शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

बूढ़ी होती स्‍वतंत्रता की जवान पीढ़ी का सच: सिर्फ अधिकारों की बात…कर्तव्‍यों का क्‍या ?

देश को स्‍वतंत्र हुए आज पूरे 71 साल हो गए। यानी जिस पीढ़ी ने आजाद भारत में आंखें खोलीं, वह आज बूढ़ों की जमात में शामिल हो चुकी है। इस पीढ़ी ने आजादी की लड़ाई को सिर्फ किस्‍से-कहानियों की तरह सुना है, या चलचित्रों में देखा है।
परतंत्र भारत की पीड़ा के साक्षी मुठ्ठीभर लोग ही बचे होंगे, और जो बचे होंगे उनमें बहुत से तो उस पीड़ा को बयां करने की स्‍थिति में नहीं होंगे।
गुलामी, परतंत्रता, अधीनता आदि कहने को तो मात्र शब्‍दभर हैं किंतु इनका दर्द वही समझ सकता है जिसने इन्‍हें भोगा है।

https://youtu.be/XK6566eXM4U


स्‍वतंत्र भारत ने 71 सालों के इस सफर में निश्‍चित ही एक मुकाम हासिल किया है और दुनिया को लोकतंत्र की ताकत समझाने में सफल भी रहा है परंतु टीस इस बात की है कि सत्तासुख भोगने वाले लोग जवान होती पीढ़ी को यह समझाने में असफल रहे कि देश ने स्‍वतंत्रता की कितनी बड़ी कीमत चुकाई है।
एक तरह से देखा जाए तो स्‍वतंत्रता की लड़ाई में अपने प्राणों की आहुति देने वालों और उसके लिए जीवन लगा देने वालों के बलिदान को चंद लोगों ने भुनाया तो खूब, परंतु श्रेय देने से मुंह मोड़ते रहे।
यही कारण है कि आज की पीढ़ी उंगलियों पर गिने जाने लायक स्‍वतंत्रता संग्राम सेनानियों से ही परिचित है।
स्‍वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे राष्‍ट्रीय पर्वों की भव्‍यता में नि:संदेह काफी इजाफा हुआ है किंतु भावनात्‍मक दृष्‍टि से ये वर्ष-दर-वर्ष फीके होते जा रहे हैं क्‍योंकि इस बीच राष्‍ट्रवाद को भी राजनीति का विषय बना दिया गया।
सत्ता मात्र सुख का साधन बन गई और उसकी प्राप्‍ति के एकमात्र ध्‍येय में लिप्‍त राजनेताओं के लिए स्‍वतंत्रता का मकसद पीछे छूटता चला गया।
स्‍वतंत्रता सेनानियों को भी निजी स्‍वार्थपूर्ति के लिए खांचों में बांट देने वाली दलगत राजनीति ने कभी यह सोचा ही नहीं कि नई पीढ़ी को बिना तोड़े-मरोड़े उस दौर के इतिहास से परिचित कराना बहुत जरूरी है। आज वीर सावरकर एक दल के लिए महान क्रांतिकारी हैं तो दूसरा दल उन्‍हें फिरंगियों का मोहरा साबित करने से नहीं चूकता।
भगत सिंह पर वामपंथी अपना ठप्‍पा लगाते हैं तो अंबेडकर को दूसरे दलों ने अपना प्रतीक चिन्‍ह घोषित कर दिया है।
कहते हैं कि आधा ज्ञान और आधी जानकारी हमेशा अंधे कुएं की तरह हैं। नई पीढ़ी इसी अंधे कुएं में भटकने को अभिशप्‍त है। उसके सामने है तो ऐसी ही आधी-अधूरी जानकारियों से भरा गूगल बाबा का वो पिटारा जो विदेशी सोच से संचालित होता है।
आज यदि सबसे ज्‍यादा जरूरत है तो इस बात की कि स्‍वतंत्र भारत के युवा को गूगल के ज्ञान से इतर ले जाया जाए। उसकी गूगल पर बढ़ती निर्भरता को कम करके धरातल पर मौजूद सच्‍चाई का साक्षात्‍कार कराया जाए। जंगे आजादी में भूमिका निभाने वाले बचे-खुचे सेनानियों को सामने लाया जाए। उन्‍हें मात्र पेंशन देकर अपने कर्तव्‍य की इतिश्री कर लेने की बजाय उनके संघर्ष की गाथाएं सुनाई जाएं।
सिर्फ अधिकारों की बात करने वाली नई पीढ़ी को देश के प्रति अपने कर्तव्‍य का भान कराना भी उतना ही जरूरी है जितना कि नई तकनीक से परिचित कराना। कर्तव्‍यों से विमुख नई पीढ़ी तकनीकी रूप से चाहे कितनी भी समृद्ध क्‍यों न हो जाए, वह न तो कभी देश के काम आ सकती है और न देशवासियों के।
नई पीढ़ी में कर्तव्‍यों के प्रति बोध पैदा करने के लिए बिना भेद-भाव स्‍वतंत्रता संग्राम का इतिहास सामने लाना अत्‍यंत आवश्‍यक है क्‍योंकि इतिहास से सबक़ न लेने वाले लोग नष्‍ट होने को अभिशप्त होते हैं।
क्‍यों न इस स्‍वतंत्रता दिवस पर ऐसा कोई संकल्‍प लिया जाए जिससे नई पीढ़ी अपने राष्‍ट्रीय पर्वों को मात्र छुट्टी का एक दिन न समझकर देश के प्रति कर्तव्‍य का अहसास करे तथा उससे लेने ही लेने की बजाय, उसे कुछ देने अथवा उसके लिए कुछ करने का जज्‍बा भी पाल सके।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

2019 चुनाव: यमुना मैया की ”लाश” के सहारे एकबार फिर लोकसभा पहुंचने की तैयारियां शुरू

