रविवार, 5 अगस्त 2012

माननीयों के लिए कानून ताक पर

आम आदमी पर आपराधिक आरोप हो तो उसे हथियार मिलना तो दूर लाइसेंस भी नहीं मिलता लेकिन सांसदों के मामले में ऐसा नहीं है।
साल 2001 से 2012 के बीच 82 सांसदों ने सरकार से बंदूकें खरीदीं। इनमें से 18 के खिलाफ गंभीर मामले दर्ज हैं। आरटीआई के जरिए यह जानकारी मिली है।

आरटीआई एक्टिविस्ट अंबरीश पांडे ने सांसदों के बंदूकें खरीदने की जानकारी मांगी थी। इसके मुताबिक बंदूक पाने वाले सांसदों में यूपी के अतीक अहमद पर 44 आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें हत्या और हत्या के प्रयास के छह-छह मामले हैं। उन्हें भी सरकारी बंदूकें बेच दी गईं।
कस्टम विभाग से मिले

शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

कसौटी पर कौन...टीम अन्‍ना या मीडिया ?

(लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष)
बुद्धिजीवी होने का भ्रम पाल लेने वाले पत्रकारों की जमात इस बार अन्‍ना और उनकी टीम के आंदोलन पर लगातार सवालिया निशान लगा रही है। इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े लोग विशेष रूप से सवालों की बौछार कर रहे हैं ।
इनके सवाल अपने-अपने चैनलों पर तो तथाकथित शालीनता के दायरे में होते हैं पर फेसबुक व टि्वटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स और वेब पोर्टल्‍स पर वह शालीनता लगभग गायब मिलती है । वहां यह तबका भी वही आचरण करता है जो जनसामान्‍य कहने वाला वर्ग कर रहा है ।

बुधवार, 1 अगस्त 2012

जन-लोकपाल नहीं, लोकपाल कहिए

रकार ''लोकपाल'' की बात तो करती है पर ''जन-लोकपाल'' का जिक्र तक उसे नागवार गुजरता है क्‍योंकि उसके साथ ''जन'' जो जोड़ दिया गया है।
धारावाहिक उपनिषद गंगा के 12 वें भाग में धनंजय नामक श्रेष्‍ठी कोटिकर्ण (करोड़पति व्‍यापारी) गंगा के घाट पर खड़े होकर कहता है कि कोई याचक बच गया हो तो वह भी मांग ले। है कोई और याचक यहां ?

शनिवार, 28 जुलाई 2012

ये तस्‍वीर डराती है अखिलेश बाबू.....

त्तर प्रदेश के विकास की ये कौन सी परिभाषा गढ़ रहे हैं अखिलेश यादव कि बुंदेलखंड में कर्ज़ के बोझ से दबे किसानों की खुदकुशी चार महीनों में चालीस का आंकड़ा छू रहा है वहीं उनके अपने जिले इटावा में लायन सफारी के लिए पूरी सरकारी ताकत झोंकी जा रही है। तस्‍वीर भयावह है.....

शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

..और सरकारी खाप पंचों का क्‍या!

देश व प्रदेशों में कुछ खाप सरकारी हैं और कुछ गैर सरकारी। कुछ फरमान व फतवे सरकारी स्‍तर से जारी किये जाते हैं, कुछ गैर सरकारी स्‍तर से  लेकिन हर हाल में शिकार होती है आमजनता । वह आमजनता जो सरकारी व गैर सरकारी यानी दोनों किस्‍म की खापों को खास बनाती है ।
(लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष)

सोमवार, 16 जुलाई 2012

मथुरा निकाय चुनाव:जे नर्म के पैसे ने पैदा कर दिये अचानक इतने खेवनहार

जरा विचार कीजिये कि जिन्‍हें न तो कोई वेतन-भत्‍ता मिलता है, न कोई सुविधा प्राप्‍त होती है। निर्णय लेने का कोई अधिकार हासिल नहीं है। संविधान ने कोई विशेष दर्जा भी नहीं दे रखा तो फिर घर फूंक कर तमाशा देखने को यह इतने उतावले क्‍यों हैं ?
(लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष) 
यूपी में निकाय चुनाव यूं तो लगभग सम्‍पन्‍न हो चुके हैं पर विभिन्‍न कारणों से कुछ जनपदों में मतदान होना अभी बाकी है। इन जनपदों में मथुरा भी शामिल है।

गुरुवार, 12 जुलाई 2012

सवाल अनेक पर जवाब किसी का नहीं

मैं नहीं समझ पा रहा हूं कि भारत तब अधिक गौरवशाली था जब गरीबी के बावजूद उसकी सांस्‍कृतिक समृद्धि का सारी दुनिया लोहा मानती थी या आज अधिक गौरवशाली है जब उसकी गिनती विश्‍व के भ्रष्‍टतम देशों में की जाती है ?
कुछ समय पहले तक भारत को सपेरों और साधु-सन्‍यासियों का देश कहा जाता था । गरीब देश कहा जाता था । नेता कहते हैं कि भारत ने बहुत तरक्‍की की है । अब दुनिया का कोई देश भारत को सपेरों का देश नहीं कहता ।
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