गुरुवार, 12 जुलाई 2012

सवाल अनेक पर जवाब किसी का नहीं

मैं नहीं समझ पा रहा हूं कि भारत तब अधिक गौरवशाली था जब गरीबी के बावजूद उसकी सांस्‍कृतिक समृद्धि का सारी दुनिया लोहा मानती थी या आज अधिक गौरवशाली है जब उसकी गिनती विश्‍व के भ्रष्‍टतम देशों में की जाती है ?
कुछ समय पहले तक भारत को सपेरों और साधु-सन्‍यासियों का देश कहा जाता था । गरीब देश कहा जाता था । नेता कहते हैं कि भारत ने बहुत तरक्‍की की है । अब दुनिया का कोई देश भारत को सपेरों का देश नहीं कहता ।

खुलासा: बॉलीवुड में लगता है नेताओं का काला धन


मंगलवार, 10 जुलाई 2012

45 लाख करोड़ का काला धन विदेश में

समाचार ऐजेंसी पीटीआई के मुताबिक भारतीय वाणिज्‍य उद्योग परिसंघ फिक्की ने कहा है कि अगर भारत की सरकार 45 लाख करोड़ रुपए के काले धन को विदेश से देश ले आए, तो भारत की अर्थव्यवस्था को काफी फायदा हो सकता है.
भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय मंदी से जूझ रही है और ऐसी आशंका है कि चालू वित्तीय वर्ष के सकल घरेलू उत्पाद में 5.13 लाख करोड़ रुपए का घाटा हो सकता है.

सोमवार, 9 जुलाई 2012

THE UNDERACHIEVER PM:TIME MAGAZINE

विश्‍व की प्रतिष्ठित टाइम पत्रिका ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कामकाज पर सख्त टिप्पणी करते हुए उन्हें अंडरअचीवर बताया है.
'पत्रिका के ताजा अंक में मनमोहन सिंह को निशाना बनाया गया है. पत्रिका में कहा गया है कि मनमोहन सिंह लोगों की उम्मीद पर खरे नहीं उतर रहे.
टाइम पत्रिका की कवर स्टोरी में प्रधानमंत्री की काबिलियत पर सवाल उठाया गया है. टाइम ने लिखा है कि मनमोहन उम्मीद से कम कामयाबी हासिल करने वाले शख्स साबित हुए हैं.

शनिवार, 7 जुलाई 2012

बड़ों को रास नहीं आ रहा RTI एक्‍ट

आने वाले सालों में बेमतलब हो सकता है सूचना का अधिकार
सरकारी अधिकारियों को ट्रेनिंग में सिखाया जाता है कि कैसे जवाब देने से बचा जाए। यह कहना है शैलेश गांधी का जो छह जुलाई को सूचना आयुक्त के पद से सेवानिवृत हो रहे हैं।

मंगलवार, 3 जुलाई 2012

WOW CM साहब : न जन का मान, न तंत्र का भान

लोहिया को अपना आदर्श और खुद को धरती पुत्र कहलाने वाले मुलायम सिंह के पुत्र का यह कैसा समाजवाद है जो जनप्रतिधियों को जनता के पैसों से  मौज कराने का हिमायती है।
एक ओर जहां आम जनता महंगाई व भ्रष्‍टाचार से त्रस्‍त है और कानून-व्‍यवस्‍था की बदहाली ने उसका जीना हराम कर रखा है वहीं दूसरी ओर अखिलेश सरकार के अजीबो-गरीब फैसले ''जले पर नमक छिड़कने'' की कहावत को चरितार्थ करते नजर आते हैं।

शनिवार, 30 जून 2012

अबू जंदाल: सिर्फ आतंकी या कुछ और..

ऐसा लगता है कि हमारे मंत्रीगण अधिकांश मामलों और विशेषकर पाकिस्‍तान से जुड़े मुद्दों पर या तो अपनी बुद्धि व विवेक का इस्‍तेमाल किये बिना अमेरिका की लिखी हुई स्‍क्रिप्‍ट पढ़ते हैं या फिर वह इतनी अक्‍ल भी नहीं रखते जितनी कि उच्‍च पदों पर आसीन लोगों के लिए जरूरी होती है।
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