बेशर्म नेता, भ्रष्‍ट प्रशासन और तमाशबीन जनता के कारण वेंटिलेटर पर है मां यमुना 
2019 के लोकसभा चुनाव की फील्‍ड सजने लगी है। नेताओं के दौरे शुरू हो चुके हैं। बैठकों का सिलसिला जारी है।
यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने का वचन देकर 2009 के चुनाव में भाजपा के सहयोग से लोकसभा की अपनी पारी शुरू करने वाले राष्‍ट्रीय लोकदल के युवराज जयंत चौधरी 2019 में महागठबंधन के सहारे एकबार फिर अपनी नैया पार लगती देख रहे हैं।
सिटिंग एमपी और अभिनेत्री हेमा मालिनी भी दोबारा चुनाव लड़ने के लिए अपनी ओर से ताल ठोक चुकी हैं। पार्टी ने चाहा तो वह यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने का संकल्‍प लेने के लिए एकबार फिर चुनावी मैदान में होंगी।
इत्तेफाक देखिए कि जयंत चौधरी तथा हेमा मालिनी दोनों ने कृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली से ही चुनावी राजनीति में कदम रखा और ‘कालिंदी’ के कलुष को धोने का संकल्‍प लिया परंतु नतीजा सबके सामने है।
जयंत और हेमा ही क्‍यों, यमुना तो पिछले 20 साल से अपना कलुष धुलने के इंतजार में है। इस बीच कितने नेताओं ने यमुना का जल हाथ में लेकर वचन दिया कि वह पतित पावनी को प्रदूषण मुक्‍त करायेंगे किंतु यमुना से ज्‍यादा प्रदूषित वो खुद हो गए।
जिस तरह अब उन्‍हें यमुना का प्रदूषण दिखाई नहीं देता, उसी तरह अपने चेहरे पर लगी कालिख भी नजर नहीं आती।
10 जुलाई 1998 के दिन एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यमुना को प्रदूषण मुक्‍त रखने के लिए शासन-प्रशासन को तमाम दिशा-निर्देश दिए। इन दिशा-निर्देशों में कृष्‍ण जन्‍मभूमि (मथुरा) से चंद कदम दूरी पर किए जाने वाले पशुवध को नई पशुवधशाला का निर्माण होने तक पूरी तरह बंद कराने, यमुना के जल में सीधे गिरने वाले मथुरा-वृंदावन के दर्जनों नाले-नालियों को टैप करने तथा जनपद भर में मांस की बिक्री बंद करने जैसे आदेश शामिल थे।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के इन आदेश-निर्देशों की किस तरह धज्‍जियां उड़ाई जा रही हैं, यह समझने के लिए कल का वाकया काफी है।
श्रीकृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी पर सुरक्षा-व्‍यवस्‍था और दूसरे इंतजामों के लिए कल कलक्‍ट्रेट सभागार में जिला प्रशासन ने एक मीटिंग रखी थी। इस मीटिंग में संबंधित विभागों के अधिकारियों सहित कृष्‍ण जन्‍मस्‍थान की ओर से गोपेश्‍वर नाथ चतुर्वेदी तथा द्वारिकाधीश मंदिर की ओर से श्रीधर चतुर्वेदी भी शामिल हुए। गोपेश्‍वरनाथ चतुर्वेदी ही 20 साल पहले यमुना प्रदूषण के मुद्दे को इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय लेकर गए थे।
इस मीटिंग के दौरान गोपेश्‍वर नाथ चतुर्वेदी ने जब जिलाधिकारी सर्वज्ञराम मिश्रा तथा एसएसपी बबलू कुमार को बताया कि इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय ने 1998 में जिस कट्टीघर को बंद कराने के आदेश दिए थे उसमें आज भी पशुओं का लगातार कटान हो रहा है, तो उन्‍होंने आश्‍चर्य व्‍यक्‍त किया।
डीएम और एसएसपी ने ये आश्‍चर्य पशुओं का कटान जारी रहने पर व्‍यक्‍त किया अथवा इस बात पर कि वह खुद इस जानकारी से कैसे अनभिज्ञ थे, यह तो वही जानें अलबत्ता मथुरा की जनता इस बात पर आश्‍चर्यचकित जरूर है कि ”योगीराज” में भी वही सारे कृत्‍य बदस्‍तूर हो रहे हैं जिन्‍हें सरकार बनते ही बंद कराने का वायदा भाजपा ने किया था।
योगी आदित्‍यनाथ ने मुख्‍यमंत्री पद की शपथ लेने के तत्‍काल बाद जो कदम उठाए, उनमें एक आदेश प्रदेशभर के अवैध कट्टीघरों को बंद कराने का भी था।
ऐसे में सवाल यह उठता है कि यदि हाईकोर्ट के आदेश से बंद हुआ मथुरा का कट्टीघर भी आजतक संचालित है, तो प्रदेश के दूसरे कट्टीघर क्‍या वाकई बंद हो पाए हैं ?
कुछ ऐसा ही हाल यमुना में गिरने वाले उन दर्जनों नालों का है जिन्‍हें टैप करने के आदेश इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिए थे। ये नाले तो कभी टैप नहीं हो पाए, हां इन्‍हें टैप करने के नाम पर करोड़ों का घोटाला जरूर कर लिया गया। भाजपा की चेयरपर्सन मनीषा गुप्‍ता के कार्यकाल में हुए करीब 2 करोड़ रुपयों के एक ऐसे ही घोटाले का वाद न्‍यायालय में लंबित है।
वैसे इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश आने से लेकर अब तक 20 वर्षों के बीच सिर्फ एक टर्म कांग्रेस के श्‍यामसुंदर उपाध्‍याय बिट्टू नगरपालिका के चेयरमैन रहे अन्‍यथा हमेशा भाजपा ही मथुरा नगर पालिका पर काबिज रही, बावजूद इसके यहां अवैध रूप से पशुओं का कटान कभी बंद नहीं हुआ।
अब जबकि मथुरा नगर पालिका, नगर निगम में तब्‍दील हो चुकी है और भाजपा के ही डॉ. मुकेश आर्यबंधु मेयर हैं तब भी न तो अवैध पशुकटान बंद हुआ है और न यमुना में नाले गिरना बंद हो पाया है।
जाहिर है कि ऐसे में वर्तमान विपक्ष यह कहने से नहीं चूकता कि अब तो दिल्‍ली से लेकर लखनऊ तथा मथुरा तक भाजपा की सरकार है, फिर क्‍यों बंद नहीं हो पा रहा अवैध पशु कटान और क्‍यों यमुना में गिर रहा है नालों का पानी।
इस संबंध में बात करने पर याचिकाकर्ता गोपेश्‍वरनाथ चतुर्वेदी अत्‍यंत व्‍यथित हुए। उन्‍होंने कहा कि बेशर्म नेता, भ्रष्‍ट प्रशासन और तमाशबीन जनता के कारण यमुना का प्रदूषण घटने की बजाय बढ़ता जा रहा है। शासन-प्रशासन का कोई भी अंग यमुना की इस दयनीय दशा को लेकर चिंतित नहींं है। यही कारण है कि यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने के जितने भी और जो भी प्रयास जिस स्‍तर से किए गए, वो सब निष्‍फल साबित हुए हैं। यमुना में उसका अपना जल तो दिखाई ही नहीं देता। बाढ़ का पानी पूरी तरह उतर जाने के बाद यमुना उसी स्‍थिति को प्राप्‍त हो जाएगी जिस स्‍थिति में बाढ़ का पानी आने से पहले थी। मानव ही नहीं, नभचर एवं जलचरों के जीवन को ऑक्‍सीजन देने का काम करने वाली यमुना आज अपने लिए ऑक्‍सीजन के इंतजार में है। वह मृतप्राय हो चुकी है। जिस तरह सरकारी कागजों में यमुना की प्रदूषण मुक्‍ति के लिए दिए गए कोर्ट के समस्‍त आदेश-निर्देश काम कर रहे हैं, उसी तरह यमुना भी कागजों में बह रही है अन्‍यथा वह मृतप्राय है।
हर चुनाव में नेताओं की फौज आती है और यमुना के लिए घड़ियालू आंसू बहाकर अपना मकसद पूरा कर लेती है। कोई दिल्‍ली की गद्दी हथिया लेता है तो कोई यूपी की। स्‍थानीय स्‍तर पर भी ऐसे नेताओं की कमी नहीं जो यमुना के प्रदूषण को राजनीति का हथियार बनाकर मलाई मारते रहे और एक-दो बार नहीं कई-कई बार लोकसभा तथा विधानसभा में जा बैठे, किंतु इन लोगों ने यमुना को धोखे के अलावा कुछ नहीं दिया।
2019 के लोकसभा चुनावों में निश्‍चित ही यमुना को धोखा देने की एक और पटकथा लिखी जानी है।
चूंकि इस बार भाजपा का मुकाबला संभावित महागठबंधन के प्रत्‍याशी से होना है और चुनाव 2014 के मुकाबले कहीं अधिक कठिन होने की उम्‍मीद है इसलिए भ्रमजाल भी उतना ही बड़ा फैलाया जाएगा।
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कुछ दिन पहले अपने एक आदेश में गंगा नदी को ”जीवित मानव” का दर्जा दिया था। उस नजरिए से देखें तो युगों से यमुना को दिया गया मां का दर्जा बेमतलब नहीं है।
और जब यह दर्जा बेमतलब नहीं है तो यह कथन भी बेमतलब नहीं है कि 2019 का चुनाव कम से कम मथुरा में तो यमुना की लाश पर ही राजनीति करके लड़ा जाना है। यमुना की लाश पर तैरकर ही जयंत चौधरी एकबार फिर चुनावी वैतरणी पार करके लोकसभा पहुंचना चाहते हैं और इसी लाश को ट्यूब की तरह इस्‍तेमाल करके हेमा मालिनी दोबारा जीत का परचम लहराना चाहती हैं। दोनों ने अपने-अपने तरीके से इसकी तैयारी भी शुरू कर दी है, हालांकि अभी न तो महागठबंधन मुकम्‍मल हुआ है और न किसी का टिकट, परंतु इरादे मुकम्‍मल दिखाई दे रहे हैं।
वजह साफ है, और वह वजह यह है कि यदि यमुना को मैया कहने वाले ब्रजवासियों में ही अपनी मैया को लेकर वो दर्द नहीं है जो उसकी दुर्दशा पर राजनीति करने वालों को कोई सबक सिखा सकें तो मात्र चुनाव लड़ने के लिए यमुना का सहारा लेने वालों को दर्द क्‍यों होने लगा।
नेताओं को जब इंसानी लाशों पर राजनीति करने से परहेज नहीं है तो एक नदी की लाश से परहेज कैसा।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

