्नी शकुंतला के पुत्र भरत के नाम से भारतवर्ष का नामकरण हुआ।
मरुद्गणों की कृपा से ही भरत को भारद्वाज नामक पुत्र मिला। भारद्वाज महान ‍ऋषि थे। चक्रवर्ती राजा भरत के चरित का उल्लेख महाभारत के आदिपर्व में भी है।
हालांकि ज्यादातर विद्वान मानते हैं कि ऋषभनाथ के प्रतापी पुत्र भरत के नाम पर ही भारत का नामकरण हुआ।
जो भी हो किंतु इन तीनों राजाओं का ताल्‍लुक सनातन धर्म से है, न कि किसी अन्‍य से। आज के ‘सेक्युलर’ कल यह भी कह सकते हैं कि देश के इस नाम से सांप्रदायिकता की बू आती है इसलिए संविधान में संशोधन कर देश का नाम ‘भारत’ की बजाय कुछ ऐसा रखना चाहिए जिससे Secularism और लोकतंत्र जिंदा रहें।
हिंदुस्‍तान नाम भी ऐसे तत्‍वों को रास नहीं आएगा क्‍योंकि हिंदुस्‍तान के पहले दो अक्षर ही हिंदुइज्‍म के द्योतक हैं।
यूं भी देश का नाम “भारत” होना इसलिए सांप्रदायिक बताया जा सकता है क्‍योंकि राष्‍ट्रवादी लोग तो “भारत” को मां का दर्जा देते हैं और भारत माता की जय बोलते हैं जबकि जिनकी जिनकी भावनाएं आहत होती हैं, उन्‍हें भारत माता की जय बोलने में भी आपत्ति है।
ये बात अलग है कि उन्‍हीं के बीच से निकले प्रसिद्ध शायर मुनव्वर राना ने मां की शान में लिखा है-
”चलती फिरती आंखों से अज़ा देखी है, मैंने जन्‍नत तो नहीं देखी मां देखी है”
हिंदू यानी सनातन धर्मावलंबी तो हमेशा से कहते आए हैं ‘जननी-जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ अर्थात् जननी (माता) और जन्मभूमि का स्थान स्वर्ग से भी श्रेष्ठ एवं महान है।
माता का प्यार, दुलार व वात्सल्य अतुलनीय है। इसी प्रकार जन्मभूमि की महत्ता हमारे समस्त भौतिक सुखों से कहीं अधिक है। लगभग सभी लेखकों, कवियों व महामानवों ने भी जन्मभूमि की गरिमा और उसके गौरव को जन्मदात्री के तुल्य ही माना है।
बहरहाल, आज के माहौल में ऐसे उदाहरण देना भी सांप्रदायिक सोच का परिचायक हो सकता है इसलिए तथ्‍य परक उदाहरण अधिक अनुकूल हो सकते हैं।
तथ्‍य परक उदाहरण बताते हैं कि आज प्रत्येक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के सामने लगभग 4,500 लंबित मामले हैं, जबकि अधीनस्थ न्यायपालिका के प्रत्येक न्यायाधीश को लगभग 1,300 लंबित मामलों का निपटारा करना है।
राष्ट्रीय न्यायिक डाटा ग्रिड के अनुसार 2018 के अंत में, जिला और अधीनस्थ अदालतों में 2.91 करोड़ मामले लंबित थे जबकि 24 उच्च न्यायालयों में 47.68 लाख मामले लंबित थे। 
आंकड़ों के अनुसार उच्च न्यायालयों में प्रति न्यायाधीश 4,419 मामले लंबित हैं और प्रत्येक निचली अदालत के न्यायाधीश के सामने 1,288 मामले हैं। 
बेशक यह भी कहा जा सकता है कि देश में स्‍वीकृत न्यायिक अधिकारियों की कमी है और इसलिए भी काम प्रभावित होता है किंतु इसका यह मतलब नहीं कि बेतुकी और अप्रासंगिक याचिकाएं स्‍वीकार कर ली जाएं लेकिन लंबित मामले निपटाने में इसलिए कोई रुचि न ली जाए क्‍योंकि उससे किसी एक खास धर्म की भावनाएं आहत नहीं होतीं।