नेताओं के कफ़न में जेब भी होती है जनाब, यकीन न हो तो उदाहरण सामने है

कहते हैं कि कफ़न में जेब नहीं होती, यदि कफ़न में भी जेब होती तो लोग अपने साथ क्‍या-क्‍या नहीं ले जाते।
पता नहीं यह फिलॉसफी किसकी थी और किन परिस्‍थितियों में गढ़ी गई लेकिन सच्‍चाई के धरातल पर देखा जाए तो इसमें संदेह ही संदेह नजर आते हैं।
तमिलनाडु के पूर्व मुख्‍यमंत्री और दिवंगत डीएमके नेता एम. करुणानिधि का ताजा-ताजा उदाहरण सामने है।
यूं तो इस देश में कोई भी नेता अपने लिए कभी खुद कुछ नहीं चाहता। वह जो कुछ चाहता है अपने समर्थकों, शुभचिंतकों, जनता जनार्दन और देश की भलाई के लिए चाहता है किंतु कौन नहीं जानता कि इस सबकी आड़ में वह अपनी चाहतें पूरी करता है। जो चाहत जीते-जी पूरी नहीं हो सकती, उसे भी मरने के बाद पूरी करने की व्‍यवस्‍था कर लेता है।
ऐसी ही दो चाहतें करुणानिधि की भी थीं। करुणानिधि चाहते थे कि उन्‍हें न सिर्फ मरीना बीच पर दफनाया जाए बल्‍कि उनकी समाधि भी वहीं अपने राजनीतिक गुरू सी एन अन्नादुरई के बगल में बनाई जाए। साम, दाम, दण्‍ड या भेद…जैसे भी हो…करनी तो मनमानी ही है इसलिए जब राज्‍य सरकार ने चाहत पूरी कराने में असमर्थता जाहिर की तो रात में ही मद्रास हाई कोर्ट खुलवा लिया गया। सुबह कोर्ट में सुनवाई हुई और कोर्ट ने दिवंगत करुणानिधि को अन्नादुरई के बगल में दफनाने की मांग स्‍वीकार करके उनकी समाधि बनाने का मार्ग भी प्रशस्‍त कर दिया। अब करुणानिधि समुद्र की लहरों के सामने मृत्‍यु के बाद भी उस जमीन के टुकड़े पर अनंतकाल तक काबिज़ रहेंगे जिस पर उनकी समाधि बनाई जाएगी।
दरसअल जे जयललिता, एम जी रामचंद्रन और अन्नादुरई…तीनों का अंतिम संस्कार मरीना बीच पर किया गया। करुणानिधि के समर्थक उनका समाधि स्थल यहीं बनाना चाहते थे।
इसके अलावा मरीना बीच चेन्नई शहर में बना समंदर का कुदरती किनारा है। ये उत्तर में फ़ोर्ट सेंट जॉर्ज से शुरू होता है और दक्षिण में फ़ोरशोर एस्टेट तक जाता है। ये क़रीब छह किलोमीटर में फैला है, जो इसे देश का सबसे लंबा कुदरती शहरी बीच बनाता है।
और ये जगह कई वजह से ऐतिहासिक है। साल 1884 में यहां प्रोमेनेड बना। साल 1909 में यहां देश का पहला एक्वेरियम बना।
आज़ादी के बाद यहां ट्रायंफ़ ऑफ़ लेबर और गांधी की ‘दांडी यात्रा’ वाली प्रतिमा लगाई गई।
साल 1968 में पहली वर्ल्ड तमिल कॉन्फ़्रेंस के समय तमिल साहित्य के कई दिग्गजों की प्रतिमाओं को यहां जगह दी गई।
साल 1970 में यहां अन्नादुरै का मेमोरियल बनाया गया और 1988 में एमजीआर का स्मारक बना।
इसके बाद कामराज और शिवाजी गणेशन का मेमोरियल बनाया गया और हाल में जयललिता का अंतिम संस्कार यहां किया गया था। कुछ समय में उनका स्मारक यहां बन सकता है। बन सकता है क्‍या, बन ही जाएगा।
चेन्नई में मरीना बीच पर्यटकों का पसंदीदा स्थल है। यहां लोग मेमोरियल और प्रतिमाएं, मॉर्निंग वॉक, जॉगर्स ट्रैक, लवर्स स्पॉट, एक्वेरियम देखने पहुंचते हैं। यहां दो स्वीमिंग पूल भी हैं, जिनमें से एक अन्ना स्वीमिंग पूल है।
जिस देश में कोई आम आदमी ताजिंदगी अपने सिर पर एक अदद छत का सपना पूरा करने में सफल नहीं हो पाता, उस देश में नेताओं की फौज एक ओर जहां अपनी सात-सात पीढ़ियों के लिए ऐशो-आराम का मुकम्‍मल बंदोबस्‍त कर जाती हैं वहीं दूसरी ओर अपनी मौत के बाद भी जमीन घेरने में सफल रहती हैं।
करुणानिधि तो एक उदाहरण हैं जिन्‍होंने लड़-मरकर कोर्ट के आदेश से अपनी समाधि का इंतजाम कर लिया अन्‍यथा देश का हर वो नेता जो कभी किसी अच्‍छे पद पर रहा है, मौत के बाद भी जमीन कब्‍जाए हुए है।
वह अपने जीतेजी जनमानस के दिलों पर कभी कब्‍जा कर पाया हो या न कर पाया हो लेकिन मरने के बाद जमीन पर कब्‍जा जरूर कर गया। यही कारण है कि जिन शहरों में लाखों लोग झुग्‍गी-झोंपड़ियों के अंदर पीढ़ी-दर-पीढ़ी नारकीय जीवन जीने को अभिशप्‍त हैं, उन्‍हीं शहरों की सबसे महंगी जमीनों पर दिवंगत नेता कब्‍जा किए हुए हैं।
कितने आश्‍चर्य की बात है कि आम आदमी के लिए आजतक न तो कभी कोई कोर्ट उसकी जरूरत के हिसाब से खुली और न किसी कोर्ट ने उसके सिर पर एक छत जरूरी होने का आदेश पारित किया किंतु नेताओं के लिए आधी रात में कोर्ट खुलती भी हैं और चंद घंटों के अंदर ऑर्डर-आर्डर-ऑर्डर बोलकर न्‍याय होने और न्‍याय दिखने की भी रस्‍म अदायगी करती हैं।
कोर्ट कभी उनके बारे में भी नहीं सोचतीं जो संज्ञेय अपराधों के तहत भी देश की विभिन्‍न जेलों में बंद हैं और उन जेलों में उनके मानवाधिकारों की खुलेआम धज्‍जियां उड़ाई जाती हैं। उन्‍हें जानवरों की तरह ठूंसकर इसलिए दड़बों सरीखी बैरकों में रखा जाता है क्‍योंकि जेलें ओवर क्राउडेड हैं। वो सिर्फ इसलिए उन बैरकों में ठुंसे हैं क्‍योंकि उनकी जमानत देने वाला कोई नहीं। उनकी अपनी हैसियत कोई नहीं। वह किसी नेता या किसी अधिकारी की औलाद नहीं।
एक ओर करोड़ों की तादाद में जिंदा लाशें और दूसरी ओर उंगलियों में गिने जाने लायक माननीय। मानव वो भी हैं और मानव ये भी हैं। वो जैसे तैसे रेंग रहे हैं और ये मरने के बाद भी जमीन कब्‍जा रहे हैं। इससे बड़ी विडंबना क्‍या कोई और हो सकती है।
सवाल ये नहीं है कि करुणानिधि को मरीना बीच पर दफनाने की अनुमति क्‍यों मिली, सवाल ये है कि कफन में जेब बनाने का सिलसिला कहां जाकर रुकेगा।
आज भी देश की बड़ी आबादी रोटी, कपड़ा और मकान जैसी अपनी मूलभूत जरूरतें पूरी करने में पूरी जिंदगी खपा देती है। आज भी आम आदमी अपनी उम्र का एक बड़ा हिस्‍सा न्‍याय की उम्‍मीद में जाया कर देता है किंतु उसकी सुनवाई कहीं नहीं होती लेकिन यदि 94 साल का जीवन जीकर, तीन शादियां करने वाला एक शख्‍स भरा-पूरा परिवार तथा उसके लिए अच्‍छी-खासी दौलत छोड़कर मरता है तो उसके लिए सिर्फ इसलिए भी रातों-रात सुनवाई होती है क्‍योंकि उसके कफन में जेब है। क्‍योंकि वह नेता है।
सुना है कि संविधान ने सबको बराबर का हक दिया है, क्‍योंकि संविधान के रचयिता बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर उस वंचित व दलित तबके से आते थे जिन्‍होंने गरीबी भोगी थी। गरीबी को जिया था।
क्‍या यही है बराबरी, क्‍या यही है संविधान से प्राप्‍त बराबरी का हक।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

अमित शाह की विपक्ष को “चुनौती” पर “पनौती” न बन जाए “मथुरा” BJP की गुटबाजी

यूपी में कल मुगलसराय जंक्‍शन का नाम बदलने के बाद आयोजित जनसभा के दौरान BJP के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अमित शाह ने विपक्ष को खुली चुनौती देते हुए कहा कि बुआ, बबुआ और बाबा के मिल जाने पर भी BJP ही जीतेगी।
अमित शाह ने दावा किया कि 2019 के लोकसभा चुनावों में BJP को यूपी से 2014 के मुकाबले 73 की जगह 74 सीटों पर तो जीत मिल सकती है, किंतु वह 72 नहीं हो सकतीं।
चूंकि 2019 के लोकसभा चुनावों में अब कुछ माह ही शेष हैं इसलिए BJP के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष का यूपी की धरती से किया गया यह दावा निश्‍चित ही बहुत अहमियत रखता है।
अमित शाह की संयुक्‍त विपक्ष को दी गई यह चुनौती सिर्फ विपक्ष के लिए ही नहीं, खुद BJP के लिए भी अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण है क्‍योंकि एक ओर जहां BJP के सहयोगी संगठन अक्‍सर उसके सामने समस्‍याएं खड़ी करते रहते हैं वहीं दूसरी ओर पार्टी के अंदर की गुटबाजी भी रह-रहकर सिर उठाती रहती है।
BJP के लिए 2019 का लोकसभा चुनाव 2014 के मुकाबले आसान नहीं होगा, इस बात से BJP के शीर्ष नेता भी न सिर्फ इत्तेफाक रखते हैं बल्‍कि मीडिया के सामने भी स्‍वीकारते हैं।
दरअसल, BJP का शीर्ष नेतृत्‍व भली-भांति समझ रहा है कि यदि BJP स्‍पष्‍ट बहुमत पाने में सफल नहीं हुई तो कर्नाटक वाली कहानी दोहराई जा सकती है। कर्नाटक में जिस तरह विपक्ष ने BJP को सत्ता से दूर करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था, उसने BJP को यह समझने में मदद की कि आने वाले समय में सीटों का मामूली अंतर भी उसके अरमानों पर पानी फेरने वाला होगा।
BJP में चाणक्‍य की उपाधि से विभूषित राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अमित शाह की इन सारी स्‍थिति-परिस्‍थितियों पर पैनी नजर होगी इसमें कोई संदेह नहीं, किंतु अपनी पार्टी में व्‍याप्‍त गुटबाजी पर उनकी उतनी ही पैनी नजर है, इसे लेकर संशय पैदा होता है।
दो दिन पहले मथुरा में घटी एक घटना इसका उदाहरण है। मथुरा में 04 अगस्‍त को 2019 के लोकसभा चुनावों की तैयारी के लिए BJP ने समन्‍वय समिति की बैठक बुलाई। इस बैठक में मथुरा की सांसद और प्रसिद्ध सिने अभिनेत्री दिखाई नहीं दीं जबकि उस दिन वह पहले से तय अपने कार्यक्रम के मुताबिक मथुरा में मौजूद थीं।
सांसद हेमा मालिनी का आगामी लोकसभा चुनावों की तैयारी के लिए बुलाई गई समन्‍वय समिति की बैठक में ही न पहुंचना बहुत से सवाल खड़े कर गया।
गौरतलब है कि इस बैठक में BJP के प्रदेश महामंत्री गोविंद शुक्‍ला, प्रदेश के ऊर्जा मंत्री और मथुरा-वृंदावन क्षेत्र के विधायक व प्रदेश सरकार के प्रवक्‍ता श्रीकांत शर्मा के अलावा पार्टी के बाकी तीनों विधायक, मेयर मुकेश आर्यबंधु सहित तमाम अन्‍य स्‍थानीय नेता तथा आगरा के विधायक और मथुरा के प्रभारी योगेन्‍द्र उपाध्‍याय भी मौजूद थे।
आश्‍चर्य तब हुआ जब इस सवाल का कोई एक संतोषजनक जवाब न देकर पार्टी स्‍तर से ऐसे जवाब दिए गए जो भ्रम फैलाने वाले थे। मसलन जिला मीडिया प्रभारी ने बताया कि सांसद हेमा मालिनी को बैठक की सूचना दी गई थी किंतु वह क्‍यों नहीं आईं, यह पता नहीं।
पार्टी सूत्रों की मानें तो हेमा मालिनी ने अपनी इस उपेक्षा को काफी गंभीरता से लेते हुए प्रदेश और दिल्‍ली स्‍तर पर भी शिकायत की, नतीजतन पार्टी के मथुरा प्रभारी को भविष्‍य में ऐसी गलती न होने का भरोसा दिलाना पड़ा।
उधर हेमा मालिनी ने स्‍पष्‍ट कहा है कि उन्‍हें बैठक में शामिल होने के लिए समन्‍वय समिति का कोई पत्र नहीं मिला। हेमा मालिनी ने हालांकि अपने पद व पार्टी की गरिमा का ध्‍यान रखते हुए यह भी जोड़ दिया कि शायद पार्टीजन मेरी मथुरा में मौजूदगी से अनभिज्ञ रहे होंगे।
इस सब के बावजूद मीडिया को दिए गए अपने बयान में हेमा मालिनी यह कहने से नहीं चूकीं कि कुछ लोग पार्टी में नए आए हैं इसलिए उन्‍हें पार्टी की रीति व नीति का ज्ञान नहीं है।