एक धर्म विशेष से जुड़े फांसी की सजा प्राप्‍त आतंकवादियों के लिए तो आधी-आधी रात को भी न्‍यायधीशों के दरवाजे खुल जाएं किंतु दूसरे धर्म की आस्‍था से जुड़ा मुद्दा सुनवाई के लिए भी प्राथमिकता में शुमार न हो।
नामचीन लोगों से जुड़े मामलों पर सेम डे हियरिंग भी हो जाए तथा निर्णय भी सुना दिया जाए लेकिन जनसामान्‍य को दशकों तक तारीख पर तारीख मिलती रहे और उसकी तीन-तीन पीढ़ियां न्‍याय की आस में दिवंगत होती रहें।
बृहदारण्यक उपनिषद के पवमान मन्त्र का प्रसिद्ध श्लोक है- 
ॐ असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मामृतं गमय।। 
अर्थात-
मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो।
मुझे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो।
मुझे मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो॥ 
अब बताइए कि ये शब्‍द क्‍या किसी धर्म को परिभाषित करते हैं अथवा किसी धर्म विशेष से ताल्‍लुक रखने वाले व्‍यक्‍ति की भावनाएं आहत करते हैं।
असत्‍य से सत्‍य की ओर, अन्धकार से प्रकाश की ओर तथा मृत्यु से अमरता की ओर ले चलने की प्रार्थना कौन सा धर्म अथवा धार्मानुयायी नहीं करता।
ये तो मानव मात्र के कल्‍याण की कामना करने वाली प्रार्थना है। इसका किसी धर्म विशेष से क्‍या वास्‍ता।
और अगर इस प्रार्थना को लेकर भी आपत्ति है और कहा जा रहा है कि यह किसी एक धर्म का प्रतिनिधित्‍व करती है तथा दूसरे धर्म की भावनाएं आहत करती है तो फिर तय जानिए कि न धर्म बचेगा, न धर्मानुयायी। न संविधान बचेगा न लोकतंत्र।
फिर तो विधायिका और न्‍यायपालिका भी अपना मकसद खो देंगी। जैसा कि जस्टिस आरएफ नरीमन को जवाब देते हुए सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के हर कोर्टरूम में लगे चिह्न पर भी संस्कृत में लिखा है- “यतो धर्मस्ततो जय:’। यह महाभारत से लिया गया है। इसका मतलब यह तो नहीं हुआ कि सुप्रीम कोर्ट धार्मिक है।
लोकतंत्र के किसी भी पिलर की अहमियत तब तक है जब तक वह उस औचित्‍य को सिद्ध करता रहे जिसके लिए उसका निर्माण किया गया था। यह औचित्‍य तब सिद्ध होता है जब सभी संस्‍थाएं अपनी-अपनी जिम्‍मेदारी अन्‍य संस्‍थाओं के काम में दखल न देते हुए पूरी करती रहें। एक-दूसरे के काम में हस्‍तक्षेप और अधिकारों का अतिक्रमण किसी भी संस्‍था को बर्बाद करने की दिशा में उठाया गया पहला कदम हो सकता है।
विधायिका हो या कार्यपालिका, अथवा न्‍यायपालिका ही क्‍यों न हो, अधिकारों का अतिक्रमण और कार्यक्षेत्र में हस्‍तक्षेप किसी के हित में नहीं।
जिस तरह Secularism को अब तक कोई ठीक-ठीक परिभाषित नहीं कर सका है, उसी तरह धार्मिक भावनाओं के भी आहत होने को परिभाषित करना बड़ा मुश्‍किल है। आज जिनकी भावनाएं ‘असतो मा सद्गमय’ से आहत हो रही हैं, क्‍या गारंटी है कि कल उनकी भावनाएं देश का नाम ”भारत” होने से आहत नहीं होंगी। तो क्‍या कल कोर्ट ऐसी भी किसी याचिका को स्‍वीकार करके सरकार को नोटिस भेज देगा।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

सोमवार, 14 जनवरी 2019

मथुरा में #metoo: यूनिवर्सिटी, कॉलेज और तकनीकी शिक्षण संस्‍थाओं में हो रहा है महिलाओं का “यौन शोषण”

मथुरा। यौन शोषण के खिलाफ महिलाओं के एक वर्ग द्वारा शुरू किया गया #metoo अभियान बेशक बॉलीवुड एवं राजनीति सहित कॉर्पोरेट जगत में भी काफी चर्चित रहा तथा कई नामचीन हस्‍तियों को बेनकाब करने में कामयाब हुआ, किंतु उन स्‍थानों से फिलहाल दूर है जिन्‍हें शिक्षा का मंदिर कहा जाता है और जिनके ऊपर देश का भविष्‍य कहे जाने वाले युवाओं को तैयार करने की जिम्‍मेदारी है।
यही कारण है कि धार्मिक नगरी के रूप में विश्‍व विख्‍यात मथुरा के कई निजी शिक्षण संस्‍थानों में महिला कर्मचारियों सहित छात्राओं तक का यौन शोषण किए जाने की जानकारी मिली है।
विश्‍वस्‍त सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार मथुरा-भरतपुर रोड पर स्‍थित शिक्षा के कुछ ऐसे ही मंदिरों में महिला कर्मचारियों तथा छात्राओं के यौन शोषण का खेल लंबे समय से चल रहा है। 
बताया जाता है कि कई-कई शिक्षण संस्‍थाओं का संचालन करने वाले एक ऐसे ही व्‍यक्‍ति की किसी पीड़ित फीमेल कर्मचारी ने ही पिछले दिनों वीडियो क्‍लिप तैयार की है। 
कॉलेज की इस फीमेल कर्मचारी का कहना है कि वह संस्‍थान में कार्यरत दूसरी महिलाओं तथा छात्राओं के सहयोग से शीघ्र ही शिक्षण संस्‍थान के मालिक का घिनौना चेहरा सामने लाएगी और कानूनी कार्यवाही करेगी ताकि शिक्षा व्‍यवसाइयों का पर्दाफाश हो सके। 
इस महिला का यह भी कहना है कि वह अपने साथ हुए यौन उत्‍पीड़न के अलावा दूसरी महिलाओं और छात्राओं के साथ लंबे समय से किए जा रहे दुष्‍कर्म को भी सार्वजनिक करेगी जिससे कि शिक्षा व्‍यवसाई को किसी एक महिला पर कीचड़ उछालने का मौका न मिले। 
पीड़ित महिला का दावा है कि मथुरा-भरतपुर रोड पर शिक्षण संस्‍थाएं चलाने वाले इस व्‍यक्‍ति को संस्‍थान खुलने से लेकर बंद होने तक अपने कार्यालय में एक खास महिला कर्मचारी के साथ बैठेे देखा जा सकता है। यह वही महिला है जिसके इस शिक्षा व्‍यवसाई से संबंध संदिग्‍ध बताए जाते हैं और जिसे लेकर उसके सभी शिक्षण संस्‍थानों में चर्चा का बाजार गर्म रहता है। 
संस्‍थान के सूत्र बताते हैं कि कर्मचारियों और शिक्षकों के साथ-साथ छात्र-छात्राओं के बीच भी संचालक के रंगीन मिजाज एवं रंगरेलियां मनाने के किस्‍से चर्चित हैं किंतु आदत से मजबूर संचालक पर फिलहाल कोई असर होता दिखाई नहीं देता। 
सूत्रों के अनुसार महिला कर्मचारियों और छात्राओं के यौन शोषण का यह मामला सिर्फ शिक्षण संस्‍थाओं के अंदर तक ही सीमित नहीं है, इसके बाहर भी शिक्षा व्‍यवसाइयों द्वारा उनका विभिन्‍न काम कराने के लिए उपयोग किया जाता है।
वैसे महिला कर्मचारियों एवं छात्राओं के साथ किए जा रहे खेल में मथुरा-भरतपुर रोड पर संचालित शिक्षण संस्‍थान के मालिक की संलिप्‍तता का यह एकमात्र मामला भी नहीं है। कई दूसरे शिक्षण संस्‍थान संचालक भी ऐसे घिनौने कृत्‍य कर रहे हैं जिनमें डीम्‍ड यूनिवर्सिटी तक चलाने वालों के नाम शामिल हैं।