हेमा मालिनी का इशारा किस ओर था, इसे पार्टी और पार्टी के बाहर वाले लोग भी बखूबी समझ गए क्‍योंकि उन्‍होंने यह कहकर अपनी ताकत का अहसास करा दिया कि नए लोगों को साथ लेकर चलने की जिम्‍मेदारी भी उनकी है।
इसी दौरान हेमा मालिनी ने पार्टी में व्‍याप्‍त गुटबाजी पर जो कुछ कहा, वह चौंकाने वाला है। उन्‍होंने पहले तो मथुरा BJP में किसी तरह की गुटबाजी होने से इंकार किया किंतु फिर कहा कि यदि कोई गुटबाजी है भी तो वह समाप्‍त हो जाएगी।
उल्‍लेखनीय है कि मथुरा के जिलाध्‍यक्ष पद पर हाल ही में नगेन्‍द्र सिकरवार की नियुक्‍ति हुई है। नगेन्‍द्र सिकरवार को ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा का अत्‍यंत करीबी बताया जाता है। इससे पहले नगर निगम के लिए भी मुकेश आर्यबंधु का नाम तय कराने में श्रीकांत शर्मा की बड़ी भूमिका बताई जाती है।
श्रीकांत शर्मा यूं भी क्षेत्र में हेमा मालिनी से कहीं अधिक सक्रिय रहते हैं इसलिए ऐसे कयास भी लगाए जाने लगे हैं कि श्रीकांत शर्मा को पार्टी 2019 का लोकसभा चुनाव लड़वा सकती है। पार्टी के स्‍तर से भी इस बात के संकेत तब मिले जब यह बात निकल कर आई कि 2019 में कई महत्‍वपूर्ण हस्‍तियों का टिकट काटा जा सकता है।
यही कारण है कि चुनावों की तैयारी के लिए बुलाई गई समन्‍वय समिति की बैठक में सांसद हेमा मालिनी की अनुपस्‍थिति एक बड़ा मुद्दा बन गई और बैठक के दो दिन बाद तक उसे लेकर बयानों का सिलसिला जारी है।
जो भी हो, लेकिन समन्‍वय समिति की बैठक से उपजे हालात और उसके बाद आए बयान यह जाहिर कराने के लिए काफी हैं कि BJP में सब-कुछ ठीक तो नहीं चल रहा।
मथुरा की लोकसभा सीट हमेशा से BJP के लिए बहुत अहमियत रखती है और इसीलिए प्रत्‍येक चुनाव में मथुरा की उम्‍मीदवारी का चयन बहुत जद्दोजहद के बाद हो पाता है।
2009 के लोकसभा चुनाव में BJP ने अपना कोई उम्‍मीदवार न उतारकर रालोद को समर्थन दिया और 2014 के चुनाव में अभिनेत्री हेमा मालिनी को चुनाव लड़ाना पड़ा।
मथुरा जैसे महत्‍वपूर्ण संसदीय क्षेत्र से किसी बाहरी प्रत्‍याशी को चुनाव लड़ाने का पार्टी का निर्णय स्‍थानीय भाजपाइयों के लिए हमेशा असह्य रहा है क्‍योंकि उससे उनके अपने राजनीतिक भविष्‍य पर काले साए मंडराने लगते हैं लेकिन वह इस उम्‍मीद में कड़वा घूंट पी जाते हैं कि शायद अगली बार पार्टी उनके बारे में विचार करेगी।
मामूली उपकार पाकर अपने भविष्‍य से समझौता कर चुके कुछ भाजपाइयों की बात छोड़ दें तो ऐसे नेताओं की मथुरा में कोई कमी नहीं है जिन्‍हें लंबी रेस का घोड़ा कहा जा सकता है लेकिन पार्टी ने उनके प्रति उदासीन रवैया अपना रखा है।
लोकसभा चुनावों में 2009 से लगातार बाहरी प्रत्‍याशी और पिछले विधानसभा चुनावों में पांच में से दो बाहरी दलों से आए हुए प्रत्‍याशियों के चयन ने निष्‍ठावान भाजपाइयों को काफी आहत किया है। बसपा से आए लक्ष्‍मीनारायण चौधरी तो योगी सरकार में कबीना मंत्री भी हैं।
ऐसे में पार्टी के अंदर यदि 2019 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले कोई खिचड़ी पक रही हो तो आश्‍चर्य कैसा। आश्‍चर्य तो तब होता है जब भविष्‍य की खातिर उठने वाली हर आवाज़ को खारिज करके यह संदेश दिया जाता है कि ऑल इज़ वैल।
इस ऑल इज़ वैल के संदेश पर संशय पैदा करा देते हैं क्रिया की प्रतिक्रिया के रूप में आने वाले पार्टीजनों के बयान और अपनी-अपनी हैसियत दर्शाने वाले जवाब।
BJP के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष की चुनौती को संयुक्‍त विपक्ष किस तरह लेता है, यह तो वही जाने लेकिन यह हर कोई जानता है कि यदि मथुरा भाजपा इसी प्रकार ढपली बजाती रही तो यही ढपली राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष की चुनौती के लिए पानौती जरूर बन सकती है।
देखना यह है कि अमित शाह समय रहते चुनौती के लिए पनौती बन सकने वाली इन ढपलियों के सुर व ताल मिला पाते हैं या नहीं, अन्‍यथा चिड़ियों द्वारा खेत चुग जाने के बाद पछताने का कोई फायदा होने वाला नहीं है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

राजनीति के खेल में शायद इसे ही कहते हैं सेल्‍फ गोल या हिट विकेट

सुना है कि जब समय खराब चल रहा हो तो ऊंट पर बैठे हुए इंसान को भी कुत्ता काट लेता है। इसी कहावत के दूसरे पहलू को रामचरित मानस की इस चौपाई से समझा जा सकता है कि- जाकौं प्रभु दारुण दु:ख देहीं, ताकी मति पहले हरि लेहीं।
कहने का मतलब यह है कि ”कुछ करनी कुछ करम गति, कुछ करमन के भोग”।
कांग्रेस अध्‍यक्ष राहुल गांधी का संसद में प्रधानमंत्री मोदी से गले मिलने अथवा उनके गले पड़ने के बाद आंख मारने वाला प्रसंग अभी ठीक से समाप्‍त भी नहीं हुआ था कि अब कांग्रेस की ही संस्‍था यंग इंडिया द्वारा संचालित अंग्रेजी अखबार नेशनल हेराल्‍ड के दो समाचार सुर्खियां बन गए।
पहला समाचार रविवार 29 जुलाई के अंक में पहले पन्‍ने पर इस शीर्षक से प्रकाशित हुआ- “RAFALE: MODI’S BOFORS” । हिंदी में समझें तो ”राफेल: मोदी का बोफोर्स”।
इस समाचार को किसी ”भाषा सिंह” ने लिखा है। समाचार की ज्‍यादा गहराई में न जाकर भी इसकी हेडिंग से पता लगता है कि मोदी सरकार के ‘राफेल विमान’ सौदे की तुलना राजीव गांधी सरकार में हुए ‘बोफोर्स तोप’ सौदे से की गई है।
बोफोर्स तोप सौदे को पूरा देश बोफोर्स घोटाले के रूप में जानता है और उसका साया आज तक कांग्रेस का पीछा कर रहा है। हालांकि अदालतों में इसे घोटाला साबित नहीं किया जा सका।
नेशनल हेराल्‍ड की हेडिंग ने एकबार नए सिरे से बोफोर्स के उस जिन्‍न को बोतल से बाहर लाकर खड़ा कर दिया जिसे बंद करने के लिए कांग्रेस हर जतन करती रही है।
इस हेडिंग ने बोफोर्स को लेकर इतने प्रश्‍न एकसाथ खड़े कर दिए कि उनके सामने राफेल की बात बहुत पीछे छूट गई।
कांग्रेस का कोई नेता अब यह नहीं बता पा रहा कि क्‍या उनकी नजर में बोफोर्स एक घोटाला था ?
अगर कांग्रेस इसे घोटाला स्‍वीकार करती है तो ‘सेल्‍फ गोल’ करने जैसा होगा। अर्थात अदालत के बाहर जनअदालत में कन्‍फेस करना कि बोफोर्स की खरीद में घोटाला हुआ।
और यदि कांग्रेस इसे नकारती है तो फिर उसके लिए यह जवाब देना मुश्‍किल है कि उसकी ही संस्‍था द्वारा संचालित उस अखबार में जिसकी बुनियाद स्‍वयं जवाहर लाल नेहरू ने रखी थी, बोफोर्स तोप सौदे को घोटाला करार कैसे दे दिया ?
कांग्रेस के लिए जवाब देना इसलिए और भी मुश्‍किल है कि यदि बोफोर्स तोप सौदे में किसी प्रकार का कोई घोटाला नहीं हुआ तो उसकी राफेल डील से किस आधार पर तुलना की जा रही है?
इसी प्रकार दूसरे समाचार में नेशनल हेराल्ड की वेबसाइट ने मध्‍य प्रदेश में होने जा रहे विधानसभा चुनावों को लेकर एक सर्वे रिपोर्ट छापी है। यह सर्वे स्पीक मीडिया नेटवर्क ने किया था। इस सर्वे के मुताबिक मध्य प्रदेश में इस बार भी बीजेपी की सरकार बनने जा रही है। सर्वे ये भी कहता है कि मध्यप्रदेश में सीएम शिवराज सिंह और पीएम मोदी की लोकप्रियता बरकरार है।
कांग्रेसी विचारधारा का समर्थन करने वाले अख़बार तथा उसकी वेबसाइट में छपी इन दोनों खबरों का महत्‍व इसलिए और बढ़ जाता है कि कांग्रेस इन दिनों तमाम मीडिया घरानों पर मोदी समर्थक होने का आरोप लगाती रही है।
एक तरफ तमाम मीडिया घरानों पर आरोप और दूसरी तरफ अपनी ही संस्‍था के अखबार एवं वेबसाइट पर कांग्रेस की फजीहत कुछ वैसे ही है जैसे राहुल गांधी का संसद में किया गया प्रदर्शन।
अविश्‍वास प्रस्‍ताव पर बहस के दौरान राहुल गांधी ने संसद में जब प्रधानमंत्री को गले लगाया तो दलगत राजनीति से इतर सोच रखने वालों ने इसे तब तक उनकी सुहृयता समझा जब तक कि वह आंख मारते हुए नहीं पकड़े गए थे।
आंख मारकर उन्‍होंने अपना सारा खेल बिगाड़ लिया।
कांग्रेसियों ने उसके बाद भले ही उनके बचाव में यथासंभव दलीलें दीं और एक युवा नेता ने तो पत्रकारों से ही पूछ डाला कि क्‍या उन्‍होंने अपने जीवन में कभी आंख नहीं मारी, किंतु हकीकत यह है कि राहुल गांधी सेल्‍फ गोल कर बैठे।
उनके द्वारा संसद जैसे गरिमामय स्‍थान पर आंख मारना यह सिद्ध करने में सफल रहा कि कांग्रेस की अध्‍यक्षी मिल जाने के बावजूद वह मैच्‍योर नहीं हो पाए हैं।
राहुल गांधी के बचाव में पत्रकारों से सवाल करने वाले कांग्रेस के युवा नेता भी शायद यह भूल गए कि हर क्रिया-कलाप का महत्‍व मौके और दस्‍तूर के हिसाब से तय होता है।
सवाल यह नहीं है कि राहुल गांधी ने आंख क्‍यों मारी, सवाल यह है कि संसद के अंदर उन्‍होंने अविश्‍वास प्रस्‍ताव जैसे गंभीर मुद्दे पर बहस के दौरान तब आंख क्‍यों मारी जब वह कुछ क्षण पहले ही प्रधानमंत्री को गले लगाकर यह संदेश देने की कोशिश कर रहे थे कि उनके मन में किसी के प्रति कोई घृणा का भाव नहीं है और वह घृणा करने वालों को प्‍यार से जीतना चाहते हैं।
गले मिलकर कुर्सी पर बैठते ही उनके आंख मारने का सीधा संदेश यह गया कि देखो मैंने पीएम और भाजपाइयों को कैसा मूर्ख बनाया।
राहुल गांधी और कांग्रेस यह सब-कुछ इरादतन करते हैं या स्‍वभावगत उनसे ऐसा हो जाता है, यह तो वही जानें लेकिन इतना तय है कि खास कांग्रेसियों के अलावा कांग्रेस का भी एक अच्‍छा-खासा वर्ग यह मानता है कि कहीं न कहीं कुछ लोचा जरूर है।
कांग्रेस के वयोवृद्ध लोग राहुल गांधी को युवा नेता कहते हैं और हो सकता है कि उनकी दृष्‍टि में वह युवा हों भी किंतु 50 की उम्र को छूने वाला व्‍यक्‍ति जनसामान्‍य के लिए ‘अधेड़’ हो जाता है, और किसी अधेड़ व्‍यक्‍ति से बचकानी हरकतों की उम्‍मीद कोई नहीं करता। तब तो कदापि नहीं जब पूरी पार्टी का अस्‍तित्‍व और खुद उसका राजनीतिक करियर दांव पर लगा हो।
गलतियां किसी से हो सकती हैं और कभी भी हो सकती हैं परंतु यदि कोई गलतियों से सीख न लेकर उन्‍हें दोहराने और सही ठहराने का आदी हो जाए तो उसकी मदद ऊपर वाला भी नहीं कर सकता।
संसद से लेकर सड़क तक और अपने अखबार से लेकर तमाम मीडिया के सामने किया जा रहा कांग्रेस का प्रदर्शन यह बताता है कि उसने गलतियों से सबक न सीखने की जिद पकड़ ली है। अब यह जिद मोदी के सामने झुकता हुआ न दिखने की है अथवा कांग्रेस को नीचा दिखाने की, यह बता पाना तो मुश्‍किल है लेकिन इतना बताया जा सकता है कि राजनीति के खेल में इसे ही सेल्‍फ गोल या हिट विकेट कहते हैं।
हो यह भी सकता है कि कांग्रेस तथा कांग्रेसियों का खराब समय ही उससे यह सब-कुछ करवा रहा हो और इसीलिए ऊंट पर बैठने के बाद भी कुत्‍ते द्वारा काट लिए जाने की कहावत सटीक बैठ रही हो लेकिन ऐसा मानने वालों की भी कोई कमी नहीं कि जाकौं प्रभु दारुण दु:ख देहीं, ताकी मति पहले हरि लेहीं।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

डॉ. सुब्रह्मण्यम् स्वामी ने विनीत नारायण को बताया 21 वीं सदी का नटवर लाल, सीएम योगी आदित्‍यनाथ से की जांच की मांग, ब्रज फाउंडेशन ने दिया जवाब

वृंदावन निवासी विनीत नारायण को भाजपा के राज्‍यसभा सदस्‍य और तेजतर्रार नेता डॉ. सुब्रह्मण्यम् स्वामी ने 21 वीं सदी का नटवर लाल बताते हुए उनके द्वारा संचालित संस्‍था ‘द ब्रज फाउंडेशन’ की जांच सीबीआई से कराने को कहा है।
डॉ. सुब्रह्मण्यम् स्वामी ने इस सम्‍बन्‍ध में आठ पन्‍नों का एक पत्र उत्तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ को सौंपा है और खुद ट्वीट करके इसकी जानकारी दी है।