एक मामला तो पिछले दिनों अदालत तक जा पहुंचा था और फिलहाल वहां लंबित है। दूसरे मामले में स्‍कूल के संचालक की गिरफ्तारी हो चुकी है।
इसके अतिरिक्‍त आश्‍चर्यचकित कर देने वाला एक अन्‍य मामला 14 जनवरी 2008 के दिन तब सामने आया था जब शहर के एक नामचीन होटल के अंदर न्‍यायपालिका से जुड़े चार अधिकारी अलग-अलग कमरों में चार छात्राओं के साथ पकड़े गए थे। 
ये छात्राएं भी एक स्‍थानीय तकनीकी शिक्षण संस्‍था में अध्‍ययनरत थीं और इन्‍होंने पूछताछ के दौरान बाकायदा पुलिस को बताया कि शिक्षण संस्‍था के मालिक ने उन्‍हें करियर बनाने का आश्‍वासन देकर अधिकारियों को “एंटरटेन” करने के लिए बाध्‍य किया था। 
मामला न्‍यायपालिका से जुड़ा होने के कारण पुलिस ने उसे रफा-दफा तो कर दिया परंतु तत्‍कालीन जिला जज को मौके पर बुलाने के बाद, जिससे संशय की कोई गुजाइश न रहे। 
जिला जज ने जनवरी 2008 को एक पत्र भेजकर उच्‍च न्‍यायालय के मुख्‍य न्‍यायाधीश तथा रजिस्‍ट्रार को पूरे घटनाक्रम से अवगत कराया और शिक्षण संस्‍थान के उस मालिक का नाम भी उजागर किया जिसके बारे में छात्राओं ने स्‍पष्‍ट जानकारी दी थी। 
हमेशा की तरह हालांकि शिक्षण संस्‍था के मालिक ने अपने राजनीतिक प्रभाव का इस्‍तेमाल कर मामले को दबवा दिया परंतु तत्‍कालीन जिला जज का इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय के मुख्‍य न्‍यायाधीश एवं रजिस्‍ट्रार को भेजा गया पत्र असलियत सामने लाने के लिए काफी है। 
ऐसी ही एक डीम्‍ड यूनिवर्सिटी के युवा संचालक को तो कुछ समय पूर्व उनकी पत्‍नी ने ही संस्‍थान की महिला कर्मचारी के साथ देर शाम ऑफिस में रंगरेलियां मनाते रंगेहाथ पकड़ लिया था। 
बताया जाता है कि यूनिवर्सिटी के मालिक की इस घिनौनी हरकत से यूनिवर्सिटी के सभी मेल व फीमेल कर्मचारी वाकिफ हैं किंतु नौकरी पर आंच आने के डर से मुंह नहीं खोलते। यूनिवर्सिटी के दिन-प्रतिदिन गंदे होते माहौल के कारण गत दिनों कुछ लोग दूसरे संस्‍थानों में व्‍यवस्‍था होते ही यहां से जॉब छोड़कर जा चुके हैं।
सूत्र बताते हैं कि शिक्षा मंदिरों के संचालक और हवस के इन पुजारियों का भांडा फूटने में अब ज्‍यादा समय नहीं लगेगा क्‍योंकि पीड़िताओं ने अब बदनामी की परवाह किए बिना उनके कुकृत्‍य सामने लाने का मन बना लिया है।
जो भी हो, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि एक विश्‍व विख्‍यात धार्मिक नगरी से एजुकेशन हब के रूप में पहचान बनाने वाली कृष्‍ण की नगरी आज शिक्षा के मंदिरों में किए जा रहे यौन शोषण के लिए भी बदनामी हासिल करने लगी है और इसकी चर्चा कॉलेज एवं यूनिवर्सिटी कैंपस की दीवारों से बाहर तक हो रही है। 
इन हालातों में यदि कभी किसी सफेदपोश शिक्षा व्‍यवसाई का घृणित चेहरा अचानक सामने आ जाए तो आश्‍चर्य नहीं क्‍योंकि दुष्‍कर्म किया भले ही बंद कमरों में जाता हो परंतु उसकी दुर्गंध को ज्‍यादा दिनों तक दबाए रखना संभव नहीं होता।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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