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दूसरी ओर इस पत्र के बारे में पूछे जाने पर विनीत नारायण ने प्रेस रिलीज के माध्‍यम से कहा है कि ‘द ब्रज फाउंडेशन’ पर डॉ. सुब्रह्मण्यम् स्वामी द्वारा लगाए गए सभी सनसनीखेज आरोपों का जवाब प्रमाण सहित ‘द ब्रज फाउंडेशन’ सीबीआई को इस अनुरोध के साथ सौंपने जा रही है कि सीबीआई इन सभी आरोपों की तुरंत निष्पक्ष जांच करवाए।
दरअसल सोनिया गांधी, राहुल गांधी, पी चिदंबरम तथा स्‍वर्गीय जयललिता जैसे दिग्‍गज नेताओं को अदालत के कठघरे तक ले जाने वाले भाजपा के फायरब्रांड नेता सुब्रह्मण्यम् स्वामी ने यूपी के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ को कल 28 जुलाई के दिन सौंपे अपने पत्र में विनीत नारायण तथा ‘द ब्रज फाउंडेशन’ पर अत्‍यंत गंभीर आरोप लगाए हैं।
सुब्रह्मण्यम् स्वामी के अनुसार मायावती सरकार में दो अन्‍य संस्‍थाओं के माध्‍यम से विनीत नारायण की संस्‍था ‘द ब्रज फाउंडेशन’ ने ब्रज क्षेत्र का मास्‍टर प्‍लान बनाने के नाम पर 57 लाख 65 हजार रुपए हड़प लिए।
सुब्रह्मण्यम् स्वामी का आरोप है कि ”धाम सेवा” की आड़ लेकर देश के बड़े उद्योगपतियों से पैसा उगाहने वाले विनीत नारायण और उनकी संस्‍था ‘द ब्रज फाउंडेशन’ एक्‍चुअली ”दाम सेवा” में लिप्‍त है।
यही कारण है कि मथुरा जनपद में ‘द ब्रज फाउंडेशन’ द्वारा कराये गए प्राचीन कुंडों एवं जलाशयों के जीर्णोद्धार को एनजीटी ने नियम विरुद्ध बताकर सख्‍त कार्यवाही करने के निर्देश जिला प्रशासन को दिए।
सुब्रह्मण्यम् स्वामी ने विनीत नारायण पर तमाम गरीब किसानों को उनकी भूमि से बेदखल करने का भी आरोप लगाया है।
सुब्रह्मण्यम् स्वामी ने यूपी के सीएम योगी आदित्‍यनाथ को लिखा है कि मथुरा के लिए बनाई गई ‘हृदय योजना’ में अपने राजनीतिक प्रभाव से ‘द ब्रज फाउंडेशन’ को ‘सिटी एंकर’ नामित कराकर विनीत नारायण ने पूरी योजना को ही पलीता लगा दिया है, बावजूद इसके अब तक उनके खिलाफ कोई कार्यवाही अमल में नहीं लाई गई है।
उन्‍होंने मथुरा की ‘हृदय योजना’ से विनीत नारायण और उनकी संस्‍था ‘द ब्रज फाउंडेशन’ को तत्‍काल बेदखल करने की भी मांग की है ताकि मथुरा के विनाश को रोका जा सके।
साथ ही ‘द ब्रज फाउंडेशन’ की समस्‍त गतिविधियों पर रोक लगाने तथा उसके आर्थिक लेनदेन को भी प्रतिबंधित करने की मांग सुब्रह्मण्यम् स्वामी ने अपने पत्र में की है।
पत्र में स्‍वामी ने इस बात का भी उल्‍लेख किया है कि मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण में उपाध्‍यक्ष के पद पर काबिज रहीं आईएएस अधिकारी यशु रुस्‍तगी ने हृदय योजना को गलत तौर-तरीकों से प्रभावित करने पर ‘द ब्रज फाउंडेशन’ से जुड़े राघव मित्तल के खिलाफ थाना सदर बाजार में आईपीसी की धारा 353, 183 व 186 और आपराधिक कानून (संसोधन) की धारा 7 के तहत केस दर्ज कराया था। सदर बाजार पुलिस 12 अप्रैल 2018 को इस केस में आरोप पत्र भी दायर कर चुकी है जिसका नंबर 253/18 है।
स्‍वामी ने ‘द ब्रज फाउंडेशन’ के पदाधिकारियों पर आपराधिक गतिविधियों में लिप्‍त रहने तथा सरकारी अफसरों को डरा-धमका कर उन्‍हें अपने कर्तव्‍य निर्वहन से रोकने जैसा गंभीर आरोप भी लगाया है।
स्‍वामी के आरोपों पर द ब्रज फाउंडेशन के सचिव व कालचक्र समाचार ब्यूरो के प्रबंधकीय संपादक रजनीश कपूर ने बाकायदा प्रेस-विज्ञप्ति जारी की है। इस विज्ञप्‍ति के माध्‍यम से कपूर ने सीबीआई को आश्वस्त किया है कि आरोपों के संदर्भ में जो भी जानकारी मांगी जाएगी, उसे द ब्रज फाउंडेशन सहर्ष उपलब्ध कराएगी।
विज्ञप्‍ति के अनुसार इससे पहले 19 जून 2018 को द ब्रज फाउंडेशन के अध्यक्ष विनीत नारायण ने संस्‍था का पिछले 13 वर्ष का आय-व्यय का संपूर्ण ब्यौरा भारत के नियंत्रक व महालेखाकार राजीव महर्षि को इस अनुरोध पत्र के साथ सौंपा था कि उनकी संस्था के विरूद्ध आय-व्यय के मामले में किसी भी तरह की जांच करवा ली जाए ताकि झूठे आरोप लगाने वाले बेनकाब हो सकें।
आज जारी विज्ञाप्ति में कपूर ने बताया है कि गत 4 जून 2018 को उन्होंने भारत सरकार के प्रवर्तन निदेशालय के एक ताकतवर अधिकारी राजेश्वर सिंह के विरूद्ध सर्वोच्च न्यायालय में आय से अधिक संपत्ति के मामले की जांच करवाने के लिए जनहित याचिका दायर की थी क्योंकि उन पर अपने पद का दुरुपयोग कर अकूत संपत्ति अर्जित करने के आरोप हैं।
उनके इस कदम से डा. स्वामी बुरी तरह विचलित हो गए और द ब्रज फाउंडेशन के विरुद्ध अनर्गल प्रलाप करने लगे।
कपूर ने आश्चर्य व्‍यक्‍त किया है कि भ्रष्टाचार के आरोपी एक जूनियर अधिकारी के खिलाफ जांच होने से डा. स्वामी इतना क्यों घबरा रहें हैं उनके इस अधिकारी से क्या सम्बन्ध हैं ?
कपूर के अनुसार डा. स्वामी ने इस केस में हस्तक्षेप करके तथा राजेश्वर सिंह ने रजनीश कपूर के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अदालत की अवमानना का मुकद्दमा दायर करके उन्‍हें डराने-धमकाने की भी कोशिश की पर सर्वोच्च न्यायालय ने इनकी कोशिशों पर पानी फेर दिया और दोनों की याचिकाएं अस्वीकार कर रजनीश कपूर की याचिका पर 27 जून 2018 को राजेश्वर सिंह के विरूद्ध जांच की छूट दे दी, जिस पर पहले रोक लगी थी।
कपूर के अनुसार तभी से डॉ. स्वामी बुरी तरह बौखलाए हुए हैं और इसी क्रम में उन्होंने मुख्यमंत्री योगी को ये बेबुनियाद आरोप पत्र भेजकर सनसनी पैदा करने का प्रयास किया है।
इसी संदर्भ में द ब्रज फाउंडेशन के अध्‍यक्ष विनीत नारायण का कहना है कि, ‘पत्रकारिता और ब्रज में जो कुछ मैंने गत 40 वर्षों में किया है, वह पूरे देश के सामने खुली किताब की तरह है। मैं हर तरह की जांच का स्वागत करूंगा और यह अपेक्षा रखूंगा कि आरोप गलत सिद्ध होने पर आरोप लगाने वाले अपनी सजा अभी से स्वयं ही तय कर लें जिससे फिर मुझे नाहक उनके विरुद्ध मानहानि का मुकदमा दायर न करना पड़े।’
-Legend news

एक मिनट में ‘मैगी’ भले ही न बने, लेकिन ‘हेमा जी’ सीएम बन सकती हैं…कोई शक !

मथुरा की सांसद और बॉलिवुड की स्‍वप्‍न सुंदरी हेमा मालिनी जी ने दो दिन पहले राजस्‍थान के बांसवाड़ा में दावा किया कि वह यदि चाहें तो एक मिनट के अंदर ‘मुख्‍यमंत्री’ बन सकती हैं।
सुन रहे हैं न योगी जी।
हालांकि कुछ लोग कहते हैं कि एक मिनट में तो ‘मैगी’ भी नहीं बन सकती जी…फिर हेमा जी ‘सीएम’ कैसे बन सकती हैं।
मेरा मानना है कि ऐसा कहने वाले विरोधी (भाजपा के नहीं, हेमा जी के) रहे होंगे अन्‍यथा हेमा जी तो हेमा जी हैं, क्‍या नहीं कर सकतीं। गनीमत है उन्‍होंने यह नहीं कहा कि मैं चाहूं तो एक मिनट में ‘पीएम’ बन सकती हूं।
हेमा जी यहीं नहीं रुकीं। उन्‍होंने कहा, लेकिन मैं ऐसा चाहती नहीं हूं क्‍योंकि इससे मेरा “फ्री मूवमेंट” रुक जायेगा। मैं “बंध” जाऊंगी।
यू नो…”बंधन” उन्‍हें पसंद नहीं है। उससे ”आजादी” छिन जाती है।
हेमा जी की बात में तो दम है। उन्‍होंने शादी बेशक की, किंतु शादी के ”बंधन” में कभी नहीं बंधी। ”मूवमेंट” उनका शादी के बाद भी उतना ही ‘फ्री’ रहा, जितना कि शोले में ‘बसंती’ बनकर रहा था।
मथुरा की जनता को भी अब यह बात भली-भंति समझ में आ गई होगी कि उन्‍हें ‘बंधन’ नहीं ‘फ्री मूवमेंट’ पसंद है इसीलिए वह मथुरा की जनता के चाहने से नहीं, अपनी मर्जी से अपने संसदीय क्षेत्र में ‘मूव’ करती हैं।
बहरहाल, मुझे तो योगी जी की चिंता हो रही है। सोच रहा हूं कि ‘गोरखनाथ मठ’ के इंतजामात दुरुस्‍त करवा दूं क्‍योंकि पता नहीं कब हेमा जी चाह बैठें और कब योगी जी की ‘मठ’ वापसी तय हो जाए।
पीएम पद 2019 से पहले वेेकेंट नहीं है और मोदी जी का उसे फिलहाल छोड़ने का इरादा भी नजर नहीं आता क्‍योंकि वह मठ से नहीं हठ से आए थे, इसलिए हेमा जी ने यदि चाह लिया तो योगी जी के पास ‘मठ’ लौटने के अलावा कोई विकल्‍प बचेगा नहीं।
मेरी तो योगी जी को यही सलाह है कि प्रदेश को सुधारने का ख्‍वाब देखना छोड़ो और जैसे भी हो लोकसभा चुनावों तक का समय निकाल लो।
चूंकि 2019 का लोकसभा चुनाव हेमा जी मथुरा से ही दोबारा लड़ने का मन बना चुकी हैं इसलिए हो सकता है कि 2019 में उनकी निगाहें पीएम पद पर जा टिकें। भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार का पहला पीएम ‘बनारस’ से हो सकता है तो दूसरा ‘मथुरा’ से नहीं हो सकता है क्‍या। ऐसा हुआ तो योगी जी बाकी ढाई-तीन साल और यूपी के ‘मठाधीश’ बने रह सकते हैं।
हेमा जी ने बांसवाड़ा में यह भी बताया कि उन्‍होंने सांसद बनने से पहले भी पार्टी यानी भाजपा के लिए बहुत काम किया था।
जब सांसद बनने का मन किया तो एक मिनट में मथुरा की सांसद बन गईं। इसके बाद चार साल से अनवरत मथुरा का विकास करा रही हैं। मथुरा में यमुना तो वर्षों से बह रही थी किंतु ‘गंगा’…(विकास की) उन्‍होंने लाकर बहा दी।
मथुरा के लिए हेमा जी ‘भागीरथ’ बनकर आईं और भाजपा की जटाओं के माध्‍यम से विकास की गंगा उलझा कर मथुरा में बहा दी। दो दिन की बारिश में पूरे जिले ने देखी है वो विकास की गंगा।
यमुना पर याद आया। हेमा जी ने तो यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने के भी बहुत प्रयास किए। अपने ‘फ्री मूवमेंट’ में से कुछ समय का ‘बंधन’ स्‍वीकार कर यमुना के किनारे अपने नृत्‍य का कार्यक्रम फिक्‍स किया लेकिन ‘यमुना पुत्रों’ ने एनजीटी से मिलकर उसमें रोड़ा अटका दिया।
‘यमुना पुत्र’ शायद तब नहीं जानते थे कि हेमा जी जिस काम की ठान लें, उसे रोक पाना किसी के बस में नहीं। उन्‍होंने मथुरा की वेटरनरी यूूनिवर्सिटी में न सिर्फ नृत्‍य का झक्‍कास कार्यक्रम किया बल्‍कि यह भी बताया कि यमुना को प्रदूषित करने और रखने में ऐसे ही ‘विघ्न संतोषियों’ का बड़ा हाथ है।
अब जबकि हेमा जी ने इस आशय का रहस्‍योद्घाटन किया है कि वह चाहें तो एक मिनट में मुख्‍यमंत्री बन सकती हैं, तब जाकर समझ में आया कि योगी जी क्‍यों उनके नृत्‍य कार्यक्रम में वेटरनरी यूूनिवर्सिटी दौड़े-दौड़े चले आए थे।
हमें भले ही अब जाकर पता लगा हो किंतु योगी जी तो जानते होंगे न कि हेमा जी जिस ‘मिनट’ चाह लेंगी, उस ‘मिनट’ उनकी ‘मठ’ वापसी हो जाएगी इसलिए बेचारे बरसाने से पहले वेटरनरी पहुंचे।
भाई! किसी को शक हो तो हो, मैगी चाहे दो मिनट से पहले न बनती हो, लेकिन मुझे पूरा विश्‍वास है कि हेमा जी चाह लेंगी तो एक मिनट में “सीएम” (अपने यूपी की) बन ही जायेंगी।
पीएम के काम की उन्‍होंने बांसवाड़ा में तारीफ की है जिससे साफ जाहिर है कि वह पीएम के काम से खुश हैं और पीएम की कुर्सी को 2018 में तो कोई खतरा नहीं है।
2019 की राम जानें। वह हेमा जी के मूड पर निर्भर करता है कि ‘सीएम’ बनना चाहती हैं या ‘पीएम’ बनना।
कुछ लोग यह कहते भी पाये गए हैं कि 2019 में यदि हेमा जी की ‘वन मिनट’ इच्‍छा ने जोर मारा तो संभव है ‘मोदी’ जी की जगह ‘योगी’ जी और योगी जी की जगह ‘हेमा’ जी दिखाई दें। सांसदी का क्‍या है, योगी जी ने भी त्‍यागी थी यूपी की खातिर 2017 में । 2019 में हेमा जी त्‍याग देंगी। वन मिनट…मैं अभी आता हूं। मेरी ‘मैगी’ उबल रही है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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